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समय-स्‍वर: 'रामराज्‍य आ गया है!'

''चारों ओर सुख-शांति है। प्रेम-प्रीत का वातावरण है। लोग धर्म के अनुसार आचरण कर रहे हैं। प्रजा सुखी है। माननीय मोदी जी भलीभांति राजधर्म का पालन कर रहे हैं।''
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आज रविवार होने के कारण मेरी छुट्टी थी। मोर्निंग वाक से लौट रहा था तो सोचा अपने पड़ोसी और मित्र पवनपुत्र शर्मा जी से मिल लिया जाए। यदा-कदा उनसे मिलना होता रहता है। कभी वह मेरे घर तो कभी मैं उनके घर चला जाता हूं। शर्मा जी एक सरकारी अधिकारी हैं। जब मैंने उनके घर में प्रवेश किया तो शर्मा जी अपने ड्राईंग रूम में बैठे टी.वी. पर न्‍यूज देख रहे थे। अभिवादन के आदान-प्रदान के बाद उन्‍होंने मुझे सोफे पर बैठने का संकेत किया और रिमोट उठाकर टी.वी. बंद किया। फिर उन्‍होंने भाभीजी (अपनी पत्‍नी) को आवाज लगाई और दो कप चाय का ऑर्डर किया। कुशल-क्षेम पूछने के बाद मैंने उनसे कहा, ''बड़े खुश नजर आ रहे हैं! कोई खुशखबरी है क्‍या?'' तब तक मेरे और उनके बीच रखे टेबल पर चाय-नाश्‍ता लग गया था। पहले उन्‍होंने गर्मागर्म चाय का घूंट भरा। चाय का कप टेबल पर रखते हुए गदगद भाव से बोले -''खुशखबरी की तो पूछिये ही मत, मैं समझता हूं इससे बड़ी खुशखबरी मेरे जीवन में आज तक नहीं मिली। जीवन धन्‍य हो गया - रामलला के दर्शन करके!''

''मगर शर्मा जी आप तो अयोध्‍या गए नहीं।''

''मैंने टी.वी.पर ही दर्शन कर लिए। इसके लिए सबसे तेज चैनल बधाई का पात्र है जिसने घर बैठे ही रामलला के दर्शन करा दिए। प्रात: स्‍मरणीय परम आदरणीय माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने ज्‍योंही रामलला की प्रस्‍तर प्रतिमा में प्राण प्रतिष्‍ठा की। जीवंत, अद्भुत नजारा देखने को मिला। मैं तो इतना अभिभूत, इतना भावुक हो गया कि मेरी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। सब कुछ राममय हो गया। परमानंद का पल था...''

मैं चायपान करते हुए उनकी बातें सुन रहा था। उनसे मेरी अक्‍सर बहस हो जाती है। पर वह इतने व्‍यावहारिक हैं कि मतभेद होते हुए भी पड़ोसियों और मित्रों से रिश्‍ता नहीं तोड़ते। जानते हैं वक्‍त-बेवक्‍त मित्र और पड़ोसी ही काम आते हैं। इसलिए मतभेद होते हुए भी, बहस करते हुए भी, वे उग्र नहीं होते। शांत बने रहते हैं। और विचारों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। उनकी इस व्‍यावहारिक समझ पर मुझे किसी शायर की दो पंक्तियां याद आती हैं कि 'दुश्मनी जम कर करो पर इतनी गुंजाइश रखो, गर कभी हम दोस्‍त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।' मैंने उनसे कहा- ''शर्मा जी, आप की भावनाओं और भावुकता की कद्र करता हूं पर कोई इंसान किसी पत्‍थर की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्‍ठा कैसे कर सकता है।''

शर्मा जी- ''आप नहीं समझेंगे, आप के लिए महाकवि गोस्‍वामी तुलसीदास पहले ही कह गए हैं कि 'जाकी रही भावना जैसी प्रभुमूरत देखी तिन तैसी।' वैसे आपको बता दूं कि मैंने तो रामचरित मानस बहुत पहले ही खरीद रखी है। वरना आजकल इसकी इतनी डिमांड है कि गीता प्रेस गोरखपुर वाले पूरी नहीं कर पा रहे हैं। अब देखिए एक नए युग की शुरुआत हो गई है। रामराज्‍य आ गया है। रामचरित मानस में इसके बारे में लिखा है - 'नहिं दरद्रि कोउ दुखी न दीना, नहिं कोउ अबुध न लच्‍छनहीना। दैहिक, दैविक, भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहिं ब्‍यापा। सब नर करहिं परस्‍पर प्रीती। चलहिं स्‍वधर्म निरत श्रुति नीती। किेसी को भी किसी भी प्रकार का कष्‍ट नहीं है। ईर्ष्‍या-द्वेष घृणा का नाम नहीं है। कहीं कोई हिंसा नहीं है। चारों ओर सुख शांति है। प्रेम-प्रीत का वातावरण है। लोग धर्म के अनुसार आचरण कर रहे हैं। प्रजा सुखी है। माननीय मोदी जी राजधर्म का भलीभांति पालन कर रहे हैं।''

