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उत्तर प्रदेश: सौंदर्यीकरण के नाम पर हज़ारों ग़रीबों को उजाड़ना कैसा न्याय है!

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी इन दिनों एक बड़ी आबादी प्रदेश सरकार के इसी "अच्छी मंशा" और "बुरे फ़ैसले" के बीच पिस रही है।
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मरती नदियों को दोबारा जीवन देने और उसके इर्द-गिर्द एक सुंदर वातावरण बनाने की योजना किसी भी सरकार की एक अच्छी मंशा ही दर्शाती है लेकिन यह अच्छी मंशा, बुरे फैसले में तब बदल जाती है जब उस सुंदर वातावरण के लिए गरीबों के आशियाने उजाड़ने तक में सरकार परहेज न करे। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी इन दिनों एक बड़ी आबादी प्रदेश सरकार के इसी "अच्छी मंशा" और "बुरे फैसले" के बीच पिस रही है। और ये आबादी है राजधानी के मुख्य स्थल पर कुकरैल नाले के किनारे बसे अकबर नगर की जहां सैकड़ों घर-दुकानों को चिन्हित कर उनपर बुलडोजर चलाने का आदेश सरकार ने दिया है।

सौंदर्यीकरण परियोजना

करीब पचास साल पहले बसे अकबर नगर में हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदाय के लोग रहते हैं। यहां की खास बात यह है कि जब कभी भी, कहीं भी सांप्रदायिक दंगे हुए, उसकी आग कभी यहां नहीं पहुंच पाई। इस घनी आबादी वाले अकबर नगर में दशकों से हिंदू-मुस्लिम एक साथ रहते आ रहे है और आज जब सिर से छत हटने का संकट आ खड़ा हुआ है तो दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे का सहारा बने हुए हैं।

तो सवाल अब यह है कि पांच दशकों से बसे अकबर नगर को सरकार आख़िर उजाड़ना क्यों चाहती है?

दरअसल शहर के सौंदर्यीकरण परियोजना के तहत प्रदेश सरकार की एक परियोजना कुकरैल नाले को पुनः नदी में परिवर्तित करते हुए अकबर नगर को रिवर फ्रंट बनाने की है। कुकरैल शहर का सबसे बड़ा और गंदा नाला है। किसी जमाने में यह एक नदी हुआ करती थी जो धीरे धीरे नाले में बदलती चली गई। लखनऊ के निवाजपुर दसौली गांव के नजदीक से निकलते हुए तकरीबन 28 किलोमीटर बहकर पेपर मिल कॉलोनी के पास गोमती में मिल जाती थी। इसके इर्द-गिर्द अतिक्रमण और बसावट के चलते नदी अपना अस्तित्व खोती चली गई और नाला बन गई। अभी इसमें शहर के 17 नालों का पानी गिरता है।

कुकरैल का कायाकल्प करने के लिए योगी सरकार के नगर विकास मंत्री आशुतोष टंडन द्वारा दो साल पहले ही नदी की पुनर्बहाली और इसके आस-पास सुंदरीकरण के कामों का शिलान्यास कर दिया था। सरकार के मुताबिक इसके दोनों तटों पर रिवर फ्रंट होगा। भव्य पिकनिक स्पॉट बनेगा। इसमें गिरने वाले 17 नालों को बंद कर इसका गंदा पानी भरवारा एसटीपी भेजा जायेगा फिर वहां पानी को शुद्ध कर फिर गोमती नदी में छोड़ा जायेगा साथ ही कुकरैल नाले को साफ कर इसमें शारदा नदी का पानी लाया जायेगा।
     
