युवा (कॉकरोच) आंदोलन का उभार: अब इसे रोकने-कुचलने या समझने के पुराने तौर-तरीक़े काम न आएंगे
बहुत लोग पूछते हैं कि आप युवाओं के इस कॉकरोच आंदोलन को कैसे देखते-समझते हैं। तो एक eyewitness, एक ग़वाह के तौर पर यह टिप्पणी लिख रहा हूं– यह अंतिम राय नहीं है, क्योंकि किसी आंदोलन के बीच में अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना मैं ठीक नहीं समझता।
पहले दिन से अब तक जो देखा-समझा वह यह है कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नाम से युवाओं का यह आंदोलन कोई traditional यानी परंपरागत आंदोलन नहीं है, जिसके पीछे पहले से गठित कोई पार्टी या संगठन या उसकी ठोस वैचारिकी होती है, एक अनुशासित काडर होता है, जो अपने नेता के हर निर्देश का पालन करता है। इसलिए इसे किसी एक नेता के निर्देश पर, किसी एक नेता को मैनेज करके या लाठी-गोली के परंपरागत दमन के तरीकों से कुचला नहीं जा सकता और न परंपरागत तरीके से इसका विश्लेषण किया जा सकता है।
BJP Government choose Violence and Dictatorship,
We will choose Peace and Constitution! pic.twitter.com/aUOy0EDCMA— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 20, 2026
हालांकि यह भी सोचना ग़लत होगा कि बिना किसी राजनीति या संगठन के बिना यह आंदोलन शुरू हो गया। लेकिन अब यह सिर्फ़ सीजेपी का आंदोलन नहीं रहा, बल्कि युवाओं का अपना आंदोलन बन गया है और अब तो यह यह जंतर-मंतर से निकल कर पूरे देश में फैल गया है।
शिक्षा के सवाल पर यह नये दौर का आंदोलन है, जिसे हम जेन-ज़ी यानी जेनरेशन जेड कहते हैं उसका आंदोलन। जिस पर किसी एक पार्टी विशेष या विचारधारा का टैग या बोझ नहीं है, जिसमें विभिन्न रंग-ढंग विचार के युवा हैं। लड़के भी, लड़कियां भी। कुछ राजनीतिक विचारधारा से लैस हैं, पुराने संघर्ष के साथी, तो बहुत से पहली बार किसी आंदोलन में आए हैं, जो किसी भी विचारधारा से दूर हैं। बहुत से तो कल तक ख़ुद को अराजनीतिक कहते थे। लेकिन मुद्दे की समझ सबको है। सबको अपने भविष्य की चिंता है। ये बच्चे पेपर लीक और शिक्षा में सुधार के लिए साफ़ शब्दों में सरकार से जवाबदेही और इसके लिए ज़िम्मेदार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं। इससे कम पर कोई समझौता नहीं।
यह युवा किसी से नहीं डरता, यह बेख़ौफ़ है। यह भी कह सकते हैं कि इनमें से बहुतों को सत्ता की चालाकियों और क्रूरता और बाद में होने वाले परिणामों का भी एक भी अंदाज़ा या अनुभव नहीं है। इनमें गरीब-दलित के अलावा एक बड़ी तादाद मिडिल-अपर क्लास उन हिंदू परिवारों के बच्चों की है, जिन्हें अब तक लगता था कि ‘मोदी सरकार तो उनकी अपनी सरकार है’
Cockroach Janta Party founder Abhijeet Dipke meets students who were injured during the 20 July protest march.
Photos: Suraj Singh Bisht @Surajbisht25 #ThePrintPictures pic.twitter.com/MAsaXnsrdb
— ThePrintIndia (@ThePrintIndia) July 21, 2026
Don’t take the youth of the country lightly. We will not stop till Dharmendra Pradhan resigns pic.twitter.com/AZj3f5PlwE
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 22, 2026
Delhi Police have sunk to new lows. Yesterday, during a peaceful march, a male officer was caught on camera brutally assaulting a female protestor, hitting her and shoving a lathi into her lower back.
This is criminal, unconstitutional behaviour by a force meant to protect… pic.twitter.com/S7NKsKNTyC
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 21, 2026
The Delhi Police slapping and hitting a 10 year old boy during the protest. pic.twitter.com/OpKVRWg7oS
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 21, 2026
यह युवा दमन के बाद अभी तक डटा है। यह दिन में लाठियां खाता है और शाम को रील और मीम बनाकर फिर चुनौती दे देता है। बीजेपी के आईटी सेल को भी समझ नहीं आ रहा कि इनका सामना कैसे करें।
Students take part in the protest in Dadar, Mumbai in solidarity with Jantar Mantar protest on July 21, 2026.
