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भारत में खाद्य सामग्री की क़ीमतों में मौजूदा बढ़ोतरी की वजह क्या है ?

इस समय जो खाद्य मुद्रास्फीति चल रही है उसका मुक़ाबला करने के दो तरीक़े हैं जो एक-दूसरे का विकल्प हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर।

भारत में कीमतों में आयी वर्तमान तेजी, खाद्य सामग्री की कीमतों में बढ़ोतरी से संचालित है।

मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाओं का खेल

2023 की जुलाई में जहां खुदरा मुद्रास्फीति की दर (पिछले साल के इसी महीने के मुकाबले) 7.44 फीसद की बढ़ोतरी दिखा रही थी, खाद्य सामग्री के मूल्यों में बढ़ोतरी, जिसमें खाने-पीने की सभी वस्तुएं आती हैं, जिसमें खाद्यान्न, फल-सब्जियां, दुग्ध उत्पाद, आदि सभी चीजें शामिल हैं, 11.5 फीसद चल रही थी। खाद्य सामग्री के मूल्य में यह मुद्रास्फीति अगस्त के महीने में जरा सी कम होकर, करीब 10 फीसद पर आ गयी। यह मुख्य रूप से टमाटर जैसी सब्जियों के मामले में सरकार द्वारा उठाए गए आपूर्ति प्रबंधन के कुछ कदमों का ही नतीजा था और इसके चलते कुल मिलाकर खुदरा मुद्रास्फीति की दर भी नीचे खिसक कर 6.83 फीसद पर आ गयी। फिर भी यह स्वत:स्पष्ट है कि खाद्य मुद्रास्फीति और इसके साथ जुड़ कर कुल मिलाकर खुदरा मुद्रास्फीति, अब भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है।

यह सिर्फ भारत में ही नहीं हो रहा है कि खाद्य सामग्री की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। यह एक वैश्विक परिघटना है और ऐसा सिर्फ तीसरी दुनिया में ही नहीं हो रहा है बल्कि उन्नत पूंजीवादी देशों तक में हो रहा है। आम तौर पर इसके लिए यूक्रेन युद्घ से पैदा हुई तंगियों को ही जिम्मेदार समझा जाता है। लेकिन, सिद्घांत रूप में तो यूक्रेन युद्घ को तंगी पैदा करने के जरिए, इस तरह की मुद्रास्फीति पैदा करने के लिए जिम्मेदार कहा जा सकता है, लेकिन खाद्य मूल्यों में वर्तमान मुद्रास्फीति का अगर ऐसी तंगी से कोई संबंध है भी तो, वह उतनी किसी वास्तविक तंगी का नतीजा नहीं है, जितनी कि इस तरह की तंगी की प्रत्याशा का नतीजा है। दुनिया भर से इसके बहुत सारे साक्ष्य हैं, जो दिखाते हैं कि कोई वास्तविक तंगी पैदा होने से पहले से ही, खुदरा खाद्य सामग्री क्षेत्र में मुनाफे के अनुपात बढ़ गए हैं, जो इस तरह की तंगी की प्रत्याशा में, इजारेदारियों द्वारा कीमतें बढ़ाए जाने को ही दिखाते हैं। यही बात भारत के संबंध में भी सच है, जिसके चलते बहुत से लोग ‘मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाओं’ के सक्रिय होने की बात कर रहे हैं; ये प्रत्याशाएं ही कीमतों में प्रत्याशित बढ़ोतरी के चलते, वास्तविक कीमतों को ऊपर चढ़ा रही हैं।

