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लगातार होती छात्र आत्महत्याओं को रोका जाना चाहिए

वर्ष 2022 और 2023 में छात्र आत्महत्याओं में अचानक एक वृद्धि देखी गई है।
suicide
प्रतीकात्मक तस्वीर।

हैदराबाद के नरसिंही इलाके के श्री चैतन्य जूनियर रेजिडेंशियल कॉलेज में इंटरमीडिएट के एक 16 वर्षीय छात्र एस सात्विक ने 28 फरवरी 2023 को अपने छात्रावास के कमरे में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली। उसकी जेब में मिले सुसाइड नोट से यह स्पष्ट हुआ कि कॉलेज के अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के कारण उसने आत्महत्या की। जब उसने खाने की निम्न गुणवत्ता की शिकायत की तो उस पर शारीरिक हमला और अपशब्दों का प्रयोग किया गया।

आईआईटी-बॉम्बे में केमिकल इंजीनियरिंग के एक 18 वर्षीय छात्र दर्शन सोलंकी ने 12 फरवरी 2023 को छात्रावास की बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली। सोलंकी अहमदाबाद, गुजरात के पहली पीढ़ी के दलित छात्र था। उसकी मृत्यु पर जांच के लिए एक 12 सदस्यीय समिति का गठन किया गया, जिसने एक अंतरिम रिपोर्ट  प्रस्तुत की- कि शैक्षणिक दबाव उसकी मृत्यु का कारण हो सकता है, लेकिन इस बात से इनकार किया कि कोई जातिगत भेदभाव था। लेकिन सोलंकी की बहन ने खुलासा किया कि भाई ने कैंपस के भीतर जातिगत भेदभाव की अपनी व्यथा उनसे साझा की थी. IIT-B के दलित छात्रों ने इस अंतरिम रिपोर्ट का विरोध किया, जिसने इस तथाकथित कुलीन संस्थान में जातिगत भेदभाव को कवर करने की कोशिश की थी। त्रासदी में रोहित वेमुला प्रकरण के साथ समानताएं थीं, लेकिन, बिना कोई सार्वजनिक ध्यान आकर्षित किए इस तरह के एपिसोड जारी रहे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह कहने का दुस्साहस किया कि मादक द्रव्यों के सेवन या सहपाठियों द्वारा मानव वध (homicide) से इंकार नहीं किया जा सकता!

आईआईटी-मद्रास में एक 20 वर्षीय बी.टेक छात्र ने 14 फरवरी 2023 को आत्महत्या कर ली। पुलिस अधिकारियों ने पीड़ित पर यह आरोप लगाया कि, “उस पर काफी बकाया था जिसे वह चुका नहीं सका। वह ठीक से पढ़ाई नहीं कर सका और अच्छे ग्रेड नहीं प्राप्त कर सका। इसलिए उसने आत्महत्या कर ली।”

दिल्ली IIT के निदेशक, डॉ. वेणुगोपाल राव ने  औपचारिक तौर पर कहा था कि IIT के 20% छात्रों के पास ‘बैकलॉग’ हैं, जिनकी संख्या 23 IIT में 50,000 से अधिक है। यदि एक या एक से अधिक प्रश्नपत्रों में बैकलॉग छात्रों द्वारा आत्महत्या का कारण बन रहा है, तो यह वास्तव में एक भयानक परिदृश्य है।

मद्रास आईआईटी के निदेशक, वी कामकोटि ने कैंपस आत्महत्याओं के लिए वित्तीय तनाव, व्यक्तिगत कारणों जैसे प्रेम विफलताओं, शैक्षणिक दबाव और स्वास्थ्य के मुद्दों को जिम्मेदार ठहराया और अंत में सबकुछ मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे तक सीमित कर दिया। ऐसा लगता है कि हमारे विशिष्ट पेशेवर संस्थानों (professional institutions) में मूलभूत रूप से कुछ गड़बड़ है और पीड़ितों को दोष देने से समस्या का समाधान नहीं होने वाला है।

राज्य सभा सदस्य डॉ. एल. हनुमंतैया ने 15 मार्च 2023 को राज्यसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए आईआईटी, एनआईआईटी और आईआईएम में आत्महत्या के आंकड़े इस प्रकार दिए:

आत्महत्याएं केवल आईआईटी, एनआईआईटी और आईआईएम तक ही सीमित नहीं हैं। 2017 में, यूपी के बरेली मेडिकल कॉलेज में युवा मेडिकल छात्रा अनन्या दीक्षित द्वारा आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया। भिवानी, हरियाणा की प्रियंका सिंह और बरेली के यश कुमार खटवानी के बाद तीन साल के अन्दर आत्महत्या करने वाली वह तीसरी मेडिकल छात्रा थी।

इससे पहले 27 नवंबर 2022 को यूपी के इटावा जिले के एक निजी नर्सिंग स्कूल में 222 वर्षीय नर्सिंग छात्रा शिल्पी कुशवाहा ने आत्महत्या कर ली थी.