📸: @EmmanualYogini pic.twitter.com/EcHDHcdoGW
— The Hindu (@the_hindu) July 21, 2026
यह दिल्ली में पुलिस-आरएएफ के सामने खड़ा हो जाता है और कहता है- मारो, और मारो सर। यह मुंबई में पुलिस वैन के आगे खड़ा होकर उसे रोक देता है।
May be open your eyes and look around!!!
Shame!!! https://t.co/RLtsrbnA7m pic.twitter.com/k57DMprqVV— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 20, 2026
We’re not scared. We will not stop till Dharmendra Pradhan resigns! pic.twitter.com/MC4dw4Z8ET
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 23, 2026
Hacker Hai Bhai….Hacker 🫡 pic.twitter.com/XftwOu9tke
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 22, 2026
यह पटना में पुलिस से पूछता है– भाईसहाब टियर गैस की कोई व्यवस्था नहीं किए हैं। वाटर कैनन तो है… और वाटर कैनन चलने पर उसमें नाचने लगता है। यह सीधे पुलिस को चुनौती दे देता है और कहता है कि आपने अपनी नेम प्लेट भी हटा दी, सरकार आपका नाम ही मिटा देगी जैसे उसने ऑपरेशन सिंदूर में शहीद सैनिकों के नाम ही छुपा दिए। कह दिया कोई नहीं मारा गया।
यह युवा, यह बच्चे, ये लड़के, ये लड़कियां पुलिस की आंखों में आंखों डालकर पूछते हैं कि क्या आपके बच्चे नहीं है। क्या आप उनके साथ भी ऐसी ही बेरहमी से पेश आते। क्या उन्हें अच्छी शिक्षा नहीं चाहिए।
This could be anyone’s child - why has the government decided she deserves to be beaten up for asking questions?
Dharmendra Pradhan - is all this feeling worth it now to you? Shame on you pic.twitter.com/Tz27roWylm
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 20, 2026
20 जुलाई के बाद के हालात देखकर लग रहा है कि इस आंदोलन को भले ही अभिजीत दीपके ने शुरू किया हो, लेकिन अब इसे किसी ठोस परिणाम तक पहुंचाए बिना ख़त्म कराना भी उनके बस की बात नहीं। आज भले ही दीपके या सौरव दास, आशुतोष रांका या यहां तक कि सोनम वांगचुक भी कहें कि चलो आश्वासन मिल गया, समझौता हो गया, आंदोलन ख़त्म, अब सब अपने घर जाएं तब भी यह आंदोलन ख़त्म नहीं होगा। और अगर ख़त्म भी हो गया तो फिर किसी न किसी तरह यहां नहीं तो वहां उठ खड़ा होगा।
तो यह आंदोलन कहां और कैसे ख़त्म होगा। उसके अब दो ही तरीके बचे हैं कि या तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें या फिर सत्ता की मशीनरी, संघ-बीजेपी के लोग इसे अराजक बनाकर बदनाम कर दें और फिर मोदी-शाह की पुलिस प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोली चलाए और एक बड़े ख़ून-ख़राबे के बाद यह आंदोलन ख़त्म हो।
Meet the "courageous" Addl. DCP of Delhi Police, Sandeep Lamba, who apparently believes true bravery lies in slapping a woman. pic.twitter.com/0gqARMJ8W5
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 21, 2026
पुराने औज़ार क्यों नहीं काम आ रहे
जहां तक इसके विश्लेषण की बात है तो इस आंदोलन का परंपरागत ढंग से इसलिए विश्लेषण नहीं किया जा सकता क्योंकि तमाम समझदार लोग आज न चुनाव पढ़ पा रहे हैं न आंदोलन। क्योंकि दोनों के तौर-तरीके बदल चुके हैं और हम पुराने औजार लेकर बैठे हैं।
चुनाव विश्लेषण इसलिए भी फेल हो रहा है क्योंकि चुनाव का परंपरागत तरीका बदल गया है। अब तो एसआईआर के बाद चुनाव, चुनाव बचा ही नहीं है। एक के बाद एक चुनाव खुलेआम लूटा जा रहा है और अब तो विधायक-सांसद ही नहीं पूरी पार्टी भी लुट रही हैं और बीजेपी के पेट में समा रही हैं। इसलिए जनमत या जनादेश या ज़मीन की हवा से इसे पढ़ना या भांपना, नतीजों का अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है।
इसी तरह आंदोलन हो या और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संघर्ष या युद्ध किसी के बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता। बहुत बौद्धिकों, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, सैन्य विश्लेषक और पत्रकारों और यहां तक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उसके साथी इज़रायल के नेतन्याहू को न केवल यक़ीन था, घमंड था बल्कि बाक़ायदा इसकी घोषणा भी की गई थी कि ईरान को तीन घंटे या तीन दिन में ख़त्म कर देंगे। लेकिन ईरान आज पांच महीने बाद भी उसके सामने सीना तानकर खड़ा है। पूरी टॉप लीडरशिप ख़त्म होने के बाद भी। और ट्रंप साहब को भी समझ नहीं आ रहा कि इससे कैसे निकलें। आपको याद दिला दूं कि अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर पहला बड़ा और बर्बर हमला 28 फ़रवरी, 2026 को किया था।
