दिल्ली का यमुना बाज़ार : जब घाट उजड़ते हैं तो क्या होता है?
कहते हैं कि नदियों ने जब भी अपना रास्ता बदला सभ्यताएं ख़त्म हो गईं, लेकिन जब घाट बदलते या फिर उजड़ते हैं तो नदियों पर क्या प्रभाव पड़ता होगा? नदियां अपने उद्गम स्थान से लेकर सागर में मिलने तक एक लंबा रास्ता तय करती हैं, इस दौरान वे कई शहरों और घाटों से होकर गुज़रती है, एक नदी और कई घाट। हर घाट का अपना जीवन होता है, अपने मौसम होते हैं, साथ ही होता है अपना इतिहास और भूगोल भी। हाल ही में वाराणसी के घाटों का 'ब्यूटीफिकेशन' करने के नाम पर बुलडोज़र चला तो पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे काशी के सदियों पुराने इतिहास की परतों को मिट्टी में मिला दिया गया।
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आख़िरकार यमुना बाज़ार में चल गया बुलडोज़र
कुछ दिन पहले दिल्ली के यमुना बाज़ार के घाटों पर भी आख़िरकार बुलडोज़र चला और वहां का भी भूगोल बदल गया। फिलहाल वहां हर तरफ मलबा ही मलबा है। और इस मलबे में कई ऐसी चीज़ों को दफ़न कर दिया जिसका गवाह सिर्फ़ सामने बहता दरिया है।
यमुना ने बदलती दिल्ली को देखा है और रफ़्ता-रफ़्ता वह ख़ुद भी बदलती चली गई। दिल्ली के यमुना बाज़ार के घाट इंस्टाग्राम की वायरल लोकेशन में शुमार हैं। यहां सर्दियों में हज़ारों मील का सफ़र तय कर साइबेरियन पक्षी आते हैं। जिन्हें देखने के लिए लोगों ( ज़्यादातार युवा ) की अच्छी-ख़ासी भीड़ उमड़ती है।
सर्द मौसम में धुंध में तैरती कश्तियों के ऊपर मंडराती ये साइबेरियन बर्ड बहुत ही दिलकश लगती हैं, दरिया की इस ख़ूबसूरती ने मुग़लों को भी आकर्षित किया, शाहजहां के क़िला-ए-मुबारक (लाल क़िला) बनवाने से बहुत पहले, दूसरे मुग़ल बादशाह हुमायूं को भी यमुना से बेहद लगाव था। इतिहास बताता है कि आज जहां यमुना बाज़ार के घाट हैं उससे चंद क़दमों की दूरी पर हुमायूं ने यमुना को देखने के लिए एक ख़ूबसूरत चबूतरा बनवाया था। हालांकि माना जाता है कि इस जगह पर हुमायूं से पहले के भी कुछ ऐतिहासिक निमार्ण मौजूद थे।
जब हुमायूँ ने यमुना को निहारने के लिए बनवाया था चबूतरा
सुफल कुमार ने किताब ' दिल्ली सिटी ऑफ योगिनी' में जिक्र किया है कि '' दिल्ली पुरातत्व विभाग के अधिकारी मौलवी जफ़र हसन ने एक विशाल कार्य 'मॉन्यूमेंट्स ऑफ दिल्ली: लास्टिंग स्पलेंडर ऑफ द ग्रेट मुगल्स एंड अदर्स' ( Monument of Delhi: Lasting Splendour of the great Mughal and others (1919) में संकलित किया। उन्होंने नीली छतरी मंदिर को एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया और कहा ''माना जाता है कि नीली छतरी मंदिर का निमार्ण मूल रूप से हुमायूं द्वारा साल 1531-33 में किया गया था, ताकि वह इस मंडप से यमुना के दृश्य का आनंद ले सकें''
सुफल इसी किताब में आगे बताते हैं कि ''जफ़र हसन ने 'जहांगीरनामा' से सम्राट के नीली छतरी मंदिर में ठहरने के विवरण को उद्धृत (quote) किया ''नदी के किनारे पत्थरों का एक चबूतरा जो अत्यधिक सुखद और उज्जवल था, पानी के पास इमारत के नीचे हुमायूं के आदेश से चमकीली टाइलों वाला एक चबूतरा बनाया गया था और ऐसी आब-ओ-हवा वाली बहुत कम जगहें हैं''
नीली छतरी वाला मंदिर और पौराणिक मान्यताएं
हालांकि, सर सैयद अहम ख़ान के मुताबिक़ नीली छतरी मंदिर निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थर संभवत: किसी इससे भी प्राचीन हिंदू संरचना के रहे होंगे। मान्यता है कि यहीं राजा युधिष्ठिर ने एक यज्ञ संपन्न किया था। साल 1852 में एक ब्राह्मण ने इस भवन पर अपना अधिकार स्थापित करने की कोशिश की थी। तब बहादुर शाह ज़फ़र ने स्थानीय प्रशासन से उसे हटाने की गुज़ारिश की थी और प्रमाण के तौर पर हुमायूं और जहांगीर द्वारा भवन में लगवाए गए अभिलेखों ( शिलालेखों ) का हवाला दिया था। इन शिलालेखों का आज की तारीख़ में कोई अता-पता नहीं है।
सदियों बाद यमुना आज भी दिल्ली से होकर बह रही है और नीली छतरी मंदिर आज भी मौजूद है। आज भी वहां से यमुना दिखती है हालांकि अब नज़ारा इतना बदसूरत हो गया है कि यक़ीन करना मुश्किल है कि कभी महज़ इस नदी की सुंदरता को निहारने के लिए यहां ख़ास बंदोबस्त किए गए होंगे।
सिद्धार्थ को मिला युमना किनारे 'ज्ञान'
ये एक इत्तेफ़ाक ही था कि इस साल जनवरी से ही कई बार यमुना के घाटों पर जाना हो रहा था और इसी दौरान जून के आख़िरी सप्ताह में एक दिन ख़बर मिली की यमुना बाज़ार में बुलडोज़र कार्रवाई हो रही है। जैसे ही हम यहां पहुंचे भारी पुलिस बल की तैनाती दिखाई दी, हमने घाट पर जाने की कोशिश की तो पुलिस बल ने साफ़ इनकार कर दिया। यहां अतिक्रमण हटाने के नाम पर डीडीए का बुलडोज़र चला और बेघर हुए लोग अपने सामान के साथ सड़कों पर बैठे थे।
तेज़ धूप में अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ सड़क पर पड़े ये लोग समझ नहीं पा रहे थे कि क्या करें?
