Gen-Z (कॉकरोच) की जीत: इस्तीफ़ा दिया नहीं गया, लिया गया है
सबसे पहले यह साफ़ कर दूं कि धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दिया नहीं, उनसे लिया गया। और मोदी जी ने नहीं लिया, बल्कि युवाओं ने सरकार की छाती पर चढ़कर उन्हें इस्तीफ़ा देने को मजबूर किया। इसके लिए इन युवाओं ने लाठी खाई, गोली खाई, आंसू गैस के गोले झेले, लेकिन फिर भी डटे रहे और शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लेकर ही हटे। तो इसके बहुत बड़े मायने हैं।
बहुत से लोग भले ही कहें कि एक ही तो इस्तीफ़ा हुआ है, और अब धर्मेंद्र प्रधान की जगह जिन प्रह्लाद जोशी को शिक्षा मंत्री बनाया गया है, वो तो उनसे भी ‘बड़े वाले’ हैं, पुराने संघी है (सज्जनों, जब सरकार ही संघ की है तो ले-देके मंत्री भी संघ का ही बनेगा)। क्या फ़र्क़ पड़ गया! लेकिन फ़र्क़ पड़ गया है, हमें उसे ही समझना है।
इस्तीफ़ा एक है लेकिन इसके संदेश अनेक हैं और बड़े हैं–
1. सबसे पहले इस नाउम्मीदी के दौर में एक उम्मीद जगी है। “कुछ नहीं हो सकता, कुछ नहीं बदल सकता” का नरैटिव टूटा है।
2. यह भ्रम टूट गया है कि मोदी सरकार को झुकाया नहीं जा सकता। या मोदी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते। किसान आंदोलन के बाद एक बार फिर साबित हुआ कि ‘झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए’। और ‘जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर ज़माना चलता है’।
3. पहली बार संघ-बीजेपी और गोदी मीडिया अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद इस आंदोलन को हिंदू-मुस्लिम में बांटने में कामयाब नहीं हो पाया। मंच से ही नहीं युवाओं के नारों में भी बार-बार यह साफ़ किया गया कि हिंदू-मुस्लिम की राजनीति नहीं चलेगी।

“जब जब मोदी डरता है–हिंदू, मुस्लिम करता है।” यह नारा पहले दिन से आख़िरी दिन तक इस आंदोलन का प्रमुख नारा रहा। जबकि यही हिंदू-मुस्लिम संघ-बीजेपी का कोर एजेंडा है और उसने इस बार भी पूरी कोशिश की इस आंदोलन को भी हिंदू-मुस्लिम का रंग दे दिया जाए, लेकिन युवाओं ने उसकी सारी उम्मीदों-साज़िशों पर पानी फेर दिया। यानी युवाओं ने संघ-बीजेपी की नाभि में तीर मारा।
आंदोलन में पहले दिन से खाना-पानी देकर सेवा कर रहे मोहम्मद जुनैद के परिवार को यूपी पुलिस द्वारा परेशान-प्रताड़ित करने की ख़बर मिलने पर मंच से सीधे योगी सरकार को चेतावनी दी गई। अब नारों से आगे असली परीक्षा अंत तक जुनैद और ऐसे ही अन्य परिवारों के साथ खड़े रहने की है।
4. यह भी पहली बार था कि एक ही सांस में ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम’ कहने वाले लड़के-लड़कियां उसी सांस में मोदी चोर है (यह तो मैं सबसे सभ्य वाला नारा लिख रहा हूं…) कह रहे थे। यानी नरेंद्र मोदी ने जैसे-तैसे छल-बल करके अपनी जो महामानव, हिंदू हृदय सम्राट, हर-हर मोदी, घर-घर मोदी वाली छवि बनाई थी, और जिस वर्ग में बनाई थी, उसी वर्ग या उसके बच्चों ने उसे इस आंदोलन में पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। इसके बहुत बड़े मायने हैं।
आख़िरी में एक और महत्वपूर्ण बात- बहुत से बौद्धिक जो पहले दिन से इस जेन-ज़ी युवाओं के आंदोलन को ख़ारिज कर रहे थे, सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) को संदिग्ध मान रहे थे, वही अब इस आंदोलन की सफलता के बाद सारी उम्मीद सीजेपी या जेन-ज़ी से ही न लगाएं– कि उसे अमित शाह का इस्तीफ़ा लिए बिना भी नहीं हटना चाहिए था। उसे मोदी का भी इस्तीफ़ा मांगना चाहिए था। उन्हें यह करना चाहिए था– उन्हें ये कहना चाहिए था। ऐसे लोगों को कुछ काम अपने हिस्से में भी रखना चाहिए।
जेन-ज़ी ने एक शुरुआत कर दी है और उनसे आगे की जेनरेशन अल्फ़ा भी उनके साथ आई है तो कुछ ज़िम्मेदारी “अति समझदार-अनुभवी-संस्कारी” जेनरेशन एक्स (1965 से 1980) और मिलेनियल्स (1981 से 1996) की भी बनती है। और फिर विपक्षी राजनीतिक दल भी आख़िर किस मर्ज़ की दवा हैं।
हालांकि युवाओं ने भी ये मांगें भी ज़ोर-शोर से उठा दी हैं। “धर्मेंद्र प्रधान तो झांकी है- नितिन गडकरी बाक़ी है”, 25 जुलाई को जंतर-मंतर पर यह नारा प्रमुख रूप से लग रहा था। पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट से युवाओं में काफ़ी गुस्सा है। पेपर लीक के फ़ायदे गिनाने वालीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का नाम भी युवा अपनी इस्तीफ़े वाली लिस्ट में गिना रहे थे। और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग पहले ही प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े की मांग तक पहुंचने लगी थी, तभी धर्मेंद्र जी की विदाई तय हुई। इसके अलावा पुलिस लाठीचार्ज के लिए लोग सीधे गृहमंत्री अमित शाह को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं।
कोई कहे कि एक इस्तीफ़े से कुछ नहीं बदलेगा– हां, बहुत कुछ नहीं बदलेगा, फिर नई साज़िशें होंगी, दमन होगा, लेकिन यह पहली बार है कि सत्ता का तिलिस्म टूट गया है। निहत्थे युवाओं ने सत्ता और उसकी पुलिस से डरने से इंकार कर दिया है। और उसे शिक्षा और देश की बर्बादी के लिए ज़िम्मेदार और जवाबदेह ठहराया है।
गोरख पांडेय ने कहा है ना–
रफ़्ता-रफ़्ता नज़रबंदी का जादू घटता जाए है
रुख़ से उनके रफ़्ता-रफ़्ता परदा उतरता जाए है
और दुष्यंत कुमार भी कह गए हैं–
कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
और आख़िरी बात-
दरवाज़े अभी बंद हैं, खिड़की खुली है बस
हां, सांस आ सके वो हवा सी चली है बस
ख़तरा नहीं टला है अभी, जान लीजिए
जो सर पे आ गई थी मुसीबत टली है बस
वो सुब्ह अभी दूर है, जिसकी हमें तलाश
इस दौर-ए-तीरगी में शमा इक जली है बस
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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