इसी तरह के अनुमान, विश्लेषण और ऐलान रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर किए गए थे कि यह युद्ध भी सप्ताह भर भी नहीं चलेगा। लेकिन यह नहीं हुआ। भले ही नाटो की वजह से यूक्रेन आज भी खड़ा है, लेकिन इसे भी आज क़रीब साढ़े चार साल हो गए। फरवरी 2022 में यह जंग शुरू हुई थी।
भारत में भी मोदी सरकार को शायद यही भ्र्म था कि ये कॉकरोच जनता पार्टी सिर्फ़ डिजिटल फिनोमिना है, ज़मीन पर इसका कोई असर नहीं है, और ये लोग दो-चार दिन धरना देकर चले जाएंगे।
शुरुआत से अब तक
कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से यह आंदोलन पहली बार जंतर-मंतर पर 6 जून 2026 को शुरू हुआ और फिर 20 जून 2026 से लगातार जारी है। अब इसे एक महीने से ज़्यादा हो गया है। जबकि पहले दिन से कॉकरोच जनता पार्टी और उसके संस्थापक अभिजीत दीपके शक और सवालों से घिरे रहे।
अब 20 जुलाई के संसद मार्च के बाद भी सवाल कम नहीं हुए बल्कि बढ़ गए। जैसे आंदोलनकारी युवाओं ने ही सवाल उठाया कि पूरे मार्च के दौरान दीपके कहां रहे। वो एक ट्रक में ही क्यों बैठे रहे। उन्होंने उनके साथ कोई लाठी क्यों नहीं खाई। ऐन कूच के दौरान प्रमुख प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका क्यों स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मिलने चले गए। बातचीत होनी थी तो 19 जुलाई की रात तक होनी थी, जब लोग संसद की तरफ़ बढ़ना चाह रहे थे उस समय बातचीत का कोई मतलब नहीं था।
🚨#ImportantAnnouncement: @AshutoshRanka and I have been at J.P. Nadda’s residence since 12 noon. The demands have been conveyed, including immediate resignation/sacking of Dharmendra Pradhan.
The Minister assured us he will discuss this at the appropriate level. However, no… pic.twitter.com/vzLluczbkV
— Saurav Das (@SauravDassss) July 20, 2026
और बातचीत होती तो सबके सामने होती या सबको विश्वास में लेकर होती। क्या इसके लिए आंदोलन में लगातार शामिल युवाओं या संगठनों से कोई सलाह-मशविरा किया गया। और इस बातचीत का परिणाम क्या निकला, सिर्फ़ यही कि जब नेतृत्व की ज़रूरत थी, नेतृत्व गायब था। बाद में दीपके ने माना भी कि सरकार ने उन्हें अकेला करने के लिए यह साज़िश रची। हालांकि हमें यह भी मानना चाहिए कि दीपके या उनकी टीम को आंदोलन का कोई पुराना अनुभव नहीं है। संभवतया यह उनका पहला आंदोलन होगा। और इस मामले में भी दीपके की तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने पहले दिन से बाबा साहेब आंबेडकर की तस्वीर थाम रखी है और हिंदू-मुस्लिम की राजनीति का खुलकर विरोध किया। यानी जो संघ-बीजेपी का कोर मुद्दा है, उस पर उन्होंने 6 जून के प्रदर्शन में ही सीधी चोट कर दी थी। और संघ-बीजेपी चाहकर भी अभी तक इस आंदोलन को हिंदू-मुसलमान का मुद्दा नहीं बना पाई है।
Youth of my country are fighting for their future . a movement like freedom struggle is brewing again . i will continue to empower this churning.. i will continue to hold their hands.. give them my strength and stand by them for their future. 💪💪 #justasking pic.twitter.com/BtxkKd0SWp
— Prakash Raj (@prakashraaj) July 21, 2026
