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क्या भारत में ग़रीबी तेज़ी से कम हो रही है?

ऑक्सफ़ैम की जनवरी 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आर्थिक असमानता बहुत अधिक है तो ग़रीबी इतनी कम कैसे है?
poverty
प्रतीकात्मक तस्वीर। TOI

हाल ही में आई दो रिपोर्टों ने पिछले कुछ वर्षों में भारत में गरीबी में भारी कमी के बारे में चर्चा शुरू करवा दी है।

एक है संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल,(Oxford Poverty and Human Development Initiative,OPHI) द्वारा संयुक्त रूप से 18 जुलाई 2023 को जारी की गई वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट-2023 । इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में गरीबी के पैमाने में 2005-06 में 51% से 2019-21 में 16.4% तक कमी आई है। निरपेक्ष संख्या के लिहाज से इन 15 वर्षों में भारत में कुल 415 मिलियन (41.5 करोड़) लोग गरीबी से बाहर निकले।

दूसरी है 17 जुलाई 2023 की नीति आयोग की प्रगति रिपोर्ट जो एक दिन पहले जारी की गई, जिसमें 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)-4 और 2019-21 के NFHS-5 के बीच बहुआयामी गरीबी में कमी की समीक्षा की गई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में गरीबी की व्यापकता 2015-16 में 24.85% से घटकर 2019-21 में 14.96% हो गई, केवल छह वर्षों में 9.89% की तेज गिरावट, यह छोटी अवधि इसलिए चुनी गई कि वह स्पष्ट रूप से मोदी सरकार के कार्यकाल का हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार,निरपेक्ष संख्या में, 135 मिलियन (13.5 करोड़) लोग केवल छह वर्षों में गरीबी से बाहर निकले। अधिक महत्वपूर्ण रूप से, नीति आयोग की इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ग्रामीण गरीबी इन छह वर्षों में 32.59% से घटकर 19.28% हो गई, यानी 13.31% की उल्लेखनीय कमी।

यूएनडीपी-ओपीएचआई रिपोर्ट भी नीति आयोग के निष्कर्षों पर ही आधारित है। संयुक्त राष्ट्र 2005-06 से वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक जारी कर रहा है। नीति आयोग ने 2015-16 में NFHS-4 गरीबी डेटा से संयुक्त राष्ट्र वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुरूप राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक जारी किया है। इसने 12 संबंधित मंत्रालयों के सहयोग से और राज्य सरकारों और सूचकांक प्रकाशन एजेंसियों यूएनडीपी और ओपीएचआई के साथ साझेदारी में ये डेटा विकसित किया।

भारत के लिए, यूएनडीपी-ओपीएचआई अध्ययन नीति आयोग के आंकड़ों का उपयोग करता है इसलिए माना जा सकता है कि दोनों रिपोर्टों के निष्कर्ष एक ही स्रोत से आए हैं।

इन दोनों रिपोर्टों के निष्कर्षों ने कई लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। पिछले 15 वर्षों में गरीबी में कमी, और वह भी विशेष रूप से 2015-16 और 2019-21 के बीच छह वर्षों में वास्तव में काफी प्रभावशाली रही है।

वे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के लक्ष्य 1.2 की दिशा में भारत द्वारा उल्लेखनीय प्रगति का संकेत देते हैं, जिसका उद्देश्य "सभी आयामों में गरीबी में रहने वाले सभी उम्र के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के अनुपात को कम-से-कम आधे से घटाना" है। इस दर पर, भारत SDG के गरीबी उन्मूलन लक्ष्य को हासिल कर लेगा।

पर कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं

साथ ही, इन प्रभावशाली निष्कर्षों ने कुछ अनुत्तरित प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिनके लिए संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।

प्रति दिन 2400 कैलोरी सेवन के उपभोग व्यय (Consumption expenditure) पर आधारित पहले की गरीबी रेखा के विपरीत, NFHS द्वारा मापी गई बहुआयामी गरीबी अलग है। स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के तीन आयामों में, NFHS बहुआयामी गरीबी सूचकांक तैयार करने के लिए पोषण, बाल और किशोर मृत्यु दर, मातृ देखभाल, स्कूली शिक्षा के वर्ष, स्कूल में उपस्थिति, खाना पकाने का ईंधन, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास, बैंक खाते और परिसंपत्तियां पर 12 संकेतक शामिल करता है।

गरीबी मापने के लिए जनगणना डेटा सबसे अच्छा है क्योंकि यह प्रत्येक घर के डेटा का दस्तावेजीकरण करता है। दुर्भाग्य से, 2021 की जनगणना (Census) में भी इस मुद्दे पर देरी हो रही है कि जाति डेटा की गणना की जानी है या नहीं, और इसलिए जनगणना 2021 अभी तक शुरू नहीं हुई है।