यहीं हमें पांचवी क्लास में पढ़ने वाला आठ साल का सिद्धार्थ मिला जो तेज़ धूप में एक तिरपाल के नीचे अपने बाक़ी के सोते हुए भाई-बहनों के बीच मोबाइल पर कुछ देख रहा था। हमने जब सिद्धार्थ से पूछा कि घर कहां था? तो घाट की तरफ इशारा करके कहने लगा कि वहां, वे बताता है कि उसका परिवार खुले में सड़क पर सो रहा है और वहीं पर खाना बन रहा है, जब हमने उससे पूछा कि क्या उसे समझ में आ रहा है कि ये सब क्या हो रहा है? तो कहने लगा नहीं ?
एक आठ साल के बच्चे ने अपने टूटे घर की जगह पसरे मलबे की तरफ इशारा करके जब कहा कि ''वहां था मेरा घर'' तो उसके बाद हमारी हिम्मत नहीं हुई कि आगे कुछ पूछा जाए।
कभी सिद्धार्थ अपने घर को छोड़ कर मोक्ष की तलाश में निकल गए थे और एक नदी किनारे ज्ञान प्राप्त कर भगवान बुद्ध बन गए थे। लेकिन इस आठ साल के सिद्धार्थ को दिल्ली की यमुना नदी के किनारे घर से निकाल दिया गया, वैसे तो उसकी उम्र बहुत कम है लेकिन उसे भी ताउम्र के लिए एक 'ज्ञान' प्राप्त हो गया।
''बाढ़ ठीक थी पानी उतरने पर घर लौट आते थे''
वहीं सिद्धार्थ की मां मुन्नी देवी ऑन कैमरा कुछ भी कहने से बचती नज़र आईं लेकिन, ऑफ कैमरा वे अपना दर्द बयां करते हुए कहती हैं कि '' बाढ़ ठीक थी पानी उतर जाता था तो अपने घर लौट जाते थे लेकिन अब कहां जाएंगे, बच्चों को लेकर बाहर, धूप में इतनी गर्मी में पड़े हैं'' ।

( DDA का बुलडोज़र चलने के बाद बेघर हुए बच्चे )
''मेरी बच्चियों का भविष्य ख़राब हो गया''
यमुना बाज़ार के सामने एक मंदिर की छत पर हमें रूबी मिली वे वहां से अपना घर दिखाते हुए बताती हैं कि जामुन के पेड़ के नीचे उनका घर था, वे दावा करती हैं कि उनका परिवार यहां पांच पीढ़ियों से रह रहा था। वे हनुमान मंदिर के सामने सड़क किनारे फूल बेचती हैं। वे कहती हैं कि '' यहां कई बार पहले भी नोटिस लग चुके हैं हमारे घर के बड़े-बुज़ुर्गों ने कहा कि ऐसा पहले भी हो चुका है नोटिस लग चुके हैं, तो हम भी इसी भरोसे में थे, लेकिन जब से ये रेखा गुप्ता आईं हैं कुछ ज़्यादा ही तोड़-फोड़ हो रही है। अभी हम हाईवे पर रह रहे हैं जैसे बाढ़ में रहते थे, मेरी दो बेटियां हैं एक दो साल की और एक दस साल की वो यहीं सामने स्कूल में पढ़ती है, मेरे बच्चों का भविष्य ख़राब हो गया''
फिलहाल रूबी को किराए का घर मिल गया है लेकिन वे बताती हैं कि उनका काम यहां है (यमुना बाज़ार के पास) बड़ी बेटी का स्कूल यहां है तो हर दिन आने-जाने में क़रीब दो सौ रुपए ख़र्च हो रहे हैं ऐसे में उनके लिए घर चलाना बहुत मुश्किल हो गया है।
वहीं कुछ लोगों ने सार्वजनिक शौचालय में जगह ले रखी थी। वे लोग तेज़ धूप से बचने के लिए शौचालय में ही चारपाई बिछाकर दिन काट रहे थे।
डीडीए के बुलडोज़र ने यमुना बाज़ार के घाटों को समतल कर दिया। हालांकि घाट पर मौजूद कुछ मंदिरों को छोड़ दिया गया है लेकिन कई ऐतिहासिक महत्व की इमारतों को नुक़सान पहुंचाया गया है।
मई में लगे थे घर ख़ाली करने के नोटिस

इससे पहले मई महीने में यमुना बाज़ार में दिल्ली प्रशासन की तरफ से घरों को ख़ाली करने के नोटिस जारी किए गए थे। यहां दिल्ली डिजास्टर मैनेजमेंट ( DDMA ) की तरफ़ से नोटिस लगाया गया था । मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ यमुना बाज़ार की ज़मीन दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी ( DDA ) की है और यहां किसी भी तरह का निमार्ण कार्य नहीं किया जा सकता। साथ ही इन मीडिया रिपोर्ट में जिक्र है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने DDA को यमुना के बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमण के संबंध में ज़रूरी कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।
बताया जाता है कि यमुना बाज़ार में 32 घाट हैं जिनमें क़रीब 1100 लोग रह रहे थे। लेकिन बुलडोज़र चलने के बाद अब यहां मलबा और सन्नाटा पसरा है।
2023 की बाढ़ ने डरा दिया था
यमुना में बाढ़ के दौरान इस इलाक़े में पानी भर जाता है, अगर पीछे पलट कर देखें तो साल 2023 और 2025 में बाढ़ के दौरान पानी ख़तरे के निशान से कुछ ज़्यादा ही ऊपर चला गया था जिसकी वजह से यहां रह रहे लोगों के लिए ख़तरा पैदा हो गया था। और जिसने प्रशासन को भी चिंता में डाल दिया था।
'ओ ज़ोन' का हिस्सा यमुना के घाट?