एक और प्रमुख प्रवक्ता विजेता दहिया का हाल तो आप देख ही चुके हैं। उन्होंने जिस नाज़ुक वक़्त में जैसा रवैया दिखाया, व्यवहार किया, उसके बाद उन्हें सीजेपी ने प्रवक्ता और सभी ज़िम्मेदारियों से हटा दिया है। इन तीन प्रवक्ताओं के अलावा चार अन्य प्रवक्ता भी बाद में सीजेपी में जोड़े गए, जिनमें तीन महिलाएं थी। क्योंकि पहले दिन से सवाल था कि सीजेपी के प्रमुख लोगों में महिलाएं क्यों नहीं हैं। लेकिन यह महिलाएं प्रवक्ता तो बनाई गईं लेकिन इन्हें प्रमुख भूमिका नहीं दी गई। जबकि अगर यह कहें तो ग़लत न होगा कि पूरे आंदोलन को लड़कियों ने ही संभाला और संवारा है। जो आज भी लगातार लड़ती-जूझती दिखाई दे रही हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की युवा-बेरोज़गारों-एक्टिविस्ट को लेकर की गई एक शर्मनाक टिप्पणी कि ऐसे लोग- कॉकरोच और परजीवी हैं, मज़ाक मज़ाक या व्यंग्य में यह पार्टी डिजिटल स्पेस यानी एक्स और इंस्टाग्राम पर शुरू हुई।
जब 6 जून को जंतर-मंतर पर पहले धरने-प्रदर्शन की इजाज़त मिली तभी से इस पर तमाम सवाल उठ रहे हैं। और जैसे पहले कहा कि आज भी यह सवाल कम नहीं हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद आंदोलन खड़ा हुआ है। यह बड़ी बात है।
पहले विपक्ष ने भी उठाए सवाल
दिलचस्प है कि पहले दिन से इस आंदोलन पर शक और सवाल उठाने में केवल सत्ता पक्ष नहीं, बल्कि विपक्ष भी शामिल था। इस मामले में दोनों सेम पेज पर थे। सत्ता पक्ष ने इसे विपक्ष की साज़िश कहा और विपक्ष ने इसे सत्ता पक्ष की साज़िश। बौद्धिक, लेखक, पत्रकार भी असमंजस में रहे।
प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य ने इसे लेकर बहुत सटीक कार्टून बनाया कि कॉकरोच जनता पार्टी अंधों के हाथी जैसी है। जिसमें कोई उसकी पूंछ पकड़कर विश्लेषण कर रहा है, कोई सूंड पकड़कर। पूरा हाथी किसी की पकड़ में नहीं आ रहा।
लेफ़्ट-राइट-सेंटर पार्टियां ही नहीं, लेखक-बुद्धिजीवी-पत्रकार भी अलग-अलग खेमों में बंटकर अपने-अपने तर्क और विश्लेषण करते रहे। पुराने आंदोलनों के आधार पर मूल्यांकन करते रहे। हर कोई इसमें दूसरे की रणनीति या साज़िश देख-परख रहा था। या एक वर्ग इसे बिल्कुल सीरियस मानने को तैयार नहीं था, कोई तवज्जों नहीं दे रहा था। लेकिन विपक्ष आज इससे धीरे-धीरे जुड़ रहा है मगर आज भी वो ख़ुद को इससे अलग दिखाना चाहता है या इसे केवल अपने लिए चाहता है।
सत्ता पक्ष (संघ-बीजेपी-गोदी मीडिया) के लिए तो यह आंदोलन पहले से ही विपक्ष यानी कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वामपंथियों की साज़िश था। दहशतगर्द, एंटी नेशनल, टुकड़े-टुकड़े गैंग था और इसमें हमेशा की तरह पाकिस्तान और चीन का हाथ साबित करने की कोशिश की गई लेकिन कांग्रेस समर्थकों और विचारकों ने भी पहले CJP को बीजेपी की ही बी टीम समझा, बताया। या अन्ना आंदोलन पार्ट-2 कहा। जिसे संघ-बीजेपी का ही प्रोजेक्ट कहा गया और जो अंतत बीजेपी के ही काम आया। और मनमोहन सिंह की सरकार पलट कर नरेंद्र मोदी सत्ता पर काबिज़ हो गए। या फिर अरविंद केजरीवाल को दिल्ली राज्य की सत्ता मिल गई थी।
केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस पूरे आंदोलन को अपने पक्ष में चाहती रही। अब भी जब 20 जुलाई की पुलिस बर्बर कार्रवाई के ख़िलाफ़ 21 जुलाई को राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास 7 लोक कल्याण मार्ग पर एक बड़ी पहल लेते हुए धरना दिया तो आम आदमी पार्टी इसे पचा नहीं पाई और इसका स्वागत करने की बजाय इसे मोदी की ही साज़िश बताया।
आप सांसद संजय सिंह जैसे व्यक्ति जो प्रोग्रेसिव-लिबरल खेमे में भी प्रिय और विश्वसनीय है, उन्होंने भी पार्टी लाइन पर ही कहा कि मोदी ने ही राहुल को अपने आवास पर धरने पर बिठवाया। आतिशी और सौरभ भारद्वाज को तो इसी लाइन को आगे बढ़ाना ही था। यानी पार्टियां अभी भी अपने-अपने हित से आगे नहीं निकली हैं।
ख़ैर, वाम दलों के छात्र विंग पहले दिन से इस आंदोलन के साथ जुड़े रहे, क्योंकि उनका मानना था कि वो शिक्षा के मुद्दे पर बरसों से लड़ाई लड़ रहे हैं इसलिए पेपर लीक के साथ शिक्षा में सुधार के मुद्दे पर शुरू हुआ यह आंदोलन वो ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य तो 6 जून को ही जंतर-मंतर पर पहुंचकर अपना समर्थन दे चुके थे। 20 जून के बाद अन्य वाम दलों के शीर्ष नेता सीपीएम महासचिव एमए बेबी, नेता बृंदा करात, सीपीआई महासचिव डी राजा भी आंदोलन के मंच पर पहुंचे। इसके बाद भी वे लगातार समर्थन देने आते-जाते रहे। इन पार्टियों के सांसद भी आंदोलन में लगातार पहुंचते रहे।
The wrestlers are back at Jantar Mantar!
