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बढ़ती बेरोज़गारी से परेशान हरियाणा के युवा पलायन को मजबूर

सरकारें चुनाव समय पर या समय से पहले करा लेती हैं जबकि नौकरी की आशा में तैयारी करने वाले अधिकतर युवाओं की उम्र निकल जाती है लेकिन न कोई नौकरी मिलती है और न ही देर सबेर कहीं नियुक्ति होती है।
unemployment

भाजपा शासित उत्तर भारतीय राज्य हरियाणा में बेरोजगारी चरम पर पहुंच चुकी है। भाजपा युवाओं को रोजगार तो दे नहीं पा रही है और विश्वगुरु बनने के ख्वाब संजोए जा रही है। वह युवाओं को अच्छे दिन आने, विश्वगुरु बनने, अमृतकाल में प्रवेश और आत्मनिर्भरता के सपने दिखाए जा रही है। प्रथमतः यह नारे या उक्तियां भ्रामक हैं क्योंकि कोई भी देश या राष्ट्र आत्मनिर्भर नहीं है। वास्तव में सभी एक दूसरे पर निर्भर है। किसी एक क्षेत्र में या कई क्षेत्रों में कोई आत्मनिर्भर हो सकता है। सब एक दूसरे से शिक्षा, ज्ञान, तकनीकी, व्यापारिक व अन्य चीजें आदान-प्रदान करते हैं। अगर कोई भी इस प्रकार का दावा करता है तो यह भ्रामक ही होगा।

खैर भारत में बेरोजगारी अपने चरम पर है और भारत के हरियाणा राज्य में सबसे अधिक बेरोजगारी देखी जा रही है। लगभग सभी कार्यालयों व विभागों में बड़ी संख्या में पद रिक्त है जिनमें भर्ती कब होगी? कैसे होगी? कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं देता। रोजगार सृजन और रोजगार प्रदान करने में 9 वर्ष से सत्ता में काबिज भाजपा की हरियाणा सरकार का रवैया बेहद सुस्त रहा है। बढ़ती बेरोजगारी और अंधकारमय भविष्य देखते हुए बेरोजगार युवा देश विदेश में पलायन कर रहे हैं। भाजपा शासित हरियाणा में रोजगार की स्थिति भयावह है। रोजगार के लिए प्रयासरत हरियाणा के युवा बड़ी संख्या में पलायन करने को मजबूर हो गए है।

हाल ही में हरियाणा विधानसभा के मानसून सत्र में बेरोजगारी पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने बढ़ती बेरोजगारी को स्वीकारा और माना कि सरकार रोजगार देने में विफल रही है। सरकार द्वारा स्वीकृत बेरोजगारी दर को ही देखें तो यह 8.8 प्रतिशत है। यह तो सरकार द्वारा स्वीकृत आधिकारिक बेरोजगारी दर है जो राष्ट्रीय बेरोजगारी दर से अधिक है। हकीकत केवल 8.8 प्रतिशत बेरोजगारी दर तक सीमित नहीं है। वहीं सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के अनुसार दिसंबर 2022 में 37.4 प्रतिशत की बेरोजगारी दर के साथ हरियाणा राज्य शीर्ष पर था। जिसे झुठलाने के लिए हरियाणा की सरकार ने तरह तरह के वक्तव्य दिए और सीएमआईई के आंकड़ों को छोटे पैमाने पर लिए गए नमूने कह कर बढ़ती बेरोजगारी के आरोप से अपना पल्ला झाड़ लिया। आंकड़े चाहे जो भी रहे हो लेकिन हरियाणा में बढ़ती बेरोजगारी एक स्पष्ट तथ्य है। जिसको अनदेखा नहीं किया जा सकता।

मानसून सत्र में चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने लिखित में स्वीकारा और बेरोजगारी के आंकड़े प्रस्तुत किए। खट्टर के अनुसार हरियाणा में पिछले आठ वर्षों (2015-2022) के दौरान 13.98 लाख युवाओं ने जिला रोजगार कार्यालयों में नामांकन कराया और हरियाणा लोक सेवा आयोग (एचपीएससी) के माध्यम से 1 अप्रैल 2015 से आज तक 4595 नौकरियां प्रदान की गईं एवं 2014-15 से 9 मार्च 2023 तक हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (एचएसएससी) के माध्यम से 97751 नौकरियां प्रदान की गईं। कुल मिलाकर सरकार ने 102346 नौकरियां प्रदान की। यह तो रही पिछले 9 वर्षों में सरकार द्वारा जारी बेरोजगारी के आंकड़ों की बात।

