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वनाधिकार क़ानून: उत्तराखंड के टोंगिया गावों को राजस्व का दर्जा, अब जंगलों पर सामूहिक दावों की तैयारी

लोगों के संघर्ष की जीत हुई। यूपी के बाद उत्तराखंड के हरिद्वार और नैनीताल जिले के 3-3 वन टोंगिया गावों को भी राजस्व दर्जा मिलने का काम हुआ जिससे ग्रामीणों में खुशी का माहौल है।
 Forest Rights Law

आखिरकार लोगों के संघर्ष की जीत हुई। यूपी के बाद उत्तराखंड के हरिद्वार और नैनीताल जिले के 3-3 वन टोंगिया गावों को भी राजस्व दर्जा मिलने का काम हुआ जिससे ग्रामीणों में खुशी का माहौल है। आजादी के सात दशक बाद उत्तराखंड के छह टोंगिया गांव, राजस्व ग्राम घोषित हुए तो अब ग्रामीणों की नजर, जंगलों (वन भूमि) पर अधिकार पर जा टिकी है। इसके लिए वनाधिकार कानून के तहत जंगलों पर सामूहिक दावों की तैयारी है। हरिद्वार जिले के पुरुषोत्तम नगर, कमला नगर और हरिपुर टोंगिया को हाल ही में राजस्व का दर्जा मिला है तो अब लोगों को भी वन भूमि पर हक हकूक मिलने के साथ ही अपने दिन बहुरने की उम्मीद जगी है। 

अभी तक भूमि के मालिकाना हक सहित मूलभूत सुविधाओं से वंचित इन गांवों के हजारों परिवारों को अब, अन्य राजस्व गावों की तरह सड़क बिजली पानी की मूलभूत सुविधाएं मिलने का काम हो सकेगा। आजादी के सात दशक बाद भी देवभूमि उत्तराखंड के इन टोंगिया वन गावों में ग्रामीण सड़क, बिजली-पानी की मूलभूत और शिक्षा स्वास्थ्य और यातायात जैसी बुनियादी सुविधाओं से महरूम चले आ रहे हैं, वंचित हैं। कुछ यूं समझें कि (टोंगिया) गांव हैं लेकिन न राजस्व के नक्शे पर हैं और न ही वन भूमि के। यहां तक कि राजस्व ग्राम नहीं होने से यहां लोगों को वोट डालने तक के अधिकार नहीं थे। वोट डालने के लिए भी दूसरे गांव जाना पड़ता है। इन गावों में पोलिंग बूथ तक  नही बनाए जाते हैं। 

हरिद्वार की ही बात करें तो जिले के पुरुषोत्तम नगर, कमला नगर और हरिपुर टोंगिया को सितंबर माह में ही राजस्व का दर्जा मिला है। इसके लिए लोगों ने एक लंबा संघर्ष किया है जिससे अरसे बाद ही सही, इस जीत की खुशी हर ग्रामीण (महिला- पुरुष) के चेहरे पर साफ देखी- पढ़ी जा सकती है। इसी से उत्साहित ग्रामीणों ने अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन के नेतृत्व में सोमवार को वनाधिकार कानून पर प्रभावी अमल को लेकर आगे की रणनीति बनाने और जंगलों पर सामूहिक दावों की तैयारी शुरू कर दी है। सोमवार को हरिपुर टोंगिया में यूनियन के बैनर तले एक पंचायत का आयोजन किया। जिसमें यूपी के सीमाई जिले सहारनपुर के टोंगिया ग्रामीणों और मोहंड क्षेत्र के वन गुर्जर समुदायों सहित उत्तराखंड (प्रदेश) के हरिपुर टोंगिया, हजारा टोंगिया, रसूलपुर टोंगिया, टीरा टोंगिया, कमला नगर और पुरुषोत्तम नगर आदि करीब दर्जनभर टोंगिया गांवों के लोग शामिल हुए।

उत्तराखंड के हरिद्वार में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की सीमा से लगे हरिपुर टोंगिया में आयोजित पंचायत में सभी टोंगिया गांवों को राजस्व गांव का दर्जा देने और वन अधिकार अधिनियम- 2006 के प्रावधानों के तहत जंगलों पर पूर्ण अधिकार दिए जाने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई गई।

अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन के राष्ट्रीय संगठन सचिव और यूपी उत्तराखंड के टोंगिया गांवों के हक-हकूकों की लड़ाई लड़ रहे मुन्नीलाल बताते हैं कि 1930 के दशक से लेकर “1982 तक इन गांवों के लोग लगातार वन भूमि में पौधारोपण करते रहे। वन विभाग उन्हें रियायती जमीन की रसीद और टोंगिया जमीन में पेड़ बड़े होने तक काश्तकारी करने की इजाजत देता रहा। 1982 में इस क्षेत्र को राजाजी नेशनल पार्क घोषित कर दिया गया। इसी के साथ टोंगिया गांवों के लोगों का टोंगिया भूमि पर काश्तकारी करने का हक खत्म हो गया और वन विभाग ने रियायती जमीन की रसीद देनी भी बंद कर दी। इसी के साथ टोंगिया गांवों को तोड़ने का आदेश आ गया।” मुन्नी लाल के अनुसार “1982 में पार्क के बनने के साथ ही इस इलाके के गांवों को उजाड़ने की तैयारियां हो गई थीं। सरकारी अमला सबसे पहले हरिद्वार जिले के हरिपुर टोंगिया गांव पहुंचा। लेकिन, वहां जोरदार विरोध हुआ और सरकारी अमले को पीछे हटना पड़ा। इसी दौरान इन गांवों के लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और 1986 में सुप्रीम कोर्ट ने गांवों के उजाड़ने के खिलाफ स्टे दे दिया। उसी स्टे की बदौलत आज टोंगिया गांव बचे हुए हैं।”

मुन्नी लाल बताते हैं कि इसके बाद इन गांवों को बचाने में वनाधिकार अधिनियम-2006 की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे कहते हैं कि इस विधेयक पर चर्चा के दौरान लोकसभा में स्वीकार किया गया था कि वनवासियों के साथ 60 वर्षों से ऐतिहासिक अन्याय किया गया। हालांकि वे कहते हैं कि ये 60 वर्ष आजादी मिलने के दिन से गिने गये थे, जबकि वास्तव में वनवासियों के साथ पिछले 250 वर्षों से ऐतिहासिक अन्याय किया जा रहा है।

हरिपुर टोंगिया पंचायत में जो मुख्य बातें निकलकर आई उनमें सभी टोंगिया गावों को राजस्व का दर्जा मिलने और वनाधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना प्रमुख हैं। इसके लिए सभी गावों में वनाधिकार समितियों का गठन किए जाने और वनाधिकार कानून कैसे लागू होगा, यानी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, को लेकर एक क्षेत्रीय कमेटी बनाएं जाने की बात कही गई। क्षेत्रीय कमेटी में हर गांव से एक महिला एक पुरुष का होना अनिवार्य किया गया तो वनाधिकार समितियों में महिलाओं की 50 प्रतिशत भागेदारी सुनिश्चित करने का सुझाव दिया गया। सामूहिक दावों को लेकर वक्ताओं ने कहा कि जंगलों पर ग्राम सभा का पूर्ण अधिकार सुनिश्चित हो। इसमें वन विभाग का कोई दखल नहीं होना चाहिए।

यूनियन से जुड़ी युवा अधिवक्ता अनिता और राखी ने बताया कि हाल में हमारे तीन टोंगिया गांव- हरिपुर टोंगिया, कमला नगर और पुरुषोत्तम नगर को राजस्व ग्राम घोषित किया गया है। पंचायत के फैसलों की बाबत अनिता और राखी ने बताया कि टोंगिया गांव के लोगों की पहली मांग यह है कि सभी टोंगिया गांवों को राजस्व ग्राम घोषित किया जाए। दूसरा, वनाधिकार कानून पर प्रभावी अमल सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए, “टोंगिया गांवों के लोगों को वन अधिकार अधिनियम 2006 के प्रावधानों के अनुसार जमीन दी जाए। लेकिन, 1986 में पौधारोपण का काम बंद हो जाने के बाद टोंगिया गांवों के पास टोंगिया भूमि नहीं रह गई है, यानी वह जमीन जिसमें पेड़ लगाये जाते थे और 5 वर्ष तक उस पर खेती करने की अनुमति होती थी। इसके साथ ही परिवारों की संख्या बढ़ गई है। 1930 में जो एक बीघा रियायती जमीन मिली थी, वह भी अब कई टुकड़ों में बंट चुकी है। इसके अलावा मांग की गई कि टोंगिया गांवों के लोगों ने 1930 से 1986 तक जो जंगल बनाये हैं और जिन जंगलों की देखभाल की है, वनाधिकार कानून के प्रावधानों के तहत उन जंगलों पर गांवों का सामूहिक अधिकार सुनिश्चित हो।”