ये इलाक़ा दिल्ली के निचले इलाकों में से एक है और सरकार के लिए ये ओ-ज़ोन है जिसका मतलब है कि वो इलाका जहां हर साल बाढ़ का ख़तरा बना रहता है।
जैसा कि हमने ऊपर बताया था कि हम इस साल के शुरू से लगातार यहां जा रहे थे तो मई में लोगों के घरों पर नोटिस लगने की ख़बर मिलते ही यमुना बाज़ार पहुंचे।
तपती दोपहर में, जब तापमान रिकॉर्ड तोड़ गर्मी की हेडलाइन बन रहा था, दोपहर के वक़्त यमुना से आती हवा, लू बन गई थी, ऐसी तपिश में क़रीब 60-62 साल की बुज़ुर्ग बसंती अपनी सिलाई मशीन पर काम कर रही थीं, हमने उनसे अभी यमुना बाज़ार में घर खाली करने के नोटिस के बारे में पूछा ही था कि उनकी आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, वे साड़ी के एक छोर से आंसुओं को पोछते हुए कहने लगीं '' हम यहां बहुत सालों से रह रहे हैं, बहुत परेशान हैं, कहीं जगह-ज़मीन नहीं है, अपना घर नहीं है, सोचती हूं बिहार वापस चली जाऊं लेकिन पोते-पोती की क्लास निकल जाए तब, अभी दो साल टाइम है। यहां रोज़गार है इसीलिए हैं, बेटा दुकान पर काम करता है''
''जहां झुग्गी वहां मकान का वादा किया था''
बिहार के मधुबनी से नाता रखने वाली बसंती सालों पहले अपने पति के साथ दिल्ली आईं थी, यहां यमुना बाज़ार में रह रही थीं, लेकिन नोटिस मिलने पर बहुत परेशान थीं उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या होगा। जब हमने उनसे पूछा कि क्या वे प्रशासन से कोई अपील करना चाहती हैं तो वे फिर से सुबकते हुए कहने लगीं '' जब इतने दिन रुक गए तो एक-दो साल और रुक जाते। मोदी जी कहते थे '' जहां झुग्गी वहां मकान'' तो इसीलिए हम उनको भोट (वोट) दे-देकर जिताए, और अब उन्हीं के चक्कर में उजाड़ रहे हैं ''
चुनावी वादों की ये ख़ासियत होती है कि वे जो सपना दिखाते हैं जनता को उसमें अपने सपनों की ताबीर नज़र आने लगती है।
इन सबके बीच सवाल उठता है कि क्या समाधान के नाम पर सरकार उन लोगों को ही वहां से हटा रही है जिनका हर साल बाढ़ के वक़्त पुनर्वास किया जाता था ?
''किस काम के हैं हमारे वोट'' ?
बुलडोज़र चलने से पहले (मई में) हमें यहां अपने घर के बाहर बैठी मिलीं एक सास-बहू। बुज़ुर्ग सास सोमवती घर खाली करने के नोटिस मिलने पर बेबस और सरकार से नाराज़ दिखाई दी थीं वे कह रही थीं कि -
''अब हमारे वोट किस काम के हैं, हमें घर से निकाल रहे हैं, 60-70 साल से हम यहां रह रहे हैं, सारा परिवार हमारा वोट दे रहा है वे किस काम के हैं? आज घर भी नहीं है अब बताओ कहां जाएं? 15 हज़ार तनख़्वाह है उसमें 8 हज़ार किराया दे देंगे तो खाएंगे क्या और क्या बच्चों को पढ़ाएंगे? लेकिन जब वोट मांगने आते हैं तो हाथ जोड़ते हैं ये लोग ''।
''अंग्रेज़ों के टाइम के हैं ये घाट''
इन घाटों पर रहने वाले कुछ लोगों ने दावा किया था कि वे कई पीढ़ियों से यहां रह रहे थे, तो कुछ के पास घाट से जुड़ी पुरानी जानकारी मिली, यहीं घाट पर हमें एक महिला मिलीं जो बताती हैं कि '' मेरे पिता जी की यहां गोताखोर के तौर पर गर्मियों का मौसम शुरू होते ही चार महीने की ड्यूटी लगती थी'' वे आगे बताती हैं कि '' ये घाट डेढ़ सौ साल पुराने हैं, अंग्रेजों के टाइम के, इनमें एक-एक पंडित बसाए गए थे, ये खुले घाट थे'' वे कहती हैं कि '' इन घाटों पर बहुत से मंदिर हैं। नीली छतरी वाले, बाबा बालक नाथ ''
ऐतिहासिक इमारत पर चला दिया बुलडोज़र ?
28 नंबर घाट पर हमें एक बुज़ुर्ग मिले थे जिनका नाम राम चंदर भगत था। वे बता रहे थे कि उनकी उम्र 107 साल है। उनकी आँखों की रौशनी कम हो चुकी है, लेकिन आज भी उन्हें गुज़रे वक़्त की बातें किसी क़िस्से-कहानी की तरह याद हैं जिसे सुनाते वक़्त उनकी आंखें चमक उठती हैं। वे बताते हैं कि ''इन घाटों पर साधु-महात्मा रहते थे, यहीं बैठते थे, इस घाट पर बहुत से पुराने मंदिर हैं'' वे अपने घर के सामने ही बनी एक पुरानी इमारत की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं '' ये अंग्रेजों के ज़माने से बना है''।
लेकिन, बुलडोज़र कार्रवाई के बाद जब हम वहां पहुंचे तो जिस इमारत को राम चंदर अंग्रेजों के ज़माने की बता रहे थे वहां अब मलबा था।


( यमुना बाज़ार, घाट संख्या 28 पर मौजूद एक पुरानी इमारत बुलडोज़र चलने से पहले और बाद में )
नोटिस मिलने पर मामला कोर्ट पहुंचा था और फिर डीडीए के पाले में जिसके बाद उन्होंने वो कर दिखाया जो पहले से तय लग रहा था। लेकिन इस मामले में यमुना की पंडा एसोसिएशन ने बहुत कोशिश की कि घाटों की शक्ल को न बिगाड़ा जाए। हालांकि बुलडोज़र चलने के बाद जब हम वहां पहुंचे तो जहां पंडा एसोसिएशन से जुड़े कुछ लोग रह रहे थे उन मकानों को छोड़ दिया गया है वहां बुलडोज़र नहीं चला है। जिस वक़्त पंडा एसोसिएशन लगातार घाटों को बचाने के लिए दर-दर भटक रहा था उसी दौरान हमें यहां 63 साल के सुनील शर्मा मिले थे जो पंडा एसोसिएशन के कैशियर हैं ।
''ऐसा अन्याय तो कहीं नहीं होता''
वे आसमान की तरफ हाथों तो उठा कर लगातार कह रहे थे '' ऐसा अन्याय तो कहीं नहीं होता'' वे बताते हैं कि जब से नोटिस लगा था तभी से पंडा एसोसिएशन इस बात को साबित करने की जुगत में लगा था कि ये ज़मीन उनकी है और उनके पास इसके दस्तावेज़ हैं लेकिन उन्हें शिकायत है कि कोई भी उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था। उन्होंने सीएम से लेकिन डीएम, हॉर्टिकल्चर से लेकर डीडीए के दरवाज़े पर दस्तक दी पर कहीं सुनवाई नहीं हुई।
अब क्या होगा पंडा समाज का ?
