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क्या पेंशन देना नामुमकिन है?

सरकार के जो प्रवक्ता देश के पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बन जाने का दावा करते हैं वही यह दावा करने में जरा भी नहीं हिचकते हैं कि सरकार के पास अपने कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना वाली पेंशन देने के लिए भी पैसा नहीं है।
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फोटो साभार : आईस्टॉक

एक अजीबो-गरीब परिघटना से हम हर रोज दो-चार होते हैं। यह परिघटना इतनी अजीब है कि अक्सर इसकी ओर हमारा ध्यान तक नहीं जाता है। प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक, हर स्तर पर सरकार के प्रवक्ता इसका बखान करते नहीं थकते हैं कि भारत, आज दुनिया की सबसे तेजी से वृद्घि कर रही अर्थव्यवस्था बन चुका है, कि जल्द ही यह 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बन जाने वाला है और यह भी कि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि दर के लिहाज से भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है।

ऊंची वृद्घि फिर भी संसाधनों की कमी?

इसके बावजूद, सरकार के वही प्रवक्ता यह दावा करने में जरा भी नहीं हिचकते हैं कि सरकार के पास अपने कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना वाली पेंशन देने के लिए भी पैसा नहीं है, फिर असंगठित क्षेत्र में कर्मचारियों के रूप में अपने सेवा के वर्ष गुजारने वाले करोड़ों लोगों को, एक समुचित सार्वभौम गैर-अंशदानिक पेंशन देने की योजना के लिए, पैसा होने का तो सवाल ही कहां उठता है।

इस तरह विश्व की ‘सबसे तेजी से वृद्घि कर रही अर्थव्यवस्था’ अपने बुजुर्गों को पेंशन देने में उसी प्रकार से असमर्थ है, जिस तरह वह अपनी महिला आबादी के लिए पर्याप्त पोषण जुटाने में असमर्थ है। याद रहे कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार, 2019-21 के दौरान 15 से 49 वर्ष तक आयु की 57 फीसद महिलाएं खून की कमी की शिकार थीं और यह अनुपात, 2015-16 के दौरान दर्ज हुए 53 फीसद से ऊपर चढ़ चुका था। इसी प्रकार यह तथाकथित ‘विश्व की सबसे तेजी से वृद्घि कर रही अर्थव्यवस्था’ आम तौर पर अपनी आबादी को पर्याप्त पोषण मुहैया कराने में भी असमर्थ थी, जिसके चलते यह देश विश्व भूख सूचकांक पर, कुल 125 देशों में 111वें स्थान पर था। और यह भी कि पुराने योजना आयोग ने ग्रामीण गरीबी के माप के लिए 2200 कैलोरी प्रतिव्यक्ति, प्रतिदिन का जो न्यूनतम मानक तय किया था, उस तक नहीं पहुंच पाने वाली आबादी, 2011-12 के 68 फीसद के स्तर से बढक़र, खुद राष्ट्रीय नमूना सर्वे द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 तक बढक़र 80 फीसद से ऊपर निकल चुकी थी।

पेंशन: समस्या संसाधनों की नहीं वर्गीय पूर्वाग्रह की

आइए, हम इस मुद्दे की जरा और गहराई से पड़ताल करते हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना के मुकाबले में, नयी पेंशन योजना ही दिए जाने की हिमायत करने वालों द्वारा जो इकलौती दलील दी जाती है, राजकोषीय दलील ही है। और इसे करीब-करीब स्वयंसिद्घ ही माना जाता है। जैसे ही पुरानी पेंशन योजना का जिक्र होता है, मीडियाकर्मियों की और अर्थशास्त्रियों की, करीब-करीब स्वचालित प्रतिक्रिया यही होती है कि, ‘सरकार इसके लिए पैसे कहां से लाएगी।’ अब स्थिति यह है कि पुरानी पेंशन योजना के तहत किसी भी सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद, उसकी आखिरी तनख्वाह-सह महंगाई भत्ते का आधा, पेंशन के रूप में मिलता है और इस पेंशन को आगे मुद्रास्फीति के लिए उसी प्रकार समायोजित किया जाता है, जैसे सेवारत कर्मचारियों को महंगाई भत्ता दिया जाता है। 

