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मैं अब भी नहीं संभल पाई : नजीब की मां फ़ातिमा नफ़ीस 

"समय बीत ही जाता है और लोग भी भूलने लगते हैं। आज से 7 साल पहले जब नजीब ग़ायब हुआ था उस वक्त कई लोग हमारे साथ थे लेकिन अब काफ़ी अरसा गुज़र गया है और धीरे-धीरे लोग भी भूलने लगे हैं लेकिन मैं जो महसूस कर रही हूं मुझ पर जो बीत रही है वह शायद ही कोई समझ पाए”।
Protest

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जेएनयू से 7 साल पहले एक छात्र अचानक गायब हो जाता है जिसका पता ना यूनिवर्सिटी प्रशासन को होता है और ना ही दिल्ली पुलिस उसे ढूंढ पाती है। इसके बाद हाई कोर्ट द्वारा यह मामला सीबीआई को सौंपा जाता है लेकिन अपनी जांच के कुछ समय बाद सीबीआई भी नाकाम हो जाती है।

15 अक्टूबर 2016 को जेएनयू में पढ़ने वाले एक छात्र नजीब अहमद यूनिवर्सिटी कैंपस से गायब हो जाते हैं। नजीब की गुमशुदगी को लेकर विश्वविद्यालय में विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं और इसी तरह प्रशासन हर तरह से नाकाम होता चला जाता है और नजीब का कोई सुराग तक नहीं लगता। इस मामले को अब 7 साल बीत चुके हैं जिसको लेकर जेएनयू में एक दफा फिर नजीब को वापस ढूंढ कर लाने की मांगे तेज होने लगी है इसी के चलते हैं 14 अक्टूबर 2023 की रात विश्वविद्यालय कैंपस में विभिन्न संगठनों द्वारा एक मार्च भी निकाला जाता है जिसमें नजीब के आरोपियों को सजा देने की मांग की जाती है और साथ ही साथ नजीब अहमद को ढूंढ लाने की आवाज़ें भी बुलंद होती हैं।

इस मामले में हमने जेएनयू के कुछ छात्रों से बात की तो उनमें विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे एक छात्र नीतीश ने कहा कि नजीब अहमद की गुमशुदगी कोई मामूली घटना नहीं है बल्कि यह सब कुछ एक षड्यंत्र के तहत किया गया काम है। वे आगे कहते हैं की पुलिस व प्रशासन सबको सब कुछ पता है और ऐसा नहीं है कि वह नजीब को नहीं ढूंढ सकते लेकिन वह ढूंढना नहीं चाहते। यह सब कुछ केवल नजीब अहमद तक सीमित नहीं है बल्कि यह कुछ विशेष समुदायों के खिलाफ हो रहे जुल्म की दास्तां है जिसमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ और अल्पसंख्यक समुदायों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाई जा रही है।

एक दूसरे छात्र आशीष हमें बताते हैं की नजीब एक ऐसे समुदाय से आते हैं जहां चंद लोग ही उच्च शिक्षा में पहुंच पा रहे हैं। नजीब को ग़ायब कर देने के पीछे एक बड़ी साज़िश ये थी कि मुस्लिम और अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले छात्र डर जाएं और शिक्षा में आगे ना आ सकें। लेकिन हम ऐसा होने नहीं देंगे। जेएनयू हमेशा से अल्पसंख्यकों के साथ खड़ा रहा है और हम अब भी एक नजीब की जगह हजारों नजीब खड़े करेंगे और नजीब अहमद को भी वापस लाएंगे।

बता दें कि छात्रों का ये आरोप है कि नजीब अहमद की गुमशुदगी में एक बड़ा हाथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीवीपी का है जो की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठन है। छात्रों का यह भी आरोप है की नजीब के गायब होने से पहले एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के साथ उसका झगड़ा भी हुआ था। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) के छात्र नेता क़ासिम, जो इस बात के गवाह हैं कि नजीब अहमद पर एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा हमला किया गया था और तो और वह उसके बाद से नजीब के लिए चल रही मूवमेंट का भी हिस्सा रहे, कहते हैं कि इस कैंपस को हर तरह से कमजोर करने की कोशिश की गई फिर चाहे नजीब अहमद को गायब कर देना हो या फ़िर CAA , NRC के समय चल रही मुहिम के बाद शरजील ईमाम और उमर खा़लिद जैसे जेएनयू के छात्रों पर कार्रवाई हो। वे आगे बताते हैं कि हम इसी तरह समय समय पर नजीब अहमद की के बारे में सरकार-प्रशासन से सवाल करते रहते हैं और साथ ही साथ अपनी मांग को विश्वविद्यालय में आने वाले नए छात्रों तक भी पहुंचाते हैं और हमेशा नजीब को याद रखते हैं। इन 7 सालों से जो लोग नजीब का साथ दे रहे हैं उनके साथ भी बहुत कुछ हुआ। लेकिन इन सब चीज़ों ने हमें हमेशा मज़बूत किया है और हम इसी मज़बूती के साथ नजीब की मां के साथ भी खड़े हैं।