और गरीबों को उजाड़ने की योजना

यह तो रही योगी सरकार की योजना। एक पहलू से देखने पर यह निश्चित ही बेहद खूबसूरत योजना है इसमें दो राय नहीं लेकिन जितना खूबसूरत इसका एक पहलू है उससे कई ज्यादा भयावह इसका दूसरा पहलू है जहां एक बहुत बड़ी आबादी के घरों, दुकानों को ज़मींदोज कर दिया जायेगा। ये वे लोग हैं जो 40, 50 सालों से यहां बसे हुए हैं। पांच दशक बाद अब जब इन्हें हटाने का फरमान जारी हो चुका है तो लोगों के बीच कोहराम मचना स्वाभाविक है। लोगों की मनः स्थिति समझने के लिए जब मैं अकबर नगर पहुंची तो सबसे पहले वहां तैनात पुलिस के काफिले से सामना हुआ। पहले तो यह लगा कि शायद इस जगह या इसके आस पास कोई बड़ी वारदात हो गई इसलिए इलाके को छावनी में बदल दिया गया है लेकिन कुछ लोगों से बात करते हुए पता चला कि किसी वारदात के चलते नहीं बल्कि अकबर नगर मसले के चलते यहां सैकड़ों पुलिस तैनात कर दी गई है जो कॉलोनी के बाहर रात दिन पहरा देती है।

पुलिस का काफिला आता जा रहा था जिसे देख यह विचार उठना लाज़िम था कि हम लखनऊ में हैं या किसी ऐसी संवेदनशील जगह जहां हमेशा आतंकी खतरा बना रहता है।   अकबर नगर में रहने वाले लोग निम्न या निम्न मध्यवर्गीय हैं। कोई छोटी सी दुकान या गुमटी लगाता है तो कोई फेरी तो कोई मजदूरी करता है। कई महिलाएं दूसरों के घरों में खाना बनाने या साफ सफाई का काम करती हैं। जहां लोग रोज गरीबी और तंगहाली से जूझ रहे हों, जीवनयापन के लिए रात दिन कड़ी मेहनत में लगे हों वहां किससे और किस बात का डर। खैर अब बारी थी लोगों से रू-ब-रू होने की तो हमारे कदम अकबर नगर की ओर बढ़ चले। हर शख्स के चेहरे पर चिंता और खौफ़ साफ़ देखा। तंग गलियां और एक दूसरे से सटे मकान, कहीं मस्जिद, मंदिर तो कहीं मदरसा, स्कूल, छोटी-छोटी दुकानें, सब कुछ है इस अकबर नगर में।

फिर सुविधाएं क्यों दी गईं

एक गली के अंदर घुसते ही हमारी मुलाक़ात बुजुर्ग शाहिदा बानो से हुई। बातचीत शुरू होते ही शाहिदा रोने लगी। वे कहती हैं जब जवान थी तब यहां आई थी और आज मरने की उम्र पर पहुंच गए है तब कहा जा रहा है कि ये जगह हमारी नहीं अतिक्रमण करके कब्जाई गई है। शाहिदा कहती हैं अगर अतिक्रमण था तो हम लोगों को यहां बसने ही क्यों दिया गया और क्यों सारी सुविधाएं पानी, बिजली, सड़क दी गईं। वे रुआंसे गले से कहती हैं अगर हम लोगों को ये सारी सुविधाएं नहीं दी जाती तो हम बसते भी नहीं।

शाहिदा के पति की कुछ साल पहले मौत हो चुकी है। बड़ा बेटा अक्सर बीमार रहता है। उसकी पत्नी दूसरों के यहां खाना बनाने का काम करती है। बाकी के दो बेटे भी मजदूरी करते हैं। शाहिदा कहती है घर में उनके अलावा तीन बेटे, बहुयें पोते पोतियां सब हैं। अगर घर पर बुलडोजर चलेगा तो इस कड़ाके की ठंड में कहां जायेंगे क्योंकि सरकार प्रधानमंत्री आवास के तहत जो दो कमरों का मकान दे रही है उसकी कीमत भी वसूल रही है। शाहिदा हमसे अपने घर के भीतर चलने का आग्रह करने लगी। वह हमें अपने घर, पानी, बिजली से संबंधित कागजात दिखाना चाहती थी। उनका आग्रह मानते हुए हम उनके घर गए। उन्होंने हमें हर वे कागजात दिखाये जो इतना बताने को काफी थे कि अतिक्रमण का मुद्दा महज बहाना है।
 