मैंने कहा - ''शर्मा जी, किस रामराज्‍य की बात कर रहे हैं आप। राम राज्‍य में कोई दुखी नहीं होता है। पर आप भी जानते हैं कि बाबरी मस्जिद तोड़ कर मंदिर बनाया गया है। मुसलमानों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। वे दुखी हैं। दलितों, आदिवासियों पर वर्चस्‍वशाली दबंगों द्वारा अत्‍याचार किए जा रहे हैं। महिलाओं-लड़किेयों से सामूहिक बलात्‍कार हो रहे हैं। सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि राम की अयोध्‍या वाले उत्तर प्रदेश में अपराधों का ग्राफ सबसे ऊपर है। आम जनता जिसे आप प्रजा कह रहे हैं वह गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, भुखमरी से त्रस्‍त है। पीड़ि‍तों को न्‍याय नहीं मिल रहा है। राहुल गांधी न्‍याय के लिए भारत जोड़ो न्‍याय यात्रा निकाल रहे हैं। ऐसे में इसे रामराज्‍य कैसे कहा जा सकता है।''

''देखिए, जिनके साथ अत्‍याचार हो रहा है, वे अपने पूर्व जन्‍मों के कुकर्मों का फल भुगत रहे हैं। इसमें प्रभु राम का कोई दोष नहीं है और न माननीय प्रधानमंत्री जी का। मोदी-योगी जी ने प्रजा को राम के दर्शन कराने के लिए इतना भव्‍य और दिव्‍य राम मंदिर बनवा दिया। ये उनकी बड़ी उपलब्धि है। संक्षेप में ही कह सकता हूं कि 'होहि है सोई जो राम रचि राखा...'।

''आप रामचरित मानस की चौपाईयां बोलते जा रहे हैं। पर क्‍या आपको मालूम है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के नेता रामचरित मानस पर आपत्त‍ि दर्ज करा चुके हैं। उनका कहना है कि इसमें ऐसी चौपाईयां हैं जो नारी, शूद्रों-दलितों का अपमान करती हैं जैसे 'पूजिए विप्र ज्ञान गुण हीना, पूजिए न शूद्र ज्ञान प्रवीना' या ढोल, गंवार, शूद्र,पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।''

शर्मा जी - ''देखिए, ये सब मुद्दे ईर्ष्‍यावश उछाले जा रहे हैं। दरअसल कुछ लोगों को माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी की और भाजपा की लोकप्रियता सहन नहीं हो रही है। विपक्षी हैं, विरोधी हैं, वे विरोध करेंगे ही।...'’

''शर्मा जी, ऐसी बात नहीं है। विरोध करने के ठोस कारण हैं। आज विज्ञान और तकनीक के युग में ऐसे कार्य किए जा रहे हैं जिनसे जग हंसाई हो रही है। करोड़ो रुपये खर्च किए गए। इस धनराशि को जनहित में लगाया जा सकता था। और फिर हमारा देश लोकतांत्रिक देश है। देश संविधान से चलता है। हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि सभी समुदायों, धर्मों के लोग रहते हैं। देश का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। स्‍त्री-पुरुष के समान अधिकार हैं। देश में सभी के लिए समान कानून हैं। आपको नहीं लगता कि देश में राम राज की नहीं संविधान के राज की जरूरत है। देश संविधान से ही चलना चाहिए। आप बेकार ही...''

शर्मा जी - ''देखिए, मैं ऐसा नहीं मानता। देश की बहुसंख्‍यक आबादी हिंदू है। हमारा देश एक हिंदू राष्‍ट्र है। हमारा धर्म हिंदू धर्म यानी सनातन धर्म है। देश चलना चाहिए हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार। इस बारे में मनुस्‍मृति में सारे विधान दिए गए हैं। कमियां हिंदू धर्म-संस्कृति में नहीं बल्कि गैर हिंदुओं के नजरिये में है।''

मैंने कहा- ''शर्मा जी, आपको पता ही नहीं है कि मनुस्‍मृति दलित और स्‍त्री विरोधी है। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर इसे बहुत पहले जला चुके हैं। देश में सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार संविधान देता है। इसलिए देश को राम राज की नहीं बल्कि संविधान राज की ही जरूरत है। खैर, लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है। मैं चलता हूं।'' और इससे पहले कि वे 'जय श्री राम' कहते मैं उनके घर से बाहर निकल गया।

आज लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही का राज कायम हो गया है। तानाशाह राजा अपने भक्‍तों की आंखों पर जो चश्‍मा लगा रहा है उससे उन्‍हें राम राज्‍य के सिवाय कुछ नहीं दिख रहा है। पवनपुत्र शर्मा जी जैसे लाखों भक्‍तगण दिन में भी राम राज्‍य के यूटोपिया में खोए हुए हैं। मैं तो ऐसा ही सोच रहा हूं और आप? 

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