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नागालैंड चुनाव : नतीज़ों को लेकर क्लीन इलेक्शन मूवमेंट के प्रभाव पर सभी की निगाहें

जहां BJP-NDPP को सत्ता में वापसी का भरोसा है, वहीं कांग्रेस के प्री-पोल अलायंस की पेशकश को खारिज़ करने के बाद NPF अकेले चुनाव लड़ रही है।
Nagaland Electio
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : PTI

कोलकाता : ऐसा प्रतीत होता है कि 27 फरवरी को नागालैंड विधानसभा चुनाव का परिणाम राजनीतिक दलों के साथ-साथ वर्तमान में क्लीन इलेक्शन मूवमेंट (CEM) द्वारा लाए गए गुणात्मक परिवर्तन पर भी एक फैसला होगा।

पिछले दिसंबर, नागालैंड जहां 60 सदस्यों वाली विधानसभा है, में ईसाई धर्म के 150 साल पूरे होने पर साल भर चलने वाले जश्न की शुरुआत हुई। इसके 16 जिलों में फैले हुए लगभग 16,000 चर्च के साथ 10 में से लगभग 9 व्यक्ति ईसाई हैं। नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल (NBCC) के बैनर तले इकाइयां स्वतः ही एक महत्वपूर्ण कारक बन जाती हैं।

राजनेता, चाहे जानबूझकर या शिष्टाचार से, अप्रत्यक्ष रूप से NBCC के संपर्क में आते हैं या सीधे तौर पर अपने सहयोगियों के साथ आते हैं जिसे आमतौर पर "विज़डम टू वोट" कहा जाता है। आपको बता दें NBCC भारत में स्थित एक बैपटिस्ट ईसाई संगठन है।

जो एक संरक्षित रहस्य बना हुआ है वह है NBCC की सलाह, जैसे, ईसाई धर्म की प्रासंगिकता के लिए किस पार्टी को वोट देना है और किस पार्टी से बचना बेहतर है।

क्लीन इलेक्शन मूवमेंट (CEM) कई सालों से अस्तित्व में है और, सूचित क्वाटर्स के अनुसार, 2003 के विधानसभा चुनाव से पहले इसे गति मिली। 2018 के विधानसभा चुनाव और हाल के वर्षों में CEM के कुछ परिणाम देने के साक्ष्य उपलब्ध थे।

CEM की शुरुआत करने वाली NBCC इस बात से खुश है कि भले ही आंदोलन की प्रगति धीमी है, फिर भी युवाओं में इसे लगातार स्वीकार किया जा रहा है। हालांकि बुजुर्ग मतदाता अभी भी विभिन्न प्रकार के प्रलोभनों के शिकार होते हैं चाहे कैश हो या वस्तु या दोनों।

नागालैंड बहुत अधिक मतदान के लिए जाना जाता है जो अक्सर 80% से अधिक और कभी-कभी लगभग 85% होता है। उदाहरण के लिए, 2014 के लोकसभा चुनाव में एकमात्र निर्वाचन क्षेत्र में 84% मतदान हुआ था।

इतने भारी मतदान का कारण क्या हो सकता है? एक शब्द में कहें तो 'मैलप्रैक्टिस'। यह कई मायनों में सामने आती है-प्रॉक्सी वोटिंग, सामूहिक वोटिंग, ग्राम परिषद मतदाता सूची का पालन करने का दबाव, मृतकों के नाम न हटाना और उन प्रवासी श्रमिकों के नाम पर मतदान करना जो कई सालों से दूर हैं।

किसी निर्वाचन क्षेत्र में एक उम्मीदवार और मतदाताओं के बीच 'चुनावी लेन-देन' के रूप में वोटों की खरीद-फरोख्त कई सालों से एक आम बात रही है। मतदान के दिन के दौरान 'अन-औफ़िशिअल' मतदाता सूची और 'मैलप्रैक्टिस' के कारण उच्च मतदान प्रतिशत होता है। कई सालों से मतदान के आंकड़े भारत के चुनाव आयोग (ECI) की निगरानी में तैयार की गई मतदाता सूची की संख्या को वहन नहीं करते हैं।

बेहतरी की दिशा में बदलाव के कुछ संकेत इन दिनों दिखाई दे रहे हैं। 'प्रेशर-ग्रुप' की तरह काम करने वाले 'यूथ कैंप' जिन्हें उम्मीदवारों द्वारा फंड किया जाता था, की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि CEM का प्रभाव मतदाताओं, विशेषकर युवाओं पर पड़ता है। इसके साथ ही, मतदाताओं को स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए ECI द्वारा उन्हें शिक्षित करने के निरंतर प्रयासों का भी मतदाताओं स्पष्ट प्रभाव पड़ रहा है।

सूत्रों के मुताबिक 2018 से मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो की नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDP) के साथ सत्ता साझा करने के बावजूद नागालैंड के मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को भाजपा के बारे में आपत्ति है। विशेष रूप से, ये मतदाता आरएसएस और उसके हिंदुत्व के मुद्दे से सावधान हैं, जो उनके निजी धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है।