प्रवेश परीक्षा संबंधित आत्महत्या

आंध्र प्रदेश बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट परीक्षा द्वारा 10 मई 2023 को कक्षा 11 और 12 के परिणाम घोषित किए जाने के बाद आंध्र प्रदेश में मई 2023 के दूसरे सप्ताह में नौ छात्रों की आत्महत्या से मौत हो गई।

परीक्षाओं से छात्रों की शैक्षिक क्षमता में सुधार होना चाहिये लेकिन वे हत्यारी बन गई हैं। उत्तीर्ण न होने वाले छात्र के लिए मानो सारे रास्ते बंद हो गए हों।

हर दिन 35 छात्र करते हैं आत्महत्या

छात्र आत्महत्या के आंकड़े सचमुच चिंताजनक हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2021 में हर दिन 35 से अधिक की दर से 13,000 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की। यह एनसीआरबी के ही आंकड़ों के अनुसार, 2021 में प्रति दिन 30 कृषि आत्महत्याओं (15 किसानों और 15 खेतिहर मजदूरों ने औसतन प्रति दिन आत्महत्या की) के आंकड़े से अधिक है। लेकिन राजनीतिक रूप से इसे उतना तवज्जो नहीं दिया गया है जितना किसानों की आत्महत्या को।

आत्महत्या का व्यक्तिगत कृत्य भी सामाजिक रूप से निर्मित है

आत्महत्या व्यक्तिगत रूप से की जाती है लेकिन सामाजिक रूप से निर्मित (socially constructed) होती है। यह एक निश्चित क्रूर सामाजिक-सांस्कृतिक और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक सेटिंग की उत्पाद है। सीएमपी डिग्री कॉलेज में शिक्षिका रुचिका वर्मा कहती हैं, “जबरदस्त शैक्षणिक दबाव, अपने ही परिवारों के भीतर के भारी दबाव, और सहकर्मियों से दबाव (peer pressure) अक्सर छात्रों को अपनी जान लेने के लिए मजबूर करते हैं।“

छात्रों पर व्यावसायिक दबाव

मध्यम वर्ग अपने ही अंतर्विरोधों में जकड़ा हुआ है। पहले, आइए हम वित्तीय मूर्खताओं पर विचार करें। ब्रिटिश बहुराष्ट्रीय बैंक HSBC के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 71% माता-पिता अपने बच्चे की यूनिवर्सिटी या कॉलेज की शिक्षा के लिए कर्ज में डूब जाने को तैयार थे। जो अपने बच्चों को शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहते हैं, उनके लिए यह आंकड़ा और भी अधिक - 76% है । संपन्न माता-पिता अपने बच्चों के लिए कथित रूप से प्रतिष्ठित संस्थानों में स्नातकोत्तर सीट हथियाने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का भुगतान करने को तैयार हैं। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी), हैदराबाद में प्रति वर्ष शुल्क 60 लाख रुपये से अधिक है, और अन्य  बिजनेस स्कूलों में केवल थोड़ी कम राशि वसूलते हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण कस्बों में भी कुछ अंग्रेजी माध्यम के प्राथमिक स्कूल आज फीस के रूप में प्रति माह 5000 रुपये लेते हैं।

उच्च व्यय केवल प्रवेश खरीद सकता है, लेकिन उच्च शिक्षा में स्वत: परिणत नहीं हो सकता। भारी खर्च ही अयोग्य छात्र पर बेहतर प्रदर्शन करने का भारी दबाव बनाता है।

कोचिंग संस्थानों, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, का भी व्यापक खतरा है । माता-पिता बच्चों को इन मशरूमिंग कोचिंग संस्थानों में भेजकर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने हेतु लाखों खर्च करते हैं, और ये छात्रों को रटने के लिए मजबूर करते हैं और उन्हें कुछ हजारों बहुविकल्पीय प्रश्नों (multiple choice questions) के उत्तर याद करने को कहते हैं। जब वे इन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होते हैं और व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पाते हैं तो वे वास्तविक शिक्षा का सामना करने में असमर्थ होते हैं। यह कई छात्रों को गंभीर संकट में डाल देता है।

जहां डिग्री और ग्रेड खरीदे नहीं जा सकते, वहां इन संस्थानों में प्रवेश के लिए शॉर्टकट वाली पढ़ाई का सहारा लेने वाले अक्षम छात्रों पर अकादमिक दबाव बढ़ जाता है। तब वे या तो पाठ्यक्रम से ड्रॉपाउट हो जाते हैं या फिर ज़िन्दगी से ।

