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ज्ञानवापी मस्जिद के ख़िलाफ़ दाख़िल सभी याचिकाएं एक दूसरे की कॉपी-पेस्ट!

जब न्यूज़क्लिक ने पिछले एक साल में दायर की गयी इन नयी याचिकाओं में से आठ को खंगाला, तो यह पता चला कि वे एक ही तरह की अभिप्राय और विभिन्न देवताओं के नाम पर एक ही तरह की राहत की मांग करती याचिकायें हैं।
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फ़ोटो: साभार: द हिंदू

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)/नई दिल्ली: इस रिपोर्टर ने पूछा- "अब तक कितनी याचिकायें दायर की गयी हैं ?" वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद का प्रबंधन करने वाले संगठन-अंजुमन इंतेज़ामिया मस्जिद के वकीलों में से एक वकील और परेशान दिखते रईस अहमद अंसारी ने जवाब दिया, "हमने अब गिनती करना बंद कर दिया है।"

इस मस्जिद के परिसर के भीतर और इसके आसपास भगवान आदि विश्वेश्वर, देवी श्रृंगार गौरी, भगवान गणेश, नंदी (भगवान शिव का वाहन बैल) और अदृश्य देवी-देवताओं की पूजा करने की अनुमति की मांग करती एक नयी याचिका की प्रति मिलने के बाद अंसारी वाराणसी ज़िला एवं सत्र न्यायालय परिसर में स्थित अपनी सीट पर अभी-अभी लौटे ही थे।

ज़िला एवं सत्र न्यायालय, वाराणसी

विश्व हिंदू महा समिति (वाराणसी स्थित दक्षिणपंथी संगठन) की ओर से 31 मई को दायर हालिया मुकदमे के साथ ही इन मुकदमों की कुल संख्या बढ़कर 17 हो गयी है। इन सभी आवेदनों में अदालत से आम तौर पर यही विनती की गयी है कि इस मस्जिद को हिंदुओं को इसलिए सौंप दिया जाये, क्योंकि अदालत के कमिश्नरों के सर्वेक्षण के दौरान मस्जिद परिसर में कथित तौर पर "शिवलिंग" पाया गया है और मुसलमानों को इस विवादित क्षेत्र में प्रवेश करने से रोक दिया जाये। इन सभी याचिकाओं में यही दावा किया गया है कि मस्जिद को एक प्राचीन शिव मंदिर की जगह पर बनाया गया है।

ज़िले की सिविल कोर्ट से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक सभी अदालतें इसी विवाद से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही हैं। वाराणसी की निचली अदालतों की ओर से विचार किये जा रहे 12 मामलों में से आठ मामले सिविल जज (सीनियर डिवीज़न) महेंद्र पांडे के सामने लंबित हैं और गुण-दोष के आधार पर मामले को आगे बढ़ाने से पहले सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII, नियम 11 के तहत दायर मुकदमे की स्वीकार्यता पर फ़ैसले लेने के एक मामले की सुनवाई ज़िला न्यायाधीश डॉ अजय कुमार विश्वेश की ओर से की जा रही है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले फ़ैसला करने का निर्देश दिया है।   

इसके अलावा, एक फ़ास्ट-ट्रैक अदालत को मस्जिद परिसर को उन हिंदुओं को सौंपे जाने को लेकर दायर की गयी दो नयी याचिकाओं पर सुनवाई का काम सौंपा गया है, जिन्हें कथित "शिवलिंग" में अराधना करने की भी अनुमति दी जानी चाहिए। इन मामलों को 8 जुलाई को सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया गया है। ज़िला न्यायाधीश अदालत उस समीक्षा याचिका पर भी सुनवाई कर रही है, जिसमें ऐसे मामलों की सुनवाई के लिहाज़ से दीवानी मामलों से जुड़े न्यायाधीश के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी गयी है। 

कम से कम चार याचिकायें हाई कोर्ट में लंबित है और एक विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

