नयी शिक्षा-नीति के कलस्टर-सिस्टम से झारखंडी भाषाओं के शैक्षिक अस्तित्व पर संकट
कुछ साल हुए हैं जब केंद्र की सरकार ने “कृषि-नीति” और “नए लेबर कोड” की तर्ज़ पर “विकसित भारत” निर्माण के लिए “नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP)” का प्रारूप-प्रस्ताव लाया था। जिसका पूरे देश में एकस्वर से व्यापक विरोध हुआ था। लेकिन “आदतन अनदेखा” करते हुए इस विवादित नीति को संसद से पास करके पूरे देश के शैक्षिक जगत में लागू कर दिया गया।
स्वाभाविक था कि ज़मीनी धरातल पर इसके विनाशकारी परिणाम सामने आने ही थे। साथ ही इससे प्रभावित आम लोगों की दुर्दशा-बेचैनी और भविष्य की चिंताएं भी सामाजिक सतह पर उभर कर आने लगीं।
विशेषकर झारखंड जैसे प्रदेश में तो इसका दुष्प्रभाव और भी भयावह होना है। क्योंकि आज भी यहाँ पिछड़े-गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों की एक विशाल आबादी तक “हाईटेक विकास की रौशनी” नहीं पहुँच सकी है।
झारखंड में “कलस्टर सिस्टम” लागू करने पर आमादा तंत्र द्वारा “नयी शिक्षा नीति” को “विकसित भारत” के लिए युगांतकारी क़दम बताया जा रहा है। ये “नैरेटिव” फैलाया जा रहा है कि- इससे छात्रों को केवल किताबी ज्ञान देने की बजाय उन्हें “कौशल आधारित” व्यावहारिक ज्ञान से लैस किया जाएगा। उच्च शिक्षा के स्तर को डिजिटल विकास की नयी ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया जाएगा।
लेकिन ज़मीनी धरातल की ये सच्चाई सामने आ रही है कि- “सस्ती व सर्व शिक्षा” का जनाज़ा निकाल कर सरकार के ही सहयोग से “नित नए नए प्राइवेट विश्वविद्यालयों-शिक्षण संस्थानों और महंगी शिक्षा-व्यवस्था का जाल बिछाया जा रहा है। नयी पीढ़ी के बच्चों और उनके परिजनों को “लोन लो और पढ़ाओ” के “महाजनी-चक्र” में आने की हर सुविधा खुद सरकारें उपलब्ध करा रही हैं। लेकिन लाख छुपाने पर भी “नयी शिक्षा नीति” की असलियत और मकसद खुलकर सामने आ ही जा रहा है।
कल तक झारखंड में पहले ही घोर आर्थिक समस्याओं और आवागमन की चुनौती झेलकर यहाँ के बहुसंख्य छात्र अपनी पढ़ाई कर ले रहे थे। लेकिन “कलस्टर-सिस्टम” लागू होने से अब वह भी संभव नहीं रह पायेगा। अपनी पसंद और घरेलू आर्थिक स्थितियों के अनुसार पढ़ाई के विषय और कॉलेजों के चयन की छोटी सी आज़ादी भी नहीं रह पाएगी।
गरीब-वंचित समुदायों और पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों से आनेवाले बहुसंख्य छात्र-छात्राओं का कैरियर अनिश्चय के अधर में जा लटका है। क्योंकि “कलस्टर-सिस्टम” के तहत धड़ल्ले से कई कॉलेजों में कई विषयों के विभाग बंद किये जाने के लिस्ट जारी हो रही है। छात्र-छात्राएं समझ नहीं पा रहे हैं कि अब वे “क्या करें”?
इस अफरा-तफरी से प्रभावित हो रहे छात्रों से लेकर प्राध्यापकों व गैर-शिक्षकेत्तर कर्मियों तक में भारी चिंता के साथ रोष फैल रहा है। जो “कलस्टर सिस्टम” के खिलाफ व्यापक विरोध का रूप लेता जा रहा है।
“कलस्टर सिस्टम” की सबसे अधिक मार झारखंडी भाषाओं की पढ़ाई पर पड़ती दीख रही है। जो पहले से ही सरकारों की उपेक्षा का दंश झेल रही हैं। कुछेक विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ही विधिवत रूप से ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग’ अस्तित्व में काम कर रहा है। लेकिन स्थायी प्रोफेसर्स नहीं बहाल होने के कारण “कान्ट्रेक्ट और घंटा आधारित टीचरों” के भरोसे ही पढ़ाई चल रही है।
अब “कलस्टर-सिस्टम” में ये तय होना है कि किस कॉलेज में कौन सी झारखंडी भाषा की पढ़ाई होगी अथवा बंद हो जायेगी। किस कॉलेज में ‘झारखंडी भाषा विभाग’ अस्तित्व में रहेगा अथवा नहीं, का संकट आ खड़ा हुआ है। इन भाषाओं के सभी ‘कान्ट्रेक्ट और टेम्पररी’ टीचरों का क्या होना है, सवाल बन गया है। जो अपनी झारखंडी भाषा को अकादमिक कैरियर बनाकर पढ़ाई-शोध उपरांत यूजीसी के सभी मानकों को पूरा कर टेम्पररी सहायक अध्यापक के रूप में बहाल हुए हैं, सभी को अपनी नौकरी जाने की चिंता सताने लगी है।