वे बताते हैं कि यहां 310 परिवार रहते थे जिसमें से 50-60 परिवार पंडा समाज के थे, उनके परिवार की वे पांचवी पीढ़ी के हैं जबकि उनका बेटा छठी और सातवीं पीढ़ी के पोते भी हैं। वे कहते हैं कि ''वंशावली को रखना हमारा काम है, लोग यहां दिल्ली के अलावा राजस्थान, पंजाब से आते हैं, लेकिन अब आगे क्या होगा'' ?
यमुना किनारे भी है एक काशी घाट
वे पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि ''यहां तैराकी प्रतियोगिता होती थी, यहां शंख, सीपियाँ सब किनारे पर मिलती थीं, नदी में तैरती मछलियां साफ़ दिखाई देती थीं, नदी में गिरा पैसा साफ़ दिखता था,लोग गोता लगा कर पैसा निकालते थे, हम इसके (यमुना) जल से खाना बनाते थे''
हमें घाटों पर कुछ पुराने कुएं दिखे थे, जब हमने उनके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया था कि '' हां, यहां पहले कुएं, बावड़ी और तालाब हुआ करते थे, अब कुएं बंद हो गए हैं लेकिन इन घाटों पर कम से कम 8 से 10 कुएं थे। यहां कुश्ती भी होती थी और स्विमिंग भी, अभी भी अखाड़े हैं, घाट नंबर 2, 3 और 23 नंबर पर, कुछ अखाड़े बंद हो गए हैं लेकिन तीन अखाड़े बुलडोज़र चलने से पहले तक चल रहे थे'' उन्होंने हमें बताया कि घाट नंबर 28 का नाम काशी घाट है, हालांकि कुछ किताबों के मुताबिक घाट संख्या 30 का नाम काशी घाट था।
सोचिए, वक़्त के साथ ये पता करना मुश्किल हो गया कि दिल्ली में युमना के किनारे आख़िर कहां था काशी घाट? ये होता है वक़्त के साथ इतिहास का धूमिल हो जाना।

( यमुना बाज़ार के घाटों पर मौजूद कुआं )
हमें इन घाटों पर कई ऐसे निशान मिले थे जो इस बात की तस्दीक कर रहे थे कि ये घाट अपने में एक इतिहास समेट हैं। यहां यमुना पंडा एसोसिएशन के गेट के बाहर दो तस्वीरें लगी थीं एक तस्वीर 1858 में जॉन मर्रे द्वारा ली गई यमुना नदी के बश्री घाट की थी जबकि दूसरी तस्वीर नारायण प्रसाद के द्वारा 1945 में यमुना बाज़ार घाट पर तैराकी की थी। यमुना और उसके घाटों से जुड़ा ये इतिहास मजबूर कर रहा था कि उस इतिहास को खंगाला जाए जो यमुना के किनारों पर सदियों से बिखरा पड़ा है।
यमुना दिल्ली की सबसे बड़ी 'टाउन प्लानर'
पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र कहते हैं कि '' दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यह कई बार बसी और उजड़ी। शहरी इतिहास में बार-बार इस जानकारी को पढ़ने के बाद भी हम इस बारे में ज़्यादा सोच नहीं पाते कि इतनी बार उजड़ कर यह शहर बार-बार यहीं पर क्यों बसा? इसका एक बड़ा कारण है दिल्ली में उसके पूर्व में बहने वाली यमुना''।
वे आगे लिखते हैं कि ''अरावली से छोटी-छोटी 18 नदियां पूरी दिल्ली को उत्तर से दक्षिण में काटते हुए यमुना में आकर मिलती थीं। इसलिए दिल्ली को सिर्फ़ इस दिल्ली में ही बार-बार उजड़ कर बसना था। इस तरह देखें तो हम कह सकते हैं कि यमुना दिल्ली की सबसे बड़ी 'टाउन प्लेनर' है। थोड़ा और आगे बढ़ें। एक बड़ी नदी यमुना, उसमें मिलने वाली 18 सहायक नदियां और फिर पूरे शहर में इस कोने से उस कोने तक कोई 800 छोटे-बड़े तालाब। शहर के सुंदर लेआउट को ज़रा और बारीक़ी से देखें तो इसमें कुछ हज़ार से ऊपर बावड़ी और कुएं भी जुड़ जाते थे। इस पूरी व्यवस्था के बाद इस शहर में न तो कभी पानी की कमी होनी चाहिए थी, न अकाल पड़ना चाहिए था और न कभी बाढ़ से डूबना चाहिए था'' (किताब 'बिन पानी सब सून' के चैप्टर 'यमुना की दिल्ली' से )
अनुपम मिश्र की इन बातों को अगर 2026 की दिल्ली में देखें तो हम क्या पाते हैं ये शहर आज न केवल भयंकर जल संकट से जूझ रहा है बल्कि साल दर साल जलस्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है, वहीं बरसात के मौसम में यमुना का जलस्तर भी डरा देता है,लेकिन ऐसा क्यों ? ये सवाल उन लोगों के लिए हैं जिनके हाथों में दिल्ली के लिए एक 'ख़ूबसूरत' मास्टर प्लान है।
लाल क़िले के 'रिवर गेट' से जुड़ा इतिहास
