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समय-स्‍वर : 'पूंजीपतियों का पोषण है, कह कर आप फंसे'

''सरकार किसानों को MSP पर कानून की गारंटी नहीं दे रही। किसानों का कर्ज़ माफ़ नहीं कर रही जबकि पूंजीपतियों के करोड़ों माफ़ कर देती है।''
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फोटो साभार : पीटीआई (फाइल फोटो)

मोर्निंग वॉक करने के बाद थोड़ा सुस्‍ताने की इच्‍छा हुई तो पार्क में ही एक बेंच पर बैठ गया। उस पर दो सज्‍जन पहले ही बैठे हुए थे। एक सीनियर सिटीजन थे दूसरे फोर्टी प्‍लस के होंगे। उनका वार्तालाप चल रहा था।

सीनियर सिटीजन कह रहे थे - "देखिए किसान कोई गलत मांग नहीं कर रहे हैं। उन्‍हें उनके हक अधिकार मिलने चाहिए। इसके साथ मज़दूरों को भी उनके हक मिलने चाहिए। किसानों और मजदूरों की कर्ज़ माफी होनी ही चाहिए। एक उम्र के बाद किसानों और मजदूरों को पेंशन मिलनी चाहिए। मनरेगा के तहत 200 दिनों का रोज़गार और 700 रुपये मज़दूरी भत्ता और मनरेगा को खेती से जोड़ा जाए। इसमें भला क्‍या गलत है।''

दूसरे सज्‍जन बोले- ''देखिए, किसानों को अभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्‍य मिल ही रहा है। अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के हिसाब से देखें तो गेहूं का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य है 20 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास है जबकि हमारे यहां किसानों को 22 रुपये प्रति किलोग्राम मिल रहा है। ऐसे ही 23 फसलों पर न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य दिया जा रहा है। हां ये अलग बात है कि किसान एम.एस.स्‍वामीनाथन की सिफारिशों के अनुसार एमएसपी मांग रहे हैं जो कि नहीं मिल रहा है।''

''यही तो सोचने की बात है। किसान अगर एमएसपी पर कानूनी गारंटी मांग रहे हैं तो सरकार को क्‍यों आपत्ति होनी चाहिए। वैसे तो सरकार किसान हितैषी होने का दावा करती है।'’

''देखिए, अगर किसान जैसा चाहते हैं वैसा सरकार कर देगी तो इससे चीजों के दामों में इजाफा होगा और महंगाई बढ़ेगी।''

''भाई, ये सरकार की लोगों को बेवकूफ बनाने की तरकीबें हैं। अभी भी कौन-सी महंगाई कम है। दरअसल सरकार की जो न‍ीतियां हैं उससे अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और गरीब। अब आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के अधिकार पर सरकार कब्‍जा करना चाहती है। वहां बड़े-बड़े प्‍लांट लगाकर कॉरपोरेट जगत यानी उद्यमियों, पूंजीपतियों को लाभ पहुंचा रही है। गरीब आदिवासी जिनसे अपनी आजीविका चलाते हैं उनसे उनकी आजीविका के साधन छीने जा रहे हैं।'’

''लगता है आप सरकार से बहुत ख़फा हैं।'’

''ख़फा होने की वाजिब वजह है। सरकार किसानों को MSP पर कानून की गारंटी नहीं दे रही। किसानों का कर्ज़ माफ़ नहीं कर रही जबकि पूंजीपतियों के करोड़ो माफ़ कर देती है। ये तो पूंजीपतियों का पोषण और किसानों का शोषण करना हुआ। पहले तीनों कृषि कानून भी पूंजीपतियों के हित में बनाए थे जिन्हें किसानों ने आंदोलन कर बड़ी मुश्किल से वापस कराए। पूरा सरकारी सिस्‍टम पूंजीपतियों का पोषक है। जन-विरोधी है। गरीब-मजदूर विरोधी है। किसान विरोधी है।'’

''आप जैसा बता रहे हैं उससे तो लगता है कि मोदी जी कॉरपोरेट जगत के साथ हैं। मगर उन्‍होंने अपने एक भाषण में कहा था कि फकीर आदमी हूं, झोला उठा के चल दूंगा।'’

''काश कि ऐसी फकीरी देश के हर नागरिक को मिले!'' कहते हुए वे मुसकुराए फिर बोले-''जुमलेबाजी तो कोई हमारे प्रधानमंत्री जी से सीखे। अब तक उनके अनेक जुमले सुन चुका हूं। ये जुमले हास्‍यास्‍पद हैं। आजकल कहते हैं 'मोदी की गारंटी है।' जैसे मोदी किसी संवैधानिक पद पर न होकर इस देश के राजा हों। अगर कोई गारंटी देता है तो देश का संविधान देता है। कोई व्‍यक्ति विशेष कैसे दे सकता है। दूसरी बात मोदी जी सरकार चलाने की बजाय अपना और अपनी पार्टी का प्रचार ज्‍यादा करते हैं। इससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा धूमिल होती है। संसद में भी अपना चुनाव प्रचार करते हैं। कहते हैं अबकी बार चार सौ पार। खुद ही भाजपा की सीटों की संख्‍या चुनाव से पहले ही बता देते हैं कि भाजपा की 370 सीटें आएंगी। एनडीए चार सौ से ज्‍यादा सीटें प्राप्‍त करेगा। कहते खुद हैं और नाम देश का करते हैं कि पूरा देश कह रहा है। दरअसल वे अपने मन की बात करते हैं जन की बात तो सुनते ही नहीं। लोकतंत्र और संविधान का मजाक बना कर रख दिया है।''