शाहिदा के घर से निकले ही थे कि बस्ती के अन्य लोगों ने भी हमें घेर लिया। उन लोगों के हाथों में भी हर वे कागजात थे जो यह साबित करते थे कि ये लोग वर्षों से नियमित बिजली पानी बिल का भुगतान कर रहे हैं। भीड़ में शामिल ममता गुस्से भरे शब्दों में कहती है उन लोगों के साथ एक धोख़ा ये भी किया जा रहा है कि कुकरैल नाले के किनारे जो नट, बंजारे या अन्य लोग आकर अपनी मढ़ईया (झोपड़ियां) डाले हुए हैं उन्हीं को सरकार लोगों के सामने दिखाकर ये जता रही है कि इन झोपड़ियों को हटाया जायेगा लेकिन कितनी बड़ी बस्ती सरकार ध्वस्त करने का मन बना चुकी है ये कोई नहीं जान रहा। वे कहती है जब से योगी सरकार की ये मंशा सामने आई है और दूसरी जगह कुछ कार्रवाई भी हुई है तब से अकबर नगर के लोगों का जनजीवन अस्त व्यस्त हो चुका है। न रातों को नींद न दिन को चैन। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे। वे सब मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं। सब का काम धंघा चौपट हो रहा है।

बढ़ती पुलिस ज्यादती

बस्ती के बाहर मुख्य सड़क के किनारे गुटखा मसाला की छोटी सी गुमटी लगाने वाली भूरी ने बताया कि चालीस साल से वे ये गुमटी चला रहे हैं। पहले उनकी मां इसे चलाती थी। भूरी के पति रद्दी बेचने का काम करते हैं। वे कहती हैं पूरा इलाका पुलिस छावनी में बदल दिया। हर तरफ पुलिस है। कोई कुछ नहीं कह सकता। महिलाओं का रात होते ही आना जाना दूभर हो गया है। कोई कुछ कह दे तो पुलिस पीटना शुरू कर देती है। खाने पीने की वस्तुएं तक बस्ती के अंदर ले जाना मुश्किल हो गया है तो बच्चे खायेंगे क्या। पुलिस कभी बिजली तो कभी पानी का कनेक्शन काटने की धमकी देती है। कहती है हर हाल में यहां से लोगों को जाना होगा।

भूरी तेज स्वर में कहती हैं 'जिंदगी की गरीबी यहीं काट दी। गरीबी में यहीं पले हैं यहीं मरेंगे लेकिन यहां से कहीं नहीं जायेंगे। जब अतिक्रमण हो रहा था तब क्यों नहीं रोका और आज पचास साल बाद हमें कहा जा रहा है कि यहां से चले जाओ क्योंकि शहर को सुंदर बनाना है। आंसू भरे आंखों से वह कहती हैं गरीबों को जीते जी मारकर शहर को सुंदर बनाना आख़िर ये कैसी योजना है और पुनर्स्थापना के तहत जो मकान देने की बात सरकार कर रही है उसकी किस्तें गरीब कहां से भरेगा।'

बस्ती के 22 वर्षीय अर्जुन कश्यप अनपढ़ हैं। उन्होंने बताया कि वे मज़दूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनके परिवार में तीन छोटे भाई, मां, बड़ी बहन हैं। लगभग 40-45 वर्ष से उनका परिवार यहां रह रहा है। घर में बिजली का कनेक्शन है। राशनकार्ड और आधार कार्ड भी बना है। राजाराम चौहान की पत्नी काजल ने बताया कि वह और बगल के  घर में रहने वाली लक्ष्मी सिंह दूसरे के घरों में जाकर झाड़ू बर्तन करती हैं। उनके परिवार को भी यहां रहते लगभग 50 वर्ष हो गये हैं। घर में बिजली का कनेक्शन व राशनकार्ड बना है और हाउस टैक्स भी देते हैं।

पूंजीपतियों को सौंपने की तैयारी

फेरी लगाने वाले मो. नफिल, मजदूर मैनुद्दीन, आशा कार्यकत्री सुमन पांडेय, कुल्लो देवी, जंग बहादुर आदि ने बताया कि 'लोगों के बीच चर्चा है कि योगी सरकार रिवर फ्रंट और नाइट सफारी के बहाने यह जमीन अडानी को सौंपने जा रही है। उन्होंने कहा कि यहां दोहरी लूट चल रही है। एक ओर हमारे लाखों रुपये की कीमत के घरों को जबरदस्ती उजाड़ा जा रहा है दूसरी ओर पांच लाख रुपये के ऐसे आवास लेने के लिए बाध्य किया जा रहा है जिसकी ज़िंदगी केवल 60 साल है। इसके लिए प्रशासन ने अपने दलाल लगा दिए हैं जो तोड़-फोड़ करके 5000/- जमा करवाकर आवेदन फ़ार्म भरवा रहे हैं।'

