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ख़बरों के आगे-पीछे :  कर्नाटक में भाजपा की मुश्किलें बढ़ीं

बगावत का झंडा उठा कर उपमुख्यमंत्री रहे केएस ईश्वरप्पा ने चुनाव मैदान से हटने से इनकार कर दिया है। वे शिवमोगा सीट से बीएस येदियुरप्पा के बेटे बीवाई राघवेंद्र के खिलाफ चुनाव लड रहे हैं।
BJP
फाइल फोटो पीटीआई

कर्नाटक में कांग्रेस की चुनौती का सामना करने के लिए भाजपा ने जो रणनीति बुनी थी वह अब बिखर रही है। एक तरफ पार्टी में बगावत का झंडा उठा कर उप मुख्यमंत्री रहे केएस ईश्वरप्पा ने चुनाव मैदान से हटने से इनकार कर दिया है। वे शिवमोगा सीट से बीएस येदियुरप्पा के बेटे बीवाई राघवेंद्र के खिलाफ चुनाव लड रहे हैं। दूसरी ओर एचडी देवगौड़ा के जनता दल (एस) के साथ गठबंधन करना भी उसके लिए सिरदर्द साबित हो रहा है। मुश्किल यह थी कि देवगौड़ा परिवार हर हाल में मांड्या सीट पर चुनाव लड़ने के लिए अड़ा हुआ था। मजबूरी में भाजपा को मांड्या सीट देवगौड़ा की पार्टी के लिए छोड़नी पड़ी। गौरतलब है कि सुमनलता अंबरीश इसी सीट से सांसद हैं, जो कुछ दिनों पहले ही भाजपा में शामिल हुई हैं। बताया जा रहा है कि वे एक बार फिर निर्दलीय चुनाव लड़ सकती है। पिछली बार उनके साथ सहानुभूति थी क्योंकि चुनाव से कुछ समय पहले ही उनके पति कन्नड़ फिल्मों के अभिनेता अंबरीश की मौत हुई थी। इस सहानुभूति के अलावा भाजपा ने भी उनको समर्थन दिया था। इसलिए वे चुनाव जीत गई थी। इस बार भाजपा और जनता दल एस साथ मिल कर लड़ रहे है और सीधा मुकाबला कांग्रेस से होगा तो सुमनलता अंबरीश के लिए मुश्किल हो सकती है। इसलिए सवाल उठ रहा है कि क्या वे कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ सकती हैं? अगर वे भाजपा से अलग होती है तो इससे भाजपा को तगड़ा झटका लगेगा।

बहुत दिलचस्प होगा बारामती सीट का चुनाव 

महाराष्ट्र की बारामती लोकसभा सीट का लोकसभा चुनाव बहुत दिलचस्प होने जा रहा है। बारामती में अजित पवार अपने जीवन का सबसे बड़ा दांव खेलने जा रहे हैं। वे अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को उस सीट पर चुनाव लड़ा रहे हैं, जहां से सुप्रिया सुले तीन बार से चुनाव जीत रही हैं और उनसे पहले लगातार पांच चुनाव खुद शरद पवार जीते थे। शरद पवार पहले बारामती विधानसभा सीट से विधायक होते रहे थे। वे 1967 से 1991 तक उस सीट से विधायक रहे, फिर 1991 से 2004 तक सांसद का चुनाव जीते और 2009 से उनकी बेटी सुप्रिया सुले जीत रही हैं। यानी साढ़े पांच दशक से बारामती सीट पर शरद पवार का कब्जा है। हालांकि इतनी लंबी पारी में अजित पवार और पूरा परिवार उनके साथ रहा है। पहली बार ऐसा हो रहा है कि चुनाव में परिवार बंटा हुआ है और अलग अलग चुनाव लड़ रहा है। अजित पवार के लिए यह बड़ी जोखिम वाला दांव इसलिए है कि अगर हार गए तो फिर शरद पवार की नजरों में तो गिरेंगे ही, भाजपा के लिए भी उनकी उपयोगिता घट जाएगी। लेकिन अगर जीते तो प्रदेश की राजनीति पूरी तरह से बदलेगी। फिर भाजपा उन पर दांव लगा सकती है। फिर लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उनका महत्व बढ़ेगा और उनके लिए बड़ी भूमिका भी तय होगी। अगर वे अपनी पार्टी का विलय भाजपा में करते हैं तो मुख्यमंत्री बन सकते हैं, जो उनकी सबसे बड़ी हसरत है। 