नजीब की गुमशुदगी के वक्त जो छात्र संगठन प्रशासन से सवाल कर रहे थे उन्हीं में एक स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ इंडिया (एसआईओ) भी है। एसआईओ ने दूसरे छात्र संगठनों के साथ मिलकर देशभर में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए और सरकार और प्रशासन से नजीब को वापस ढूंढ कर लाने की मांग की। एसआईओ के राष्ट्रीय सचिव इमरान कहते हैं नजीब अहमद का मामला अपने तौर का कोई एक मामला नहीं है बल्कि इसके साथ कई और मामले भी पाए जाते हैं। जिससे साफ तौर पर शिक्षा संस्थानों में इस्लामोफोबिया को बढ़ाते हुए देखा जा सकता है। नजीब अहमद की गुमशुदगी के पीछे मंशा यही थी कि मुस्लिम समुदाय से आने वाले छात्र को गायब करके दूसरे छात्रों को डराया जाए ताकि मुस्लिम एवं अल्पसंख्यक समुदायों से उच्च शिक्षा में आने वाले छात्र भी भय का शिकार हो जाएं। वे आगे कहते हैं हम नजीब के साथ पहले भी थे और आज भी हैं और तब तक रहेंगे जब तक नजीब अहमद को ढूंढ कर वापस न लाया जाए।

इस मामले पर जब हमने नजीब अहमद की मां फा़तिमा नफीस से बात की तो उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि "समय बीत ही जाता है और लोग भी भूलने लगते हैं। आज से 7 साल पहले जब नजीब ग़ायब हुआ था उस वक्त कई लोग हमारे साथ थे लेकिन अब काफ़ी अरसा गुज़र गया है और धीरे-धीरे लोग भी भूलने लगे हैं लेकिन मैं जो महसूस कर रही हूं मुझ पर जो बीत रही है वह शायद ही कोई समझ पाए। वे आगे कहती हैं, "इस घटना के बाद कई सालों तक हमारा परिवार संभल नहीं पाया था अब शायद लोग संभल गए हों लेकिन मैं संभल नहीं पाई।"

नजीब अहमद गुमशुदगी मामले को लेकर क़ानूनी तौर पर मामले में अब क्या अपडेट है जब हमने यह जानने की कोशिश की तो नजीब की मां हमें बताती हैं कि केस की हालत अब कुछ यूं है कि तारीख़ पे तारीख़ मिलती है। कभी जज साहब छुट्टी पर होते हैं तो कभी जज साहब का ट्रांसफर हो जाता है। हाल ही में 12 अक्टूबर को हाई कोर्ट से हमें तारीख़ दी गई थी लेकिन उसी समय जज साहब का ट्रांसफर हो गया और हमें अगली तारीख़ 24 नवंबर की दी गई है।"

बता दें कि 2016 में नजीब गायब होते हैं और दिल्ली पुलिस जांच शुरू करती है लेकिन उनके हाथ कोई सुराग नहीं लग पाता है। इसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप जाती है। अपनी जांच करने के बाद सीबीआई भी क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देती है और नाकाम हो जाती है। फा़तिमा नफी़स कहती हैं "साल दर साल बीतते जा रहे हैं और मेरे बेटे की वापसी का कोई रास्ता अब तक नहीं दिख रहा है। अब मैंने इन कोर्ट कचहरीयों और क़ानून से उम्मीद भी छोड़ दी है। मेरी उम्मीद सिर्फ़ ख़ुदा से है और मैंने सब कुछ ख़ुदा पर ही छोड़ दिया है। मैं हमेशा से नजीब को भी यही बात सिखाती आई हूं।"

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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