मस्जिद पैनल के एक दूसरे वकील मुमताज अहमद न्यूज़क्लिक से बात करते हुए आरोप लगाते हैं, "सीपीसी, 1908 की धारा 10 ,जो कि अदालतों को एक ही तरह के विवरण और विनती वाली याचिकाओं पर विचार करने से रोकती है,उसका उल्लंघन करते हुए सिविल जज सभी शरारती अभियोगों की अनुमति दे रहे हैं।" । 

अधिवक्ता रईस अहमद, मुमताज अहमद और उनकी टीम

ऊपर सीपीसी की जिस धारा का ज़िक़्र किया गया है,उसका मक़सद परस्पर विरोधी फ़ैसलों से बचने के लिए एक ही विषय में कई और समानांतर कार्यवाही को रोकना है। सीपीसी की धारा 151 के तहत अदालतों को क़ानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने वाली कार्यवाही पर रोक लगाने का अधिकार है।

क़ानून के जानकारों की राय है कि इन याचिकाओं को इस तरह स्वीकार किया जाना ही उस पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का उल्लंघन हैं, जो कि अदालतों को उन मुकदमों की अनुमति देने से रोकता है, क्योंकि उस स्थान के धार्मिक चरित्र पर ही सवाल उठाते हैं, जो कि 15 अगस्त, 1947 को अस्तित्व में था।

उनका आरोप है, " इन तमाम याचिकाओं के पीछे लोगों का एक ही समूह है।" वह आगे कहते हैं, "इस समूह का इरादा बहुत बड़ा और साफ़ है और वह यह है कि मस्जिद की प्रबंध समिति की नुमाइंदगी करने वाले वकीलों पर दबाव बढ़ाया जाये, ताकि वे ग़लतियां करें, वादी के पक्ष में एक सार्वजनिक चर्चा करायें, और न्यायपालिका पर आस्था को क़ानून के ऊपर रखने का दबाव डाला जाये। वह कहते हैं, "और अगर आप इन मुद्दों को लेकर उन्मादी मीडिया पर नज़र डालें,तो ये तमाम बातें साफ़-साफ़ दिख जाती हैं।"   

अदालत ने इन याचिकाकर्ताओं को "तत्काल राहत" देते हुए उनके मामले को दायर करने और वाराणसी स्थित एक फ़ास्ट-ट्रैक अदालत में स्थानांतरित करने को लेकर 60 दिनों की नोटिस अवधि से भी छूट दे दी है।

कॉपी-पेस्ट याचिकायें

जब न्यूज़क्लिक ने पिछले एक साल में दायर की गयी इन नयी याचिकाओं में से आठ याचिकाओं को खंगाला, तो पता चला कि वे एक ही तरह की अभिप्राय और विभिन्न देवताओं के नाम पर एक ही तरह की राहत की मांग करती याचिकायें हैं। ये तमाम याचिकाकर्ता मुग़ल-युग की इस मस्जिद (जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने उस शिव मंदिर के विध्वंस के बाद बनवाया था, जो कभी 1669 में इसी जगह खड़ा था) को गिराने की मांग कर रहे हैं । ये तमाम याचिकायें हिंदुओं के लिए इस भू-खंड को फिर से हासिल करने की बात कर रही हैं।

ये दिवानी मुकदमें हैं- 245/2021 (लखनऊ स्थित सत्यम त्रिपाठी और आशीष कुमार शुक्ला और वाराणसी स्थित पवन कुमार पाठक बनाम भारत संघ और अन्य), 350/2021 (देवी मां श्रृंगार गौरी की ओर से मुकदमा लड़ने वाली और भक्त रंजना अग्निहोत्री और अस्थान भगवान आदि विशेश्वर की ओर से मुकदमा लड़ने वाले और भक्त जितेंद्र सिंह 'विषेण' और अन्य बनाम अपने सचिव और अन्य के ज़रिये भारत संघ), 358/2021 (भगवान आदि विशेश्वर की भक्त, मां गंगा बनाम भारत संघ और अन्य), 693/ 2021 (राखी सिंह और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य), 761/2021 (साध्वी पूर्णंबा और अन्य बनाम कलेक्टर और अन्य के ज़रिये यूपी स्टेट), 839/2021 (भगवान श्री आदि विशेश्वर ज्योतिर्लिंग और अन्य बनाम अध्यक्ष एवं अन्य के ज़रिये यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड), 840/2021 (श्री नंदीजी महाराज और अन्य बनाम यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अन्य), 712/2022 (काशी में प्रकट स्वयंभू काशी भगवान आदि विश्वेश्वर विराजमान बनाम यूपी राज्य), अनुच्छेद 227 के तहत मामले, 2021 का संख्या 3562 (यूपी सुन्नी सेन त्राल वक्फ़ बोर्ड बनाम स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर की प्राचीन मूर्ति) और एसपीएल (सी) 9388/2022 (प्रबंधन समिति, अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद वाराणसी बनाम राखी सिंह और अन्य)।

