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रिवर्स माइग्रेशन: महामारी के साल भर बाद भी मज़दूरों को सरकारों पर नहीं हुआ विश्वास!
आज देश में कोरोना की दूसरी लहर है। कई राज्य फिर से लॉकडाउन लगा रहे हैं। एक सवाल जो उठ रहा है, वह यह कि इस दौरान क्या कुछ बदला है? मज़दूरों की सुरक्षा के लिए क्या कुछ हुआ? क्या सरकारें मज़दूरों को भरोसा दिला सकी हैं कि वो उनके लिए भी है?
मुकुंद झा
21 Apr 2021
 रिवर्स माइग्रेशन: महामारी के साल भर बाद भी मज़दूरों को सरकारों पर नहीं हुआ विश्वास!
फोटो साभार : विकास कुमार की फेसबुक वॉल से

देश एक साल पहले कोरोना की शुरुआत के साथ जिस दुखद रिवर्स माइग्रेशन को देख चुका है, आज कमोबेश फिर वही नज़ारा है। यानी शहरों में आए प्रवासी मज़दूरों का मजबूर होकर वापस अपने गांव घरों की तरफ जाना।

पिछले साल मज़दूरों को इन सब के लिए कितनी भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन वो सब झेलते हुए वह वापस गए। इस दौरान कई मज़दूरों को महामारी ने नहीं बल्कि सरकारी लापरवाहियों ने मारा, कभी ट्रक से कुचलकर तो कभी सड़क पर भूख से या फिर ट्रेन से कटकर मज़दूरों ने अपनी जान गंवाई। इसके बाद सरकारों ने बड़े बड़े दावे किए चाहे वो प्रवास वाला राज्य हो या उनका अपना राज्य लेकिन आज देश में कोरोना की दूसरी लहर है। कई राज्य फिर से लॉकडाउन लगा रहे हैं। एक सवाल जो उठ रहा है, वह यह कि इस दौरान क्या कुछ बदला है?

मज़दूरों की सुरक्षा के लिए क्या कुछ हुआ? क्या सरकारें मज़दूरों को भरोसा दिला सकी हैं कि वो उनके लिए भी है? इन सभी का जवाब आज के हालात देखकर लगता है बिल्कुल नहीं! 

प्रवासी मज़दूर फिर एकबार अपनी जान पर खेलकर अपने घर लौटना चाहता है।  दूसरी लहर और देश के आंशिक इलाको में लगाए लॉकडाउन के बीच ही मज़दूरों ने पलायन शुरू कर दिया और इस बीच ऐसे खबरे भी आई कि रास्ते में ही उनकी मौत भी हो रही है। 

अब तक दो अलग अलग घटनाओ में कम से कम तीन मज़दूरों की मौत हो चुकी है। 

पहली घटना में प्रवासी मजदूरों से भरी एक बस मंगलवार की सुबह ग्वालियर के पास पलट गई। हादसे में दो मजदूरों की मौत हो गई जबकि आठ अन्य घायल हो गये। हादसा ग्वालियर-झांसी राजमार्ग पर जौरासी घाटी के पास एक मोड़ पर सुबह करीब नौ बजे हुआ।

दिल्ली में लॉकडाउन होने के बाद एक बस प्रवासी मजदूरों को लेकर मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ होते हुए छतरपुर जा रही थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बस में सैकड़ों से ज्यादा लोग सवार थे। जो उसकी क्षमता से कहीं अधिक थे। 

अधिकारियों ने बताया कि इस हादसे में दो यात्रियों की मौत हुई है और करीब आठ लोग घायल हुए हैं। इन सभी घायलों को मेडिकल कॉलेज के जयारोग्य अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

 उन्होंने कहा, ‘‘इस बस में क्षमता से ज्यादा यात्री सवार थे, इसकी जांच की जाएगी। लेकिन फिलहाल घायलों के इलाज और सभी मजदूरों को घर भेजने पर ध्यान दिया जा रहा है।’’