छोड़ी गई बीपीएल जनगणना

ग्रामीण विकास मंत्रालय (MoRD) बीपीएल जनगणना करा रहा है और आखिरी बीपीएल जनगणना 2011 की थी, जिसे सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) के रूप में आयोजित किया जाना था, जो 2016 में पूरी हुई थी। SECCका जाति डेटा सरकार द्वारा प्रकाशित नहीं किया गया क्योंकि उसे डर था कि इससे एक बड़ा जातीय संघर्ष शुरू हो जाएगा। लेकिन सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना, अंत्योदय योजना, आयुष्मान भारत, हर घर बिजली और उज्ज्वला योजना आदि जैसी अपनी विभिन्न योजनाओं के लिए एसईसीसी से बीपीएल डेटा का उपयोग कर रही है। राज्य सरकारें बीपीएल राशन कार्डों की पहचान के लिए SECCडेटा का उपयोग करती हैं। आधार डेटा के साथ संयोजन में, इसका उपयोग बहुआयामी गरीबी पर पहुंचने के लिए किया जा सकता है। लेकिन इसके बाद बीपीएल जनगणना बंद कर दी गई।

इसलिए, बहुआयामी गरीबी को मापने के लिए, सरकारNFHSडेटा पर निर्भर करती है, जिसे अपनी विवादास्पद डेटा गुणवत्ता के लिए अकादमिक आलोचना का सामना करना पड़ा है। दूसरे शब्दों में, मुख्य रूप से जनसंख्या की स्वास्थ्य स्थिति को मापने और स्वास्थ्य योजना के लिए डिज़ाइन किए गए सर्वेक्षण गरीबी को मापने और उससे निपटने के विकल्प बन गए हैं। सरकार को अलग-अलग बीपीएल सर्वेक्षण करने से कोई तो नहीं रोक रहा है, जो पंचायत और गांव स्तर तक गरीबी उन्मूलन योजना में मदद कर सकता है; और सरकार की कोई जबावदेही क्‍यों नहीं है।

क्‍या महामारी के बावजूद गरीबी में भारी गिरावट आई ?

दूसरा, नीति आयोग की रिपोर्ट में 2015-16 और 2019-21 के बीच गरीबी में 9.89% या 135 मिलियन की भारी कमी देखी गई है। संयोग से ये आर्थिक मंदी के वर्ष थे। इसके बाद 2020-21 का महामारी वर्ष आया। जब पहले दस वर्षों में 280 मिलियन लोग गरीबी से बाहर आये थे, तो इन समस्याग्रस्त वर्षों में 135 मिलियन लोग गरीबी से बाहर आये? इसके बावजूद कि विश्व बैंक ने सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) द्वारा आयोजित उपभोक्ता पिरामिड घरेलू सर्वेक्षण (CPHS) का उपयोग किया और दिखाया कि महामारी के कारण 2020 में भारत में 23 मिलियन (2.3 करोड़) लोगों को गरीबी में धकेल दिया गया था। इसमें स्पष्टीकरण की आवश्यकता है लेकिन न ही नीति आयोग रिपोर्ट और न यूएनडीपी वैश्विक रिपोर्ट इस संबंध में कोई ठोस स्पष्टीकरण देती है।

इसके अलावा, अगर गरीबी में अचानक गिरावट आई है, तो सरकार ने खुद 81.35 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न देने का फैसला क्यों किया है? सरकार ने 2022-23 के लिए खाद्य सब्सिडी के लिए 2.07 लाख करोड़ रुपये भी क्यों आवंटित किए हैं?

गरीबी के अनुमान पर पहुंचने के लिए 2017-18 के NSSO घरेलू उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण का उपयोग किया जा सकता था, लेकिन उस रिपोर्ट को मोदी सरकार ने डेटा गुणवत्ता के नाम पर रद्द कर दिया था, क्योंकि यह मोदी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से परेशानी पैदा करने वाला था। इसमें गरीबी की व्यापकता में वृद्धि देखी गई थी।

कुछ विरोधाभासी संकेतक

यदि लगभग 15% भारतीय ही गरीब हैं, तो 2021 में भारत में वृद्धावस्था पेंशन के लाभार्थियों की संख्या 8 करोड़ होने का अनुमान कैसे है?

