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“जो जितना धार्मिक है उतना ही पूंजीवादी है”

हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने 'जन बुद्धिजीवी क्या करें ' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा "जन बुद्धिजीवी का काम है दुनिया को समझना। जन बुद्धिजीवी का काम है इस मिथक को तोड़ना कि दुनिया विकल्पहीन है।

bihar

अखिल भारतीय शान्ति व एकजुटता संगठन (ऐपसो) ने मंगलवार को 'द्वितीय फणीश सिंह स्मृति व्याख्यान' का आयोजन किया, जिसका विषय था 'जन बुद्धिजीवी क्या करें'। इस व्याख्यान का आयोजन पटना स्थित बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ भवन में किया गया। 

इस व्याख्यान में मुख्य वक्ता थे साहित्य अकादमी से सम्मानित सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल। इस व्याख्यान में बड़ी संख्या में बिहार के कोने-कोने से ऐपसो के कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त पटना के बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे।

हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने 'जन बुद्धिजीवी क्या करें ' विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा "जन बुद्धिजीवी का काम है दुनिया को समझना। जन बुद्धिजीवी अपने पेशेगत कामों से बाहर समाज के बारे में सोचता है। जन बुद्धिजीवी का काम है इस मिथक को तोड़ना कि दुनिया विकल्पहीन है। जन बुद्धिजीवी का काम है धन की महिमा को तोड़ना। एक ऐसे समाज का निर्माण करना जन बुद्धिजीवी का काम है जिसमें सबसे निर्बल आदमी सुख के साथ रह सके।"

उन्होंने आगे कहा, "आज जो जितना धार्मिक है वह उतना ही पूंजीवादी है। आज इस दुनिया को ईश्वर नहीं, पूंजी चला रही है। आज देश के मुठ्ठीभर लोगों के पास सत्तर प्रतिशत धन है। लेकिन हैरत है कि इससे भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। दुनिया का सबसे बड़ा अंतर्विरोध है आर्थिक अंतर्विरोध और यही शोषण व सत्ता का आधार है। इसलिए बुद्धिजीवी का सबसे पहला काम सत्ता के सामने सच बोलना। यह काम बहुत कठिन है। हम आज जिसे सत्ता समझते हैं, वह सत्ता नहीं है, वह असल में पूंजी की पिछलग्गू हैं।"

अरुण कमल ने देश में बढ़ती आसमानता के बारे में टिप्पणी करते हुए कहा "हमारे देश में अरबपतियों की संख्या में वृद्धि गर्व की नहीं, शर्म की बात है। बेस्ट सेलर किताबों के लेखक सत्ता के बुद्धिजीवी हैं। बड़े-बड़े लेखक, वकील और दूसरे लोग जाति और धर्म की वकालत करते हैं वे भी बुंद्धिजीवी हैं पर वे सब अंततः पूंजीवादी सत्ता की गुलामी करते हैं। एक बुद्धिजीवी का काम है कि मनुष्य की पहचान को संपूर्णता में देखे।। बुद्धिजीवी का एक काम यह भी है कि वह जाति और धर्म से मुक्त समाज के निर्माण के लिए लड़े। हमें जन्मना जाति व सम्पत्ति दोनों का विरोध करना चाहिए।"

फणीश सिंह के व्यक्तित्व को याद करते हुए बिहार के बिहार ऐपसो के महासचिव ब्रजकुमार पाण्डेय ने बताया कि फणीश सिंह जमींदार और वकालती परिवार में जन्में थे पर वे इसके साथ वे शहीद परिवार में भी जन्मे थे। पांडे कहते हैं, "उन्होंने प्रेमचंद और गोर्की का तुलनात्मक अध्ययन किया थे। वे और उनकी पत्नी 15 वर्षों से अधिक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे। वे कांग्रेसी भी हुए पर कम्युनिस्ट पार्टी से हमेशा अच्छा व्यवहार रखा। उन्होंने अस्सी देशों की यात्रा की थी। वे इतने बड़े व्यक्तित्व थे कि उनके 75 वें जन्मदिन पर पटना का कोई ऐसा बुद्धिजीवी नहीं था जो उनको आशीष देने नहीं पहुंचा हो। वे विरल व्यक्तित्व के मनुष्य थे।"

व्याख्यान में सवाल जवाब का सिलसिला भी काफी लंबा चला जिसमें कई दिलचस्प सवाल पूछे गए।

अध्यक्षीय संबोधन करते हुए हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार संतोष दीक्षित ने कहा "पूरी दुनिया में जिस तरह से जन विरोधी वर्चस्ववाद चल रहा है उससे निपटने में जन बुद्धिजीवियों की प्रमुख भूमिका है। आज जन बुद्धिजीवी बनने के रास्ते संकरे हो गये हैं। पूंजी मनुष्य के चारों तरफ दलदल बना रही है।"

स्मृति व्याख्यान का संचालन व धन्यवाद ज्ञापन 'ऐपसो' राष्ट्रीय परिषद सदस्य अनीश अंकुर ने किया।

सभा में मौजूद प्रमुख लोगों में ऐपसो के प्रदेश महासचिव सर्वोदय शर्मा, अध्यक्ष नीरज सिंह, जयप्रकाश, कौशल किशोर झा, सत्येंद्र कुमार, देव कुमार झा, दिनेश प्रसाद, अनिल अंशुमन, टुनटुन सिंह, मासूम अली, गजेंद्रकान्त शर्मा, अभिषेक, सुनील सिंह, तृप्ति नाथ सिंह, प्रीति सिंह, विनोद कुमार वीनू, सुधीर शर्मा, राजीव जादौन, गोपाल शर्मा, जफ़र इकबाल, उदयन, अचित, रौशन कुमार, बालगोविन्द सिंह, कमलेश शर्मा, अनिल कुमार राय आदि रहे।

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