तेलंगाना में विपक्ष पर कार्रवाई उलटी पड़ी थी

लोकसभा चुनाव के बीच विपक्षी पार्टियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई हो रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविद केजरीवाल जेल में हैं। उनसे पहले झारखंड के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिला कर हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया गया था। कांग्रेस के खिलाफ आयकर विभाग ने साढ़े सात हजार करोड़ रुपए का टैक्स नोटिस भेजा है तो सीपीआई और तृणमूल कांग्रेस को भी आयकर विभाग की ओर से नोटिस भेजा गया है। कई विपक्षी पार्टियों के नेताओं के यहां छापे पड़ रहे हैं या केंद्रीय एजेंसियां चुनाव के बीच उनको समन भेज कर पूछताछ के लिए बुला रही है। विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग से इसकी शिकायत की है लेकिन वहां भी कोई सुनवाई नहीं है। इस बीच एक खबर आई है कि पिछले साल जब तेलंगाना में विधानसभा के चुनाव हो रहे थे तब राज्य में सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति ने विपक्षी यानी कांग्रेस के उम्मीदवारों के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई की थी। के चंद्रशेखर राव की सरकार ने कांग्रेस, भाजपा और दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेताओं के फोन टैप कराए थे। पुलिस ने इस सिलसिले में मुकदमा दर्ज किया है, जिसमें कहा गया है कि सरकारी एजेंसियां विपक्षी उम्मीदवारों का पीछा करती थीं। उनकी गाड़ियों से पैसे और दूसरे सामान जब्त किए जा रहे थे। यानी उनके चुनाव प्रचार को डिस्टर्ब किया जा रहा था। लेकिन बीआरएस सरकार की यह रणनीति उलटी पड़ गई। के.चंद्रशेखर राव को तीसरा कार्यकाल नहीं मिल सका। उनको हरा कर कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली।

वीवीपैट पर कोई फैसला आ सकता है?

इस समय एक तरफ लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है तो दूसरी ओर सभी वीवीपैट मशीनों की पर्चियों की गिनती की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। गौरतलब है कि विपक्षी पार्टियां वोटर वेरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी वीवीपैट मशीन की पर्चियों को गिनने और ईवीएम के वोट से उनके मिलान की मांग कर रही हैं। इससे पहले 2019 के अप्रैल में ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि लोकसभा चुनाव में हर विधानसभा क्षेत्र के पांच बूथों पर वीवीपैट मशीन की पर्चियों की गिनती की जाए और उसका मिलान ईवीएम के वोट से किया जाए। अब विपक्षी पार्टियां चाहती हैं कि सभी वीवीपैट मशीनों की पर्चियां गिनी जाए। अगर ऐसा होता है तो यह बैलेट पेपर से ही चुनाव कराने जैसा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग के साथ-साथ केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। गौरतलब है कि चुनाव आयोग इस आइडिया का विरोध करता है। उसकी ओर से कहा जाता है कि अगर सभी वीवीपैट मशीन की पर्चियों की गिनती होगी तो नतीजे आने में कई दिन लग जाएंगे। पहले जब बैलेट पेपर से चुनाव होते थे तो सारे नतीजे आने में तीन चार दिन का समय लगता था। इसमें भी वैसा हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र और चुनाव की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और पारदर्शिता के लिए अगर यह जरूरी है तो इसमें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। वैसे भी चुनाव की प्रक्रिया तो 81 दिन में पूरी होनी है। आयोग ने 16 मार्च को चुनाव की घोषणा की थी, जिस दिन आचार संहिता लगी और वोटों की गिनती चार जून को होगी। ऐसे में अगर नतीजे आने में दो या चार दिन और लग जाते हैं तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