लौटते हैं यमुना पर, तो अनुपम मिश्र ने बताया कि कैसे दिल्ली के लिए यमुना बेहद अहम रही है। यमुना दिल्ली को एक प्राकृतिक सुरक्षा ढाल भी प्रदान करती है। और शायद कई वजहों में से एक वजह ये भी रही होगी कि शाहजहां ने साल 1639 में अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला लिया होगा। मुग़लों का यमुना से बहुत ख़ास रिश्ता था। आर.वी स्मिथ अपनी किताब ' द दिल्ली दैट नो वन नोज' (The Delhi that No- one Knows by R.V. Smith ) में लिखते है कि ''ये (लाल क़िला) 1648 में एक करोड़ की भारी लागत से बनकर तैयार हुआ था। क़रीब आधा करोड़ रुपए महलों पर ख़र्च किए गए थे, जो ज़्यादातर पूर्वी हिस्से में बने थे और यमुना नदी की ओर थे जो कभी वहां बहती थी जहां अब रिंग रोड है। इसी लाल क़िले में एक 'रिवर गेट' है जो उस दौर में बेहद अहम था''। वैसे इस 'रिवर गेट' के कुछ और नाम भी बताए जाते हैं जैसे इसे 'यमुना द्वार' या फिर ख़िजरी दरवाज़ा भी कहा जाता है जो कि पानी से जुड़े एक सूफी संत ख़्वाजा ख़िज्र से जुड़ा है।
बहरहाल, इस रिवर गेट के बारे में कहा जाता है कि शाहजहां पहली बार क़िला-ए-मुबारक (लाल क़िला) में इसी दरवाज़े से दाख़िल हुए थे। और 1857 में ढलती मुग़लिया सल्तनत के आख़िरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र भी इसी गेट से निकल कर यमुना के रास्ते हुमायूं के मकबरे तक पहुंचे थे।
इस गेट के बारे में स्मिथ अपनी किताब में बताते हैं कि '' हरम में रहने वाली महिलाएं यमुना तक पहुंचने के लिए 'रिवर गेट' का इस्तेमाल करती थीं, नदी में तैरना सिर्फ़ पुरुषों का ही शगल नहीं था राजकुमारियों को भी इसका और बोटिंग का बहुत शौक था। नदी के तट पर चांदनी रात में पिकनिक का आयोजन किया जाता था। गर्मियों की गर्म रातों में नहाना एक सुखद अहसास था''।
स्मिथ अपनी किताब में लिखते हैं कि ''अकबर आगरा में यमुना नदी में नाव बंधवा कर रखते थे, अगर कुछ रातों को उनका मन नदी पर सोने का होता था। शाहजहां और उनके उत्तराधिकारियों ने भी आगरा और दिल्ली दोनों जगहों पर ऐसा ही किया''।
जब नावों पर सजती थी महफ़िलें
यमुना से जुड़े ऐसे ही एक शौक के बारे में INTACH के द्वारा प्रकाशित मीनाक्षी धावले की किताब- नैरेटिव्स ऑफ़ द एनवायरनमेंट ऑफ़ दिल्ली (Narratives of the environment of delhi by Meenakshi Dhawale ) में किया गया है '' चारदीवारी वाले शहर (शाहजहांनाबाद) के संभ्रांत लोग मुग़ल दरबार के अवसान के बाद भी लंबे समय तक उसी शानो-शौक़त के साथ शाम की महफ़िलों के आयोजन की परंपराओं को निभाते रहे। प्रोफेसर देहलवी को 'बजरा' नामक चपटी नावों पर नवाबों द्वारा आयोजित की जाने वाली पार्टियों के बारे में पढ़े गए संस्मरण याद हैं। इन नावों में बैठने की आरामदायक व्यवस्था होती थी और नृत्य व संगीत पेश करने के लिए पर्याप्त जगह होती थीं। ये प्रस्तुतियां ज़्यादातर चांदनी रातों के दौरान होती थीं''।
लाल क़िला और उससे सट कर बहती यमुना ने अब रास्ता बहुत बदल लिया है लेकिन उसकी निशानियां अब भी मौजूद हैं भले ही फिर वे पुरानी तस्वीरों, किताबों के पन्नों पर ही क्यों न हो। साल 2023 में जब यमुना नदी का पानी लाल क़िले की दीवारों तक पहुंच गया तो लोगों ने उन पुरानी तस्वीर को याद किया जिसमें यमुना सलीमगढ़ के क़िले और लाल क़िले के बीच बने पुल के नीचे से बहती नज़र आ रही थी।
गौर से देखा जाए तो लाल क़िले और सलीमगढ़ के क़िले को जोड़ने वाले पुल की बनावट कुछ ऐसी है जो पानी के धार को काटती हो ऐसा यमुना की वजह से ही किया गया होगा। लेकिन आज वे पुल एक बिज़ी रोड में तब्दील हो चुका है, यमुना ने रास्ता बदला तो उसके किनारों की शक्ल भी बदल गई।
जमना के घाट और आम शहरी जीवन
दिल्ली शहर का अहम हिस्सा रही यमुना ( जमना ) से ख़ास लोगों के ही नहीं आम लोगों के भी बहुत से क़िस्से जुड़े हैं विलियम डैलरिंपल अपनी किताब 'आख़िरी मुग़ल: एक साम्राज्य का पतन, दिल्ली 1857' में दिल्ली वालों की एक सुबह का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं कि '' राजघाट गेट पर धोबियों के आने और भीड़ होने से पहले सुबह-सुबह उठने वाले हिंदू श्रद्धालु यमुना में नहाने और पूजा करने निकल पड़ते। उनमें ज़्यादातर औरतें होती जो सूती साड़ी पहने स्नान करने आती। यमुना के किनारे निगमबोध तक बने हुए छोटे-छोटे मंदिरों में पंडित सुबह-सुबह पूजा करने आते'' ।
यमुना के रास्ता बदलने की एक दिलचस्प निशानी है दरियागंज। दरियागंज जो आज एक भीड़ भाड़ वाले इलाक़े में तब्दील हो चुका है आख़िर उसका नाम दरियागंज क्यों रखा गया होगा? बेशक उसके पानी के क़रीब होने की वजह से ही उसे ये नाम मिला।

( स्वप्ना लिडल की किताब 'शाहजहानाबाद: मैपिंग ए मुग़ल सिटी' से लिया गया एक मानचित्र जिसमें घाटा मस्जिद के क़रीब दिखती यमुना नदी )
दरियागंज के नाम के पीछे नदी का किनारा ?
