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ख़बरों के आगे-पीछे : अब प्रधानमंत्री को भी सहानुभूति चाहिए

अमित शाह ने कुछ समय पहले कहा था कि दुनिया में कोई भी बड़ा फैसला मोदी की सहमति के बगैर नहीं होता है। फिर कौन ऐसा बड़ा आदमी दुनिया में हो गया, जो मोदी के खिलाफ साजिश कर रहा है और वे जनता के बीच इसका जिक्र करके सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं?
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Image Courtesy : Hindustan

इस समय दो प्रमुख विपक्षी नेता - झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जेल मे बंद हैं। हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन और अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल दोनों ही लोगों के बीच जाकर सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रही हैं। दोनों का राजनीतिक मकसद यह बताना है कि उनके पति को ऐन चुनाव से पहले गिरफ्तार करके जेल मे डाल दिया गया ताकि वे चुनाव प्रचार नहीं कर सके। यानी दोनों अपने पति की गिरफ्तारी के नाम उनकी पार्टी के लिए सहानुभूति अर्जित करना चाहती है जो कि स्वाभाविक भी है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सहानुभूति चाहिए। वे भी अपने को साजिश का शिकार बता रहे हैं। एक तरफ देश की तमाम विपक्षी पार्टियां मोदी और उनकी सरकार पर आरोप लगा रही है कि केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करके साजिश के तहत उन्हें फंसाया जा रहा है और चुनाव प्रचार से दूर किया जा रहा है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी भी कह रहे हैं कि उनके खिलाफ साजिश हो रही है। वे चुनाव प्रचार के दौरान कह रहे हैं कि उनके खिलाफ देश की घरेलू और बाहरी ताकतों ने हाथ मिला लिया है, दुनिया के बड़े लोग उनके खिलाफ साजिश में शामिल हैं। इसी के साथ वे यह भी कह रहे हैं कि मोदी डरेगा नहीं। सवाल है कि देश के सर्व शक्तिमान प्रधानमंत्री को कौन डरा रहा है? वे तो खुद अपने को विश्व मित्र बताते हैं। उनके समर्थक भारत को विश्वगुरू बता रहे हैं। भाजपा के प्रचार वीडियो में बताया जा रहा है कि मोदीजी यद्ध रुकवा देते हैं। अमित शाह ने कुछ समय पहले कहा था कि दुनिया में कोई भी बड़ा फैसला मोदी की सहमति के बगैर नहीं होता है। फिर कौन ऐसा बड़ा आदमी दुनिया में हो गया, जो मोदी के खिलाफ साजिश कर रहा है और वे जनता के बीच इसका जिक्र करके सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं?

निर्वाचन आयोग के लिए सबक है ठाकरे चुनौती

शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट ने निर्वाचन आयोग की नाफरमानी करने का खुलेआम एलान किया है। आयोग ने चुनाव के लिए पार्टी के थीम सॉन्ग से दो शब्दों- भवानी और हिंदू को हटाने का निर्देश दिया था। आयोग के मुताबिक थीम सॉन्ग में इन शब्दों के होने का मतलब है कि शिवसेना धर्म के नाम पर वोट मांग रही है, जो आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है। मगर उद्धव ठाकरे ने सपाट अंदाज में कहा है कि शिवसेना ऐसा नहीं करेगी। ठाकरे ने आयोग को चुनौती देते हुए कहा है कि आयोग पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर करे, जो लगातार धार्मिक भावनाओं को भड़काने और नफरत फैलाने वाले भाषण दे रहे हैं। इस सिलसिले में ठाकरे ने दोनों भाजपा नेताओं के ऐसे भाषणों के कुछ वीडियो भी मीडिया को दिखाए है। इस तरह उद्धव ठाकरे ने निर्वाचन आयोग को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है। उन्हें ऐसा करने का अवसर इसलिए मिला है, क्योंकि आयोग के रुख पर पहले से सवाल है और यह धारणा बन गई है कि आयोग को आचार संहिता की याद सिर्फ विपक्षी नेताओं के मामले में ही आती है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक बयान को तो-मरोड़ कर जिस तरह मुस्लिम समुदाय को निशाना साधने वाला भाषण दिया है, उससे एक बार फिर से निर्वाचन आयोग के लिए असहज स्थिति पैदा हो गई है। निर्वाचन आयोग अगर आचार संहिता के पालन के मामले में सबके प्रति समान नजरिया नहीं अपनाएगा तो कुछ पार्टियों को उसे चुनौती देने का मौका मिलेगा, जिससे सारी चुनाव प्रक्रिया दूषित हो सकती है।