इसी बीच हादसे के तुरंत बाद मध्य प्रदेश के परिवहन आयुक्त अरविंद सक्सेना मौके पर पहुंचे। सक्सेना ने कहा इस बस में क्षमता से ज्यादा यात्री सवार थे यानी ओवरलोड थी। इसकी जांच की जा रही है और बस में सवार मजदूरों से बात करके जानकारी ली जा रही है।

जब सक्सेना से पूछा गया कि प्रदेश में ओवरलोड बसों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई तो उन्होंने कहा, ‘‘फरवरी के बाद पूरे राज्य में 24,000 बसों की जांच की गई और 3000 बसों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी गई और 2500 बसों के परमिट भी निरस्त किए गए।’’

वहीं, बस में सवार एक यात्री गनपत लाल ने बताया, ‘‘बस में ड्राइवर के साथ पूरे स्टाफ ने धौलपुर में रात में खाना खाया और शराब पी। धौलपुर में ही बस ड्राइवर ने एक ट्रक में टक्कर मार दी, उसके बाद यहां ग्वालियर के पास बस पलटा दी। इस बस में 100 से ज्यादा यात्री सवार थे और बस की छत पर भी यात्री बैठे थे। दिल्ली से टीकमगढ़ के लिए बस कंडक्टर ने 700 रुपए प्रति यात्री की वसूली की।’’

दूसरी घटना: गुजरात के सूरत से ओडिशा के गंजाम जिले में लौट रहे 39 वर्षीय प्रवासी कामगार की मौत हो गई। गवर्मेंट रेलवे पुलिस (जीआरपी) ने मंगलवार को यह जानकारी दी।

जीआरपी कर्मियों ने मंगलवार सुबह बेहरामपुर रेलवे स्टेशन पर पहुंची अहमदाबाद-पुरी एक्सप्रेस ट्रेन से कामगार का शव बरामद किया। मृतक की पहचान गंजाम ब्लॉक के खंडादेवली गांव के निवासी विश्वनाथ जेना के रूप में हुई है।

जीआरपी बेहरामपुर की प्रभारी निरीक्षक ज्योति प्रकाश नायक ने कहा, "हम कोविड-19 के चलते उसकी मौत की बात से इनकार नहीं कर सकते। पोस्टमॉर्टम के बाद मौत का सटीक कारण पता चल पाएगा। कोविड-19 दिशा-निर्देशों के साथ पोस्टमॉर्टम किया जाएगा।"

जेना ने कहा, "सूरत से जब उसने यात्रा शुरू की थी तब उसकी स्थिति सामान्य थी। लेकिन ट्रेन में दस्त आने के बाद उसकी तबीयत खराब होने लगी। सोमवार रात उसकी मौत हो गई।"

यह सब देखने के बाद एक बात स्पष्ट है कि मज़दूरों के लिए कल भी वही हालात थे और आज भी वही हैं। एकबार फिर सरकारों ने सड़को पर मज़दूरों की मरती तस्वीरों के सामने आने के बाद बैठके शुरू कर दी और उन्हें भाषणों के माध्यम से आश्वासन भी दे रहे हैं लेकिन सरकारों को आज महामारी के एक साल बाद भी समझ नहीं आ रहा है कि भाषण से शासन व्यवस्था नहीं चलती है। जो मज़दूर जा रहे हैं उन्हें यह डर है कि आगे उनके घरों में राशन होगा या नहीं या उन्हें इलाज़ मिलेगा भी या नहीं। इन सवालों पर सरकारों ने मुंह बंद किया हुआ है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन घोषणा के साथ कहा 'मै हूँ न' लेकिन यह नहीं बताया की अगर मज़दूरों को राशन चाहिए या इलाज़ तो वो कैसे मिलेगा। इसके साथ ही प्रवासी मज़दूर गांव में रह रहे अपने बाकि परिजनों को लेकर भी चिंतित है कि उनका क्या हाल होगा? 

