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लोकसभा चुनाव 2024: मायावती के ‘एकला चलो’ के सियासी मायने

हालांकि मायावती ने अपने लिए सभी रास्ते बंद नहीं किए हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि चुनाव के बाद हम विचार करेंगे कि कौन सी सरकार सही है, और फिर उसके साथ जाने पर निर्णय लिया जाएगा।
Mayawati
फ़ोटो : PTI

‘इंडिया’ गठबंधन के दो बड़े दल कांग्रेस और सपा बहुत वक्त से एक-दूसरे को आंखें गुरेर रहे थे, क्योंकि कांग्रेस कह रही थी मायावती के जन्मदिन पर हम उनके साथ बैठक करेंगे तो सपा कह रही थी कि अगर ‘इंडिया’ में मायावती की एंट्री होती है तो हम एग्ज़िट कर जाएंगे।

अब अपने जन्मदिन पर यानी 15 जनवरी को मायावती ने इन दोनों पार्टियों के साथ-साथ पूरे ‘इंडिया’ गठबंधन को और भाजपा को एक बड़ा सियासी तोहफा दिया है। यानी मायावती ने ये साफ कर दिया है कि न तो वो ‘इंडिया’ के साथ हैं और न ही ‘एनडीए’ के।

मायावती ने ये ऐलान किया है कि उनकी पार्टी आने वाले लोकसभा चुनाव में अकेली चुनाव लड़ेगी। इतना ही नहीं मायावती ने ये भी बता दिया कि भले ही उन्होंने आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया मग़र वो राजनीति से संन्यास लेने वाली नहीं है और आख़िरी सांस तक अपनी पार्टी की सेवा करती रहेंगी।

ख़ैर.. मायावती की ओर से उनके जन्मदिन पर दिए गए इस सियासी तोहफे के मायने क्या हैं, और उन्होंने कहा क्या है? जानते हैं…

मायावती ने कहा कि गठबंधन करने से पार्टी को फायदा कम, नुकसान ज्यादा होता है और हमारा वोट प्रतिशत भी घट जाता है और अन्य दल के फायदा पहुंच जाता है, इसलिए अधिकांश पार्टी बसपा से गठबंधन कर चुनाव लड़ना चाहती हैं। हमारी पार्टी अकेले ही लोकसभा चुनाव लड़कर बेहतर नतीजे लाएगी। हम इसलिए चुनाव अकले लड़ते हैं क्योंकि इसका सर्वोच्च नेतृत्व एक दलित के हाथ है, गठबंधन करके बसपा का पूरा वोट गठबंधन की पार्टी को चला जाता है जबकि उस गठबंधन का वोट, विशेषकर अपर कास्ट वोट बसपा को नहीं मिलता है।

मायावती ने सपा को ‘गिरगिट’ की उपाधि दे दी

दरअसल इंडिया गठबंधन की दिल्ली बैठक में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बसपा के साथ बातचीत को लेकर तल्ख तेवर दिखाए थे, उन्होंने कहा था कि अगर मायावती की पार्टी गठबंधन में आई तो उनकी पार्टी को भी अपना स्टैंड क्लियर करना पड़ेगा, अखिलेश ने इंडिया गठबंधन से सपा के बाहर जाने तक की बात कह दी थी। मायावती ने इंडिया गठबंधन की इसी बैठक का जिक्र करते हुए अखिलेश यादव को गिरगिट तक बता दिया।

मायावती ने कहा कि सपा प्रमुख ने जिस तरह बसपा प्रमुख को लेकर गिरगिट की तरह रंग बदला है, इससे भी सावधान रहना है। मायावती ने कहा कि कांग्रेस, भाजपा और इनकी सभी सहयोगी पार्टियों की सोच पूंजीवादी, सामंतवादी और सांप्रदायिक है। यह पार्टियां दलितों और अति पिछड़ों को अपने पैरों पर खड़ा होते नहीं देख सकती हैं। आरक्षण का भी पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

‘ग़ुलामी का टूल है फ्री राशन स्कीम’