केजरीवाल की पार्टी में खींचतान

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के जेल जाते ही उनकी पार्टी के अंदर नेताओं की खींचतान शुरू हो गई है। हालांकि राज्यसभा सदस्य संजय सिंह के जेल से छूट जाने से उम्मीद की जा रही है कि वे कुछ अनुशासन बहाल कराएंगे लेकिन अगर केजरीवाल ज्यादा समय तक अंदर रहे तो उनकी पार्टी में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। आतिशी की सक्रियता कई नेताओं को खटक रही है। वे केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल के साथ हर जगह दिख रही हैं और ऐसा आभास करा रही हैं, जैसे सुनीता केजरीवाल उनकी सलाह से काम कर रही हैं। एक अन्य मंत्री सौरभ भारद्वाज परोक्ष रूप से अरविंद केजरीवाल के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक यूट्यूब चैनल पर इंटरव्यू के दौरान पंजाब के राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पता नहीं क्यों हरभजन सिंह हमारे लिए स्पिन नहीं करा रहे हैं। असल में पार्टी के इस संकट के समय पंजाब से राज्यसभा भेजे गए सभी सात सांसद लापता हैं। राघव चड्ढा आंख की सर्जरी के नाम पर लंदन में बैठे हैं। दिल्ली से राज्यसभा में गईं स्वाति मालीवाल अपनी बहन के इलाज के लिए अमेरिका में हैं। कुल मिला कर पार्टी के 10 राज्यसभा सदस्यों में से कोई भी अरविंद केजरीवाल के समर्थन में सामने नहीं आया है। इनमें से संजय सिंह अभी जेल से छूटे हैं तो वे कुछ करेंगे लेकिन बाकी किसी का कुछ पता नहीं है। राज्यसभा के सभी सदस्यों को सीधे अरविंद केजरीवाल ने चुना है और उनकी गिरफ्तारी के बाद उनमें से कोई राजनीतिक लड़ाई लड़ने बाहर नहीं निकला है। 

बिना झंडे के राहुल का चुनाव प्रचार 

राहुल गांधी ने चार महीने तक भारत जोड़ो न्याय यात्रा की लेकिन उसमें कांग्रेस का झंडा नहीं दिखा और कांग्रेस के संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश बार-बार कहते रहे कि यह राजनीतिक यात्रा नहीं है। हैरानी की बात है कि ऐन लोकसभा चुनाव से पहले राहुल की यात्रा चल रही थी और उसे अराजनीतिक यात्रा बताया जा रहा था। सवाल है कि क्या कांग्रेस नेता इस भ्रम में थे कि वे अण्णा हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसा कोई जादू कर देंगे और देश मान लेगा कि राहुल सचमुच देश और लोकतंत्र बचाने निकले हैं? कांग्रेस के कई नेता मान रहे थे कि अराजनीतिक यात्रा बताने से भाजपा के कुछ समर्थक भी बात सुनेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं होना था और नहीं हुआ। बहरहाल, अब खबर है कि राहुल गांधी ने पिछले बुधवार को केरल की वायनाड सीट पर दूसरी बार नामांकन दाखिल किया तो उससे पहले हुए रोड शो में किसी पार्टी का झंडा शामिल नहीं किया गया। कहा गया कि पिछली बार कांग्रेस की सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता उनके नामांकन में शामिल हुए थे तो उन्होंने पार्टी का हरा झंडा लिया था, जिसे भाजपा ने पाकिस्तान का झंडा बता कर शोर मचाया था। सवाल है कि क्या इस डर से कोई पार्टी अपना या अपनी सहयोगी पार्टी का झंडा लगाने से इनकार कर सकती है? कांग्रेस ने वायनाड में ऐसा किया है, जहां उसकी असली लड़ाई सीपीआई से है। भाजपा लड़ाई में नहीं है फिर भी उसकी चिंता में कांग्रेस ने अपना और सहयोगी पार्टी दोनों का झंडा ही छोड़ दिया।
 

भोजपुरी कलाकार बिहार से क्यों नहीं लड़ते?

