कटाक्ष: वे काग़ज़ नहीं दिखाएंगे!
मोदी जी के इन विरोधियों ने हिंदू संस्कृति का अपमान करने की कसम ही खा रखी है क्या? बताइए, चुनाव आयोग की ढिलाई से कर्नाटक में इनकी सरकार क्या बन गयी, आरएसएस से ही कागज दिखाने की मांग करने लगे।
हिंदू आरएसएस, उसका हिंदू राष्ट्र, फिर भी कहते हैं कि रजिस्ट्रेशन के कागज दिखाओ। जमा-खर्च का हिसाब बताओ।
जिस आरएसएस से सौ साल में किसी ने कागज दिखाने को नहीं कहा, उसे इन्हें कागज दिखाने होंगे? जिस आरएसएस के कागज देखने की अंगरेजों तक की हिम्मत नहीं पड़ी, उसे इन दलित साहबों को कागज दिखाने होंगे? और किसलिए ? सिर्फ इसलिए कि आरएसएस परिवार वाले खुद भी तो दूसरों से कागज दिखाने की मांग कर रहे थे--पहले एनआरसी में और अब एसआईआर में! यानी मियां की जूती, मियां के ही सिर!
लेकिन, यह क्या हिंदू संस्कृति का खुला अपमान ही नहीं है। यह अर्द्ध-सत्य है कि आरएसएस परिवार कागज दिखाने के लिए कहता आया है। माने आरएसएस परिवार कागज दिखाने के लिए कहता जरूर आया है, लेकिन यह अधूरा सच है। बाकी आधा सच इसमें है कि वह किस से कागज दिखाने के लिए कहता आया है? किसी से छुपा नहीं है कि आरएसएस परिवार कोई सबसे कागज दिखाने की मांग नहीं करता है। वह भला हिंदुओं से कागज दिखाने की मांग क्यों करने लगा? हिंदुओं का तो यह देश ही है। सिर्फ इस देश के हिंदुओं का ही नहीं, दूसरे देशों के हिंदुओं का भी। इस देश में पैदा हुए हिंदुओं का ही नहीं, पड़ोसी देशों में पैदा हुए हिंदुओं का भी। तभी तो उन्होंने सीएए वाला कानून बनवाया था--आस-पड़ोस के देशों के हिंदुओं का बल्कि बाकी सब का स्वागत है, सिर्फ मुसलमानों को छोड़कर।
अब चूंकि मुसलमानों को छोड़ना है, तो कागज तो दिखाने ही पड़ेंगे। कागज बाकी सब को भी दिखाने पड़ सकते हैं, पर अपने लिए नहीं, मुसलमानों के बाहर रखे जाने के लिए। सब कागज दिखाएंगे, तभी तो जिन्हें बाहर किया जाना है, बाहर किए जाएंगे।
शाह साहब ने जो क्रोनोलॉजी बताई थी, वह तो याद होगी। पहले सीएए से मुसलमान छानकर अलग किए जाएंगे, फिर हिंदू अपनाए जाएंगे। अब बीच में एसआईआर आ जाएगा, हिंदुओं का भी वोट कट जाएगा, यह किसे पता था। खैर! बड़े-बड़े कामों में छोटी-मोटी दुर्घटनाएं तो हो ही जाती हैं।
खैर! मुद्दे की बात यह है कि कागज दिखाने की डिमांड, कम से कम हिंदुओं के लिए नहीं थी--दूसरों के लिए ही थी। तभी तो ज्यादातर दूसरों ने ही उसका विरोध भी किया था। तब उसे दलील बनाकर, आरएसएस से कागज दिखाने की मांग कैसे की जा सकती है?