मुद्रास्फीति के लिए समायोजन करने पर, ‘‘वास्तविक’’ पेंशन, कमोबेश जस की तस बनी रहती है, जब तक कि कई-कई वर्ष के अंतराल के बाद, जब-तब उसे अद्यतन नहीं किया जाता है। अब अगर देश की अर्थव्यवस्था, वास्तविक मूल्य के लिहाज से 6 से 7 फीसद सालाना के हिसाब से बढ़ रही है, जिसकी शेखी सरकार करती है, तो चूंकि पेंशनयाफ्ता सरकारी कर्मचारियों की संख्या उतनी रफ्तार से नहीं बढ़ रही है और चूंकि वास्तविक पेंशन में कोई भी बढ़ोतरी अगर होती भी है तो काफी अंतराल के बाद ही होती है, जीडीपी के अनुपात के रूप में पेंशन का हिस्सा वक्त गुजरने के साथ तब तक घटता ही जाता है, जब तक कि वास्तविक पेंशन में ही बढ़ोतरी नहीं हो जाती है और इस बढ़ोतरी के बाद भी वास्तविक पेंशन का हिस्सा ज्यादा से ज्यादा अपने उस बिंदु तक ही पहुंचता होगा, जहां से उसमें गिरावट शुरू हुई थी।

दूसरे शब्दों में, वक्त के साथ पेंशन की राशि का अवहनीय होते जाना तो दूर रहा, वास्तव में आनुपातिक रूप से उसमें गिरावट ही हो रही होगी और इसलिए, अगर सरकार के अपने वृद्घि के आंकड़ों को गंभीरता से लिया जाए तो, वक्त गुजरने के साथ उसके लिए पेंशन का खर्चा उठाना पहले से आसान ही होते जाना चाहिए। लेकिन, तब सरकार इससे उल्टा दावा क्यों कर रही है? इसकी वजह कम से कम यह तो हो नहीं सकती है कि जीडीपी में वृद्घि तो तेजी से हो रही हो, लेकिन सरकार का वित्तीय अर्जन किसी वजह से उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा हो। आखिरकार, ऐसा होने की तो कोई तुक ही नहीं बनती है। तब इस तरह की दलील दिए जाने का वास्तविक कारण यही होना चाहिए कि सरकार चाहती है कि जीडीपी का और भी बड़ा हिस्सा पूंजीपतियों तथा धन्नासेठों के हवाले कर दिया जाए, जिसके लिए वह हमेशा ही यह सुविधाजनक दलील दे सकती है कि इस तरह के हस्तांतरणों से निवेश को बढ़ावा मिलेगा और इसलिए जीडीपी की वृद्घि में तेजी आएगी।

पूंजीवादी पूर्वाग्रह की बचकानी दलील

बहरहाल, इस दलील का कोई औचित्य है नहीं। यह बार-बार दी जाने वाली दलील कि अगर पूंजीपतियों के हाथों में और संसाधन दे दिए जाएंगे, तो वे और ज्यादा निवेश करेंगे, एक बचकानी दलील है। इस दलील का खोखलापन, अब से करीब एक सदी पहले ही, और किसी ने नहीं पूंजीवादी अर्थशास्त्री, जेएम केन्स ने ही उजागर कर दिया था। उन्होंने और पोलिश मार्क्सवादी अर्थशास्त्री मिखाइल कलेकी ने यह दिखाया था कि पूंजीवाद सामान्य रूप से एक ‘मांग बाधित व्यवस्था’ होता है। और ऐसी व्यवस्था में उत्पाद, निवेश तथा वृद्घि को, सकल मांग में बढ़ोतरी के जरिए ही बढ़ाया जा सकता है, न कि पूंजीपतियों के पक्ष में हस्तांतरणों के जरिए। इस प्रस्थापना की सत्यता अनुभव ने इतने स्पष्ट रूप से प्रमाणित की है कि मोदी सरकार भी उक्त दलील पर विश्वास करती हो यह संभव नहीं है। इसके बावजूद, अगर यह सरकार पेंशनों के लिए और ज्यादा संसाधन उपलब्ध कराने इंकार कर रही है, चाहे यह खुद अपने कर्मचारियों के लिए पेंशन देने का मामला हो या फिर आम तौर पर बुजुर्गों को पेंशन देने का, यह साफ तौर पर एक वर्गीय पूर्वाग्रह को ही दिखाता है, जिसका किसी विवेकपूर्ण आर्थिक तर्क से कुछ लेना-देना ही नहीं है।

