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ग्राउंड रिपोर्टः भूख और कुपोषण से लड़ने के लिए मुसहर समुदाय के किचन गार्डन से निकली तरक़्क़ी की राह

अपने किचन गार्डन की सब्ज़ियों से सावित्री ने हर रोज़ क़रीब डेढ़ सौ रुपये कमाए। उनके लिए यह एक बड़ी रक़म थी। सावित्री ने ‘न्यूज़क्लिक’ से कहा, "किचन गार्डन ने हमारे परिवार को समृद्धि से भर दिया। सब्ज़ियों को बेचकर हम घर में दाल, नमक, हल्दी का इंतज़ाम कर लेते हैं।''
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"जब भूख और कुपोषण के काले बादल छाने लगते हैं और गरीबी के घेरे में हमारे बच्चे अपने सपनों को सिर्फ सपने ही रहने देते हैं, तब किचन गार्डन से हमारे दिल के अंदर एक नया उत्साह जाग उठता है। यही उत्साह हमें किचन गार्डन में सब्जियों की खेती करने के लिए प्रेरित करता है। हमारे उत्साह से भरे हुए मन में उग रहे हैं टमाटर, पालक, धनिया, कद्दू, करेला, भिंडी, लौकी, सरपुतिया और नेनुआ(तोरई) के पौधे। ये सब्जियां हमारी रसोई में स्वादिष्ट खाना बनाने में मदद कर रही हैं और हमारे बच्चों की सेहत सुधारने में भी अहम भूमिका निभा रही हैं। हमारे छोटे से किचन गार्डन में छुपी हैं अनगिनत खुशियां जिससे हम भूख और कुपोषण को धीरे-धीरे हरा देंगे।"

जज्बात भरे ये शब्द हैं 40 वर्षीया मंता के, जो अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए संघर्ष कर रही हैं। मंता एक दलित  महिला हैं। उनके चार बच्चे हैं-बेटी निशा, सुंदरी और बेटे कौशल, सूरज। मंता बनारस के एक छोटे से गांव अनेई में रहती हैं। महामारी के दौर में इनके पति गुलाब बनवासी(ये मुसहर जातियां यहां बनवासी शब्‍द को टाईटल के रूप में इस्‍तेमाल करती हैं) की मौत हो गई तो उन्होंने अपनी बड़ी बेटी निशा और दामाद राजा बनवासी को साथ रखने का निर्णय लिया। यह सोचकर कि सभी मिलकर मेहनत-मजदूरी करेंगे तो उनके बच्चे भी पल जाएंगे। मंता के घर के पीछे का हिस्सा जंगली बबूल से घिरा था और वहां कूड़ा-करकट फेंका जाता था। यकीन नहीं था कि उनका घर किचन गार्डन बन सकता है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में हाशिए पर रहने वाले समुदाय के उत्थान के लिए काम करने वाले जनवादी संगठन पीपल्स विजिलेंस कमेटी फॉर ह्यूमन राइट्स (पीवीसीएचआर) के कार्यकर्ताओं ने मंता को सब्जी उगाने के लिए प्रेरित किया और मुफ्त में उन्हें बीज दिए। तब मंता ने कहा, "भैया, हमारे जमीन में किचन गार्डन तो बन जाएगा, लेकिन पैदावार किसी चीज की नहीं होगी। सारा परिश्रम बर्बाद हो जाएगा। अगल-बगल के गांव के पालतू जानवर आते-जाते हैं, तो बचेगा नहीं। हम मजदूरी का काम करने चले जाते हैं, और घर पर कोई नहीं रहता है।"

पीवीसीएचआर एक भारतीय गैर-सरकारी संगठन है जो यूपी के बनारस और उसके आसपास के जिलों में हाशिए पर रहने वाले लोगों के अधिकारों के लिए लड़ता है। इनकी मुहिम को इंटरनेशनल रिहैबिलिटेशन कॉउंसिल फॉर टॉर्चर विक्टिम्स (आईआरसीटी) ने भी समर्थन दिया है। संस्था के स्वयंसेवकों ने मंता के साथ मिलकर उनके घर को साफ-सुथरा किया और कुम्हड़ा (सीता फल), नेनुआ और करैली के बीज बो दिए। पौधों का तेजी से विकास हुआ और उनका किचन गार्डन सब्जियों से भर गया। ज्यादा सब्जियां हुईं तो वह गांव वालों को बेचने लगीं। नए रोजगार का सृजन से मंता का परिवार खुशियों से भरने लगा। मंता ने खुशी का इजहार करते हुए न्यूजक्लिक से कहा, " पिछले साल 50 किलो कुम्हड़ा, 25 किलो नेनुआ और 12 किलो करेला अपने किचन गार्डन में उगाया। यह किचन गार्डन अब हमारी आमदनी का जरिया है।"