आरएसएस और क्या है और क्या नहीं है इसे छोड़ भी दें, तब भी कम से कम उसके हिंदू होने से कोई इंकार नहीं कर सकता है। वह बेचारा तो अपने जन्म से ही हिंदू-हिंदू ही जपता आया है। यह सच है कि उसके विरोधी शुरू से यह कहते आए हैं कि वह ध्यान हमेशा ही मुसलमान-मुसलमान का करता आया है; कि कैसे मुसलमानों को नीचा दिखाएं; कैसे हिंदुओं में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाएं; कैसे ऐसा राज बनाएं, जिसमें मुसलमान दबाए जाएं--और दलित वगैरह और औरतें भी। पर ध्यान में चाहे जो भी हो, मुंह से तो वह हिंदू-हिंदू का ही जाप करता आया है।
और आज से नहीं सौ साल से हिंदू-हिंदू का जाप करता आया है। इतनी ज्यादा तल्लीनता से हिंदू-हिंदू का जाप करता आया है कि जब पूरा देश अंगरेजी राज के खिलाफ लड़ रहा था, लोग प्रदर्शनों में लाठियां खा रहे थे, जेल जा रहे थे, फांसियां तक चढ़ रहे थे यानी देश भर में अच्छी-खासी उथल-पुथल चल रही थी, तब भी उन्होंने अपना ध्यान जरा सा भी भटकने नहीं दिया और हिंदू-हिंदू का अपना जाप कभी टूटने नहीं दिया। उनके जाप में विघ्र डालने के चक्कर में जब गांधी जी ने सीने पर तीन गोलियां खाईं, तब भी उनका जाप जारी रहा। जब इंदिरा गांधी ने तैंतीस गोलियां खाईं, तब भी उनका जाप जारी था। और अब जब उनके स्वयंसेवक राज कर रहे हैं, हरेक संस्था उनकी शाखा बन चुकी है और ऑपरेशन लंगड़ा से लेकर ऑपरेशन एन्काउंटर और ऑपरेशन बुलडोजर तथा मॉब लिंचिंग का बोलबाला है, तब भी उनका हिंदू-हिंदू का जाप जारी है। और तो और न कोई गौरी आया, न कोई बाबर, फिर भी राम मंदिर लुट गया, तब भी उनका वही जाप जारी है।
ऐसी घनघोर टाइप की हिंदू एंटिटी से उसके अपने हिंदू राष्ट्र में कागज दिखाने की मांग कैसे की जा सकती है, जबकि यह मांग उन्हीं ने खासतौर पर मुसलमानों वगैरह के लिए तय ईजाद की है। एंटिटी हमने जानबूझकर कहा है क्योंकि आरएसएस, दूसरी भाषाओं की हम नहीं कहते पर कम से कम हिंदी-संस्कृत में तो अपरिभाषेय है। उसे संगठन नहीं कह सकते क्योंकि उसके लिए सदस्यता, संविधान, सांगठनिक ढांचा, चुनाव वगैरह, वगैरह के हजार दुनियावी झंझट हैं, जो उसे मंज़ूर नहीं हैं । उसे आंदोलन कह नहीं सकते क्योंकि आंदोलन शब्द से ही वामपंथ की बू आती है। उसे महज ताना-बाना भी नहीं कह नहीं सकते क्योंकि वर्दी से लेकर शाखा तक, उसका कठोर अनुशासन है। वह नेति-नेति की महान भारतीय परंपरा में है--संगठन है भी, नहीं भी है; आंदोलन है भी, नहीं भी है; ताना-बाना है भी, नहीं भी है। जो है भी और नहीं भी है, उसके कागज कैसे! और जब कागज होंगे ही नहीं तो, कोई देखेगा क्या और भागवत जी दिखाएंगे क्या?
माना कि आरएसएस की अपनी हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियां हैं। उसके आनुषांगिक संगठनों की मिलाकर तो लाखों करोड़ रुपये की संपत्तियां होंगी। माना कि उसका देश-विदेश तक फैले हजारों संगठनों का ताना-बाना है। माना कि उसका और उसके संगठनों का पचासों हजार करोड़ सालाना का खर्चा है। माना कि मौजूदा राज पर और उसकी सारी संस्थाओं पर, असल में उसी का कब्जा है। पर उससे क्या? सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान तो ईश्वर को भी कहते हैं। अब क्या आरएसएस से कागज मांगने वाले रामलला से कागज मांगने जाएंगे? क्या सुप्रीम कोर्ट ने रामलला से मस्जिद वाली जमीन के कागज मांगे थे? कल को ये दलित-वलित तो हिंदू धर्म से भी कागज मांगने लग जाएंगे! कागज की जरूरत मुसलमानों के लिए है, हिंदू आरएसएस से मोदी राज में कागज क्यों मांगे जाएंगे? वे कागज नहीं दिखाएंगे!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लोक लहर के संपादक हैं।)
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