केवल धन की आय ही जीवन की गुणवत्ता तय करने में मायने नहीं रखती। बहुआयामी गरीबी सूचकांक कथित तौर पर स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा के अभाव को ध्यान में रखता है।

आयुष्मान भारत की शुरुआत के बावजूद, भारत में जेब से इलाज पर खर्च (यानी निजी अस्पतालों में इलाज में खर्च किया गया पैसा) अभी भी 47.1% के उच्च स्तर पर क्यों है?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बावजूद लगभग 25% ग्रामीण स्कूली छात्र और 49% शहरी बच्चे प्रति वर्ष लगभग 1.25 लाख रुपये की निजी स्कूलों की लागत के बावजूद महंगे निजी स्कूलों का चयन क्यों करते हैं? क्या सरकार यह पता लगाने के लिए सर्वेक्षण कर सकती है कि निजीकरण के इस युग में शिक्षा की उच्च लागत के कारण कितने लोग गरीबी में धकेल दिए गए हैं? मार्च 2023 के ILO आंकड़ों के अनुसार, भारत में 5 से 14 वर्ष की आयु के बीच 10 मिलियन कामकाजी बच्चे हैं। क्या यह स्थिति गरीबी के कारण नहीं है?

उसी एनएफए-5 सर्वेक्षण के अनुसार 15-49 आयु वर्ग की महिलाओं में एनीमिया 57% के उच्च स्तर पर है। क्या इसका गरीबी से कोई संबंध नहीं है? यदि गरीब केवल 15% से कम हैं, तो महिलाओं के इतने बड़े प्रतिशत को पोषण क्यों नहीं मिल रहा है? फिर,एनएफएचएस-5 के अनुसार 2021 में 35.5% बच्चे बौने हैं; लगभग एक तिहाई बच्चे कम वजन वाले भी हैं! यदि मोदी के शासनकाल में गरीबी तेजी से कम हो रही है, तो ये आंकड़े इतने ऊंचे क्यों बने हुए हैं?

ऑक्सफैम की जनवरी 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आर्थिक असमानता बहुत अधिक है तो गरीबी इतनी कम कैसे है? ऑक्सफैम द्वारा 17 जनवरी 2022 की एक संक्षिप्त जानकारी से यह भी पता चला कि 84% भारतीय परिवारों ने महामारी के कारण आय में गिरावट का अनुभव किया। क्या यह गरीबी में तीव्र गिरावट का संकेत देता है?

वर्ष 2016 में भारत में औसत जीवन प्रत्याशा 68.67 थी।? 2021 में यह 69.96 था। 2021 में श्रीलंका में जीवन प्रत्याशा 76.39 और बांग्लादेश में 71.97 थी। क्या भारत में छह वर्षों में जीवन प्रत्याशा में मामूली सी गिरावट गरीबी में तेज गिरावट का संकेत है?

अनौपचारिक श्रमिक और उनकी अल्प मज़दूरी

ILO की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 85% गैर-कृषि कार्यबल अनौपचारिक श्रमिक हैं। 92.37% अनौपचारिक श्रमिकों की मासिक आय 10,000 रुपये से कम या प्रतिदिन 333 रुपये से कम है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है कि यदि परिवार की आय 27,000 रुपये प्रति माह से कम है तो वह परिवार बीपीएल श्रेणी में आता है, और इंदिरा आवास योजना जैसी केंद्रीय कल्याण योजनाओं का हकदार है। तमिलनाडु जैसे अत्यंत विकसित राज्य ने निर्णय लिया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 6400 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 11,850 रुपये से कम कमाने वाला व्यक्ति बीपीएल राशन कार्ड का हकदार होगा। ये आंकड़े सरकार के ही हैं। अंतिम गणना के अनुसार, 27.69 करोड़ अनौपचारिक श्रमिकों ने श्रम मंत्रालय के ई- श्रम पोर्टल पर अपना पंजीकरण कराया है! क्या नीति आयोग पोर्टल के समान ये आंकड़े गरीबी में नाटकीय कमी दर्शाते हैं??

प्रचारित करने से पहले सरकार को ऐसी रिपोर्टों की उच्च प्रतिष्ठित स्वतंत्र शिक्षाविदों से समीक्षा करानी चाहिए थी।

अजीब बात है कि रिपोर्ट में वृद्धों, शारीरिक रूप से अक्षम और एकल महिलाओं, जो सबसे कमजोर वर्ग हैं उनके बीच गरीबी की व्यापकता के अलग-अलग आंकड़े नहीं दिए गए हैं। इसलिए इस नीति आयोग द्वारा इन वर्गों को लक्षित करने के लिए कोई विशेष कार्यक्रम प्रस्तावित नहीं किया गया है जिसका एक सूत्रीय एजेंडा मौजूदा शासकों की चापलूसी ही प्रतीत होता है।

भूटान जैसा एक छोटा पड़ोसी देश सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता सूचकांक लाता है और वार्षिक प्रसन्नता रिपोर्ट (Gross National Happiness Report) जारी करता है। यदि नीति आयोग अप्रसन्नता रिपोर्ट बनाए, तो भारत टॉप पर होगा! इसके लिए भारतीय शासक अधिक श्रेय ले सकते हैं।

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