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यूपी : ट्रेड यूनियनों का संयुक्त मंच सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लखनऊ में करेगा 3 दिवसीय 'महापड़ाव'

26 से लेकर 28 नवंबर तक लखनऊ के इको गार्डन में होने वाले महापड़ाव को संयुक्त किसान मोर्चा का समर्थन भी हासिल है।
Trade Union Protest
प्रतीकात्मक तस्वीर

लखनऊ: ट्रेड यूनियनों का संयुक्त मंच, जो 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और कई अन्य फेडरेशनों का एक संयुक्त मंच है, ने 26-28 नवंबर तक लखनऊ के प्रतिष्ठित इको गार्डन में महापड़ाव डालने का फैंसला लिया है, जिसके ज़रिए श्रमिकों, किसानों और लोगों को प्रभावित करने वाली सरकारी नीतियों का विरोध किया जाएगा।

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने केंद्र सरकार की "मजदूर विरोधी, किसान विरोधी, जन विरोधी और राष्ट्र विरोधी नीतियों" के खिलाफ प्रस्तावित तीन दिवसीय महापड़ाव के लिए विभिन्न जिलों और इलाकों में तैयारियों का जायजा लेने के लिए लखनऊ में एक बैठक की जिसके बाद जारी एक बयान में उक्त जानकारी दी गई।

ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच के आह्वान को संयुक्त किसान मोर्चा का समर्थन भी हासिल है, जो किसान यूनियनों का एक संयुक्त मंच है, जिसने केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया था। ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच के घटक सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीआईटीयू) ने भी आहवान का समर्थन करते हुए एक बयान जारी किया है।

मांगों में चार श्रम संहिताओं को खत्म करना, संगठित श्रमिकों के लिए 26,000 रुपये का मासिक न्यूनतम वेतन तय करना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के स्थान पर एक नई फसल बीमा और मुआवजा योजना लाना और उर्वरक जैसे कृषि इनपुट, बीज और कृषि उपकरण पर जीएसटी से छूट की मांग भी शामिल है।

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के महासचिव प्रेम नाथ राय ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि श्रम कोड श्रमिकों के हितों के खिलाफ हैं और इनका श्रम कल्याण से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार को श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन को अधिसूचित नहीं करना चाहिए और उन्हें रद्द कर देना चाहिए।

एसकेएम और सीटू ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के पार्टी के दावे को लेकर भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए शासन के दौरान किसानों की आय में कमी आई है।

"मोदी सरकार एमएसपी की कानूनी गारंटी और 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के वादे के साथ सत्ता में आई थी, लेकिन उसने किसानों को धोखा दिया है। सरकार ने कोविड-19 के दौरान भी पूंजीपतियों से हाथ मिलाकर साजिश रची थी।" संयुक्त मंच ने एक बयान में कहा कि, तीन काले कानूनों की मदद से भारतीय खेती को बड़े पूंजीपतियों को सौंप देने की कोशिश की गई थी।

संयुक्त किसान मोर्चा ने वादा पूरा न करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि, ''किसानों को उनकी जमीन से बेदखल कर बंधुआ मजदूर बनाने की रणनीति बनाई गई है। देश के किसानों ने इसके खिलाफ 13 महीने की ऐतिहासिक लंबी लड़ाई लड़ी।'' तीन कृषि कानून के खिलाफ लड़े गए आंदोलन में करीब 750 किसान शहीद हो गए थे। किसान आंदोलन के दबाव में सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए थे। लेकिन बिजली और एमएसपी को लेकर लिखित समझौता अभी तक लागू नहीं किया गया है।"

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने मंडी अधिनियम और आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करके फसल खरीद और खाद्य वितरण पर निगमों का कानूनी नियंत्रण स्थापित करने और मूल्य समर्थन और खाद्य सुरक्षा समाप्त करने की साजिश रची है।

इस बीच, संयुक्त मंच और उसके नेता राज्य भर में किसानों, मजदूरों और स्कीम वर्करों को एकजुट कर रहे हैं और उनसे 26 नवंबर को लखनऊ में बड़ी संख्या में इकट्ठा होने की अपील कर रहे हैं। साथ ही, विभिन्न जिलों में घर-घर अभियान और नुक्कड़ नाटक भी आयोजित किए जा रहे हैं। 

ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ आंगनवाड़ी वर्कर्स एंड हेल्पर्स (AIFAWH) की सचिव वीणा गुप्ता, जो महापड़ाव के दौरान स्कीम वर्करों का नेतृत्व करेंगी, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, "मौजूदा शासन के तहत स्कीम वर्करों की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। सालों से श्रमिकों का वेतन नहीं बढ़ाया गया है।" 

महापड़ाव की प्रमुख मांगों में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार सी-2 प्लस 50 प्रतिशत के फार्मूले के साथ सभी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी शामिल है। किसानों की फसलों को आवारा पशुओं से बचाया जाए। पशु बाजारों में वध के लिए मवेशियों की बिक्री पर लगी रोक हटाई जाए। चार श्रम संहिताओं और निश्चित अवधि के रोजगार कानून को वापस लिया जाना चाहिए, और सरकार को काम के दौरान समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

इसके अलावा, महापड़ाव की मांग है कि नई संशोधन योजना को रद्द कर पुरानी पेंशन योजना को बहाल किया जाए, साथ ही पेंशन सहित व्यापक सामाजिक सुरक्षा की पोर्टेबिलिटी की गारंटी दी जाए। इसके अलावा, संयुक्त मंच सभी किसानों और खेत मजदूरों के लिए 10,000 रुपये की मासिक पेंशन योजना की मांग करता है। सभी श्रेणी के असंगठित श्रमिकों का निबंधन किया जाए तथा आशा मध्याह्न भोजन, रसोइया, आंगनबाडी, सेविका एवं सहायिका सहित सभी योजना कर्मियों को नियमित किया जाए।

अन्य मांगों में बटाईदार किसानों को सभी प्रकार की सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए रजिस्ट्री कराना शामिल है। मंच की मांग है कि सरकार अग्निपथ योजना को वापस ले और रिक्त स्वीकृत सरकारी पदों को तुरंत भरे। कॉरपोरेट समर्थक पीएम फसल बीमा योजना को वापस लिया जाना चाहिए और सभी फसलों के लिए एक व्यापक सार्वजनिक क्षेत्र की फसल योजना स्थापित की जानी चाहिए। मनरेगा का विस्तार शहरों तक किया जाना चाहिए और श्रमिकों के लिए हर साल 200 दिन का काम सुनिश्चित किया जाना चाहिए, साथ ही 600 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी भी दी जानी चाहिए।

विस्तारित मांग-पत्र में काम करने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने, बिजली संशोधन विधेयक 2022 को वापस लेने, औद्योगिक त्रिपक्षीय समिति का गठन करने और वन अधिकार अधिनियम को सख्ती से लागू करने का भी जिक्र है। इसके अतिरिक्त, मंच की मांग है कि निर्माण श्रमिकों को ईएसआई और स्वास्थ्य योजना, मातृत्व लाभ, जीवन बीमा और विकलांगता बीमा का कवरेज दिया जाए। अंत में, मंच की मांग है कि जनवादी अधिकारों पर हमले बंद होने चाहिए और सरकार को विरोध जताने वालों, पत्रकारों और जन आंदोलनों को दबाने के लिए अपनी जांच एजेंसियों का दुरुपयोग बंद करना चाहिए।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल ख़बर को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

UP: Joint Platform of Trade Unions to Hold 3-Day ‘Mahapadav’ in Lucknow Against Govt Policies

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