महामारी से पहले मंता और उनके पति गुलाब वनवासी ईंट-भट्ठों पर काम करने जाते थे तो अपने बच्चों को भी साथ में ले जाते थे। रूखी-सूखी रोटियां अथवा चावल नमक ही उन्हें खाने को मिल पाता था। सार्वजनिक वितरण प्रणाली स्कीम के तहत उन्हें निर्धारित मात्रा में सिर्फ गेहूं और चावल मिलता था, जिससे स्वस्थ जीवन गुजारना संभव नहीं था। मंता कहती हैं, "शुरू में हमने किचन गार्डन में सब्जियां उगाईं और बाद में 40 फुट लंबे और 20 फुट चौड़े पटरियों पर खेती-बाड़ी शुरू की। खूब मेहनत की तो हाथ में पैसे भी आने लगे। बाद में दूसरों की जमीन किराए पर लेकर उसमें धान, गेहूं, और दालों की खेती शुरू कर दी। अब हमें ये चीजें नहीं खरीदनी पड़तीं हैं। मैंने यह सीख लिया है कि अपनी मेहनत से हम किसी भी ख्वाब को पूरा कर सकते हैं। यह बात हमें देर से समझ में आई, लेकिन अब हमें अपने आप पर गर्व होता है। किचन गार्डन ने हमारी जिंदगी बदल दी है।"

किचन गार्डन से सुनहरे भविष्य का ख्वाब देखने वाली मंता अकेली महिला नहीं हैं। बनारस के अराजीलाइन ब्लॉक के संजोई गांव की बुधना देवी ने भी अपने किचन गार्डन में अपने परिवार के लिए तरक्की का नया रास्ता ढूंढा है। उनके परिवार में पांच सदस्य हैं। पति ट्रैक्टर चलाता है और मिट्टी ढोने का काम करता है। फिर भी घर का खर्च नहीं चल पाता था। बुधना कहती हैं, ''मैंने अपने पति के साथ ईंट भट्ठों पर काम किया है। बीमार पड़ी तो घर लौट आई। आजीविका चला पाना मुश्किल था। आमदनी का कोई जरिया नहीं था। आमतौर पर हमारे घर में चावल अथवा रोटियां बनती थी, जिसे हम नमक-प्याज से खाया करते थे। हम सब्ज़ियां खाने के लिए हमेशा किसी अवसर अथवा त्योहार का इंतज़ार करते थे।''

“लेकिन जब से हमने किचन गार्डनिंग शुरू की है, हम नियमित रूप से एक दिन में दो-तीन किलो लौकी, तोरई, करेला, चिचिड़ा उगा लेते हैं। हमारे किचन गार्डन में पिछले साल 60 किलो लौकी, 30 किलो करेला और 45 किलो चिचिड़ा पैदा हुई। पहले हम इस बात से अनभिज्ञ थे कि सब्जियां कैसे उगाई जाती हैं? पीवीसीएचआर के स्वयंसेवकों ने हमारे घर के पास खाली भूखंड का उपयोग करने में मदद की। सब्जियों का बीज बोने से लेकर उसे उगाने की तकनीक समझाई। कुछ ही दिनों में हम जल निकासी के अलावा सब्जियों में खाद-पानी देने और पौधों की देखभाल करने के गुर सीख लिए। मैं एक छोटे बच्चे की मां हूं और मुझे लगता है कि हमारे किचन गार्डन की सब्जियां बहुद ज्यादा स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक हैं।"