पीड़ित परिवारों ने कहा कि हम यहां से कहीं दूसरी जगह जाने की बजाय मरना पसंद करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि आज डूब एरिया का भी बहाना बनाया जा रहा है। अगर यही बात थी तो सन् 1971,1977 और 1982 में बाढ़ आई थी। उस समय बहुत कम परिवार यहां रहते थे। अच्छा होता उसी समय सरकार हम लोगों को हटा देती। उन्होंने कहा कि योगी-मोदी सरकार के द्वारा खुर्रम नगर, रहीम नगर, अबरार नगर, लवकुश नगर समेत 89 बस्तियों को उजाड़ने के लिए चिन्हित किया गया है। सभी बस्तियों को उजाड़कर उस जमीन को अडानी को सौंपने की योजना है।

फिलहाल कोर्ट ने लगाई रोक

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कुकरैल नदी में कब्जा कर बसे अकबर नगर प्रथम एवं द्वितीय में धवस्तीकरण पर अंतरिम रोक लगा दी है। ये रोक 22 जनवरी तक है। कोर्ट ने राज्य सरकार व एलडीए से कहा कि पहले वहां के लोगों के पुनर्वास का आवेदन करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया जाए। इसके पश्चात पुनर्वास योजना को अपनाने वाले लोगों द्वारा कब्जा छोड़ देने पर एलडीए उनके परिसरों को कब्जे में ले सकता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि याची अपना स्वामित्व साबित करने में सफल नहीं हुए हैं। यह आदेश जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने सैयद हमीदुल बारी सहित 46 व्यक्तियों की कुल 26 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए पारित किया।

अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि वहां अपेक्षाकृत गरीब लोग रह रहे हैं और यह समझ नहीं आ रहा कि इनके खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की इतनी जल्दी क्यों है? वह भी ठंड के इस मौसम में पुनर्वास योजना को वास्तविक तौर पर लागू किए बिना।

वहीं सरकार की ओर से कहा गया कि पहले से दो रिट याचिकाएं जस्टिस प्रकाश सिंह की पीठ में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं, लिहाजा सभी याचिकाएं भेज दी जाएं। राज्य सरकार व एलडीए की दलील को दरकिनार करके जस्टिस भाटिया ने सभी याचिकाओं को कोर्ट की रजिस्ट्री से मंगाकर स्वयं सुनने का निर्णय लिया। याचियों की ओर से मुख्य रूप से दलील दी गई कि याची 40-50 सालों से उस स्थान पर कब्जे में हैं और तब यूपी अर्बन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1973 लागू भी नहीं हुआ था लिहाजा कानून के तहत याचियों को बेदखल करने की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

अकबर नगर में लगभग 70:30 के अनुपात में हिंदू और मुसलमान परिवार रहते हैं। बस्ती में बड़ी संख्या गरीब मजदूरों की है और कुछ परिवार छोटी-मोटी नौकरी या कारोबारी हैं। 40-50 वर्षों से रहने वाले लगभग सभी परिवारों ने अपने घरों में बिजली, पानी आदि के कनेक्शन लिए है और लगभग सभी परिवारों के पास राशन कार्ड हैं एवं वहां के मतदाता हैं। अब सबसे बड़ा सवाल सवाल तो यही उठता है कि जो लोग पांच दशकों से वहां रह रहे हैं क्या उन्हें इस तरह उजाड़ा जाना उचित है? और सरकार जो मकान उन्हें देने की बात कह रही है उसकी भारी भरकम रकम आख़िर ये गरीब कहां से जुटायेंगे? जो किसी तरह इंतज़ाम कर दे सकेंगे लेकिन जो नहीं दे सकेंगे वो गरीब आख़िर कहां जायेंगे। सौंदर्यीकरण के नाम पर आख़िर ये कैसा फैसला है जहां इंसान के जान की कोई कीमत नहीं। "सबका साथ, सबका विकास" इस सबके बाद फिर सरकार के इस स्लोगन का आख़िर क्या मायने रह जाता है।

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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