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दहाड़: जाति, धर्म और घोर लैंगिक भेदभाव से बने समाज का हश्र

वेबसीरीज सामाजिक सरोकारों पर बात करते हुए लैंगिक और जातीय भेदभाव के व्यवहार को मौन होकर  बहुत रोचकता से चिह्नित कर रही है।
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"शिक्षा शेरनी का वो दूध है जिसे जो पियेगा वो दहाड़ेगा”

यह कथन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का है जिसमें वो समाज में शिक्षा के महत्व को बता रहे हैं। वे इस सत्य को भलीभाँति समझ गये थे कि हाशिये के वर्गों का शिक्षित होना उनके हक-अधिकार की लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। जो समाज भेदभाव, छुआछूत, उच्चजातीयता बोध पर गर्व करता हो, अपने धर्म व अपनी संस्कृति को ही श्रेष्ठ समझता हो, उसकी परिणीति ऐसे ही एक उन्माद में डूबे समाज में हो जाती है। 

अमेजन प्राइम पर अभी दहाड़ वेबसीरीज देखी तो लगा कि एक ओर तो इसी देश में ऐसी फिल्में बन रही हैं और खूब भर-भर के प्रमोट की जा रहीं जिनसे समाज में नफरत और हिंसा फैल रही है, हाल ये है कि युवा सिनेमा हॉल से निकलकर एक अल्पसंख्यक समुदाय के लिए नफ़रत से भरी हुई बातें कर रहे हैं। वहीं दहाड़ जैसी फिल्में/सीरीज भी बन रही हैं जो समाज में सदियों की रोपी गयी बुराई को चिह्नित करके हमें मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। बाबा साहब अंबेडकर के एक कथन को आधार बनाकर एक समावेशी समाज बनाने का स्वप्न रोप रही हैं। भेदभाव और छुआ-छूत, सांप्रदायिकता के जहर को चिह्नित करके उनके खतरों से समाज को आगाह कर रही हैं। ये वेबसीरीज झूठी अफवाह फैलाकर समुदायों को लड़वाते भ्रष्ट नेताओं की धूर्तता को बताती है। जातिघृणा में डूबे समाज को एक आईना देती है कि देखो इसमें अपनी कुरूप तस्वीर। 

दहाड़ एक थ्रिलर के साथ सामाजिक मुद्दों को बहुत रोचक ढंग से रेखांकित करती एक अर्थपूर्ण वेबसीरीज है। समाज में जाति व्यवस्था को लेकर अपमान का जो सामाजिक व्यवहार सदियों से चला आ रहा है उसका निकृष्टतम और और क्रूर रूप वेबसीरीज के दृश्यों में बहुत जीवंतता से दिखाया गया है। बहन की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने आये दलित के कदम पड़ने से अपवित्र थाने में  अगरबत्तियां जलाते सिपाही को देखकर लगता है कि क्या समाज अब भी सदियों पीछे खड़ा है। ऐसे तमाम दृश्य जाति व्यवस्था में आकंठ डूबे समाज का ठीक-ठीक यथार्थ दिखाते हैं। दलित युवक ने देखा कि ऊँची जात की एक लड़की के लिये इतना बवाल हो रहा है छोटी जात की गरीब लड़की के लापता होने की कहीं सुनवाई नहीं हो रही है उसे लगा कि अगर कहूंगा कि कोई मुसलमान भगा ले गया मेरी बहन को तो कार्रवाई होगी और हुआ भी वही।

वेबसीरीज जहाँ से शुरू होती है वो समूचा दृश्य ही आज के उन्माद में डूबे भारतीय समाज की मानसिकता का दृश्य है। प्रेम को लेकर जिस तरह हमारा समाज हिंसक है उसकी बानगी भर है वो दृश्य।  और अगर प्रेम अंतरजातीय हो तो समाज की हिंसा कई गुना बढ़ जाती है और अगर गलती से मुस्लिम समुदाय से लड़का आता हो तो समाज की क्रूरता अपने चरम पर होती है।  फ़िल्म के दृश्य में एक मुस्लिम लड़के को एक तथाकथित समाजिक संगठन के गुंडे कार्यकर्ता ट्रेन की पटरी से बांध देते हैं किसी तरह पुलिस इंस्पेक्टर अंजलि उसे वहाँ से निकालती है। एक अल्पसंख्यक समुदाय के लिए जो घृणा की राजनीति का आज चलन है ये हिंसा क्रूरता का दृश्य उसी की एक बानगी भर है।