संजोई के फूलचंद मुसहर की तबीयत अक्सर खराब रहती है। उनकी पत्नी और बेटी दूसरे की जमीन पर काम करती हैं। बेटा मिट्टी ढोने का काम करता है। फूलचंद कहते हैं, "जब से हमने होश संभाला, तब से अपने पूरे जीवन में कभी कोई बीज नहीं बोया था। हमने कभी नहीं सोचा भी नहीं था कि सब्जियों का बीज हमारे घर के आंगन में उगेगा। अब अपनी सब्जियां खुद उगाने के बाद मुझे बहुत अच्छा महसूस हो रहा है। अपने किचन गार्डन से हम अपनी सब्जियां के पैसे बचा रहे हैं। मेरे बच्चों ने मुझे बाज़ार में सब्जियां बेचने की सलाह दी, लेकिन मैंने मना कर दिया और इसके बदले उन्हें अपने पड़ोसियों को दे दिया, जिन्हें इसकी ज़रूरत थी। हमने लौकी, नेनुआ, करेला के कुछ बीज बो दिए हैं। उम्मीद है कि कुछ दिनों में हमारे घरों में सब्जियां फलने लगेंगी।"

इन्हें दलित भी मानते हैं अछूत

मुसहर शब्द का शाब्दिक अनुवाद चूहे मारने वाले और चूहे खाने वाले होते हैं, जो अधिकतर पूर्वी उत्तर प्रदेश और उनके आस-पास बिहार के जिलों में रहते हैं। दलित जातियों में मुसहर समुदाय की गिनती सबसे निचले पायदान पर होती है। दूसरे दलित भी उन्हें 'अछूत'  मानते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, यूपी में मुसहर जनसंख्या लगभग 2.5 लाख थी, हालांकि इनकी असल संख्या चार लाख से अधिक है, जो महाराजगंज, आजमगढ़, गाजीपुर, गोरखपुर, बलिया, कुशीनगर, जौनपुर, देवरिया, वाराणसी, संत कबीर नगर, मिर्ज़ापुर, अंबेडकर नगर, अमेठी, चंदौली, मऊ, प्रतापगढ़, सोनभद्र और सुल्तानपुर के 18 जिलों में फैले हुए हैं। बिहार में इनकी तादाद 30 लाख से ज्यादा है। आमतौर पर यह समुदाय ईंट-भट्ठों पर मजूरी करता है। बेरोजगारी की मार झेलने वाले इस समुदाय ने अब से पहले खेती-बाड़ी नहीं सीखी थी।

पीवीसीएचआर की मैनेजिंग ट्रस्टी श्रुति नागवंशी के प्रोत्साहन से बनारस की 46 मुसहर बस्तियों में उनके घरों के पिछवाड़े किचन गार्डन में सब्जियों के पौधे लहलहा रहे हैं। किचन गार्डन से उन्हें अच्छा वातावरण और रोजगार का एक बड़ा जरिया मिल गया है। नागवंशी बताती हैं, "स्वीडन की एक्टिविस्ट पारुल शर्मा और करीब दो सौ दानदाताओं के सहयोग से साल 2018 में हमने बनारस के कुछ गांवों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में मुसहर सरीखे समुदाय के बीच किचन गार्डन प्रोजेक्ट शुरू किया। अब तक हमने करीब तीन हजार परिवारों को कवर कर लिया है। साल 2022 में इस प्रोजेक्ट ने मुसहर समुदाय की जिंदगी में नया रंग भरा है।"

बनारस, सोनभद्र और बदायूं में पीवीसीएचआर की ओर से पिछले साल करीब 2,261 परिवारों को मौसमी सब्जियों के बीज बांटे गए। किचन गार्डन में करीब 36,536 किलो सब्जियां उगाई गईं, जिनमें से 2,523 किलो बाजार में बेचा गया। पिछली गर्मियों में किचन गार्डन की सब्जियों से मुसहर समुदाय ने करीब 26,775 रुपये कमाए थे। इन पैसों से उन्होंने अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदे और उनकी पढ़ाई पर खर्च किया था। कुछ पैसे से घरेलू सामान भी जुटाए। अनेई गांव में अब स्थायी रूप से एक बीज बैंक स्थापित किया गया है। इस गांव में मुसहर समुदाय के घरों के सामने बड़ी संख्या में फलदार वृक्ष लगाए गए हैं, जो उनके बच्चों को कुपोषण से बचाने में मददगार साबित हो रहा है। अनेई वह गांव है जहां दो दशक पहले कुपोषण के चलते कई बच्चों की मौत हो गई थी।