मेहनतकशों की कीमत पर मुद्रास्फीति नियंत्रण

बहरहाल, इस तरह की मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाएं तभी ऐसी भूमिका अदा कर सकती हैं, जब कोई वास्तविक तंगी न होने के बावजूद, वास्तविक आपूर्ति की स्थिति कोई खास इफरात में उपलब्धता की भी नहीं हो। आखिरकार, जब खाद्यान्न के विशाल भंडार मौजूद हों, मुद्रास्फीति की प्रत्याशा में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा कीमतें नहीं बढ़ायी जाती हैं। अगर इस तरह के भंडार सरकार के हाथों में हों, तो आपूर्तिकर्ताओं को पता होता है कि सरकार ये भंडार उपभोक्ताओं के लिए ऐसी कीमतों पर निकाल देगी, जिससे उनके कीमतें बढ़ाने पर पानी ही फिर जाएगा। अगर ये स्टॉक निजी विक्रेताओं के पास हों, तब भी उनकी प्राथमिकता कीमतें बढ़ाने की जगह, अपने स्टॉक कम करने की ही होगी। इतना ही नहीं, अगर कुछ आपूर्तिकर्ता कीमतें बढ़ाते भी हैं, तो दूसरे आपूर्तिकर्ता इसे उनके ग्राहकों में सेंध लगाने का और इस तरह अपने स्टॉक घटाने का मौका बना लेंगे। दूसरे शब्दों में, ‘मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाएं’ सिर्फ तभी काम करती हैं, जब कुल मिलाकर आपूर्तियों की स्थिति बहुत ज्यादा सहूलियत की नहीं हो।

पिछले काफी समय से खाद्यान्न के बाजार में ठीक ऐसी ही स्थिति बनी रही है। मिसाल के तौर पर सालाना प्रतिव्यक्ति विश्व खाद्यान्न उत्पादन (त्रिवार्षिक औसत और त्रिवार्षिकी के मध्य की आबादी का भागफल), 1979-80 से 1981-82 (संक्षेप में 1980-82) की त्रिवार्षिकी में 355 किलोग्राम था। यह 2000-2002 की अवधि में घटकर 343 किलोग्राम रह गया और 2016-18 के दौरान भी यह 344 किलोग्राम ही था। इसके ऊपर से, 2002 से लगाकर खाद्यान्न उत्पाद का एक बढ़ता हुआ हिस्सा इथेनॉल के उत्पादन की ओर मोड़ा जा रहा है। इसका मतलब यह है कि दुनिया में इंसानों के उपभोग के लिए प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता, पहले से सिकुड़ गयी है।

अगर उपभोग के लिए खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता में इस गिरावट के बावजूद, अब तक कोई सतत तथा उल्लेखनीय मुद्रास्फीतिकारी दबाव नहीं बना था, तो इसका कारण इस तथ्य में छुपा हुआ है कि नवउदारवादी व्यवस्था में, मेहनतकश जनता की क्रय शक्ति को तथा खासतौर पर तीसरी दुनिया में मेहनतकश जनता की क्रय शक्ति को, बहुत ज्यादा निचोड़ दिया गया था। संक्षेप में यह कि मेहनतकश जनता पर जो आय संकुचन थोपा गया था, उसके चलते ही बैठती हुई मांग और बैठती हुई उपलब्धता के बीच, एक नाजुक संतुलन बना रहा था। इसी का नतीजा था कि हालांकि, नवउदारवादी दौर में गरीबी तथा अल्पपोषण में भारी बढ़ोतरी हुई है (यह दूसरी बात है कि इस तथ्य को ब्रेटन वुड्स संस्थाओं के तत्वावधान में कराए गए अनगिनत ‘गरीबी के अध्ययन’ आम तौर पर छुपाने की ही कोशिश करते आए हैं), इस वंचना ने आम तौर पर किसी मुद्रास्फीतिकारी निचोड़ का रूप नहीं लिया था। जब-तब खाद्य सामग्री की कीमतों में उछाल तो आते रहे हैं, पर उन्हें मेहनतकश जनता की आमदनियों को दबाने के जरिए ‘नियंत्रित’ किया जाता रहा है। पुन: इस तरह से भी, मुद्रास्फीति पैदा किए बिना, मांग और आपूर्ति के नाजुक संतुलन को बहाल किया जाता रहा था।