ऐतिहासिक घटनाओं के ब्योरे, पूजा स्थल अधिनियम की वैधता, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 (1) और अनुच्छेद 25 पर प्रस्तुतिकरण, अगर वक़्फ़ कभी मस्जिद के लिए बनाया गया था,तो उस पर काम करने वाली ये धारायें और दीवानी याचिकायें इन वादियों का हवाला देते हैं (1937 दीन मोहम्मद केस), तो अन्य के अलावा हर एक याचिका में ये बातें समान हैं।

यहां तक कि इन तामम याचिकाओं में श्री स्कंद पुराण, शिव महापुराण और उपनिषद जैसे पवित्र ग्रंथों के उद्धरण के संदर्भ भी समान ही हैं। कुछ याचिकाओं में प्रार्थनाओं को बस अलग तरह से लिखा गया है।

अंसारी बताते हैं, “ऐसा हमें परेशान करने के लिए किया जा रहा है। वे किसी भी मौक़े की तलाश में हैं। अगर हम किसी भी मामले में कोई भी ग़लती करते हैं, तो वे इसका फ़ायदा उठायेंगे। और यही उनका इरादा है।”  

'सोची-समझी क़ानूनी रणनीति'

नाम नहीं छापे जाने की सख़्त शर्त पर इसे एक "सोची-समझी क़ानूनी रणनीति" का हिस्सा बताते हुए विभिन्न याचिकाकर्ताओं को पेश करने वाले दो वकीलों ने न्यूज़क्लिक से कहा, " इतना ही नहीं, इस तरह की और भी याचिकायें दायर की जानी अभी बाक़ी हैं।"

माथे पर चंदन के लेप की मोटी धारियों के बीच लाल रंग की बिंदी लगाये उनमें से एक वकील ने अपने चेहरे पर मुस्कान लिए कहा, "विचार तो एक न्यायिक फ़ैसला पाने का है; वे अदालत में कितनी याचिकाओं को नाकाम कर पायेंगे ? यह एक सुस्थापित क़ानून है कि विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से कई याचिकायें दायर की जा सकती हैं।"

ज़िला एवं सत्र न्यायालय के बरामदे के पास स्थित एक टिन की शेड के नीचे बैठे अहमद ने कहा कि "बहुत ही सीमित संसाधनों" वाले पांच वकीलों की एक छोटी सी टीम “पूरी ताक़त" के साथ इन मुकदमों का विरोध कर रही है।

“विभिन्न याचिकाकर्ताओं की नुमाइंदगी करने वाले वरिष्ठ वकीलों के समूहों के ख़िलाफ़ हम कुछ मुट्ठी भर लोग हैं, जो अपना जी जान लगाये हुए हैं। हमें भरोसा है कि एक दिन सच्चाई की जीत ज़रूर होगी।"

किसी का नाम लिए बिना उन्होंने कहा, "ये याचिकाओं को तैयार किये जाने के पीछे का असली मक़सद हम पर ज़्यादा बोझ डालना हैं।"

"यह हैरत की बात है कि अदालत भी उन्हें इस तथ्य के बावजूद इजाज़त दे रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर अपने फ़ैसले में बार-बार दोहराया था कि 'सार्वजनिक पूजा स्थलों के चरित्र को संरक्षित किये जाने को लेकर संसद ने बिना किसी ढुलमुल शब्दों के यह अनिवार्य कर दिया है कि इतिहास और उसकी ग़लतियों को वर्तमान और भविष्य को दबाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जायेगा’।”  

तमाम याचिकाओं के पीछे एक ही समूह ?