मुक्कम्मल हक पाने को ग्राम सभा के साथ सांगठनिक मजबूती भी जरूरी: अशोक चौधरी  

अखिल भारतीय वन जन श्रमजीवी यूनियन के कार्यकारी अध्यक्ष और प्रमुख वनाधिकार कार्यकर्ता अशोक चौधरी कहते हैं कि वनाधिकार कानून ऐतिहासिक कानून है। इस कानून में जंगलों पर आश्रित टोंगिया गांव और घुमंतु पशुपालक वन गुर्जर समुदायों को पहली बार मान्यता मिली है। ऐसे में उनका अधिकार प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए ग्राम सभा के साथ- साथ सांगठनिक मजबूती होना भी बहुत जरूरी है। कहा उदाहरण के तौर पर, टोंगिया गावों को राजस्व ग्राम के दर्जे की घोषणा तो हो गई लेकिन हक मिलना कितना मुक्कम्मल हो पाया। हक मिलना तभी मुक्कम्मल माना जाएगा जब सब कुछ रिकॉर्ड में दर्ज हो जाए। वरना तो जैसे सहारनपुर में कालूवाला, सोढ़ीनगर और भगवतपुर को राजस्व दर्जा मिले 5 साल होने को है लेकिन लोगों को आधे अधूरे हक भी नहीं मिल सके हैं। व्यक्तिगत हक भी चंद लोगों को ही मयस्सर हुए है वो भी सिर्फ कागज के टुकड़े के तौर पर, तहसील रिकॉर्ड में इंद्राज तक नहीं हो सका है। इसलिए कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ग्राम सभा और सांगठनिक तौर पर, दोनों तरह से मजबूती चाहिए होगी। 

दूसरी बात, अंग्रेजों के बनाए वन विभाग से सावधान रहना होगा। हालांकि वनाधिकार अधिनियम 2006 के अमल में आने के बाद से वन विभाग का वो दर्जा नहीं रह गया है जो ब्रिटिश काल में या 2006 के पहले था। संविधान का अनुच्छेद 39-बी भी कहता है कि, तमाम प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल देश के नागरिकों के कल्याण के लिए किया जाएगा। लेकिन सरकार इस संपदा का उपयोग निजी कंपनियों के मुनाफे के लिए कर रही है। सरकार ने लोगों के संवैधानिक अधिकारों का ख्याल नहीं किया और अंग्रेजी शासनकाल से शुरू हुआ लोगों का शोषण आजादी के छह दशक बाद तक भी जारी रहा। इसलिए वनाधिकार कानून में इसे ऐतिहासिक अन्याय की संज्ञा दी गई। यही नहीं, वनाधिकार कानून- 2006, भी स्पष्ट तौर से जंगलों पर लोगों के सामूहिक और व्यक्तिगत हकों को मान्यता प्रदान करता है। लेकिन इस सब के बावजूद लोगों के हक हकूकों में वन विभाग हर कदम पर अड़ंगे लगाने का काम करता रहा है, करता रहेगा। आपसी गुटबाजी पैदा करने से लेकर दादागिरी तक हर काम करता है। इससे चौकस होने की जरूरत है। हमें खुद भी बात बात में वन विभाग पर निर्भरता छोड़नी होगी। वन विभाग के पास जाने की बजाय, सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाना होगा जो बिना सांगठनिक मजबूती के नहीं हो सकता। याद रहे अपने आप चलकर अधिकार नहीं मिल सकते हैं। इसके लिए एकजुटता जरूरी है। ग्राम सभा के साथ संगठन की मजबूती चाहिए होगी। यह बात हर किसी को समझनी होगी।

चौधरी के अनुसार, ये संगठन के लिए भी बड़ी चुनौती है। जैसे लखीमपुर खीरी जिले का सूरमा गांव बड़ी चुनौती थी विस्थापन के आदेश हो गए थे लेकिन ग्राम सभा के साथ सांगठनिक मजबूती थी। मुक्कमल हक मिलना संभव हो सका। वहीं, यूनियन की राष्ट्रीय महासचिव रोमा ने कहा कि केन्द्र सरकार वन अधिकार कानून 2006 को ही हटाने के लिए तैयार बैठी है। ऐसे में जरूरी है देशभर के वनाश्रित समुदाय एकजुट हों और इस कानून के प्रावधानों के अनुसार हक हासिल करने के लिए लड़ाई लड़ें। उन्होंने कहा कि सरकार अब वनों को भी उद्योगपतियों को सौंपने के प्रयास कर रही है, इसलिए सभी को सावधान रहने की जरूरत है। जागने की जरूरत है।

साभार : सबरंग 

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