''ले‍किन कुछ लोग तो कहते हैं कि देश में टू मच डेमोक्रेसी है, इतनी नहीं होनी चाहिए। देश की राजधानी में धरना प्रदर्शन होते रहते हैं, इससे लोगों को परेशानी होती है फिर भी विरोध प्रदर्शन चलते रहते है।'’

''यही तो समझने की बात है। अब पहले जैसे धरना प्रदर्शन कहां होते हैं। सरकार ने काफी सख्‍ती कर दी है। दूसरी बात कि अगर धरना प्रदर्शन होते भी हैं तो उस आवाज को दबाने की पूरी कोशिश की जाती है। मिसाल के तौर पर देखिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा देने वाली सरकार खेल में देश का नाम रोशन करने वाली बेटियों के साथ इंसाफ कर पाई? क्‍या अपनी ही पार्टी के आरोपी पदाधिकारी को गिरफ्तार किया? क्‍या उसे सजा मिली?'’

मेरे पत्रकार मन ने कहा कि जब चर्चा चल ही रही है तो एक सवाल पूछ ही लिया जाना चाहिए, ''सर आपको क्‍या लगता है मोदी जी और भाजपा क्‍या तीसरी बार भी सत्ता हासिल करेंगे?     और अगर करेंगे भी तो इसका देश के लोकतंत्र पर क्‍या असर होगा?'’

वरिष्‍ठ नागरिक बोले- ''देखिए, जिस तरह ये सरकार साम, दाम, दंड, भेद अपना रही है, उससे तो लगता है कि तीसरी बार भी यही सत्ता हासिल करेंगे। पर अगर जनता जनार्दन किसी भी प्रकार के प्रलोभन में न आकर, अपना लोकतंत्र बचाने के लिए वोट करेगी तो बाजी पलट भी सकती है। इन्‍होंने तो विपक्ष मुक्‍त संसद बनाने का मन बना ही लिया है। सीबीआई, ईडी आदि का दुरूपयोग कर विपक्षी नेताओं को जेल में डाला जा रहा है। धर्म निरपेक्ष देश में किसी एक धर्म-संस्‍कृति विशेष को बढ़ावा दिया जा रहा है। उससे तो लगता है लोकतंत्र और संविधान दोनों के ही अस्तित्‍व पर ख़तरा है।'’

सामने वाली बेंच पर बैठे एक और बुजुर्ग सज्‍जन हमारी बातें सुन रहे थे वे भी पास आ गए। बोले- ''अरे भईया, अब तो सरकारी अधिकारी अपनी मनमानी करने लगे हैं। मैं अपनी पेंशन चालू करवाने के लिए संबंधित विभाग के चक्‍कर लगाते-लगाते थक गया हूं। पर पेंशन चालू करके नहीं दे रहे। कभी किसी दस्‍तावेज में कमी निकाल देते हैं तो कभी कोई और कारण बता देते हैं। परोक्ष रूप से मुझसे रिश्‍वत मांगी गई। मैंने इनकार कर दिया। मोदी सरकार को भी खरी-खोटी सुना दी कि ये सरकार गरीबों की नहीं पूंजीपतियों की पोषक है तो अधिकारी नाराज हो गए। जब काम नहीं करोगे तो आदमी अपना गुस्‍सा जाहिर तो करेगा ही। अब पेंशन चालू तो नहीं कर रहे बस तारीख पर तारीख देते रहते हैं।''

फोर्टी प्‍लस वाले सज्‍जन बोले- ''अंकल जी, आपने दो गलतियां करीं जिससे आपकी पेंशन चालू होने में देरी हो रही है। पहली आपने अपनी फाईल पर नोटों के पंख नहीं लगाए। फाईल पर नोट रखने से उस पर पंख लग जाते हैं फिर वह एक टेबल से दूसरी टेबल पर होती हुई अनुमोदित हो जाती है। दूसरी बात सरकार पूंजीपतियों की पोषक है कह कर आप फंसे।''

मैं उठकर घर की ओर चलने लगा। अचानक दिमाग में रघुवीर सहाय की एक कविता की पंक्तियां कौंध गईं -'लोकतंत्र का अंतिम क्षण है, कहकर आप हंसे, निर्धन जनता का शोषण है, कह कर आप हंसे।'

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