हालाँकि कल मंगलवार को केजरीवाल सरकार ने निर्माण मज़दूरों को 5 हज़ार आर्थिक मदद का आश्वसन दिया।  हालांकि निर्माण मज़दूर बोर्ड में जमा मज़दूरों के फंड से ही दिया जाएगा।  लेकिन ये पैसा सिर्फ निर्माण मज़दूरों को ही मिलेगा बाकि रेहड़ी पटरी ,रिक्शा और अन्य दिहाड़ी कामगार इसमें नहीं आएँगे।  निर्माण मज़दूरों में भी सिर्फ उनको जिनका निर्माण मज़दूर कार्ड बना हुआ है ,जबकि पिछले सालो में सरकारों ने इस कार्ड बनाने की प्रक्रिया को इतनी जटिल बना दिया है जिससे मज़दूरों की बड़ी संख्या इस लाभ से वंचित ही रहेगी।   

दिल्ली के उप-राज्यपाल ने लॉकडाउन की घोषणा के बाद प्रवासियों के शहर छोड़ने पर चिंता जताई

दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल ने राजधानी में छह दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद प्रवासी श्रमिकों के शहर छोड़ने पर मंगलवार को चिंता जताई और हालात से निपटने की ज़िम्मेदारी प्रधान सचिव(गृह) तथा विशेष पुलिस आयुक्त को सौंपी।

अधिकारियों ने बताया कि बैजल ने हालात का जायजा लेने के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा मुख्य सचिव के साथ आपात बैठक की और उनसे प्रवासियों की वापसी को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाने को कहा।

केजरीवाल ने राष्ट्रीय राजधानी में सोमवार रात 10 बजे से 26 अप्रैल सुबह पांच बजे तक लॉकडाउन की घोषणा की है।

उनकी घोषणा के फौरन बाद आनंद विहार और आईएसबीटी पर हजारों प्रवासी मजदूर पहुंचने लगे जो बसों में बैठकर अपने घरों को जाना चाहते हैं।

हालांकि मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन की घोषणा करते हुए लोगों को भरोसा दिलाया था और कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि यह लॉकडाउन छोटा रहेगा और लोग दिल्ली छोड़कर नहीं जाएं।

 उन्होंने यह आश्वासन देते हुए कहा था, ‘‘मैं हूं ना’’।

बैजल ने मंगलवार को ट्वीट किया, ‘‘मैं दिल्ली के सभी प्रवासी नागरिकों से अपील करता हूं कि डर की वजह से शहर छोड़कर नहीं जाएं। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि सरकार कोरोना वायरस महामारी के इस हालात में आपकी समस्त जरूरतों का ध्यान रखेगी। आपके लिए सभी प्रबंध किये जा रहे हैं।’’

उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा कि प्रवासी श्रमिक अपने परिश्रम से दिल्ली चलाते हैं और दिल्ली उनकी है।

उप-राज्यपाल ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि प्रवासी कामगारों के लिए भोजन और आश्रय की व्यवस्था की जाए। 

अधिकारियों के मुताबिक बैजल ने अधिकारियों से कहा है कि ऑक्सीजन संयंत्र वाले अस्पतालों को उत्पादन बढ़ाने के लिए जरूरी अनुमति दी जाए।

इस बैठक के बाद भी वही सवाल है कि उनकी घोषणा में ऐसा क्या है जिस पर मज़दूर भरोसा करे? पिछली बार की अपनी दुर्गति याद है कैसे मज़दूर दो वक्त के भोजन के लिए मोहताज़ हो गया था। ऐसी बैठकों में सरकारों को प्रवासी मज़दूरों के राहत के लिए कोई पैकेज की घोषणा नहीं करनी चाहिए या अभी वो पहले सड़कों पर कोहराम का इंतजार करेंगे फिर सरकार लाखों-करोड़ों के पैकेज की घोषणा करेगी और वो किस के लिए होगा वो भी बड़ा सवाल है। हालाँकि विपक्ष लंबे समय से केंद्र सरकार से सीधे मज़दूरों की मदद का आह्वान कर रही है। 

