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विमर्श: आज़ादी के आंदोलन के हर चरण में किसान सभा का योगदान रहा

किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की 76वीं पुण्यतिथि के अवसर पर श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट और पटना जिला किसान सभा का संयुक्त आयोजन
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पटना: क्रांतिकारी किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की 76 वीं पुण्यतिथि के अवसर पर राघवपुर (बिहटा) में श्री सीताराम आश्रम  में विमर्श का अयोजन किया गया। विषय था "आजादी के आंदोलन में किसान सभा की भूमिका"। इस कार्यक्रम में आसपास के गांवों और  कस्बों के किसान व उनके प्रतिनिधि मौजूद थे।  स्वागत वक्तव्य अभिषेक कुमार ने किया जबकि पूरे कार्यक्रम का संचालन पटना जिला किसान सभा के  सचिव गोपाल शर्मा ने किया ।

विषय प्रवेश करते हुए श्री सीताराम आश्रम ट्रस्ट के अध्यक्ष व स्वामी सहजानंद सरस्वती के अध्येता कैलाश चंद्र झा  ने अपने वक्तव्य में बताया कि "स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 1927 में पटना पश्चिमी किसान सभा की स्थापना की थी। यही सभा आगे चलकर 1929 में बिहार राज्य किसान सभा तथा 1936 में ऑल इंडिया किसान सभा  के रूप मे विकसित हुई। यह स्वतंत्रता आंदोलन के बीच की कहानी है। इस किसान सभा को जवाहर लाल नेहरू का समर्थन था। नमक आंदोलन, असहयोग आंदोलन सबमें  किसान सभा के लोग शरीक रहे। मतभेद शुरू हुआ 1942 में जब पीपुल्स वार की लाइन आई। स्वामी जी ने कई राजनीतिक मसलों पर स्टैंड लिया। इस बीच कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के मध्य आपस में मतभेद उभरने लगे। 1942 में क्या हो रहा था यह गहन शोध का विषय है जिसपर काम किया जाना बाकी है। मेरा और वाल्टर हाउजर का मानना है किसान सभा कम्युनिस्ट पार्टी और जयप्रकाश नारायण के बीच बंट गई। भारत छोड़ो आंदोलन को लेकर भी अलग अलग राय उभर कर आ गई। मुझे हाल में हजारीबाग  जेल में जाने का मौका मिला वहां मैने देखा कि  राहुल जी का सेल मौजूद था लेकिन स्वामी जी का कोई चिह्न बचाकर नहीं रखा गया है। 1937 में जब पहली बार मंत्रिमंडल बना तो सबसे पहला मुख्यमंत्री मोहम्मद यूनुस को बनाया गया श्री कृष्ण सिंह दूसरे मुख्यमंत्री थे। ये बात आजकल कम लोग जानते हैं।"

जन संस्कृति मंच में राज्य अध्यक्ष जितेंद्र कुमार ने राष्ट्रीय आंदोलन की चर्चा करते हुए हुए कहा " प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन एम्पायर का अंत हो गया। इस्लाम के  खलीफा का अंत कर दिया। महात्मा गांधी ने अच्छी डिप्लोमेसी करते हुए मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए  खलीफा का सपोर्ट किया। स्वामी सहजानंद असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी से जुड़ जाते हैं।  पटना पश्चिमी किसान सभा के माध्यम से किसानों की मुक्ति की लड़ाई शुरू की  साम्राज्यवाद, जमींदार, छुआछूत, वर्णवाद इन सबसे लड़ाई लड़ने की ठानी। ब्राह्मणों से प्रतिष्ठा दिलाने के लिए बनारस से बिहटा तक के लड़ाई लड़ी। वे पौरोहित्य की खिलाफ लड़ने को प्रेरित कर रहे थे। स्वामी जी ने 'मेरा जीवन संघर्ष' किताब में बताया  कि कैसे बेगारी करवाई जाती थी । स्वामी जी ने हथुआ महाराज के खिलाफ एक धोबी को खड़ा कर दिया था। पुलिस हथुआ महाराज के खिलाफ काम करते हुए वोटरों को वोट देने रोका करते थे। स्वामी जी को यह एहसास हुआ कि पाखंड से भी मुक्ति जरूरी है। देश से मुक्ति के साथ-साथ जमींदारों , छद्म धार्मिकता से मुक्ति चाहिये। सबसे पहला जमींदारी उन्मूलन कानून बिहार में पास हुआ। दरभंगा महाराज  ने केस कर दिया बाद में भारतीय संविधान में पहला संशोधन जवाहर लाल के मदद से किया गया। "