वेबसीरीज के शुरुआती दृश्यों में कुछ दृश्य भीड़तंत्र और उसकी हिंसा-क्रूरता को बहुत सटीक ढंग से दिखाते हैं जैसे प्रेमी जोड़े घर से भाग जाते हैं और उन्होंने बाकायदा कोर्ट से विवाह भी कर लिया है लेकिन लड़के के खिलाफ थाने में किडनैपिंग ,बलात्कार, हत्या आदि की कितनी धारायें लगाने की बात की जा रही है। वे पुलिस से पहले ही सुरक्षा की माँग करते हैं।  प्रेमी जोड़े को एक तथाकथित समाजिक दल कहीं से पकड़ कर लाता है लड़की को धमकाकर लड़के पर कई संगीन आरोप लगाए गए हैं। 

वेबसीरीज सामाजिक सरोकारों पर बात करते हुए लैंगिक और जातीय भेदभाव के व्यवहार को मौन होकर  बहुत रोचकता से चिह्नित कर रही है जैसे थाने के  सिपाही का ऑफिस दलित वर्ग के मनुष्य के कदम पड़ने से अशुद्ध हो जाता है और अगरबत्ती जलाकर तुरंत अपना ऑफिस शुद्ध करता है। राजस्थान का सामन्ती परिवेश एक दलित महिला इंस्पेक्टर को देख-देख लगातार कुढ़ता रहता है और उसपर लगातार व्यंग करता रहता है। कथानक के लिहाज से वेबसीरीज एक तिहाई के बाद गहरे थ्रिलर में चली जाती है लेकिन साफ दिखता है फ़िल्म महज थ्रिलर के लिए नहीं बनायी गयी है राजनीतिक व समाजिक मुद्दे हमेशा वेबसीरीज में बने रहते हैं और उसपर बहुत तार्किकता से बात भी करती है। एक समाज में जाति और लिंग के आधार पर किए जाने वाले भेद-भाव जब हिंसक हो जाता है और ताकत की सारी व्यवस्था को अपनी तरफ देखता है तब वह कितना भयावह  कितना उन्मादी व खतरनाक हो सकता है ये बात वेबसीरीज  बेहद अर्थपूर्ण ढंग रखती है।

भारतीय समाज में लड़कियों पर शादी का बेहद दबाव होता है अपने सीनियर के एक सवाल पर अंजलि कहती है कि प्यार से ज़्यादा शादी के प्रेशर की वजह से जब घर वाले दिन-रात एहसास दिलाएं कि उम्र निकली जा रही है, शादी हो नहीं रही है, बोझ बन गई है। दहेज देने की हैसियत न हो, कोई उम्मीद दिख नहीं रही हो, ऐसे में कोई उसे स्पेशल फ़ील कराए, प्यार से बातें कर ले, आगे की ख़ूबसूरत ज़िन्दगी के सपने दिखाए, हमेशा खुश रखने की बातें करे तो भाग जाती है सर।" घोर पारम्परिक समाज की बुराइयां आगे जाकर विभत्स रूप ले लेती हैं समाज में दहेज प्रथा ऐसी ही एक बुराई है। दहेज के कारण जाने कितनी लड़कियों का जीवन यहाँ रोज बर्बाद हो रहा है लेकिन समाज की इस कुरीति को खत्म करने को कौन कहे ये लगातार बढ़ती जा रही है। वेबसीरीज में जिन लड़कियों हत्या होती है वे सभी दहेज के कारण इतनी टूट चुकी होती हैं कि हर हाल में किसी तरह अपने उस जीवन से छूटना चाहती हैं और परिस्थिति उन्हें हत्यारे तक पहुँचा देती है। शादी के सपने देखती लड़कियों की लाश शादी के जोड़े में मिलती है।