यदि एक वर्ष का औसत निकालें तो यह महज़ 11371 के लगभग है। यह आंकड़े स्वयं हरियाणा में फैली बेरोजगारी की दुहाई देते हैं। सरकार रोजगार सृजन करने में विफल रही है। केवल रोजगार सृजन में ही नहीं बल्कि अनेकों नियमित भर्तियां करने में सरकार बुरी तरह विफल रही है। बहुत से ऐसे बेरोजगार युवक अवश्य होंगे जिन्होंने जिला रोजगार कार्यालयों में नामांकन नहीं कराया होगा और किसी रोजगार की तलाश में होंगे। उनके आंकड़े प्राप्त करने भी मुश्किल है। ऐसी स्थिति में हरियाणा के युवक न केवल अन्य राज्यों में बल्कि पहली बार ऐसा देखा गया है कि बेरोजगार युवा रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में पासपोर्ट व वीजा के लिए आवेदन कर एक बेहतर भविष्य की उम्मीद में विदेश का रुख कर रहे है। राज्य में गिरते शिक्षा के स्तर को कारण मानकर स्नातक, स्नातकोत्तर या किसी अन्य पेशेवर विषय की डिग्री अर्जित करने के बाद बेरोजगारी के डर से युवा हरियाणा से विदेशों में पलायन कर रहे हैं।

हरियाणा में बेरोजगारी इस वजह से नहीं है कि यहां रोजगार नहीं है बल्कि भाजपा सरकार की अकर्मण्यता के कारण बेरोजगारी यहां चरम पर है। उदाहरण स्वरूप हरियाणा में विद्यालय शिक्षक नियुक्ति प्रक्रिया को ही ले लेते है। वर्ष 2019 में स्नातकोत्तर शिक्षक (पीजीटी) शिक्षकों की भर्ती के लिए हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (एचएसएससी) ने विज्ञापन निकाला और आवेदन आमंत्रित किए। उम्मीदवारों ने शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन पत्र भर दिए। उसी भर्ती के लिए दोबारा हरियाणा लोक सेवा आयोग (एचपीएससी) द्वारा 2022 में फॉर्म भरवाए गए। उम्मीदवारों ने दोबारा आवेदन पत्र भरे। शिक्षकों की विज्ञापित भर्ती के बीच में इस भर्ती प्रक्रिया के नियम बदल दिए गए और जब मामला कोर्ट में गया तो 2023 में तीसरी बार उम्मीदवारों से आवेदन पत्र भरवाए गए। पांच वर्ष की अवधि हो चुकी है लेकिन स्नातकोत्तर शिक्षकों की यह भर्ती प्रक्रिया अभी तक पूर्ण नहीं हो पाई है।

सरकार कोरोना महामारी का बहाना बनाकर कह सकती है कि कोरोना वायरस की वजह से फैली महामारी के कारण यह भर्ती प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो पाई। एक दो वर्ष को अगर छोड़ भी दिया जाए तो क्या तीन वर्ष एक भर्ती प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त नहीं है? दरअसल हरियाणा में ही नहीं बल्कि सभी राज्यों के साथ-साथ केंद्र की भर्ती प्रक्रिया बहुत ही धीमी हैं।

सरकारी कार्यालयों व विभागों में, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, देशी कंपनियां व अन्य प्रकार के रोजगारों के बावजूद हरियाणा में बढ़ती बेरोजगारी के कारण युवा विदेशों में पलायन कर रहे है। भाजपा सरकार ने यहां रोजगार होते हुए भी युवाओं को रोजगार नहीं दिए। कोरोना वायरस के कारण फैली महामारी के बाद से अब तक विदेश जाने वालों में बड़ी संख्या में हरियाणा के युवाओं का शामिल होना सबके लिए आश्चर्यजनक था। जो युवा अपना कौशल हुनर देश की तरक्की में लगा सकते थे वे शिक्षा और रोजगार के बेहतर अवसरों की तलाश में विदेशों में जा रहे है।

सबसे अधिक पलायन अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, चीन और कई यूरोपीय देशों में हो रहा है। पंजाब की तरह हरियाणा के युवा भी विदेशों में बेहतर भविष्य देख रहे हैं। इस पलायन के पीछे सबसे बड़ा कारण शिक्षा और रोजगार का गिरता और घटता स्तर है। यह न केवल 'धन की निकासी' है बल्कि 'प्रतिभा पलायन' है। अगर रोजगार सृजन और मौजूदा रोजगारों को प्रदान किया जाए तो सरकार इस पलायन को रोक सकती है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा संभव दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि भाजपा का प्रमुख एजेंडा चुनाव जीतना और सरकार बनाना है। सत्ता में आने से पहले चुनावी घोषणापत्र व रैलियों में रोजगार देने और लोकलुभावन वादे करने वाले भाजपा नेताओं को अब बेरोजगारी दिखाई नहीं देती। हकीकत यह है कि सरकार और राजनीतिक संगठन जनहित से पहले अपना हित देखते है। तमाम सरकारें चुनाव समय पर या समय से पहले करा लेती हैं जबकि नौकरी की आशा में तैयारी करने वाले अधिकतर युवाओं की उम्र निकल जाती है लेकिन न कोई नौकरी मिलती है और न ही देर सबेर कहीं नियुक्ति होती है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में पीएचडी शोधार्थी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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