Bajrang Punia joined the protest to demand the immediate resignation of Union Education Minister Dharmendra Pradhan and an end to police brutality.
We won't back down. All people's movements stand united. pic.twitter.com/AXT9spPdxT
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 22, 2026
28 जून को जब प्रमुख शिक्षाविद और पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर अपनी भूख हड़ताल शुरू की तो उनके साथ ही वाम छात्र संगठन आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिशन) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा समेत संगठन के 6 छात्रों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी।

बीच में तीन अनशनकारियों की तबीयत बिगड़ने पर डॉक्टरों की सलाह पर अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन नेहा, आमीन और मनीष इन तीन छात्र नेताओं की भूख हड़ताल 20 जुलाई के संसद मार्च तक जारी रही। उस दिन इन छात्रों की भूख हड़ताल ख़त्म कराई गई और डॉक्टरों के ऑब्जर्वेशन में रखा गया, लेकिन एक दिन बाद ही नेहा प्रेस कॉन्फ्रेंस करती हैं और दूसरे दिन 22 जुलाई को फिर जंतर-मंतर पहुंच गईं और आंदोलन में डट गईं। तो ऐसा जज़्बा है इन युवा छात्र-छात्राओं का। इनके अलावा भी तमाम अलग-अलग जगह या संगठन से आए युवा भी इस दौरान अनशन पर रहे। किसी ने 18 दिन तो किसी ने 15 दिन भूख हड़ताल की। एक या दो दिन की भूख हड़ताल तो बहुत लोगों ने की।
धरने पर तो सब पहले दिन से ही डटे थे। इनमें आइसा के अलावा एसएफआई, एआईएसएफ, केवाईएस, दिशा, पछास आदि छात्र और युवा संगठन प्रमुख रूप से शामिल थे।

कुल मिलाकर वाम दलों और उनके छात्र संगठनों ने इस आंदोलन को पहले दिन से एक मज़बूत आधार दिया, लेकिन अगर वाम भी यह चाहे कि सोनम या दीपके एक क्रांतिकारी की तरह बिना इधर-उधर की बात किए मुद्दे पर डटे रहें और उनकी तरह मोदी सरकार को कड़ा संदेश दें, तो ये भी संभव नहीं। हमें सोनम और दीपके की सीमाओं को समझना होगा। हालांकि अब यह आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान की इस्तीफ़े की मांग से शुरू होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफ़े की मांग तक पहुंच गया है। पेपर लीक से शुरू होकर पूरे शिक्षा सुधार और रोज़गार की मांग तक पहुंच रहा है।
सभी विपक्षी दल इससे जुड़ रहे हैं। राहुल गांधी पूरी तरह सड़क पर उतर आए हैं, हालांकि अभी उन्होंने जंतर-मंतर से दूरी बना रखी है और अब लगता है कि ठीक ही है। शायद मोदी सरकार इंतज़ार कर रही है राहुल जंतर-मंतर जाएं, फिर कोई अराजकता कराई जाए और सारा ठीकरा राहुल के सिर पर फोड़ दिया जाए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव भी राहुल के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। उनकी पत्नी और सांसद डिंपल यादव एक अभिभावक की तरह 20 जुलाई को घायल आंदोलनकारियों का ख़्याल रखती नज़र आईं।
आज़ाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आज़ाद भी इस आंदोलन से पूरी तरह जुड़े हैं उन्होंने संसद परिसर में ही बाबा साहिब भीम राव आंबेडकर की प्रतिमा के नीचे धरना दे रक्खा है।
बारिश की हर बूँद स्वीकार है, मगर मासूमों पर अन्याय स्वीकार नहीं, जिन्होंने अन्याय किया वो कितने ही ताकतवर क्यों ना हो, उनके पीछे कितनी बड़ी शक्ति क्यों ना हो, लेकिन जवाब देना ही होगा।