श्रुति कहती हैं, "मुसहर समुदाय को किचन गार्डनिंग के महत्व को समझा पाना आसान नहीं था। हम महसूस  कर रहे थे कि कई घरों में पौष्टिक भोजन की कमी और प्रदूषण के चलते लोग बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं। किचन गार्डनिंग पर हमने मुसहर समुदाय के साथ चर्चा की और बाद में उनकी रुचि व स्वाद के आधार पर उगाई जाने वाली सब्जियों की एक सूची बनाई। बाद में उन्हें सब्जियां उगाने के लिए ट्रेनिंग दी। बांस की बाड़ लगाकर सुरक्षा करने के बारे में जानकारी दी गई, ताकि जानवर, पक्षी और बच्चे सब्जियों के पौधों को नुकसान न पहुंचा सकें। किचन गार्डन की देखभाल कैसे करें? पानी, खाद और निराई की जरूरतों के बारे में भी उन्हें जानकारी दी गई। आखिर में सब्जिया पैदा करने का वक्त आ गया। जुलाई से दिसंबर तक कई तरह की सैकड़ों किलो सब्जियों का उत्पादन हुआ। कुछ सब्जियां बाज़ार में बेची गईं तो कुछ पड़ोसियों के साथ भी साझा की गईं।"

हरी सब्जियों से संवरी सेहत

बनारस के हरहुआ ब्लॉक में एक गांव है पुआरी खुर्द। इस गांव की राजभर बस्ती में गरीब तबके के करीब 137 परिवार रहते हैं, जिनमें बहुत से बच्चे कुपोषण की जद में थे। पुआरी की सावित्री देवी ने सब्जियां उगाने की ट्रेनिंग ली और अपने किचन गार्डन में उनकी बुआई की। कुछ ही दिनों में 20 किलो नेनुआ, 15 किलो कोहड़ा, 20 किलो कद्दू और 10 किलो करैला उगा लिया। सब्जियों की पैदावार अधिक होने पर उन्होंने गांव की दुकान पर बेचना शुरू किया। अपने किचन गार्डन की सब्जियों से सावित्री ने हर रोज करीब डेढ़ सौ रुपये कमाए। उनके लिए यह एक बड़ी रकम थी। सावित्री ने ‘न्यूजक्लिक’ से कहा, "किचन गार्डन ने हमारे परिवार को समृद्धि से भर दिया। सब्जियों को बेचकर हम घर में दाल, नमक, हल्दी का इंतजाम कर लेते हैं।"

बनारस की आयर मुसहर बस्ती की 45 वर्षीय निर्मला सुबह-शाम अपने किचन गार्डन में सब्जियों की देखभाल करती हैं। वह कहती हैं, "पिछले साल हमने करैला, कद्दू, कोहड़ा, सरपुतिया और सेम खूब उगाया। खुद भी खाया और पूरे गांव को खिलाया। हमें उम्मीद नहीं थी कि सरपुतिया और ननुआ के पौधे हमारी जिंदगी को खुशहाली और पौष्टिकता से भर देंगे। हम अनपढ़ जरूर हैं, लेकिन सब्जियों की खेती के गुर सीख लिए हैं।" निर्मला से बातचीत में उनकी आवाज़ में गर्व और संतुष्टि परिलक्षित होती है। उनके नज़रिए में सकारात्मक भाव झलकता है। उन्होंने ‘न्यूजक्लिक’ से कहा, " यह किचन गार्डन मेरे लिए एक खेत की तरह है। मैं जो चाहती हूं,  उगा लेती हूं और उसे बेच लेती हूं। मेरे पास अब पैसे हैं। अपने बच्चों की शिक्षा के लिए पैसों का इंतजाम कर सकती हूं। मुझे आत्मनिर्भर बनने का एहसास हुआ है।"

आयर मुसहर बस्ती की 60 वर्षीया महिला मनभावती का किचन गार्डन कोहड़े से भर गया था। वह कहती हैं, "हमारा नौ लोगों का परिवार है और हमें चार-पांच महीने तक सब्जियां नहीं खरीदनी पड़ी।" 65 वर्षीया अमरावती का 16 लोगों का परिवार चार-पांच महीने तक अपने किचन गार्डन से सब्जियों का इंतजाम करता है। 50 वर्षीया ज्ञानती देवी के परिवार में आठ लोग हैं जिनकी सेहत के लिए किचन गार्डन वरदान साबित हो रहा है। मुसहर बस्ती की रन्नो, दुर्गा, रेखा, धनेसरा कहती हैं, "सब्जी उगाने की तरकीब सीखकर हमने अपनी जिंदगी को खुशहाल बनाया है। पहले सब्जियां हमारे नसीब में नहीं थी, क्योंकि हमारे पास खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। अब दूसरे गांव के लोग हमारे घर आते हैं और सब्जियां लेकर जाते हैं।"