ईडी और केजरीवाल की तमाशेबाजी

देश मे लोकसभा के चुनाव के चलते प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच एक अलग ही ड्रामा चल रहा है। केजरीवाल ने कितनी बार खाना खाया, आम और मिठाई खाई या नहीं, इसको लेकर बहस चल रही है। ईडी ने दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट को बताया कि केजरीवाल जेल में आलू की सब्जी, पूड़ी, मिठाई और आम इसलिए खा रहे हैं ताकि उनकी शुगर बढ़ जाए और उनको जमानत मिल जाए। कैसी हास्यास्पद और बेसिरपैर की बात है? ईडी ने जेट एयरवेज के मालिक रहे नरेश गोयल को गिरफ्तार किया है। उन्हें कैंसर है और उनकी हालत बहुत खराब है। लेकिन ईडी ने ऐड़ी चोटी का जोर लगा कर नरेश गोयल को जमानत नहीं मिलने दी। सोचने वाली बात है कि गंभीर रूप से बीमार कैंसर मरीज को ईडी के विरोध की वजह से जमानत नहीं मिल पा रही है। लेकिन उसी ईडी का कहना है कि केजरीवाल की शुगर बढ़ जाएगी तो उन्हें जमानत मिल जाएगी। ईडी के अधिकारी इस तरह की बेहूदा दलीलों से अपनी ही बची-खुची साख चौपट कर रहे हैं। सबको पता है कि भारत को दुनिया का डायबिटीज कैपिटल राजधानी कहा जाता है। यहां सात करोड़ से ज्यादा लोगों को डायबिटीज है। अगर शुगर बढ़ने के आधार पर जमानत मिलने लगे तो पूरी जेल ही खाली हो जाए। इस मामले का दूसरा पहलू यह है कि यह केजरीवाल का प्रचार पाने का तरीका है। उन्हें लग रहा है कि अगर मीडिया में किसी तरह से उनकी खबरें नहीं आती रहीं तो लोकसभा चुनाव के शोर में लोग भूल जाएंगे कि वे जेल में बंद हैं।

भाजपा से अलग राह पर अजित पवार

महाराष्ट्र में असली एनसीपी के नेता अजित पवार भाजपा की अगुवाई वाले गठबंधन में होते हुए भी भाजपा की लाइन से हट कर अपने हिसाब से राजनीति कर रहे हैं। कुछ समय पहले उन्होंने मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी। हालांकि अपनी पार्टी के घोषणापत्र में उन्होंने यह मुद्दा शामिल नहीं किया है। लेकिन बड़ा सवाल है कि उन्होंने अपना अलग घोषणापत्र क्यों जारी किया? भाजपा की ओर से सभी सहयोगी पार्टियों को कहा गया था कि सारी पार्टियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और काम पर लड़ रही हैं तो फिर ऐसे में सबको अलग-अलग घोषणापत्र जारी करने की जरूरत नहीं है। लेकिन अजित पवार ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया। इतना ही नहीं घोषणापत्र में उन्होंने जाति आधारित जनगणना कराने का वादा कर दिया है, जबकि भाजपा कहीं भी इसका वादा नहीं कर रही है। वह न तो इसका विरोध कर रही है और न समर्थन कर रही है। बिहार में मजबूरी थी तो उसने समर्थन कर दिया। लेकिन बाकी जगह उसने चुप्पी साध रखी है। अजित पवार की घोषणा के बाद महाराष्ट्र में उसके नेताओं को इस पर जवाब देना पड़ सकता है। अजित पवार ने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री यशवंत राव चव्हाण को भारत रत्न देने का वादा किया है। यशवंतराव चव्हाण ही शरद पवार के राजनीतिक गुरू थे। उनके प्रति आज भी मराठा लोगों में गर्व की भावना है। सो, उन्हें भारत रत्न देने का वादा करके अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार को भी मात देने का एक दांव चला है।

