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जब बेदी और मंटो के बीच ख़तो-किताबत बंद हो गई

उर्दू-हिंदी पाठकों के दुलारे, बेहतरीन अफ़साना निगार, फ़िल्म संवाद राइटर राजिंदर सिंह बेदी की पुण्यतिथि पर जानिए मंटो से जुड़ा उनका यह क़िस्सा।
rajinder singh bedi

अफ़साना निगार राजिंदर सिंह बेदी का दौर वह हसीन दौर था, जब उर्दू अदब में सआदत हसन मंटो, कृश्न चंदर, इस्मत चुग़ताई और ख़्वाजा अहमद अब्बास जैसे महारथी एक साथ अपने अफ़सानों से पूरे मुल्क में धूम मचाए हुए थे. इन सबके बीच एक प्यार भरी नोंक-झोंक भी चलती ही रहती थी. एक बार मंटो ने बेदी को एक ख़त लिखा. ख़त का मज़मून कुछ इस तरह से था, ‘‘बेदी! तुम्हारी मुसीबत यह है कि तुम सोचते बहुत ज़्यादा हो. मालूम होता है कि लिखने से पहले सोचते हो, लिखते हुए सोचते हो और लिखने के बाद भी सोचते हो.’’ बहरहाल अब ख़त का ज़वाब देने की बारी बेदी की थी. कुछ अरसा बीता, बेदी ने जब मंटो के कुछ अफ़सानों में लाउबालीपन (लापरवाही) देखा, तो उन्हें लिखा, ‘‘मंटो तुम में एक बुरी बात है और वह यह कि तुम न लिखने से पहले सोचते हो और न लिखते वक्त सोचते हो और न लिखने के बाद सोचते हो.’’ बेदी समग्र में यह वाक़िया ‘अफ़सानवी तजरबा और इज़हार के तख़लीकी मसाइल’ लेख में दर्ज़ है. इसके बाद मंटो और बेदी में ख़तो-किताबत बंद हो गई. बाद में पता चला कि उन्होंने बेदी की तनक़ीद का उतना बुरा नहीं माना, जितना इस बात का ‘‘कि वे लिखेंगे ख़ाक! जबकि शादी से परे उन्हें किसी बात का तजरबा ही नहीं.’’

राजिंदर सिंह बेदी की मादरी ज़बान पंजाबी थी, लेकिन उनका सारा लेखन उर्दू ज़बान में ही मिलता है। इक़बाल और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ से लेकर साहिर लुधियानवी, कृश्न चन्दर, राजिंदर सिंह बेदी तक ऐसे अनेक शायर और लेखक हुए हैं, जिनकी मादरी ज़बान पंजाबी है, पर वे लिखते उर्दू में थे और उनकी शिनाख़्त उर्दू लेखक के तौर पर ही है। उर्दू की पैदाईश पंजाब में हुई और इस ज़बान का जो मुहावरा है, वह भी काफ़ी हद तक पंजाबी ज़बान से मिलता है। इन दोनों भाषाओं की समानताओं को देखते हुए कई बार राजिंदर सिंह बेदी औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत में यह कहते थे कि उर्दू का नाम ’पंजुर्दु’ होना चाहिए.

उर्दू अदब में राजिंदर सिंह बेदी की पहचान अफ़साना निगार के तौर पर है. उन्होंने सिर्फ़ एक उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ लिखा और वह भी संग—ए—मील है. साल 1962 में छपे इस उपन्यास को 1965 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाज़ा गया. बाद में इस उपन्यास पर इसी नाम से एक फ़िल्म भी बनी, हालांकि वह बहुत कामयाब साबित नहीं हुई. बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि नावेल ‘एक चादर मैली सी’ सबसे पहले ‘नुकूश’ पत्रिका के कहानी विशेषांक में शाया हुआ था. पाठकों की बेहद पसंदगी और मांग पर बाद में यह अलग से छपा.बेदी ने कुछ नाटक भी लिखे. उनके ड्रामों का पहला मजमुआ ‘बेजान चीज़ें’ टाइटल से 1943 में छपा. राजिंदर सिंह बेदी की कहानियों को पाठकों और आलोचकों दोनों का ही भरपूर प्यार मिला. बेदी की ज़्यादातर कहानियों में महिलाओं के दुःख-दर्द, जज़्बात और उनकी समस्याएं बड़ी ही संज़ीदगी से नुमायां हुई हैं. ‘लाजवंती’ से लेकर ‘युक्लिप्टस’, ‘बब्बल’, ‘एक लंबी लड़की’, ‘अपने दुख मुझे दे दो’ और ‘दिवाला’ वगैरह. यहां तक कि उनके एक अदद उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ के मरकज में भी एक औरत ही है. बेदी के दिल में औरतों की बड़ी इज़्ज़त थी. औरत के मुतअल्लिक़ उनके ख़्यालात थे,‘‘मैं मानता हूं, दुनिया की तख़्लीक में औरत का रोल बड़ा होता है. उसको दुनिया की तरक़्क़ी में पूरी आज़ादी दी जानी चाहिए, क्योंकि वो जानती है कि सही क्या है ? वो अपनी तख़्लीक के जियादः करीब है, क्योंकि वही तख़्लीक का सारा दर्द बर्दाश्त करती है.’’