औरतों ने ढूंढी तरक्की की राह

बनारस शहर के करीब आठ किमी दूर है आयर मुसहर बस्ती। यहां मुसहर वनवासी समुदाय के 42 परिवार रहते हैं। इनकी आबादी 225 है और ज्यादातर लोग ईंट-भट्ठों पर काम करते हैं। बारिश के दिनों में जब ईंट-भट्ठे बंद हो जाते हैं तो इनके पास कोई काम नहीं होता। ऐसी स्थिति में किचन गार्डन ही इनकी आजीविका चलाने में मददगार साबित होता है। आयर के नजदीक के गांव पुआरी खुर्द की मुसहर बस्ती की सीमा, मीना, धर्मेंद्र, संजू, माधुरी, दुर्गा, ऊषा, अनीता, प्रेमा, लक्ष्मी, सोनी, माधुरी, चिरौजी, विमला, जीरा, सुग्गी, चांदनी समेत न जाने कितनी औरतों ने अपने घरों के पीछे किचन गार्डन बनाकर अपनी तरक्की की नई राह ढूंढ ली है। मुसहर समुदाय की मंता, निर्मला और सावित्री जैसी तमाम महिलाएं हैं, जिन्होंने अपने सामर्थ्य से घरों पर सब्जियां उगाकर अपनी नई पहचान बनाई है। साथ ही दूसरी औरतों को स्वावलंबी बनने का मंत्र भी बांटा है। किचन गार्डन में सब्जियां उगाने की पीवीसीएचआर की मुहिम के चलते बनारस का मुसहर समुदाय एक नई दिशा की ओर बढ़ रहा है। अनेई, आयर, पुआरीकला, ककरही, उसरहिया, खसेरा, बऊली आदि गांवों में दलित समुदाय की न जाने कितनी औरतों की जिंदगी को किचन गार्डन की सब्जियों ने आसान बनाया है।

एक्टिविस्ट श्रुति कहती हैं, "मुसहर समुदाय के लोगों के घरों के आस-पास काफी खाली जगहें थीं, जहां घास उगी थीं और खाली जगह को कूड़ेदान के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। इस समुदाय के लोगों को हमने खेती-बाड़ी के लिए प्रोत्साहित किया। उन्हें पहले अमरूद और आम के पौधे दिए। साथ ही कुछ लोगों को बकरियां भी बांटी। इसी के साथ उन्हें मौसमी सब्जियों के बीज भी दिए। पहली बात, वे अक्सर भूखे सोते थे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के चावल मिलना शुरू हुआ तो पेट भरने लगा, लेकिन बच्चों के कुपोषण की दिक्कत जस की तस थी। सब्जियों ने उनके बच्चों को पौष्टिकता दी, जिससे वो कुपोषण पर विजय पाने लगे। मुसहर समुदाय के लोग अब अपने किचन गार्डन की पौष्टिक सब्जियां खुद खाते है और उसे बेचकर घर का जरूरी घरेलू सामान भी खरीद लेते हैं। मुसहर समुदाय के बच्चों में स्फूर्ति का स्पंदन बढ़ा है और वो स्कूल भी जाने लगे हैं। इनके किचन गार्डन में उगने वाली सब्जियां अब ऊंची जातियों के लोग भी खरीद रहे हैं। कुछ साल पहले तक जो लोग इनके घरों पर आने-जाने में शर्म महसूस करते थे, लेकिन अब वो झिझकते नहीं हैं।"

चुनौतियां और भी हैं

पूर्वांचल में मुसहर समुदाय की बदहाली को कुछ लोग सामाजिक समस्या नहीं मानते, लेकिन नंगा सच यह है कि यह समुदाय आज भी हाशिए पर है। ज्यादातर लोगों के पास न तो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी का कार्ड है और न ही आधार कार्ड। नौकरियों में इस समुदाय के लोग नहीं के बराबर हैं। यूपी की सियासत के कई रंग बदले, लेकिन मुसहर समुदाय की जिंदगी की थकान, चिंता और आर्थिक दुर्बलता नहीं मिटी। सरकार ने इनके लिए मकान जरूर बनवा दिया है, लेकिन वो सालों से प्लास्टर चढ़ने के इंतजार में है।