सरकार एक ओर तो भारी संकट के बीच भी, वृद्घि दर की शेखियां मार रही है और जीडीपी में वृद्घि करने के नाम पर, इस संकट को दूर करने से इंकार कर रही है। संक्षेप में इस जीडीपी की जड़पूजा में वही बेतुकापन निहित है, जो गुजरे जमाने के राजाओं-महाराजाओं के जमाने में अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा था। इन महाराजाओं में से अनेक अपने लिए महल बनवाने के लिए बेगार या कर्वी मजदूरी का इस्तेमाल किया करते थे, जिसमें मजदूरों को मजदूरी दिए बिना ही काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। इस तरह का निर्माण तेजी से विकास होना नजर आता होगा, हालांकि इसके लिए जनता पर अमानवीय उत्पीड़न थोपा जाता था। इसलिए, किसी जीडीपी जड़पूजक को अवश्य ही बेगार पर भी गर्व हुआ होता। इसी प्रकार, आज करोड़ों बुजुर्ग अमानवीय हालात में जीने पर मजबूर हैं क्योंकि उनके भी बहुत ही छोटे से हिस्से को ही, केंद्र सरकार से 200 रुपये प्रतिमाह प्रतिव्यक्ति की जरा सी राशि मिलती है। और ऐसा कोई इसलिए नहीं हो रहा है कि देश के पास उनकी दशा कुछ बेहतर करने के लिए संसाधन ही नहीं हैं। यह तो सिर्फ इसलिए हो रहा है कि देश के पास जो संसाधन हैं उन्हें पूंजीपतियों द्वारा तथा आम तौर पर धन्नासेठों द्वारा इस सरासर झूठी दलील से हड़पा जा रहा है कि वे तो ऐसा जीडीपी की वृद्घि को बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।

सार्वभौम पेंशन कुल कितना खर्च

आइए, संसाधनों के प्रश्न को हम जरा और गहराई से जांचें। 2018-19 में 60 वर्ष से अधिक आयु के लगभग 13 करोड़ लोग थे, जिन्हें मोटे तौर पर 3,000 रुपये प्रति माह की गुजारा पेंशन दिए जाने की जरूरत थी। उस वर्ष में हमारे देश की सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) 187 लाख करोड़ रुपये या 187 ट्रिलियन रुपये थी। इसलिए, इन बुजुर्गों को 3000 रुपये महीना की पेंशन देने के लिए, जीएनआई के 2.5 फीसद से ज्यादा की जरूरत नहीं पड़ी होती। दूसरी ओर, पेंशन दिए जाने से, इन लोगों ने इस राशि में से जो खर्चे किए होते, उनमें एक हिस्सा तो करों के रूप में सरकार के खजाने में ही वापस पहुंच गया होता और इस राशि को दोबारा खर्च किया जा सकता था। एक अनुदार अनुमान लेकर, अगर हम यह मान लें कि इस खर्च के बहुगुणनकारी प्रभाव के सभी चक्र पूरी होने के बाद (यानी इस खर्च से चक्र दर चक्र उत्पाद तथा आमदनी पैदा होने और इसलिए और ज्यादा खर्च तथा ज्यादा उत्पाद व आमदनियां पैदा होने और हरेक चक्र में एक हिस्सा करों के रूप में सरकारी खजाने में लौट आने का सिलसिला आखिरकार पूरा हो जाने के बाद) इस तरह के खर्च का 30 फीसद सरकार के पास लौट आएगा, तो जीएनआई के 2.5 फीसद के बराबर इस खर्च के लिए, अर्थव्यवस्था में मांग में शुरूआत में जीएनआई के 1.75 फीसद के बराबर ही अतिरिक्त बढ़ोतरी डालने की जरूरत होगी।