ऐसा लगता है कि लोगों के उसी समूह की ओर से इन मामलों को सुव्यवस्थित तरीक़े से मिल-जुलकर तैयार किया जाता है, जिन्होंने वरिष्ठ वकीलों के एक नेटवर्क को काम पर लगा रखा है।  

विश्व हिंदू परिषद (VHP) के पूर्व उपाध्यक्ष सोहन लाल आर्य का दावा है कि उन्होंने ही उन पांच हिंदू महिलाओं को तैयार किया था, जिन्होंने "उस पुराने मंदिर परिसर में स्थित माँ श्रृंगार गौरी, भगवान हनुमान, भगवान गणेश, और अन्य दृश्य और अदृश्य देवताओं की अराधना के सिलसिले में एक रिट याचिका दायर की थी,जो कि ज्ञानवापी मस्जिद है।

सोहल लाल आर्य

70 साल से थोड़े ऊपर की उम्र के इस शख़्स ने कहा कि इन्होंने उन पांच हिंदू महिला वादियों को छांटने से पहले 35 महिलाओं से मुलाक़ात की थी, जिनमें उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा, "मैं चाहता था कि वादी बच्चों वाली ऐसी गृहिणियां हों, जो पारंपरिक और धार्मिक हों।" उन्होंने आगे कहा, " ये महिलायें पहले मुश्किल से बोल पाती थीं, लेकिन अब तो ये धड़ल्ले से मीडिया से बातें कर रही हैं।"

उनका कहना है, “यह मेरे उस प्रशिक्षण का ही कमाल था, जिसने उन्हें मुखर बना दिया और खुलकर बोलने का शऊर दिया। मैंने उन्हें जानकारी दी, उनके लिए वे बयान लिखे,जिन्हें उन्होंने याद कर लिए।”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की शाखाओं में पले-बढ़े सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वैचारिक संरक्षक आर्य ने 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस में भाग लेने, अयोध्या में उस मस्जिद के खंडहरों से वापस लायी गयी ईंट और ज्ञानवापी को ध्वस्त करने के सिलसिले में तीन दशक के लंबे संघर्ष में अपनी भागीदारी की बात कही।

एक दूसरा शख़्स, जो इन मामलों में शामिल है, वह हैं-गोंडा के रहने वाले जितेंद्र सिंह 'बिसेन', जो विश्व वैदिक सनातन संघ नामक एक संगठन के अध्यक्ष हैं।

वह ख़ुद ही एक मामले में याचिकाकर्ता हैं, जबकि उनकी पत्नी किरण सिंह 24 मई को दायर की गयी एक अन्य याचिका की याचिकाकर्ता हैं। यह वाराणसी फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के सामने लंबित है। उनकी भतीजी राखी सिंह उस मामले में याचिकाकर्ता हैं, जिसमें एडवोकेट कमिश्नर के सर्वे का आदेश दिया गया था।

इसके अलावा, उनका कहना है कि उनके सहयोगी बाक़ी मामलों में भी शामिल हैं। उनका यह भी कहना है कि उनके पास मामले दर्ज करने वाले दूसरे याचिकाकर्ता भी हैं।

इस विवाद में कई मुकदमों को आगे बढ़ाने वाले वकीलों में आर्य और बिसेन के अलावा हरि शंकर जैन और उनके बेटे विष्णु जैन भी शामिल हैं। ये दोनों पिता-पुत्र कई हिंदुत्व संगठनों से जुड़े हुए हैं। हालांकि, अदालत के कमिश्नरों की ओर से किये गये सर्वेक्षण के वीडियो क्लिप मीडिया में लीक हो जाने के बाद इन याचिकाकर्ताओं ने उन्हें बतौर अपने वकील हटा दिया है,यह क़दम तब उठाया गया,जब पांच में से चार महिला याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने एक हलफ़नामा दिया था कि वे इसे प्रेस के सामने उजागर नहीं करेंगी।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Copy-Paste Pleas Coordinated by Right-wing Lawyers: Analysis of Petitions Seeking Gyanvapi Mosque Demolition

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