असहनीय शैक्षणिक दबाव

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में, 2 लाख से अधिक छात्र राज्य के व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में चिकित्सा और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम के लिए एक संयुक्त प्रवेश परीक्षा के लिए उपस्थित होते हैं और औसतन लगभग 600 छात्र हर साल रैंक नहीं पाने के कारण आत्महत्या कर लेते हैं।

आईआईटी-जेईई की प्रवेश परीक्षा में असफल होने वाले आईआईटी उम्मीदवारों की आत्महत्या की संख्या हर साल दर्जनों में होती है। अब, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के आंकड़ों के अनुसार, एनईईटी के एक दर्जन से अधिक छात्र हर साल आत्महत्या करते हैं और मेडिकल कॉलेजों में शामिल होने वाले सफल लोगों में से औसतन 119 मेडिकल छात्र हर साल आत्महत्या करते हैं।

यहां तक कि प्रवेश स्तर पर भी दबाव बहुत अधिक होता है। अपने छात्रों को कुछ चुनिंदा शैक्षणिक संस्थानों में रखने के लिए माता-पिता के  झुंड मानसिकता है, जिन्होंने अपने चारों ओर एक ब्रांड-इक्विटी और आभा विकसित की है। यही कारण है कि हम देखते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों के कट-ऑफ अंक 98% से ऊपर हैं। इस प्रकार छात्रों को एक छोटी उम्र में भी मृत्यु के साथ संवाद करने के लिए मजबूर किया जाता है।

पहले, महंगे स्कूलों में प्रवेश पाने का दबाव, फिर अच्छा प्रदर्शन करने और रैंक हासिल करने का दबाव, फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में रैंक हासिल करने के लिए कोचिंग का दबाव, और फिर इन कॉलेजों में अच्छा प्रदर्शन करना - यह एक निरंतर चलने वाली कठिन परीक्षा है।

तीव्र पारिवारिक दबाव

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर और पेशेवर कउन्सेलर डा. कोमिला थापा के अनुसार “एक मध्यम वर्गीय परिवार की सामाजिक स्थिति इस बात से तय होती है कि बच्चे किस शैक्षणिक संस्थान में जा रहे हैं और वे क्या पढ़ते हैं और औपचारिक परीक्षा में कैसा प्रदर्शन करते हैं।

“बच्चे अब सेल फोन में फंस गए हैं और उनका सामाजिक जीवन सीमित हो गया है। जहाँ वे शिक्षा में पिछड़ जाते हैं, वहाँ परिवार के अन्य सदस्यों से तीव्र अलगाव होता है। वे खुद को निराश नहीं कर रहे हैं बल्कि वे परिवार के अन्य सदस्यों को भी निराश कर रहे होते हैं क्योंकि यह सामूहिक प्रतिष्ठा का मामला बनता है। परीक्षा में असफलता उन्हें परिवार और समुदाय दोनों में मिसफिट बनाती है। वे रिश्तेदारों के बीच अपना सम्मान खो देते हैं। और जहाँ वे जल्दी से अपने आप को पुनः ठीक नहीं कर पाते, आत्महत्या ही एकमात्र रास्ता प्रतीत होता है। कई बार तो मुझे लगता है कि अभिभावकों को काउन्सेलिंग की ज़रूरत है क्योंकि वे जो खुद नहीं कर पाए, अपने बच्चों पर थोपकर संतुष्टि प्राप्त करते हैं। लड़के-लड़कियों के बीच संबंधों को लेकर भी आपसी तनाव होता है। बात-बात पर जीने मरने की बात होने लगती है। और मां-बाप को यह सब पता ही नहीं होता।“

गहरा पीयर प्रेशर

एक ही कक्षा के छात्रों के बीच शैक्षणिक प्रदर्शन में असमानता स्वाभाविक है। सभी को पहली रैंक नहीं मिल सकती है। लेकिन कम अच्छा प्रदर्शन छात्रों के सम्मान और स्वाभिमान की भावना को गंभीर चोट पहुंचाता है। जहां शिक्षा एक बेमतलब की दौड़ है और रैंकिंग कैंपस भर्ती तथा वेतन को प्रभावित करेगी, बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पीयर प्रेशर और भी तीव्र होता है। किसी फेल्योर के साथ कैंटीन में चाय पीते हुए भी देखा जाना कोई पसंद नहीं करता।