महापुरुषों के विचार ही मेरे संघर्ष की ताक़त हैं। जय भीम, जय भारत। pic.twitter.com/14uRLsh41v— Chandra Shekhar Aazad (@BhimArmyChief) July 22, 2026
शिव सेना (उद्धव) के कई नेता और खुद उद्धव ठाकरे भी जंतर-मंतर पर पहुंचे। शरद पवार भी आंदोलन में गए। अब तो किसान, मज़दूर, महिला संगठन, बैंक एम्लाइज़ संगठन समेत तमाम संगठन और लोग इसके समर्थन में आगे आए हैं।
ख़ैर फिर लौटता हूं 20 जुलाई की तरफ़। 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान क्या हुआ वो देश-दुनिया ने देखा कि किस तरह गृहमंत्री अमित शाह के अंडर में आने वाली दिल्ली पुलिस और आरएएफ (रैपिड एक्शन फोर्स) ने निहत्थे छात्रों को मार-मारकर लहूलुहान कर दिया। लाठी चली, आंसू गैस के गोले छोड़े गए। अब तो पैलेट गन, कील लगी लाठियां और करेंट लगाने के भी वीडियो वायरल हैं। लड़कियों-बच्चियों के साथ भी खुलकर बदसुलूकी की गई। ऐसा शर्मनाक व्यवहार किया गया कि कुछ कहते नहीं बनता।
सरकार की रणनीति
आता हूं सरकार के मुद्दे पर, कि सरकार इसे कैसे हैंडिल करना चाहती है, या अब तक उसकी रणनीति क्या रही।
एक पत्रकार के तौर पर सरकार के नज़रिये की भी पड़ताल करुं तब भी मुझे मोदी सरकार की रणनीति बिल्कुल नहीं समझ आ रही है कि वो क्या सोच रही है, क्या चाह रही है। पहले तो वो लगभग छात्र-युवाओं की मांगों के प्रति बिल्कुल उदासीन बनी रही। फिर कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन शुरू हुआ तो उसने उसे संभालने की बजाय आग में घी डालने का काम किया। धर्मेंद्र प्रधान ने बच्चों को दहशतगर्द बताया। बीजेपी के किसी नेता ने टुकड़े-टुकड़े गैंग कहा, जैसा उनकी आदत है। किसी ने पाकिस्तान का हाथ तो किसी ने चीन का हाथ बताया। लेकिन किसी ने भी समस्या को समझने की कोशिश नहीं की।
पहले 6 जून को एक दिन का धरना और फिर 20 जून से अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया। लेकिन सरकार ने कोई पहल नहीं की। 20 जून को शाम साढ़े पांच बजे धरना ख़त्म होना था, लेकिन समय के बाद भी उसे वहां जमने दिया गया। फिर 28 जून से सोनम वांगचुक और उनके साथ कई छात्र अनशन शुरू कर देते हैं, लेकिन सरकार फिर गूंगी-बहरी बनी रहती है। दिन निकलते जाते हैं। अनशनकारियों की तबीयत ख़राब होने लगती है, लेकिन सरकार पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। फिर 20 जुलाई के संसद मार्च का ऐलान होता है। जंतर मंतर पर भीड़ बढ़ने लगती है, फिर अचानक सरकार सक्रिय होती है और 18 जुलाई को सोनम वांगचुक को जबरन जंतर-मंतर से उठा लिया जाता है। लोगों में इसी बात का ज़्यादा गुस्सा है कि भले ही धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा नहीं लिया जाता, लेकिन कोई एक प्रतिनिधिमंडल तो बातचीत के लिए भेजा सकता था। अनशन तोड़ने की अपील के साथ ही भेज देते, लेकिन नहीं। आंदोलनकारियों को लगता सरकार को उनकी फ़िक्र है, लेकिन सरकार ने ऐसी कोई समझदारी नहीं दिखाई। इसमें शायद मोदी जी को अपनी हेठी लगी हो, लगा हो कि इससे उनके 56 इंच के सीने पर डेंट लग जाएगा।
सोनम वांगचुक को इस तरह जबरन परदे की ओट में उठाना यही वह टर्निंग पाइंट था जिसकी इमोशनल अपील दिल्ली समेत पूरे देश में गई और जंतर-मंतर पर जन सैलाब उमड़ आया। लेकिन तब भी बातचीत का चैनल खोलकर मामला वहीं सुलझाया जा सकता था।
इसके बाद आती है 20 जुलाई। क्या मोदी सरकार का इंटेलिजेंस ब्यूरो इतना नाकारा है कि उसे अंदाज़ा ही नहीं लगा कि 20 जुलाई को कितने लोग दिल्ली पहुंचने वाले हैं, सड़कों पर आने वाले हैं।