भारत में हालात

ठीक ऐसी ही स्थिति, भारत में भी बनी रही है। 1991 में प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता, 510.1 ग्राम प्रतिदिन थी। 2019-20 तक यह उपलब्धता थोड़ी से घटकर 501. 8 ग्राम प्रतिदिन पर आ गयी। अगले दो वर्षों में महामारी के दौरान सरकार द्वारा खाद्यान्न का वितरण किए जाने के फलस्वरूप, जिसे सरकारी खाद्यान्न भंडारों में से अनाज निकाले जाने ने संभव बनाया था, यह आंकड़ा बढ़कर क्रमश: 511.7 ग्राम तथा 514.6 ग्राम हो गया। लेकिन, यह साफ है कि पूरे नवउदारवादी दौर में खुद सरकारी आंकड़े के अनुसार भी, खाद्यान्न की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता में शायद ही कोई बढ़ोतरी हुई है। दूसरे शब्दों में कीमतों में किसी उल्लेखनीय तथा सतत बढ़ोतरी के बिना ही, मांग और आपूर्ति में एक नाजुक संतुलन इसलिए बना रहा था कि नवउदारवादी व्यवस्था के संचालन की कार्यप्रणाली के जरिए, मेहनतकश जनता के हाथों में क्रय शक्ति को पर्याप्त रूप से दबाए रखा जा रहा था।

यह नाजुक संतुलन कभी भी बिगड़ सकता है और इससे खाद्यान्न की कीमतें बढ़ सकती हैं और इसके चलते मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाएं पैदा हो सकती हैं, जो महंगाई की समस्या को और उग्र बना सकती हैं। पूंजीवादी व्यवस्था में इससे सिर्फ इसी तरह से बचा जा सकता है कि सरकार द्वारा अपनायी जाने वाली मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने की नीतियों के जरिए, मजदूर वर्ग की क्रय शक्ति के निचोड़े जाने का शिकंजा और कस दिया जाए। यूक्रेन युद्घ तथा खाद्यान्न की कीमतों में वैश्विक बढ़ोतरी, भारत में भी मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाएं पैदा करने के लिए संदर्भ मुहैया कराते हैं। इसे और पुख्ता कर रहा है यह तथ्य कि सरकार के हाथों में खाद्यान्न के भंडार, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को बनाए रखने के लिए जरूरी भंडार से तो ज्यादा हैं, लेकिन पिछले कुछ अर्से से जिस स्तर पर बने रहे थे, उससे घट गए हैं। मिसाल के तौर पर 22 अगस्त को भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में कुल 5 करोड़ 23 लाख 35 हजार टन अनाज था, जिसमें 2 करोड़ 42 लाख 96 हजार टन चावल था और 2 करोड़ 80 लाख 39 हजार टन गेहूं था। ये भंडार सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चलाने के लिए जरूरी ऑपरेशनल स्टॉक से तो ज्यादा थे, लेकिन इससे पहले के छह साल में किसी भी समय उसके पास रहे स्टॉक से घटकर ही थे। इससे सटोरियों को इसका इशारा मिला होगा कि अनाज अपने पास जमा कर के रख लें और खुले बाजार के दाम को बढ़ाएं।

असाधारण नासमझी की नीति

खाद्यान्न भंडारों का यह घटाया जाना, अपने आप में ही मोदी सरकार की एक असाधारण रूप से नासमझी की नीति का नतीजा था। उसको यह लग रहा था कि वह अपने हाथों के भंडारों को बाजार में निकाल कर, खुले बाजार में खाद्यान्न मुद्रास्फीति को नीचे ला सकती थी। हुआ यह कि सरकार ने इस तरह जो भी अनाज अपने भंडार से बाहर निकाला, सटोरियों ने उसे खरीद कर जमा कर लिया और इस तरह मुद्रास्फीति पहले की तरह चलती रही, जबकि सरकार के भंडार घटा दिए गए और इस तरह मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाओं को और इसलिए मुद्रास्फीतिकारी प्रक्रिया को ही, और मजबूत कर दिया गया। जाहिर है कि जब मुद्रास्फीतिकारी प्रत्याशाओं के चलते, खाद्यान्नों के दाम बढ़ते हैं, तो इसका असर आमतौर पर अन्य खाद्य वस्तुओं के भी दाम बढऩे के रूप में सामने आता ही है।