वेबसीरीज देखते हुए बार बार ये महसूस होता है कि समाज स्त्रियों के लिए कितना जटिल है नायिका अंजलि पुलिस सब-इंस्पेक्टर है लेकिन जिसतरह भारतीय मर्दवादी ढाँचे का समाज उसके साथ व्यवहार करता है उससे लगता है कि एक आम स्त्री जिसके पास कोई पावर नहीं उसे इस समाज में कितना झेलना पड़ता होगा। अंजलि का दलित होना पुलिस अफसर होना इस समाज के लिए असहनीय है। जाति से स्वर्णकार हत्यारे के पिता का घर अंजलि के कदम पड़ने से अपवित्र हो जाता है और हत्या बलात्कार करते उसके घर के लोगों से अपवित्र नहीं होता। अंजलि एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर है फिर भी सवर्णों के घरों में उसके जाने की मनाही है। यह वेबसीरीज हमारी उस व्यवस्था को बेनकाब करती है जिनमें स्त्रियों और दलितों को दोयम दर्जा हासिल है।

वेबसीरीज के एक दृश्य में अंजलि कहती है कि "कातिल को अच्छे से पता है, किस जात की छोरी की जान की कितनी कीमत है, इसलिये उसका टारगेट छोटी जात की ग़रीब लड़कियां हैं, जिनकी किसी को परवाह नहीं।" ये पीड़ा है उस समाज की जिसकी मुक्ति का स्वप्न बाबा साहब, फुले ,पेरियार ने देखा था। 

सीरीज बच्चों के सेक्स एजुकेशन को लेकर बहुत सहजता से बात करती है। स्कूल में सेक्स वीडियो देखने पर पिता जिस तरह अपने बच्चे को समझाता है कि "इस उम्र में क्यूरोसिटी होती ही है सबको बेटा, उसमें कुछ ग़लत नहीं है। ग़लत है उन्हें ग़लत जगह से जानना, ये सब जो तुम देख रहे थे, कोई लड़की कभी नहीं चाहेगी कि उसके साथ इस तरह का सुलूक हो। आगे से कुछ भी जानना समझना हो तो याद रखना, पापा हैं बात करने को।"

वेबसीरीज अलग अलग सामाजिक मुद्दों पर बहुत सजगता और सहजता से अपनी बात कहती है। नायिका पुलिस अफसर अंजलि एक मुक्त विचारों की लड़की है राजस्थान के सामन्ती समाज में पलकर भी वो पारम्परिक ढाँचे में नहीं ढली और यौन-स्वतंत्रता के अपने अधिकार को लेकर सजग है। उसके साहस की एक बानगी ये है कि गर्भनिरोधक गोली खिलाने के बहाने हत्यारा लड़कियों की हत्या करता है ये बात जब वो अपने सीनियर को बताती है तो वो बाद में पूछता है कि तुम्हें कैसे पता चली ये बात तो अंजलि कहती है दरअसल गर्भनिरोधक गोली की मुझे जरूरत पड़ी थी। एक घोर मर्दवादी समाज में एक अविवाहित लड़की का यूँ देह-सम्बन्ध की बात को झटके में बताना सीधे उस रूढ़िवादी ढाँचे से विद्रोह है।

एक गहन सामाजिक राजनैतिक चिंतन और धारा के सबसे पिछड़े वर्गों के साथ खड़ा होना, स्त्री की घुटन और उसकी मुक्ति के भी सभी आयामों को छूना, साम्प्रदायिकता और जातीयता के अंधेरे को चिह्नित करना  व्यवस्था पर सवाल उठाना, एक लोकतांत्रिक और समावेशी समाज की जरूरत को बताना साथ ही रोचकता को बनाये रखना इस वेबसीरीज "दहाड़ की सफलता है।

(लेखिका एक कवि और संस्कृतिकर्मी हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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