और फिर उस दिन लाखों लोग दिल्ली की सड़कों पर थे। सबने पहले जंतर-मंतर पहुंचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बीच-बीच में रोक दिया गया। इधर जंतर-मंतर भी फुल हो चुका था। फिर सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया। यह मूर्खता थी, इससे यह हुआ कि सीजेपी का कोई निर्देश सड़कों पर इकट्ठा लोगों तक नहीं पहुंचा। अलबत्ता कन्फ्यूज़न और अफवाहों का बाज़ार ज़रूर गर्म हो गया। और फिर लोग जहां थे वहीं से संसद की तरफ़ मार्च शुरू कर दिया। और फिर आप सबने देखा ही क्या घमासान हुआ। पुलिस, आरएएफ ने जगह-जगह बैरेकेडिंग करके उन्हें रोकने की कोशिश की। लोगों ने आगे बढ़ने की कोशिश की और टकराव हो गया। और पुलिस ने वहीं किया जो वो हमेशा करती है लाठीचार्ज। जगह-जगह निहत्थे छात्रों पर लाठीचार्ज आंसू गैस के गोले। लेकिन नौजवानों को कौन रोक सका है। इसलिए वे भी भिड़ गए। पत्थर भी चले। हां, इससे भी इंकार नहीं। लेकिन इसमें भी पहला शक संघ-बीजेपी के लोगों पर ही है। पुलिस ने भी पत्थर चलाए। सादी वर्दी में भी डंडे लिए पुलिस थी या गुंडे अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया है।
संसद मार्च से पहली रात को जंतर-मंतर के पास खड़ा किया पत्थरों से भरा ट्रक और टूटी गाड़ी भी वालियंटर्स ने पकड़ी थी। उसका वीडियो भी बनाया गया। पुलिस से सवाल पूछा गया कि इस एरिया में यह पत्थरों से भरी गाड़ी अचानक से कहां से आकर खड़ी हो गई। लेकिन पुलिस ने चुप्पी साध ली। एक गाड़ी को पुलिस खुद तोड़ती कैमरे में क़ैद हुई।
ख़ैर आंदोलन हुआ, घमासान हुआ, यह सब तो सबको पता है, लेकिन एक बात अभी तक समझ में नहीं आई। वो अब तक मेरे लिए और हमारे तमाम आंदोलनों को कवर करने वाले पत्रकार साथियों के लिए पहेली बनी हुई है कि जब संसद मार्च के दौरान दिन में जंतर-मंतर खाली करा लिया गया था। तंबू उखाड़ दिया गया था तो फिर उसी रात को फिर वहां कैसे धरना जम गया। क्या हम यह मान लें कि यह सरकार की सहमति या मर्जी़ के बिना संभव हो गया। अगर सरकार और उसकी पुलिस चाहती तो उस रात को फिर वहीं धरना नहीं जम सकता था। तंबू नहीं खड़ा हो सकता था। ऐसे कैसा हुआ, कैसे होने दिया गया, यह समझ से बाहर है।
Who are these lathi-armed goons in plainclothes @DelhiPolice? Who have you hired on your force to beat us up? Why are such monsters called police in India? pic.twitter.com/h3pXcz3RKQ
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 20, 2026
बस एक बात समझ आ रही है कि इस आंदोलन में बड़ी संख्या में मिडिल और अपर क्लास परिवारों के बच्चे हैं। जिनमें बड़ी संख्या बीजेपी सपोर्टरों की है। तो क्या शुरुआती हिंसा के बाद सरकार ने इसलिए दोबारा आंदोलन जमने दिया और खदेड़ कर नहीं भगाया कि और सख़्ती करने से कहीं उसका वोटर वर्ग उससे ज़्यादा ही नाराज़ न हो जाए। जबकि सुबह ही जो डैमेज हो चुका था वो हो चुका था। फिर बाद की नरमी से वो मैनेज होने वाला नहीं था।
आख़िर सरकार की रणनीति क्या है। और फिर वहां जनसैलाब उमड़ने लगा है। और यह स्वाभाविक है कि इस बीच विपक्ष भी फायदा उठाएगा। क्यों नहीं उठाएगा, जब सरकार उसे भरपूर मौका दे रही है। और फिर विपक्ष इस तरह सड़क पर उतरी जनता के साथ नहीं आएगा तो क्या करेगा। उसकी राजनीति किस काम की।
क्या सरकार चाहती थी धरना चलता रहे?