कई अन्य कारणों से भी यह चुनाव महत्वपूर्ण है। पहला ये कि नागालैंड के चुनावी इतिहास में पहली बार कोई कम्युनिस्ट चुनाव लड़ेगा। अगस्त 2022 में कोहिमा में अपना कार्यालय स्थापित करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने मोन जिले के 45-तहोक निर्वाचन क्षेत्र से एमएम थ्रोमवा कोन्याक को मैदान में उतारा है। मणिपुर और असम के वरिष्ठ सीपीआई नेता, एम नारा सिंह और मुनि महंत, उनके चुनावी अभियान को मैनेज कर रहे हैं।

पल्लब सेनगुप्ता, जो सीपीआई कार्यालय और मणिपुर व त्रिपुरा में अंतर्राष्ट्रीय मामलों को देखते हैं, ने कहा, “हम जो भी ताकत जुटा सकते हैं, हम धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में और मजदूर वर्ग व दलितों के सुधार के लिए नैरेटिव को बदलने की कोशिश करेंगे।”

दूसरा, ईस्टर्न नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) की तैयारी। ENPO ने चुनावों का बहिष्कार करने की धमकी दी थी क्योंकि सात जनजातियों वाले छह पिछड़े जिलों को मिलाकर 'फ्रंटियर नागालैंड' नाम से एक अलग राज्य की उनकी 12 साल पुरानी मांग लटकी हुई है। हालांकि, ENPO का नेतृत्व बहिष्कार पर बंटा हुआ था जबकि पूर्वी जिलों के विधायक चुनाव में भाग लेने के पक्ष में थे। रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि बॉर्डर-स्टेट कॉम्पैक्ट बरकरार रखते हुए केंद्र पर्याप्त शक्तियों के साथ स्वायत्तता देने के लिए तैयार हो सकता है।

तीसरी महत्वपूर्ण बात ये कि कांग्रेस ने इस बार गंभीरता से चुनाव लड़ने का फैसला किया है। 2018 में, कांग्रेस, जो संगठनात्मक रूप से काफी कमज़ोर थी, ने बेमन से 18 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था।

AICC नागालैंड के प्रभारी सचिव रणजीत मुखर्जी के अनुसार, पार्टी ने 24 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जो जिलों और जनजातियों/उप-जनजातियों के मामले में जितना संभव हो उतना प्रतिनिधित्व करते हैं- नागालैंड में कुल 19 जनजातियां हैं। वे कहते हैं, "सूची की घोषणा के तुरंत बाद, एक उम्मीदवार ने भाजपा का दामन थाम लिया। यह एक लेन-देन-आधारित दल-बदल है जो संसाधन संपन्न भाजपा के कारण हुआ है।" वे आगे कहते हैं, “कांग्रेस, परिणामों के आधार पर एक धर्मनिरपेक्ष गठबंधन बनाने की कोशिश करेगी।"

2018 की तरह ही बीजेपी 20 सीटों पर अपनी सीनियर पार्टनर NDP (40 सीटों पर) के साथ चुनाव लड़ रही है। 2018 में भाजपा ने अपनी टैली में सुधार किया और 2013 में एक सीट से बढ़कर 2018 में 12 सीटों तक पहुंचे। नागालैंड भाजपा के अध्यक्ष व वरिष्ट मंत्री तेमजेन इम्ना अलोंग लॉन्गकुमेर ने कहा कि पार्टी इस बार टैली में और सुधार करते हुए 14-15 पर पहुंच सकती है। लॉन्गकुमेर उसी गठबंधन के सत्ता में बने रहने को लेकर आश्वस्त दिखे।

भाजपा मूल रूप से नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF) की सहयोगी थी, जिसने अतीत में सरकार बनाई थी। रियो भी मूल रूप से NPF का सदस्य था लेकिन बाद में उसने इसे छोड़कर NDP का गठन किया। NPF केंद्र में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) का हिस्सा है।

अंत में, नागा राजनीतिक समझौते के मुद्दे पर, NPF, जिसके पास 25 विधायक थे और वो 2018 में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, उसके 21 विधायकों का रियो की पार्टी में विलय हो गया। और कांग्रेस के वहां नहीं होने से, नागालैंड में कोई विपक्ष नही था।

अब एक अहम सवाल यह है कि चुनाव के बाद NPF का फैसला क्या होगा। अपनी ताकत कम होने के साथ, इसने 21 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।NPF के महासचिव अचुबेमो किकोन ने कहा कि पार्टी अकेले चुनाव में जाएगी।

NPF सिर्फ बीजेपी से ही नहीं बल्कि रियो से भी लड़ रही है, जिसके दलबदल के कारण उसकी संभावनाओं को बड़ा झटका लगा था। आरोप थे कि रियो की अंडरग्राउंड तत्वों से सांठगांठ है।

किकोन ने कहा, "हम अभी भी NDA सरकार का समर्थन कर रहे हैं। कई फैक्टर्स पर विचार किया जाना है। अभी की बात करें तो चुनाव के बाद गठबंधन के बारे में हमनें कुछ नहीं सोचा है। NPF ने प्री-पोल अलायंस के लिए कांग्रेस की पेशकश का जवाब नहीं दिया।"

(लेखक कोलकाता स्थित वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

Nagaland Elections: All Eyes on Clean Election Movement’s Impact on Outcome

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