मुसरहर समुदाय आज भी अपने सपनों की तलाश में जहां-तहां घूम रहा है। वो ईंट-भट्ठों और खेतों में अधीर होकर काम करते हैं, मगर समाज उन्हें जबरन दोराहे पर धकेल देता है। सत्ता ने इनके संघर्षों को अलग-अलग रंगों में रंग दिया है। इनकी बस्तियों में कभी पंजे का जलवा बिखरा तो कभी कमल का उमंग दिखा। वो उम्मीद के सागर में तैरते रहे, लेकिन उनके संघर्षों को कोई सार्थक दिशा नहीं मिली। इनकी रोज़मर्रा की जिंदगी में मुश्किलें आती हैं, लेकिन सरकारें न तो इनकी पीड़ा समझती हैं, न ही इनके संघर्षों को कोई दिशा देने का प्रयास करती हैं। वो आज भी हाशिये पर खड़े हैं और अब किचन गार्डन के जरिये एक उजियाले भविष्य की राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

बनारस के कोईरीपुर, दल्लीपुर, रमईपट्टी, औराब, सरैया, कठिरांव, असवारी, हमीरापुर, मारूडीह, नेहिया रौनाबारी, जगदीपुर, थाने रामपुर, बरजी, महिमापुर, सिसवां, परवंदापुर, सजोई, पुआरी खुर्द, मेहंदीगंज, शिवरामपुर, लक्खापुर आदि गांवों में,  मुसहर समुदाय के लोगों की  जिंदगी की अनगिनत चुनौतियों को किचन गार्डन ने आसान किया है। अव उन लोगों को भी झंझावतों से मुक्ति मिलने लगी है जो बंधुआ मज़दूरों की फेहरिस्त के हिस्से हैं अथवा जिनकी कई पीढ़ियां चूहेखोरी करते-करते मर-खप गईं।

बनारस के एक विश्वविद्यालय में सामाजिक कार्य विभाग की प्रोफेसर अर्चना कौशिक एक लेख में कहती हैं, "असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली मुसहर समुदाय की आबादी का दस फीसदी हिस्सा बंधुआ मजदूरी करने के लिए विवश है। दलित, विशेष रूप से मुसहर समुदाय के पास नियमित आय का कोई स्रोत नहीं है। वो ईंटे-भट्ठों पर काम करते हैं, उन्हें आजीविका चलाने के लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। कुपोषण के शिकार ज्यादातर बच्चे मुसहर बस्तियों के होते हैं। खाद्यान्न की कमी होने पर यह समुदाय धान के खेतों में गिरी बालियां बीनते हैं, ताकि वो अपनी भूख मिटा सकें। इनकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये भूमिहीन होते हैं। आमतौर पर ये सस्ते श्रमिक होते हैं अथवा बंधुआ मजदूर बन जाना इनकी नियति होती है। कई लोग पंजाब, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में प्रवास करते हैं, जहां उन्हें उत्पीड़न झेलना पड़ता है।"

एक्टिविस्ट डा.लेनिन कहते हैं, "मुसहर समुदाय के टोले आमतौर पर गांवों के बाहर होते हैं। सामाजिक रूप से इन्हें अछूत मानकर अपमानित किया जाता है। इनके घरों के पास न तो राशन की दुकानें होती हैं, न स्कूल और न ही अस्पताल। उत्तर प्रदेश सरकार दावा करती है कि समुदाय के कल्याण के लिए कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन मुसहरों के बच्चों के लिए आज भी नौकरियों के अवसर नहीं हैं। राजनीतिक शक्ति और समर्थन के बिना उनके अधिकार के लिए लड़ने की ताकत नहीं है।"

"पूर्वांचल में मुसहर समुदाय के लोग दूसरों के स्वामित्व वाले खेतों में काम करते हैं अथवा शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं, जहां उनके साथ उनके बच्चों को भी खतरनाक उद्योगों में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। ऐसे में किचन गार्डन योजना ने मुसहर समुदाय के लिए तरक्की का नया गलियारा खोला है। सरकार सही मायने में इस दिशा में काम करे तो उन लोगों की जिंदगी निश्चित तौर पर बदल सकती है जो आज हाशिए पर हैं।"

(लेखक बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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