भोजपुरी भाषा का सबसे बड़ा क्षेत्र बिहार है लेकिन भोजपुरी फिल्मों के कलाकार बिहार के बजाय उत्तर प्रदेश, दिल्ली यहां तक कि पश्चिम बंगाल से चुनाव लड़ते हैं। भोजपुरी के दो बड़े स्टार कलाकार रविकिशन और दिनेश लाल यादव निरहुआ उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और आजमगढ़ सीट से सांसद हैं और भाजपा ने दोनों को इस बार भी टिकट दिया है। इसी तरह दिल्ली से दो बार सांसद रह चुके मनोज तिवारी को एक बार फिर भाजपा ने टिकट दिया है। भाजपा ने चौथे स्टार पवन सिंह को पश्चिम बंगाल की आसनसोल सीट से टिकट दिया था। लेकिन टिकट घोषित होते ही वे विवादों में उलझ गए और उन्हें चुनाव मैदान से हटना पडा। वैसे भी उनसे बहुत बड़ी बिहारी पहचान वाले शत्रुघ्न सिन्हा वहां से तृणमूल कांग्रेस के सांसद हैं। पवन सिंह बिहार में सारण, आरा या औरंगाबाद में किसी सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन भाजपा ने उनको टिकट नहीं दिया। वे राष्ट्रीय जनता दल के संपर्क में भी थे लेकिन उसने भी उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया। दरअसल भोजपुरी के फिल्मी सितारे बिहार से इसलिए नहीं लड़ते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि तमाम लोकप्रियता के बावजूद चुनाव में वोटिंग के समय उनकी जाति आड़े आ जाएगी। सामाजिक समीकरण अगर ठीक नहीं रहा तो लोकप्रियता काम नहीं आएगी। इसलिए वे बिहार से बाहर लड़ते हैं तो उन्हें अपनी भोजपुरी पहचान के दम पर सभी जातियों का वोट मिल जाता है और वे जीत जाते हैं।
 

राजनीतिक घरानों का बंटवारा निजी विवाद बना

भारतीय राजनीति में सक्रिय परिवारों में बंटवारा नई बात नहीं है। कई राजनीतिक परिवारों में बंटवारा हुआ और सदस्यों ने अलग-अलग रास्ता पकड़ा लेकिन उनके विवाद ने कभी भी निजी रूप नहीं लिया। एकाध अपवाद छोड़ दे तो उन लोगों ने एक दूसरे के खिलाफ लड़ने या हराने की नीयत से काम नहीं किया। लेकिन इस बार कमाल हो रहा है। इस बार राजनीतिक परिवारों का बंटवारा निजी विवाद में तब्दील हो रहा है। परिवारों के सदस्य एक दूसरे को निबटाने की राजनीति कर रहे हैं। इस सिलसिले में शरद पवार के परिवार का बंटवारा बहुत कड़वाहट भरा होता जा रहा है। अजित पवार ने न सिर्फ शरद पवार की बनाई पार्टी तोड़ी, बल्कि उनकी पारंपरिक बारामती सीट पर उनकी बेटी सुप्रिया सुले को हराने का संकल्प जताया है। इसके लिए वे अपनी पत्नी सुनेत्रा पवार को चुनाव लड़ा रहे हैं। हालांकि पहले भी धनंजय मुंडे अपनी चचेरी बहन पंकजा मुंडे के खिलाफ लड़े थे या शिवपाल यादव ने अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव के बेटे के खिलाफ चुनाव लड़ा था लेकिन इतनी कड़वाहट तब भी नहीं दिखी थी। इसी तरह बिहार में दिवंगत रामविलास पासवान के भाई और बेटे के बीच कड़वाहट देखने को मिली है। चिराग पासवान ने भाजपा के साथ इसी शर्त पर गठबंधन किया कि उनके चाचा को उसमें कोई जगह नहीं मिलेगी और उन्हें कोई सीट नहीं दी जाएगी। इससे पहले चाचा पशुपति पारस ने भी इसी अंदाज में पार्टी तोड़ी थी और चिराग पासवान को अलग-थलग किया था।

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