इस समय जो खाद्य मुद्रास्फीति चल रही है, उसका मुकाबला करने के दो तरीके हैं, जो एक-दूसरे का विकल्प हैं। पहला है मुद्रा नीति के जरिए, जिसमें ब्याज की दरें बढ़ायी जाती हैं और आम तौर पर ऋणों पर शिकंजा कसा जाता है। पुराने जमाने में, ऐसे मौकों पर ‘चुनिंदा ऋण नियंत्रण’ कहलाने वाली नीति के अंतर्गत, सिर्फ खाद्यान्न क्षेत्र के लिए दिए जाने वाले ऋणों पर ही शिकंजा कसा जाता था। लेकिन, अब नवउदारवादी दौर में उस नीति का उपयोग बंद कर दिया गया है और इसके चलते आम ब्याज दर नीति का सहारा लिया जाता है, जिससे अपरिहार्य रूप से लघु उद्योगों की वहनीयता पर चोट पड़ती है और उल्लेखनीय बेरोजगारी पैदा होती है। संक्षेप में, खाद्य मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने का यह तरीका, बेरोजगारी पैदा करता है और दुर्भाग्य से पूंजीवाद के अंतर्गत आम तौर पर मुद्रास्फीति के इसी रामबाण इलाज को पसंद किया जाता है।

सार्वजनिक वितरण ही है वास्तविक काट

खाद्य मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने का दूसरा रास्ता यह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यापकता को बढ़ाया जाए और सरकार के भंडारों को खुले बाजार में खाली करने के उलट, उपभोक्ताओं को ही खुले बाजार से हटाकर सार्वजनिक वितरण के अंतर्गत लाया जाए तथा उनके बीच सरकारी भंडारों से वितरण किया जाए, ताकि सटोरियों को इन भंडारों तक पहुंच ही हासिल नहीं हो सके।

बेशक, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए खाद्यान्न के बढ़े हुए वितरण के लिए, आगे चलकर भारतीय खाद्य निगम के जरिए सरकार को, सरकारी खरीद बढ़ानी पड़ेगी, तभी सार्वजनिक वितरण प्रणाली चलती रह सकेगी। वैसे भी सरकार इस साल के खरीफ के सीजन में 5 करोड़ 21 लाख टन चावल की सरकारी खरीद करने का मंसूबा बना रही है। यह, वर्तमान खाद्य मुद्रास्फीति की काट करने के लिए अत्यावश्यक कदम है। यहां आकर उन कदमों की मूर्खता की पराकाष्ठा स्वत:स्पष्ट हो जाती है, जिन्हें कुख्यात कृषि कानूनों के जरिए लागू करने की कोशिश की गयी थी। अगर, किसानों के आंदोलन के चलते उन कदमों को वापस नहीं लिया गया होता, तो खरीदी का निजीकरण हो गया होता और सरकार के हाथों में मुद्रास्फीति की काट करने का कोई साधन ही नहीं रहता और निजी क्षेत्र के तत्वावधान में मुद्रास्फीति बेरोक-टोक चलती रहती। सौभाग्य से किसानों ने देश को बचा लिया और खाद्यान्न की सार्वजनिक खरीदी अब भी कायम है और सरकार के हाथों में अब भी एक हथियार है जिसके सहारे वह आम बेरोजगारी पैदा किए बिना, मुद्रास्फीति पर काबू पा सकती है।

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीेचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Food Price Spike: How Farmers’ Protest Saved the Country

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