बिहार राज्य किसान महासभा के उमेश सिंह ने बताया "आज देश का सबसे बड़ा जमींदार अडानी है  जो सोलह लाख एकड़ जमीन का मालिक है। इतनी जमीन तो आजतक किसी  जमींदार के पास नहीं  रही है  । विकास  के नाम पर कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। कोराना के समय पर तीन काले कानून लाकर हमारी खेती, उत्पाद पर कब्जा करने का प्रयास किया गया लेकिन उसके खिलाफ भारत भर के किसानों से  संघर्ष किया। दुनिया के इतिहास के फ्रेंच क्रांति के बाद यह किसानों की  सबसे बड़ी गोलबंदी  कही जाती है। जब देश के किसानों ने राजधानी को चारों ओर से घेर कर 13 महीने तक लड़ाई लड़कर काले कानूनों को वापस लेने पर मजबूर कर दिया गया। अभी वर्तमान सरकार सेटेलाइट टाउनशिप का कानून लाई है। यह अब तक का सबसे बड़ा भूमि हड़प आंदोलन है। अकेले पटना जिला में 81 हजार एकड़ कब्जा किया गया है। सरकार इसको विकास का नाम देकर ‘लैंड पुलिंग’ कह रही है। खेती भूमि का नाश किया जा रहा है। अब गौतम अडानी बिहार में निवेश की बात कर रहे हैं। बिहार में खेती भूमि के अलावा तो कुछ भी नहीं है । जिस राज्य में हाइवे निर्माण के नाम पर चार लाख पचपन हजार एकड़ जमीन पर कब्जा किया गया।  मुआवजा नहीं दिया जाता है विरोध करने पर पुलिस सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाने का नाम देकर जेल में डाल देती है। बगीचा, पेड़ कटने के नाम पर प्रकृति बैलेंस खत्म हो रहा है। प्रतिकार इसलिए नहीं हो रहा क्योंकि स्वामी जी की तरह कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है।"

पेशे से अधिवक्ता ज्ञानचंद्र भारद्वाज ने अपने गांव दहिया से स्वामी जी से संबंध के बारे में बताया "स्वामी जी ने हमारे गांव में लाइब्रेरी और शिक्षा का प्रसार किया करते थे। हमारे गांव में संस्कृत विद्यालय खोला गया यह आजकल हाईस्कूल बन गया है। किसान आंदोलन उसका शिक्षा , स्वास्थ्य आदि से भी जुड़ा हुआ रहा है। किसी भी आंदोलन की सफलता तभी होती है जब साथ-साथ सुधार आंदोलन भी चलता  है। जब हमारे गांव में ब्राह्मण लोगों ने पुरोहित का काम छोड़ दिया तो खगड़िया के संस्कृत विद्यालय से लाकर काम शुरू किया। समाज के सुधार आंदोलन पर मौलिक रूप से काम शुरू किया। बेगूसराय के हमारे इलाके में नौ सत्ता घर होता है इसे बनाने के लिए , स्वामी जी के अनुसार, किसी पंडित की आवश्यकता नहीं है। 

अब सवाल यह है की  किसान अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे? जब तक सरकारी  स्कूल नहीं होगा और इलाज के लिए सरकारी स्वास्थ्य की सुविधा नहीं होगी ? पुस्तकालय अंग्रेजों से छुपकर मीटिंग करने की जगह थी। सही मायने में राष्ट्र भक्त किसान है। आज बिड़ला और आर. एस. एस दोनों के स्कूल का फीस एक ही है।"