मस्क का नहीं आना भी बड़ा मुद्दा बना

इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली कंपनी टेस्ला, ट्विटर और स्पेसएक्स के मालिक एलन मस्क का भारत आना एक मुद्दा बना था। कहा जा रहा था कि वे चुनाव के बीच भारत आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलते हैं और 25 हजार करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा करते है तो उससे चुनाव प्रभावित होगा। भारत में टेस्ला का कारखाना लगाने की घोषणा होती तो भाजपा को इसका फायदा मिलता। लेकिन अब मस्क के भारत आने का कार्यक्रम टल गया है। उन्होंने खुद ही इसकी जानकारी दी और कहा कि वे इस साल के अंत में भारत का दौरा करेंगे। जब से उनके नहीं आने की खबर आई है तब से इसका अलग राजनीतिक मुद्दा बन गया है। कांग्रेस को इससे मौका मिला है और उसने प्रचार शुरू कर दिया है कि मस्क इसलिए नहीं आए क्योंकि भाजपा चुनाव हार रही है और ऐसे में वे प्रधानमंत्री से मिल कर क्या करेंगे? कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि मस्क जल्दी ही भारत आएंगे और 'इंडिया’ ब्लॉक के प्रधानमंत्री से मिलेंगे। गौरतलब है कि मस्क अमेरिका में दक्षिणपंथी राजनीति के समर्थक हैं। वे डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी का खुला समर्थन करते हैं। मोदी सरकार ने उन्हें टैक्स आदि में पर्याप्त राहत दे ही दी है। इसलिए मस्क के भारत नहीं आने में कोई वैचारिक या कारोबारी कारण नहीं है। परंतु प्रतीकात्मक रूप से इसका इस्तेमाल भाजपा के खिलाफ होने लगा है।

बसपा ने माना कि वह डरी हुई है!

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती के राजनीतिक उत्तराधिकारी आकाश आनंद ने बड़ी ईमानदारी से स्वीकार किया है कि उनकी पार्टी भाजपा पर ज्यादा हमला इसलिए नहीं कर रही है, क्योकि उसे ईडी और सीबीआई का डर है। आमतौर पर इतनी ईमानदारी से यह बात कोई स्वीकार नहीं करता है। लेकिन आकाश आनंद ने अंग्रेजी के एक अखबार को दिए इंटरव्यू में खुल कर यह बात कही। उन्होंने कहा कि दूसरी पार्टियों के पास पैसे हैं, साधन हैं लेकिन बसपा के पास सिर्फ अपने समर्थक हैं। आकाश आनंद ने चुनाव लड़ने की रणनीति भी बताई और यह भी कहा कि जहां जैसी जरुरत होगी उसके हिसाब से पार्टियों को निशाना बनाया जाएगा। गौरतलब है कि मायावती का ज्यादा हमला कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर है लेकिन पिछले कुछ दिनों से उन्होंने भाजपा को भी निशाना बनाना शुरू किया है। आकाश आनंद ने माना कि भाजपा पर हमला सीमित होगा और रणनीतिक होगा। माना जा रहा है कि जहां बसपा का मुस्लिम उम्मीदवार लड़ रहा है वहां मायावती भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाएंगी। इससे मुस्लिम वोट सपा और कांग्रेस गठबंधन से टूटेगा। इसलिए भाजपा के नेता इस बात का बुरा नहीं मानेंगे कि मायावती उनकी पार्टी और नेता पर हमला कर रही हैं। गौरतलब है कि मायावती ने बहुत देर से चुनाव प्रचार शुरू किया और जिस तरह से विधानसभा चुनाव में वे निष्क्रिय रहीं, उसी तरह लोकसभा चुनाव में भी दिख रही हैं।