स्वप्ना लिडल अपनी किताब 'शाहजहानाबाद: मैपिंग ए मुग़ल सिटी' में मानचित्र के ज़रिए शाहजहानाबाद के उन कोनों के बारे में बताती हैं जो आज अपनी शक्ल पूरी तरह से बदल चुके हैं वे दरियागंज के बारे में बताती हैं कि ''शहर के इस हिस्से को दरियागंज (नदी का बाज़ार) के रूप में जाना जाता था, क्योंकि इसकी सीमा नदी से लगती थी। शाहजहांनाबाद की स्थापना से पहले भी यहां एक गंज या थोक बाज़ार मौजूद था, जहां यमुना के रास्ते लाया जाने वाला अनाज और अन्य सामान पास के घाटों पर उतारा जाता था और वहां उनका व्यापार किया जाता था'' ।
वे आगे लिखती हैं कि '' मैप में पूर्वी दीवार के साथ नदी किनारे और भी संरचनाएं देखी जा सकती हैं। मस्जिद ज़ीनत-उन-निस्सा 171 (मैप में) (जिसे ज़ीनत-उल-मसाजिद के नाम से भी जाना जाता है ) को बेहद ख़ूबसूरत और बारीक विवरण के साथ चित्रित किया गया है। इस मस्जिद का निर्माण औरंगज़ेब की बेटी ज़ीनत-उन- निस्सा द्वारा करवाया गया था''।
घाटा मस्जिद और ख़ैराती घाट
इसी मानचित्र में दिखाई दे रही संख्या 172 के बारे में वे बताती हैं कि ''मस्जिद के बगल में यमुना की ओर जाने वाले एक दरवाज़े को 'घाट मस्जिद दरवाज़ा 172' के रूप में चिन्हित किया गया है, हालांकि सैयद अहमद ख़ान ने इसे 'ज़ीनत-उल-मसाजिद की खिड़की' के रूप में सूचीबद्ध किया था। मानचित्र की शब्दावली से पता चलता है कि कभी मस्जिद के बगल में घाट रहे होंगे, जिन्हें घाट-ए-मस्जिद ( मस्जिद के घाट) कहा जाता था। इसकी पुष्टि जफ़र हसन ने भी की है। जिनका कहना है कि इन्हें मस्जिद घाट या ख़ैराती घाट कहा जाता था (इस दरवाज़े को ख़ैराती दरवाज़ा भी कहा जाता है) दिलचस्प बात यह है कि आज इस मस्जिद को आमतौर पर घटा / घाटा मस्जिद के नाम से जाना जाता है'' ।
हम यहां पहुंचे तो मस्जिद में घुसते ही अंदर दरवाज़े पर एक दर्ज़ी की दुकान मिली वहां बैठे कुछ लोगों से हमने बातचीत की वे बताते हैं कि ये दुकान उनकी पांचवी पीढ़ी के पास है। जब हमने उनसे पूछा कि क्या यहां से कभी यमुना बहती थी, तो उन्होंने महज़ चंद कदमों की दूरी पर एक दीवार दिखाई जिसे अब तोड़ के एक सड़क निकाल दी गई है, वे बताते हैं कि उस दीवार तक कभी यमुना का इलाक़ा था। इसी मस्जिद में पीछे की तरफ एक और दरवाज़ा है जिसे खिड़की दरवाज़ा भी कहा जा सकता है, वहां से रास्ता दरियागंज से होते हुए लालक़िला और जामा मस्जिद की तरफ जाता है।
कहां गए यमुना के घाट ?
यमुना बाज़ार के घाटों से निकली तलाश और पेचीदा होती जा रही थी, आख़िर यमुना किनारे कितने घाट थे और वे घाट आज कहां हैं? इस तलाश में यमुना बाज़ार (1 से 32 घाटों) के अलावा निगमबोध घाट, राजघाट, ख़ैराती घाट, क़ुदसिया घाट ही मिले ( इसके अलावा एक वासुदेव घाट भी बनाया गया है )। वहीं यमुना बाज़ार में पंडा एसोसिएशन के गेट पर लगी जॉन मर्रे द्वारा 1858 में खींची गई तस्वीर में दिखे बश्री घाट को भी नहीं भूलना चाहिए लेकिन आज ये घाट कहां है ये बताना मुश्किल लगता है।

( पंडा एसोसिएशन के गेट पर लगी थी यमुना के घाट की 1858 में खींची गई तस्वीर )
क़ुदसिया घाट
हाल ही में INTACH के प्रयास से क़ुदसिया घाट को दोबारा संवारा गया है, हालांकि वे अपनी पुरानी ख़ूबसूरती से कोसो दूर लगता है। इस घाट को मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह की पत्नी क़ुदसिया बेग़म ने बनवाया था। पुरानी तस्वीरों को देखने से पता चलता है कि कभी यहां एक ख़ूबसूरत महल भी था लेकिन आज उसका नाम-ओ-निशां भी बाक़ी नहीं रहा।
निगमबोध घाट
ये घाट सबसे पुराना बताया जाता है जो आज भी मौजूद है, इस घाट के साथ कई पौराणिक मान्यताएं जुड़ी हैं, दिल्ली पर गहन शोध करने वाले कैर स्टीफ़न ( Carr Stephen ) लिखते हैं कि '' पौराणिक कथाओं के मुताबिक़ यह वही स्थान है जहां युधिष्ठिर ने पांच हज़ार साल पहले अश्वमेध यज्ञ किया था। और ब्रह्मा ने अचानक पवित्र पुस्तक (वेदों) की स्मृति खोने के बाद यमुना के जल में डुबकी लगाकर उन्हें दोबारा प्राप्त किया था इसलिए इस नाम की उत्पत्ति हुई जो दो शब्दों से मिलकर बना है निगम जो वेदों को दर्शाता है और बोध यानी ज्ञान (सुफल कुमार की किताब 'दिल्ली: सिटी ऑफ योगिनीज़ ' से )
राज घाट