अब अगर हम यह मान लें कि जब गरीबों पर अतिरिक्त कर लगाया जाता है, इसके चलते वे अनिवार्य रूप से अपने उपभोग में कटौती नहीं करते हैं (अगर करों का बोझ बहुत ही ज्यादा हो तो बात दूसरी है), उक्त खर्च के लिए जरूरी राशि आबादी के सिर्फ 1 फीसद सबसे धनी तबके पर, सिर्फ 1 फीसद का संपदा कर लगाकर, आसानी से जुटायी जा सकती है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस देश में इसके लिए संसाधनों की कोई कमी नहीं है कि एक सार्वभौम, गैर-अंशदानिक पेंशन कार्यक्रम स्थापित किया जाए। जो लोग पहले ही किसी पेंशन योजना के अंतर्गत आते हैं (जिससे उन्हें 2018-19 की कीमतों पर 3,000 रुपये महीना से ज्यादा मिल रहा हो) स्वेच्छा से इस योजना से बाहर हो सकते हैं।

संकट से उबरने का रास्ता भी

बेशक, किसी को लग सकता है कि इस तरह की पेंशन योजना के संभावित लाभार्थियों की संख्या, 2018-19 की तुलना में और बढ़ गयी होगी और चूंकि उस वर्ष के बाद गुजरे समय में हुई मुद्रास्फीति के चलते पेंशन की राशि भी 3,000 रुपये से ज्यादा तो करनी ही पड़ेगी, तब क्या आज उसी योजना से राजकोष पर आने वाला दबाव, पहले के मुकाबले बढ़ नहीं जाएगा? इस सवाल का जवाब है, नहीं। इसकी वजह यह है कि इसी दौरान चालू कीमतों पर राष्ट्रीय आय भी तो बढ़ गयी है और ऐसा वास्तविक आर्थिक वृद्घि के चलते भी हुआ है और कीमतों में वृद्घि के चलते भी हुआ है, जिससे रुपयों में राष्ट्रीय आय और भी बढ़ जाती है। वास्तव में, चूंकि इस योजना के संभावित लाभार्थियों की संख्या, वास्तविक राष्ट्रीय आय जितनी दर से नहीं बढ़ रही होगी, उतनी ही ‘‘वास्तविक’’ पेंशन (यानी 2018-19 की कीमतों पर 3,000 रुपये के बराबर पेंशन) देने के लिए, राष्ट्रीय आय के पहले से कम हिस्से की जरूरत पड़ेगी और इसलिए, इसके लिए कहीं थोड़ा राजकोषीय प्रयास करना होगा।

इस तरह की योजना का, इससे मनुष्यों को गरिमापूर्ण तरीके से राहत मिलने के अलावा एक लाभ और भी है। अब जबकि नव-उदारवादी पूंजीवाद अधि-उत्पादन संकट में फंस गया है, इस संकट से निकलने के लिए, कहीं बढ़ा हुआ राजकोषीय खर्च तत्काल जरूरी है, उसके लिए चाहे राजकोषीय घाटे से वित्त जुटाया जाए या फिर धनपतियों पर कर लगाकर वित्त जुटाया जाए। लेकिन, नव-उदारवार तो दोनों के ही खिलाफ है, राजकोषीय घाटा बढ़ाने के भी और अमीरों पर ज्यादा कर लगाने के भी और इसीलिए, नव-उदारवाद के अंतर्गत इस संकट का कोई समाधान ही नहीं है। इस संदर्भ में, एक सार्वभौम गैर-अंशदानिक पेंशन योजना जैसे कदम, वर्तमान संकट से उबरने का रास्ता पेश करते हैं और एक नयी व्यवस्था की ओर इशारा करते हैं। 

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