आत्महत्या की रोकथाम की चुनौती

यूजीसी गाइडलाइन्स के अनुसार भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनिवार्य रूप से छात्र सेवा केंद्र बनाए जाने की बात है; ये प्रत्येक विभाग में होंगे, और उन्हें छात्रों की मानसिक/शारीरिक स्वास्थ का लेखा-जोखा रखना होगा। हेल्पलाइन नंबर भी है। पर डा. कोमिला का कहना है कि “आत्महत्या की स्थिति तक पहुचने वाले की सोच संकुचित हो जाती है और वह समाज से कटा हुआ व निराश होता/ती है, इसलिए मदद लेने की नहीं सोचता/ती।“ फिर, ऐसा कोई कानून नहीं है जो आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले लोगों के लिए स्क्रीनिंग करता हो और उन्हें पेशेवर परामर्श प्रदान करता हो। कुछ एनजीओ भी हेल्प-लाइन संचालित करते हैं लेकिन उनकी पहुंच सीमित है।

जो छात्र अवसाद में आ जाते हैं और आत्महत्या के विचार विकसित कर लेते हैं, सिस्टम उन्हें अलग-थलग कर देता है। कई लोग जो इस चरम कदम का सहारा नहीं लेते, वे भी केवल "चलते-फिरते लाश” जैसे दिशाहीन हो जाते हैं!

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क्या कहते हैं शिक्षाविद...

महिला अध्ययन केंद्र, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पूर्व निदेशक प्रो. सुमिता परमार ने न्यूज़क्लिक को बताया: "हालांकि मैंने आत्महत्या के आंकड़ों का बहुत बारीकी से अध्ययन नहीं किया है, लेकिन मैं कह सकती हूं कि 2 दशक पहले अकादमिक दबाव आत्महत्या की मौतों का मुख्य कारक नहीं था। रैगिंग और अन्य कारणों से आत्महत्याओं के बारे में अधिक सुना गया। लेकिन अब आबादी बढ़ गई है और उतनी नौकरियां नहीं हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धा कई गुना ज्यादा है। छात्र आत्महत्याओं की घटनाएं भी बढ़ी हैं” प्रो.परमार कहती हैं, “हालांकि, आत्महत्या से होने वाली मौतों के लिंग आयाम का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। क्या छात्र और छात्राओं के लिए दर अलग-अलग है और क्या जिम्मेदार कारक भी अलग-अलग हैं। इसका अध्ययन करना दिलचस्प होगा।"

उन्हें "मानसिक मामलों" के रूप में डब करने के बजाय, किस तरह के संवेदनशील मनोवैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता है? क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक...

प्रो. आर.सी. त्रिपाठी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और जी बी पंत  इन्सिटिट्यूट के पूर्व निदेशक ने बताया: "भारत में बड़े हो रहे बच्चे का पश्चिम की तुलना में एक अलग तरह का समाजीकरण होता है और वास्तव में परिवार से इतना अधिक पोषण नहीं होता जैसा कि यहां। उन्होंने स्वतंत्र रूप से जीना और तनाव का सामना करना सीखा नहीं होता । जब बच्चा अपने माता-पिता की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोष देने लगता है, तो वह उनका और समाज का सामना करने में अपने को असमर्थ महसूस कर सकता/सकती है। इसलिए वे यह अतिवादी कदम उठा लेते हैं। वे मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं की मदद ले सकते हैं, लेकिन प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में भी कोई कारगर व्यवस्था नहीं है।” उन्होंने कहा कि ऐसी परामर्श सुविधाओं के लिए एक कानून होना चाहिए।

रैडिकल छात्र संगठनों और शिक्षकों को क्या करना चाहिए?

सुनील, जो पहले ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के नेता थे और वर्तमान में इन्कलाबी नौजवाल सभा (आरवाईए) के उत्तर प्रदेश राज्य सचिव हैं, ने कहा: “इलाहाबाद और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में कुछ आत्महत्याएं हुई हैं। लेकिन हमें उनके बारे में समाचार पत्रों से ही पता चलता है। और इस मामले को हमेशा प्रशासन और संस्था प्रमुखों के साथ-साथ अभिभावकों द्वारा भी रफा-दफा कर दिया जाता है। कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता। हम अधिक आत्मविश्वास पैदा करने के लिए छात्रों की रचनात्मकता और प्रतिभा को पोषित करने के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए प्लेटफॉर्म विकसित करने के बारे में भी सोच रहे हैं।”

 लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति और एक अकादमिक ऐक्टिविस्ट सुश्री रूपरेखा वर्मा ने NewsClcik को बताया, "छात्रों में आत्महत्या की दर बढ़ने के कुछ कारण हैं: एक, शिक्षा का व्यावसायीकरण जिसके कारण शिक्षक-छात्र बंधन टूट गया है; दूसरे, आज के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में बढ़ता जातिगत भेदभाव; और तीसरा, बढ़ती बेरोज़गारी और गरीब परिवारों के लिए संसाधनों की कमी अवसाद की ओर ले जा रही है।” उन्होंने कहा कि खतरे से तीनों स्तरों पर निपटना होगा।

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