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को कहा कि कोरोना वायरस संकट के चलते शहरों से पलायन कर रहे प्रवासी मजदूरों के बैंक खातों में पैसे डालने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है।

पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी कहा कि गरीबों, श्रमिकों और रेहड़ी-पटरी वालों को नकद मदद दी जानी चाहिए।

राहुल गांधी ने 20 अप्रैल को ट्वीट किया, ‘‘प्रवासी मजदूर एक बार फिर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है कि उनके बैंक खातों में रुपये डाले जाएं। लेकिन कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने के लिए जनता को दोष देने वाली सरकार क्या ऐसा जन सहायक क़दम उठाएगी?’’

प्रियंका ने 20 अप्रैल को ट्वीट कर कहा, ‘‘ कोविड महामारी की भयावहता देखकर यह तो स्पष्ट था कि सरकार को लॉकडाउन जैसे कड़े कदम उठाने पड़ेंगे, लेकिन प्रवासी श्रमिकों को एक बार फिर उनके हाल पर छोड़ दिया गया। क्या यही आपकी योजना है? नीतियां ऐसी हों जो सबका ख्याल रखें।’’

उन्होंने सरकार से आग्रह किया, ‘‘गरीबों, श्रमिकों, रेहड़ी-पटरी वालों को नकद मदद वक्त की मांग है। कृपया यह करिए।’’

वाम दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने भी सरकार से मज़दूरों की मदद करने की अपील की है माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने सरकार से नौ बिन्दुओं पर काम करने को कहा जो इस प्रकार हैं - 

1. आवश्यकता के अनुरूप पीपीई हासिल करो और उपलब्ध कराओ।

2. टेस्टिंग को तेजी से बढ़ाओ।

3. सभी गैर-आयकर दाता परिवारों के लिए फौरन 7,500 रु. का नकद हस्तांतरण करो।

4. सभी जरूरतमंदों के लिए मुफ्त खाद्यान्न का वितरण करो।

5. वित्तीय उत्प्रेरण पैकेज को मौजूदा 0.8 फीसद से बढ़ाकर जीडीपी का कम से कम 5 फीसद करो।

6. उदारता से फंड देकर राज्य सरकारों की सहायता करो।

7. लागत का दुगुना + 50 फीसद के हिसाब से घोषित समर्थन मूल्य पर किसानों की पैदावार खरीदो और काम हो या नहीं, सभी रजिस्टर्ड मनरेगा मजदूरों को मजदूरी दो।

8. मजदूरों/कर्मचारियों को रोजगार छिनने तथा मजदूरी कटौती से बचाने के लिए मालिकान को वित्तीय सहायता दो।

9. प्रवासी मजदूरों के अपने घर लौटने की व्यवस्था करो।

हालाँकि विपक्ष के द्वारा सुझाए गए किसी भी सुझाव पर सरकार कुछ करती हुई नहीं दिखी। कल यानी मंगलवार को कथित तौर पर सबसे मज़बूत प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित किया। उनके पूरे 19 मिनट के भाषण मे कही भी मज़दूरों की चिंताओं का कोई हल नहीं दिखा। उन्होंने लोगों से धैर्य रखने को कहा लेकिन शायद वो नहीं जानते इस त्राहिमाम में धीरज और धैर्य भाषण में ही सही है। लोग आज भयभीत हैं, उन्हें ये आशंका है की कल उनके साथ क्या होगा? वैसे भी मोदी सरकार के साथ मज़दूरों के सभी अनुभव खट्टे ही हैं।

(समाचार एजेंसी भाषा इनपुट के साथ )

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Ground reality of the workers
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Workers rights
India
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