राज घाट, आज महात्मा गांधी के समाधि स्थल के रूप में पूरी दुनिया में जाना जाता है लेकिन एक दौर था जब ये शाहजहानाबाद के लोगों के लिए बेहद अहम था। स्वप्ना लिडल की किताब 'शाहजहानाबाद: मैपिंग ए मुग़ल सिटी' के एक मैप को देखने से पता चलता है कि 'थाना सुनहरी मस्जिद' की सीमा के दक्षिण पूर्वी छोर पर राज घाट दरवाजा था। जो शहर के कई द्वारों में से एक था। यह दरवाजा नदी के किनारे की ओर जाता था, जहां नदी तक जाने वाली चौड़ी सीढ़ियां जिन्हें 'राज घाट दरवाजा' के रूप में जाना जाता था।
जब यमुना से दिल्ली आते थे यूपी के दूध बेचने वाले
आज यमुना नदी का जो हाल है वो देखकर इस बात का तसव्वुर करना भी मुश्किल लगता है कि ये नदी कभी शहर की धड़कन थी, INTACH के द्वारा प्रकाशित किताब में बताया गया है कि '' वास्तव में 1971 तक यमुना में फेरी ( घाट नौकाओं ) का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। ये फेरी पांच अलग-अलग क्षेत्रों में चलती थीं जो MCD के नियंत्रण में थी सुंगरपुर, बुराड़ी, वज़ीराबाद, ओखला, और जैतपुर। वज़ीराबाद में नावें साल भर गांव वालों और उनके व्यापारिक सामानों का परिवहन करती थीं। जैतपुर और अन्य स्थानों पर भारी बारिश के दौरान नावें नहीं चल पाती थीं और सर्दियों में भी जब नदी का बहाव उथला ( कम गहरा) हो जाता था। सुंगरपुर में सार्वजनिक नौका से न केवल पड़ोसी गांवों के बल्कि उत्तर प्रदेश के दूध विक्रेता, चीनी और गुड़ के व्यापारी इस नौका के नियमित उपयोगकर्ता थे। और अपना व्यापारिक सामान ले जाते थे'' ।
साथ ही किताब में ये भी लिखा है कि '' श्री कीरत सिंह याद करते हैं कि पुराना क़िला के पास नदी के आस-पास ऐसे लोग रहते थे जिन्हें मल्लाह कहा जाता था। उनकी आजीविका लोगों को अपनी नावों से नदी पार कराने पर निर्भर थी। उनमें से कुछ अपनी नावों पर ही रहते थे। ये नावें नदी के पार बैलगाड़ियों को ले जाती थीं। नावें या कश्तियां हमें एक आने में दूसरी तरफ ले जाती थीं ''।
कहां गया मोहल्ला मल्लाही ?
स्वप्ना लिडल अपनी किताब 'शाहजहानाबाद: मैपिंग ए मुग़ल सिटी' में राजघाट के क़रीब मोहल्ला मल्लाही ( नाविकों का मोहल्ला ) का ज़िक्र करती हैं वे बताती हैं कि '' यहां एक धर्मशाला ( यात्रियों के लिए एक सराय ) भी थी, जो नाव से आने वालों के लिए सुविधाजनक रही होगी, क्योंकि रेलवे के आने से पहले नदी परिवहन का एक प्रमुख साधन थी। इस क्षेत्र में दो बगीचे भी हैं जो उन बगीचों की श्रृंखला का हिस्सा हैं जो क़िले की दीवार के नीचे बनाए गए थे। देहली दरवाजा के ठीक सामने छोटी बग़ीची-ए-मिर्ज़ा गौहर है और उसके पूर्व में बुलंद बाग़ बादशाह ''।
बेला एस्टेट और मल्लाहों की बस्ती
वहीं 1961 की जनगणना के मुताबिक जमुना ( यमुना ) नदी के दोनों किनारों पर स्थित बेला एस्टेट की बसावट, केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में मल्लाहों की सबसे बड़ी आबादी वाला इलाक़ा था। ऐसा कहा जाता है कि इस एस्टेट की ज़्यादातर ज़मीन मुग़ल काल के दौरान भी मल्लाहों के क़ब्ज़े में थी। उस समय मल्लाह मुख्य रूप से नाविकों के रूप में काम करते थे, जो मुग़ल शासकों की सेनाओं के साथ-साथ उनके व्यापारिक सामान को ले जाने का काम करते थे। उनमें से कई लोगों ने अपने इस व्यवसाय के माध्यम से काफी धन जमा कर लिया था और उसे ज़मीन में निवेश किया था। जबकि सिपाही विद्रोह (1857) के बाद उन्हें दरियागंज स्थित उनके निवास स्थान से बेदखल कर दिया गया। उनमें से कई लोग मरुगपुर (Maragpur ) कोटला फिरोज़ शाह और जटवाड़ा इलाक़ों में बस गए, कुछ लोग सीलमपुर में भी जाकर बस गए।
बदलते वक़्त की रफ़्तार के साथ नदी ने भी अपना रास्ता बदल लिया यमुना ने जो रास्ता छोड़ा उस जगह पर सड़कें और रिहायशी इलाक़े पैदा हो गए, लेकिन लोग फिर भी घाटों पर आते रहे INTACH के द्वारा प्रकाशित किताब में बताया गया कि '' लोग रोज़ाना नियम से सुबह-सुबह ताज़ी सब्ज़ियाँ और फल (साथ ही पूजा के लिए फूल) ख़रीदने घाटों पर जाते थे, किशन मोहन गांधी याद करते हैं, हालांकि इन खेतों की उपज को शाहदरा और शकरपुर जैसी मंडियों में ले जाया जाता था''
किशन मोहन गांधी आगे कहते हैं कि '' नदी किसी न किसी रूप में शहर के लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी हुई थी। कई पुराने दिल्लीवाले आदत के तौर पर सुबह-सुबह घाटों पर स्नान करने, अखाड़ों में कसरत करने या मालिश कराने जाते थे। हम नदी में स्नान करने और तेल मालिश के लिए कुदसिया घाट जाया करते थे। निगमबोध घाट से लेकर नीली छतरी तक पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग स्नान करने की व्यवस्था थी''।
कभी ओखला बैराज में दिखती थी डॉल्फिन