गौरतलब है कि पूरे देश में अपनी विशिष्ट सामुदायिक भाषा-संस्कृति को लेकर झारखंड की अपनी पहचान रही है। जिसके संरक्षण-संवर्धन के लिए देश के संविधान से पांचवी अनुसूची के विशेषाधिकार भी हासिल हैं।

इतना ही नहीं जिस झारखंड राज्य गठन के लिए सत्तर वर्षों से भी अधिक समय की लम्बी लड़ाई लड़ी गयी, उसके प्रमुख-केंद्रीय मुद्दों में भी यहाँ की ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा-संस्कृति’ का सवाल मुखर रूप से रहा है। लेकिन राज्य गठन उपरांत यह मुद्दा “कुर्सी-राजनीति” के लिए आज तक कोई महत्व नहीं पा सका। उलटे अब तो हालत ऐसे बन रहे हैं कि अपने ही “देस” में “परदेसी” बन रहीं झारखंडी भाषाओं के “शैक्षिक अस्तित्व” पर ही संकट आ खड़ा हुआ है।
उक्त सन्दर्भ में गहरी पीड़ा से झारखंडी बौद्धिक जन बताते हैं कि- कैसी भारी विडंबना हुई इस नवगठित प्रदेश में। झारखंड की “पहली सरकार” (NDA गठबंधन वाली) के प्रथम मुख्यमंत्री (बाबूलाल मरांडी) ने कुर्सी पर बैठते ही पहली कैबिनेट मीटिंग में तय कर दिया कि इस राज्य में “सीबीएससी पैटर्न” की पढ़ाई ही अनिवार्य होगी। बंगाल, पंजाब और दक्षिण के राज्यों की भांति झारखंडी भाषाओं में पढ़ाई का मुद्दा धरा का धरा रह गया।
अजीब दुर्भाग्य यह भी है कि- आज भी झारखंडी भाषा-संस्कृति का मुद्दा उछालकर “कुर्सी-राजनीति” खूब चमकाई जाती है, हर चुनाव में झारखंडी भाषाओं के चुनावी गीत गाने-बजाने और भाषणों की खूब होड़ मचायी जाती है, लेकिन झारखंडी भाषा का मुद्दा भूले से भी किसी को याद नहीं आता। देखा जाय तो झारखंडी भाषाओं के वोटर भी कम “समझदार” नहीं हैं, वोट देते समय शायद ही कभी वे अपनी झारखंडी भाषाओं के मुद्दे पर अपना “जनादेश” देते हैं।
इसी का परिणाम है कि आज तक देश के संविधान की अनुशंसाओं के अनुरूप झारखंडी भाषा-संस्कृति के लिए न तो किसी सरकार ने “विशेष भाषा-नीति” बनाई और ना संस्थानिक अकादमियों ही का गठन किया है। झारखंड ललित कला अकादमी के नहीं होने से आज भी दूसरे राज्यों की कला अकादमियों की बैसाखी का सहारा लिया जा रहा है।
सनद रहे कि झारखंडियों के बेहद प्रिय-आत्मीय कुशल प्रशासक रहे डॉ. कुमार सुरेश सिंह ’80 के दशक में दक्षिण छोटानागपुर के प्रमंडलीय आयुक्त थे। उसी दौरान जब उन्होंने रांची विश्वविद्यालय के उपकुलपति का कार्यभार सम्भाला तो झारखंडी पुरोधा शिक्षाविद डॉ. रामदयाल मुंडा और डॉ. वीपी केसरी सरीखे झारखंड आन्दोलनकारी शिक्षाविद-बौद्धिकजनों के सहयोग से ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग’ (पीजी टीआरएल) की स्थापना की थी। जिसका उद्देश्य था सभी झारखंडी भाषाओं के शैक्षिक-अकादमिक विकास और साहित्यिक पहचान को स्थापित करना। अपने समय में पूरे देश के विश्वविद्यालयों में पहला देशज-आदिवासी भाषा विभाग था।
जल्द ही रांची विश्वविद्यालय के सभी कॉलेजों में ‘टीआरएल’ के विशेष विभाग बनाकर स्नातक स्तर पर भी झारखंडी भाषाओं की पढ़ाई शुरू कर दी गयी थी। बाद में तत्कालीन सरकारों ने भी रूचि दिखाई और कोल्हान विश्विद्यालय व सिद्धू-कानू विश्वविद्यालयों की स्थापना कर बीए-पीजी स्तर पर टीआरएल पढ़ाई कराने लगी।
बहरहाल, “कलस्टर-सिस्टम” को लेकर व्यापक झारखंडी छात्र-छात्राओं के साथ-साथ झारखंडी भाषाओं के शिक्षाविद मुखर विरोध में उतर रहे हैं। जिनकी ओर से प्रदेश की सरकार और राज्यपाल को विशेष ज्ञापन देकर झारखंडी भाषाओं को “कलस्टर-सिसटम” से बाहर रखने की मांग की गयी है।

“कलस्टर-सिस्टम” के विरोध में कई छात्र संगठन उतरे हुए हैं। वामपंथी छात्र संगठन आइसा ने कैम्पसों से सड़कों तक धारावाहिक विरोध आन्दोलन चलाते हुए ‘राजभवन मार्च’ संगठित कर महामहिम कुलाधिपति को मांग-पात्र दिया है।
आइसा का यह भी आरोप है झारखंड राज्य के सभी विश्वविद्यालय अपने शैक्षिक संस्थान की स्वायत्तता-मर्यादा को तिलांजलि देकर “कुर्सी-राजनीति” की कठपुतली बनने पर तुले हुए हैं। सबसे दुखद है कि “कलस्टर-सिसटम” लागू करने के नाम पर “शिक्षा के बाजारीकरण” के जारी खेल में अब झारखंड को भी एक “प्रयोगशाला” बनायी जा रही हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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