अब फिर जंतर-मंतर के भीतर और बाहर दिन-रात भारी भीड़ उमड़ रही है। जगह-जगह से झड़प की ख़बरें आ रही हैं। इसके अलावा देशभर में आंदोलन शुरू हो गया है।
सरकार की तरफ़ से ही सोचा जाए तो कितना समय था, बातचीत के लिए। पूरा एक महीना। वो भी छोड़िये शुरूआती दिनों में 400-500 लोग ही जंतर मंतर पर रहते थे। रात में तो 50-100 लोग रह जाते थे। पुलिस जिस दिन चाहती बिना बल प्रयोग के धरना हटा सकती थी, क्योंकि धरने कि केवल एक दिन की परमिशन थी। उसे उसी दिन शाम को गैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया था। सोनम वांगचुक के अनशन के बाद भीड़ बढ़नी शुरू हुई तब भी बहुत ज़्यादा नहीं थी, जितनी सख़्ती और बल प्रयोग 20 जुलाई को किया गया उसके चौथाई या उससे भी कम में धरना हटाया जा सकता था। और यह पहले हो भी चुका है। दिल्ली पुलिस इस मामले में ट्रेंड है। यहां धरना प्रदर्शन रोज़ की बात है, लेकिन पता नहीं किस चीज का इंतज़ार किया जा रहा था। न मांगें माननी थी, न धरना हटाना था। यह राजनीति अभी डिकोड होना बाक़ी है। ख़ैर तब तक सब शांतिपूर्ण चल रहा था।
फिर अचानक 17 जुलाई को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को बदल दिया गया। सतीश गोलचा को हटाकर आईबी से लाकर अनुराग कुमार को कमिश्नर बना दिया गया। और अगले ही दिन 18 जुलाई को सोनम वांगचुक को दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए जंतर-मंतर से उठाकर जबरन अस्पताल में भर्ती करा दिया गया। और जंतर-मंतर पर जनसैलाब उमड़ पड़ा।
20 जुलाई को फिर कैसे जमा धरना!
दो दिन बाद 20 जुलाई को जो कुछ हुआ आप सबने देखा। लेकिन 20 जुलाई को दिन में जंतर मंतर खाली करा लिया गया तो फिर वहां रात में किसी को आने क्यों दिया गया। हम यह नहीं मान सकते कि दिल्ली पुलिस इस काम में माहिर नहीं है। लेकिन फिर पहले की तरह धरना शुरू करने दिया गया।
तो सरकार की इससे निपटने की रणनीति क्या है। क्या उसके सोचने-समझने की शक्ति चली गई है। या वह अपने अहंकार में है कि इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता वह फिर चुनाव जीत जाएगी या क्या वह यह चाहती है कि किसी तरह यह आंदोलन पूरी तरह अराजक हो जाए। हालांकि अब भी वास्तविक आंदोलनकारी छात्र-युवा जोश और गुस्से में तो हैं, लेकिन शांत बने हुए हैं। पुलिस वालों को फूल तक दे रहे हैं। पानी और खाने तक को पूछ रहे हैं।
The only projectiles we support❤️
These cuties deserve some love and flowers to overcome hatred and anger! pic.twitter.com/t1xafcJKUo
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 22, 2026
लेकिन यह कहने में भी कोई गुरेज़ नहीं कि अब तमाम तरह के तत्व इस आंदोलन में घुस रहे हैं या घुसाए जा रहे हैं।
#Imp: This goon also attacked minor Nishu’s father, Sanjay ji, inside Jantar Mantar and broke his skull. We kept demanding that the Police invoke SC/ST Act, and stricter IPC provisions. Our fear was that he’ll be emboldened to repeat this.@DCPNewDelhi why are you protecting…
— Saurav Das (@SauravDassss) July 23, 2026
IMPORTANT ANNOUNCEMENT
BJP-linked goons like this person, Abhishek Thakur who has several FIRs in UP and is close to BJP leaders are active in Delhi to create mischief.
Please beware of such elements.
Hope @DelhiPolice will not let him roam with the streets with a lathi pic.twitter.com/H4JICPPgWP
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 22, 2026
यह किसकी नाकामी है, यह किसकी साज़िश है। क्या सरकार किसी बड़ी हिंसा और अराजकता के इंतज़ार में है ताकि फिर इस आंदोलन को बदनाम कर इसका बलपूर्वक दमन किया जा सके।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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