दिवाली के बाद यमुना के घाटों पर ज़हरीले झाग के बीच छठ की तस्वीरें हर साल यमुना की सफ़ाई पर दिल्ली वालों का ध्यान खींचती है, लेकिन INTACH की किताब के मुताबिक़ ओखला बैराज में कभी गंगा डॉल्फिन भी पाई जाती थी, ये सुनने में भले ही झूठ लगता हो लेकिन इसी यमुना किनारे कभी मछलियों को पकड़ना दिल्ली वालों के शौक में शामिल था इसके लिए बाकायदा लाइसेंस लेने पड़ते थे।
यमुना के घाटों पर होती थी रामलीला और लगते थे मेले
आज भले ही यमुना की सफाई की याद छठ क़रीब होने पर आती हो लेकिन जब यमुना साफ़ थी तो उसके किनारे कई त्योहारों पर जगमगा उठते थे। अम्बेडकर विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर कम्युनिटी नॉलेज ( CCK ) ने साल 2018-19 में एक साल लंबा प्रोजेक्ट चलाया जिसका नाम था 'द रिवर एंड द सिटी: मल्टीपल स्टोरीज़ ऑफ द यमुना इन दिल्ली' ( The River and the city: Multiple Stories of the Yamuna in Delhi) जिसके तहत वज़ीराबाद बैराज से ओखला बैराज के बीच यमुना के किनारों पर रहने वाले लोगों के मौखिक साक्षात्कार (Oral History interviews) किए गए जिसमें कई दिलचस्प बातें जानने को मिली जैसे यमुना बाज़ार कभी दशहरा, दिवाली, बुद्ध पूर्णिमा और अमावस्या जैसे दिनों में उत्सव के माहौल से सराबोर रहता था।
वहीं इस प्रोजेक्ट के अनुसंधान सहायक ( Research Assistant ) कार्तिकेय जैन ने बताया कि '' ओखला में, ईद के अलगे दिन यमुना के तट पर एक मेला आयोजित किया जाता था और पुरानी दिल्ली से लोग इसमें शामिल होने के लिए तांगों पर आते थे''।
यमुना किनारे त्योहारों का ये सिलसिला पुराने दौर से चला आ रहा था जिसकी जानकारी हमें स्मिथ की किताब 'द दिल्ली दैट नो वन नोज' से भी मिलती है वे लिखते हैं कि ''शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसे यह याद हो कि कभी 'शाहजी का तालाब' उस इलाके के एक बड़े हिस्से में फैला हुआ था जिसे अब रामलीला मैदान के नाम से जाना जाता है। यह झील रामायण के 'केवट प्रसंग के लिए एक आदर्श दृश्य प्रस्तुत करती थी। उस समय रामलीला समारोह का मुख्य हिस्सा यमुना के तट पर आयोजित किया जाता था, जिसे मुगल सम्राट लाल क़िले से देखते थे''।
जब डीयू के कॉलेज के थे अपने बोट क्लब
यमुना के साथ त्योहारों के अलावा मनोरंजन का रिश्ता भी था इसके किनारों पर जहां खेती-बाड़ी होती थी वहीं पिकनिक के लिए भी ख़ूब पसंद किए जाते थे। इसके अलावा बोट क्लब और सेलिंग क्लब में भी लोगों की अच्छी खासी तादाद रहती थी। INTACH के द्वारा प्रकाशित किताब में बताया गया कि ओखला सेलिंग क्लब में क़रीब 35 से 40 नावें थीं वहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफन और हिंदू कॉलेज के अपने बोट क्लब थे।
बेशक, आज यमुना की हालत देखकर ये सब बातें कोरी गप लग सकती है, आज भी चंद लोग बचे हैं जिनकी यादों में यमुना के सुनहरे दिन ज़िदा हैं। ठीक वैसे ही जैसे यमुना से जुड़ी पौराणिक कहानियां जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सुनाई जाती है और लोग उन पर विश्वास करते चले आ रहे हैं।
मान्यता है कि दिल्ली को कभी इंद्रप्रस्थ (महाभारत काल) भी कहा जाता था। इंद्र के नाम पर इस शहर का नाम रखा गया होगा। इंद्र जिन्हें बारिश का देवता भी कहा जाता है और पुरन्दर भी। अनुपम मिश्र लिखते हैं कि '' भला इंद्र को शहरों से ऐसी क्या नफ़रत या शिकायत थी कि जब देखो तब वह शहरों को तोड़ देता था। इसमें दोष इंद्र का नहीं, प्राय: हमारे शहरों के नियोजन का ही रहा होगा। शहरों को तोड़ने में इंद्र का सबसे बड़ा हथियार वर्षा ही था'' ।
जब साल 2023 में भारी बारिश के बाद यमुना का जलस्तर बढ़ा और पानी यमुना किनारे बसी बस्तियों में घुसने लगा तो प्रशासन ने बहुत ही मुस्तैदी से काम किया लेकिन साल दर साल उसी परेशानी को झेलने वाले प्रशासन ने अब उन तमाम बस्तियों को ही यमुना किनारे से हटाना शुरू कर दिया है, और उसी में से एक है यमुना बाज़ार जहां आख़िरकार बुलडोज़र चल गया।
अब देखना होगा कि जिस घाट को मलबे में तब्दील कर दिया गया है उसका आगे क्या होता है ? क्या उसका भी 'ब्यूटिफिकेशन' होगा या फिर यमुना रिवर फ्रंट बनेगा ? लेकिन इन सबके बीच उन प्राचीन कुओं, अखाड़ों और पुरानी इमारतों का क्या होगा जो ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा थीं?
(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
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