1982 में छपी किताब ‘मुक्तिबोध’ में राजिंदर सिंह बेदी के लेख, संस्मरण और भाषण शामिल हैं. इस किताब में पाठकों को बेदी के लेखन के दीगर पहलू देखने को मिलते हैं. किताब के ‘अफ़सानवी तजरबा और इज़हार के तख़लीकी मसाइल’ लेख में फ़न और अदब के तआल्लुक से राजिंदर सिंह बेदी ने क्या ख़ूब लिखा है, ‘‘फ़न किसी शख़्स में सोते की तरह से नहीं फूट निकलता. ऐसा नहीं कि आज रात आप सोएंगे और सुब्ह फ़नकार होकर जागेंगे. यह नहीं कहा जा सकता कि फ़लां आदमी पैदाइशी तौर पर फ़नकार है, लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि उसमें सलाहियतें हैं, जिनका होना बहुत ज़रूरी है. चाहे वो उसे जिबिल्लत (सहजवृत्ति) में मिले और या वह रियाज़त (अभ्यास) से उनका इक्तिसाब (अर्जन) करे.पहली सलाहियत तो यह है कि वह हर बात को दूसरों के मुक़ाबले में ज़्यादा महसूस करता हो, जिसके लिए एक तरफ़ तो दादो-तह्सीन (प्रशंसा) पाए और दूसरी तरफ ऐसे दुख उठाए जैसे कि उसके बदन पर से ख़ाल खींच ली गई हो और उसे नमक की कान (खान) से गुज़रना पड़ रहा हो. दूसरी सलाहियत यह कि उसके कामो-दहन (दांत और मुंह) उस चरिंद (शाकाहारी पशु) की तरह से हो, जो मुंह चलाने में ख़ुराक को रेत और मिट्टी से अलग कर सके. फिर यह ख़्याल उसके दिल के किसी कोने में न आए कि घासलेट या बिजली का ज़्यादा ख़र्च हो गया या काग़ज़ के रिम के रिम ज़ाया हो गए. वह जानता हो कि कुदरत के किसी बुनियादी क़ानून के तहत कोई चीज़ ज़ाया नहीं होती. फिर वह ढीठ ऐसा हो कि नक्शे-सानी (दूसरा ख़ाका) को हमेशा नक्शे-अव्वल (पहला ख़ाका) पर तरजीह दे सके. फिर अपने फ़न से परे की बातों पे कान दे–मसलन मौसीक़ी और जान पाए कि उस्ताद आज क्यों सुर की तलाश में बहुत दूर निकल गया है. मुसव्विरी के लिए निगाह रखे और समझे कि विशी-वाशी में खुतूत (रेखाएं) कैसी रानाई (सुंदरता) और तवानाई (ऊर्जा) से उभरे हैं. अगर यह सारी सलाहियतें उसमें हों, तो आख़िर में एक मामूली सी बात रह जाती है और वह यह कि जिस एडिटर ने उसका अफ़साना वापस कर दिया है, नाअह्ल (अयोग्य, मूर्ख ) है.’’

बेदी न तो एक बंधे-बंधाए ढांचे में लिखने के क़ायल थे और न ही उन्होंने अपना लेखन किसी विचारधारा में क़ैद होकर लिखा. कृश्न चंदर और ख़्वाजा अहमद अब्बास के बेश्तर लेखन में जहां वैचारिक आग्रह साफ दिखाई देता है, तो वहीं बेदी किसी भी तरह के मंसूबाबंद लेखन के सख़्त ख़िलाफ़ थे. इस बारे में उनका साफ़ कहना था, ‘‘आख़िर क्या किसी का दिमाग़ ये सोच कर बैठता है कि बस इसी ढांचे पर छांट-छांट कर बात लिखेगा. वही लिखेगा जो उनके उसूलों पर फिट बैठता है. नहीं जी. हर आदमी का अपना एक फ़लसफ़ा होता है और दुनिया के सारे हादिसात वो क़बूल करता है और उसकी तहरीर में वो उसके ज़ेहन की छलनी से छनकर आता है. ख़्याल कोई चीज़ नहीं, वो एक पैटर्नलेस बहाव है. पुरअस्रार ही है. ये जो मार्क्सवादी समाज के सोशलिस्ट पैटर्न की बात करते हैं, उसमें अगर मुझे कोई चीज़ नापसंद है, तो वो है रेजिमेंटेशन.’’

अलबत्ता एक अदीब से वे इस बात की ज़रूर उम्मीद करते थे, ‘‘अदीब फ़िलॉस्फ़र होता है. अगर वो समझता है कि उसके चारों तरफ़ जो रवायतें या अक़ीदे हैं, उनकी बुनियाद ग़लत है, तो ज़रूरत है कि उनके ख़िलाफ़ लिखा जाए. किसी बिलीफ को तोड़ा जाए, चोट की जाए और नए मौजूआत सामने लाए जाएं. इसी में अदब की कामयाबी है.’’ 

उर्दू-हिंदी पाठकों के दुलारे, बेहतरीन अफ़साना निगार, फ़िल्म संवाद राइटर राजिंदर सिंह बेदी ने 11 नवम्बर, 1984 को हमसे अपनी आख़िरी रुख़सती ली।

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