चुनाव का समय बदलना चाहिए

लोकसभा चुनाव के लिए दो चरणों का मतदान हो चुका है। पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों को छोड़ दें तो उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत में मतदान का आंकड़ा बहुत उम्मीद जगाने वाला नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में 49 से लेकर 61 फीसदी मतदान हुआ है, जो 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में बहुत कम है। इसका एक कारण भीषण गरमी है। देश के 11 राज्यों में करीब 45 शहरों में तापमान 43 डिग्री से ऊपर पहुंच गया है। अप्रैल के अंत में ही देश के कई हिस्सों में भारी गरमी पड़ने के साथ लू के थपेडें चल रहे हैं। बिहार और देश के कई हिस्सों में गरमी, शादियों और खेती व कारोबार से जुड़ी गतिविधियों की वजह से मतदान प्रतिशत में गिरावट आई है। इसलिए चुनाव आयोग को इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए। गौरतलब है कि पहले 1991 में लोकसभा असमय भंग होने की वजह से चुनाव का चक्र टूटा था और नवंबर की बजाय मई-जून में चुनाव हुए थे। उसके बाद फिर सर्दियों में चुनाव होने लगे थे। लेकिन 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने समय से पहले चुनाव का फैसला किया तो फिर चक्र टूटा। अगर चुनाव आयोग सचमुच चाहता है कि मतदान का प्रतिशत बढ़े और लोकतंत्र के उत्सव में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो तो उसे कुछ ऐसा प्रयास करना चाहिए कि चुनाव अक्टूबर से मार्च के बीच हो।

लद्दाख में भाजपा के खिलाफ असंतोष का बवंडर

लद्दाख में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और उसके बाद उनकी सक्रियता ने इस केंद्र शासित प्रदेश के लोगों को भाजपा के खिलाफ खड़ा कर दिया है। उधर पार्टी ने अपने मौजूदा सांसद जामयांग शेरिंग नामग्याल का टिकट काट कर उनकी जगह ताशी ग्यालसन को टिकट दिया है। इसका बड़ा विरोध हो रहा है। नामग्याल की टिकट कटने पर भाजपा की प्रदेश इकाई में बगावत हो गई है। बड़ी संख्या में पार्टी के नेता भाजपा छोड़ने की चेतावनी दे रहे हैं। भाजपा के सामने यह दूसरा संकट है। दिलचस्प बात यह है कि लद्दाख के लोगों के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी लोग पूछ रहे हैं कि नामग्याल का टिकट क्यों कटा? यह इसलिए पूछा जा रहा है क्योंकि कुछ समय पहले नामग्याल और उनकी पत्नी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें दोनों देश के सबसे तेज चैनल के उच्च पदस्थ पत्रकार से बातचीत कर रहे थे। इस बातचीत में नामग्याल की पत्नी सोनम वांग्मो ने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार का बचाव किया था। वे जेएनयू में पढ़ी हैं और जिस समय कथित भारत विरोधी नारेबाजी हुई थी, वे वहां मौजूद थीं। उन्होंने कहा कि कन्हैया ने कोई भारत विरोधी नारा नहीं लगाया था। उन्होंने यह भी कहा कि कन्हैया के साथ ज्यादती हुई है। माना जा रहा है कि उनके इस इंटरव्यू ने उनके पति का टिकट कटवा दिया। इसके अलावा कोई कारण नहीं है, क्योंकि नामग्याल ने कुछ समय पहले ही संसद में जो भाषण दिया था, उसके लिए खुद प्रधानमंत्री ने उनकी तारीफ की थी।


 

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