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तिरछी नज़र: राजा जी के महल की गुल्लक बनाम चुनावी बांड

राजा जी ने चुनाव के खेल का खर्च निकालने के लिए राजमहल में एक बड़ी सी गुल्लक रखवा दी। ईमानदारी इतनी अधिक कि बाक़ी सबके के लिए भी गुल्लकें रखवा दीं, बस यह ध्यान रखा कि उन गुल्लकों का मुंह या तो हो ही न या फिर हो तो बहुत ही छोटा हो।
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कार्टून। सतीश आचार्य के X हैंडल से साभार

सरकार जी या राजा साहब, आप उनको जो चाहे वह बुलाओ, बात एक ही है। कहने को तो रजवाड़े खत्म हो चुके थे और प्रीवीपर्स भी समाप्त हो गया था पर राजाओं वाले शौक अभी भी बाकी थे। राजाओं के शौक भी निराले होते थे, और खर्चीले भी। वही महंगा खाना, महंगा पहनना और महंगी गाड़ियों में सवार होना। और सब प्रजा के सिर पर। राजा जी तो राजकोष से अपने खर्चे के लिए मात्र एक स्वर्ण मुद्रा उठाया करते थे और राजा जी के लिए बाकी का जो खर्च होता था, सारा का सारा राजकोष अपने आप करता था। और राजकोष बनता था प्रजा के द्वारा दिए गए टैक्स से। तो कह सकते हैं, राजा के इन निराले महंगे शौकों का खर्च प्रजा ही उठाती थी। पहले भी राजाओं के शौक का खर्च उनकी प्रजा ही उठाती थी, आज भी उठाती है।

सरकार जी को, मतलब राजा जी को एक और शौक था। हवाई जहाज की सवारी का। जब खुद का नहीं था तो दोस्तों के हवाई जहाज में इस शौक को पूरा कर लेते थे। और फिर अपने लिए ही खरीद लिया या खरीदवा दिया। यह तो खूब बड़ा वाला, महंगा वाला हवाई जहाज था और सवारी के शौक में राजा साहब नए नए देश भी घूम आए। ऐसे देश भी घूम आए जिनके नाम तक न राजा जी को पता थे न प्रजा को। कहानी तो यह भी है कि इससे पहले सिर्फ लंका के राजा को ही हवाई जहाज की सवारी का इतना अधिक शौक था। और कहानी यह भी है कि लंका नरेश के पास हवाई जहाज होने के कारण ही सीता माता का हरण हुआ था और राम रावण युद्ध हुआ था। न रावण के पास पुष्पक विमान होता और न सीता हरण हुआ होता। 

राजा साहब की पढ़ाई लिखाई भी अन्य राजाओं की तरह से ही हुई थी। शुरुआती कक्षाओं में तो राजा साहब अन्य बच्चों के साथ पाठशाला में ही पढ़े थे पर बाद में उनकी शिक्षा दीक्षा एकांत में, अकेले में, गुप्त रुप से, गुरुकुल में हुई थी। न कोई पाठी था न कोई सहपाठी। और तो और परीक्षा भी राजा साहब ने अकेले में ही दी थी और टॉप किया था। कहने का तात्पर्य है कि आप खुद ही समझदार हैं।

राजाओं को खेलने का भी बहुत शौक होता था। उनके खेल भी अजीबोगरीब होते थे। कहते तो यह भी हैं कि राजा जब शतरंज भी खेलते थे तो गोटियों की बजाय सचमुच के ऊंट, हाथी, घोड़े और प्यादे होते थे। और जब कोई मरता था तो सचमुच में ही मरता था। 

राजाओं के खेलों में एक खेल, शिकार का खेल हुआ करता था। अंगरेज गए तो शिकार का खेल भी बंद हो गया। मतलब जानवरों का शिकार तो बंद हो गया लेकिन आदमियों के शिकार पर कोई पाबंदी नहीं रही। बस बदनामी का डर था। वह भी देश से ज्यादा विदेश में। एक डर और था। मुकदमे बाजी का, सजा का डर भी था। लेकिन ऐसे मौकों के लिए ही तो कहावत बनी थी, 'सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का'। और राजा अगर डर कर रहे तो प्रजा न बन जाए।

लोकतंत्र आया तो राजा जी के लिए एक नया खेल लेकर आया। चुनाव का खेल। बिल्कुल शिकार के खेल जैसा ही है यह चुनाव का खेल, वोटों के शिकार का खेल। ठीक शिकार के खेल जैसा ही माहौल, ठीक शिकार के खेल जितनी ही उत्तेजना। और शिकार जीतने जैसी ही खुशी। शिकारी के लिए ऊंचा मंच सजे। उसके पास शब्दों के बाण हों। शिकार के लिए आश्वासनों का भोजन हो। और शिकार को शिकारी की जद में लाने के लिए कारिंदों की फौज हो। सबकुछ शिकार के खेल के मानिंद ही है इस चुनाव के खेल में। 

लेकिन यह जो चुनाव का खेल है न, बहुत ही खर्चीला खेल है। खेल तो शिकार का भी खर्चीला है पर चुनाव के खेल में खर्चा इतना अधिक है कि खर्चे की कोई सीमा ही नहीं है। करोड़ों की बात तो छोड़ो, अरबों, खरबों, कुछ भी कम पड़ जाता है इस चुनावी खेल में। इस खेल को खेलने निकलें तो खर्चे के मारे बड़ों बडों की टें बोल जाए। तो राजा जी ने इसकी भी तोड़ निकाल ली। राजा जी हैं तो मुमकिन है, सबकुछ मुमकिन है, कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

राजा वही सफल है जो बेईमानी भी करे तो भी प्रजा को ईमानदारी लगे। नहीं तो बड़े से बड़े राजा की गद्दी छिन जाती है। तो राजा जी ने चुनाव के खेल का खर्च निकालने के लिए राजमहल में एक बड़ी सी गुल्लक रखवा दी। ईमानदारी इतनी अधिक कि बाकी सबके के लिए भी गुल्लकें रखवा दीं बस यह ध्यान रखा कि उन गुल्लकों का मुंह या तो हो ही न या फिर हो तो बहुत ही छोटा हो। और  पारदर्शिता का भी पूरा ख्याल रखा। पारदर्शिता इतनी कि राजा जी को छोड़ कर किसी को भी पता न चले कि गुल्लक में पैसा किसने डाला, कितना डाला और क्यों डाला? मतलब राजा जी और गुल्लक में पैसे डालने वाले के अलावा किसी को खबर नहीं हो कि कितना दिया और क्यों दिया।

लेकिन पैसे से ही सबकुछ नहीं हो जाता है। यह राजा जी से ज्यादा अच्छी तरह कोई और कहां जानता है। वे सबसे बड़े खिलाड़ी जो हैं। और बड़ा खिलाड़ी वह होता है जो खेल जीतने के लिए खेल जीतने के साथ साथ बाकी सबकुछ भी करे। और बाकी सबकुछ में तो राजा साहब माहिर हैं ही। तो उन्होंने चुनावी खेल में मैच फिक्सिंग और अपनी पसंद के रैफरी बना लिए। और तो और स्कोर की गणना करने वाली मशीन में भी गड़बड़ी की खबरें आई हैं। तभी तो सब कहते हैं- वाह राजा जी, वाह...

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

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