बिहार राज्य किसान सभा के रवींद्र नाथ राय ने अपने संबोधन में कहा "1857 में चलने वाले आंदोलन किसानों के आंदोलन थे । कुंवर सिंह के नेतृत्व में  शामिल होने वाले सिपाही कौन थे? वे तो वर्दी  पहने हुए  किसान थे।  उससे पहले आदिवासियों का आंदोलन भी दरअसल किसानों का आंदोलन ही था। भगत सिंह के चाचा किसानों के नेता थे। जालियांवाला बाग में मरने वालों में विभिन्न गांवों से आए हुए किसानों के बेटे थे। चौरा-चौरी की घटना में मरने वाले किसान थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती किसानों को केंद्रीय भूमिका में लाते हैं। उन्होंने जो किसान सभा बनाई वह संगठित लड़ाई की शुरुआत थी। कांग्रेस के नेतृत्व में बड़े जमींदार थे। स्वाधीनता आंदोलन के बीच से किसानों के आंदोलन को खड़ा किया। यदि स्वामी जी के नेतृत्व में किसान आंदोलन नहीं होता तो भारत का संविधान पूंजीपतियों और जमींदारों का बनता। आज बिहार में जमीन छीनने की तैयारी चल रही है और कोई आंदोलन क्यों नहीं खड़ा हो रहा है। जब जमीन जाने की बात हुई तो पंजाब के किसानों में उबाल आया पर बिहार के  किसानों में नहीं आया। सच बात तो यह है कि आज किसानों को किसानी से मुहब्बत नहीं रह गई है। भारत के जितनी कृषि नीति बनी है 1967 के बाद वह अमेरिकी कंपनियों द्वारा बनाई गई है। कृषि विश्विद्यालयों के पाठ्यक्रम तक  को  अमेरिकी हितों के अनुरूप  बनाया गया है । पूरी कृषि पद्धति को नष्ट कर दिया गया है। आज की लड़ाई जमींदारों के बदले कॉरपोरेट  के इशारे में बनने वाली नीतियों से है। "

सभा को संबोधित करने वाले अन्य वक्ताओं में थे  गोरखरी गांव के लवकुश शर्मा, अमहरा के सुधीरशरण , रांतरी गाँव के कांग्रेस नेता सुधीर शर्मा तथा पटना जिला किसान सभा के अध्यक्ष वशिष्ठ शामिल थे। धन्यवाद ज्ञापन सुधांशु कुमार ने किया।  

कार्यक्रम में शामिल प्रमुख लोगों में थे  अनीश अंकुर, बिक्रम से लवकुश शर्मा, नौबतपुर से निर्मल कुमार सोनू, वशिष्ठ , पटना से आए उदयन राय, बिसनपुरा से संतोष ,  अमहारा  से  अंगिरा शर्मा,  महेश प्रसाद, दारा, शैलेश कुमार, महेश  प्रसाद,  सुधीर सिंह , मुन्ना सिंह, वैभव , गंगाचक के गोपाल जी, कौड़िया के सगुनी, सूर्यदेव आदि थे।

इस मौके पर ‘दीक्षा फाउंडेशन’  द्वारा चलाए जा रहे स्कूल के बच्चों द्वारा एक कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया । छोटे-छोटे बच्चों ने बहुत अच्छी कलाकृतियों को प्रदर्शित किया था।  जिस किस्म की कृतियाँ शामिल थी उसमें प्रमुख है मधुबनी पेंटिंग, जूट पेंटिंग, बम्बू स्टैंड, क्लॉथ  बैग, ट्रे, पॉट लाइट, फ्रिज मैगनेट, ज्वेलरी आइटम , कैनवास पेंटिंग। शामिल बच्चों में सृष्टि, इशिका, नंदिनी, सलोनी, मुस्कान, अनुप्रिया शर्मा, सोनाली, आदित्य, आनंदी, आयुष, शिवम, अंकित, प्रज्ञा, प्रिया, विष्णु आदि थे।

 

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