मायावती ने भाजपा को भी आड़े हाथों लिया और उनकी फ्री राशन स्कीम को गुलामी का टूल बता दिया। उन्होंने कहा कि हमने उत्तर प्रदेश में अपनी चार बार की सरकार में सभी वर्गो के लिए काम किया, अल्पसंख्यक, गरीब, किसान और अन्य मेहनतकश लोगों के लिए जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू की थीं। उन्होंने कहा कि सरकारें नाम और स्वरूप बदलकर उन योजनाओं को अपना बनाने का प्रयास कर रही हैं लेकिन जातिवादी होने के कारण यह काम नहीं हो पा रहा है। मायावती ने कहा कि रोजगार के साधन देने की बजाय फ्री में थोड़ा सा राशन आदि देकर इनको अपना गुलाम बना रहे हैं।

क्योंकि ये बयान सियासी थे, इसलिए मायावती ने अपने लिए सभी रास्ते बंद नहीं किए हैं, उन्होंने आख़िर में ये भी कह दिया चुनाव के बाद हम विचार करेंगे कि कौन सी सरकार सही है, और फिर उसके साथ जाने पर निर्णय लिया जाएगा।

यूपी में सपा-बसपा की तकरार होगी कम?

इतना तो कहा जा सकता है कि अब सीटों के बंटवारे को लेकर प्रदेश में सपा और कांग्रेस एक मंच पर बैठ सकती हैं, क्योंकि इनके बीच कोई तीसरा नहीं है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि अब सपा ख़ुद को बड़ा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। क्योंकि कांग्रेस के हैं महज़ 2 विधायक और एक सांसद। जबकि सपा के पास हैं 111 विधायक और तीन सांसद। हालांकि हमें भूलना नहीं चाहिए कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राहुल-अखिलेश एक गाड़ी पर ही घूमे थे, और दोनों का ही हश्र बहुत अच्छा नहीं हुआ था।

ख़ैर... मायावाती ने अकेले चुनाव लड़ने के लिए जिस नफा-नुकसान को आधार बनाया है, उसके लिए उन्होंने कुछ आंकड़ें भी रखे हैं... मायावती के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सपा के साथ 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में गठबंधन करने का फायदा बसपा को नहीं मिला था, बसपा 67 सीटें ही जीत सकी थी जबकि सपा को गठबंधन का ज्यादा लाभ मिला था। इसके बाद 1996 में कांग्रेस के साथ बसपा ने उत्तर प्रदेश में गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, जिसमें पार्टी 67 सीटें ही जीतकर आई थी। इस चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा फायदा मिला था और 2002 चुनाव में अकेले लड़ी थी और लगभग 100 सीटें आईं थी। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा ने अकेले लड़कर सरकार बना ली थी जबकि यह चुनाव ईवीएम से हुआ था। अब ईवीएम में काफी धांधली हो रही है, इसलिए बसपा को नुकसान हो रहा है। ईवीएम में धांधली को लेकर आवाजें उठने लगी हैं और हमें उम्मीद है कि जल्द ही ईवीएम पर रोक लगेगी, ऐसी उम्मीद है।

ख़ैर.. मायावती ने तो अपने आंकड़े दे दिए और गठबंधन से नुकसान भी गिना दिए, मग़र असल कहानी क्या है वो देखिए...

सबसे पहले साल 2019 के लोकसभा चुनाव पर ही आते हैं, तब मायावती ने सपा के साथ अपनी सारी पुरानी रार भुलाकर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के साथ एक मंच पर आने का फैसला किया था, जो सही भी साबित हुए, क्योंकि इस चुनाव में मायावती की बसपा ने प्रदेश में 10 लोकसभा सीटें जीत ली थीं, जबकि अखिलेश की सपा को सिर्फ 5 सीटें मिली थीं। यानी मायावती फायदे में रहीं, क्योंकि इससे पहले वाले लोकसभा चुनाव यानी 2014 में मायावती की बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी।

फिर बात 1996 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की, जिसमें मायावती का कहना है कि वो कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थीं, लेकिन उनके खाते में सिर्फ 67 सीटें ही आई थीं। यहां आपको बता दें कि मायावती की सीटें भले ही 67 आई हों लेकिन उनके वोट शेयर में ज़बरदस्त उछाल आया था जो 11.12 प्रतिशत से बढ़कर 19.64 हो गया था।

कुछ ऐसे ही बसपा 1989 और 1993 के विधानसभा चुनाव में रही। उत्तर प्रदेश के 1989 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बसपा लड़ी और 13 विधायक जीतने में सफल रहे, राम मंदिर आंदोलन की लहर में हुए 1991 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की एक सीट घट गई और 12 प्रत्याशी जीते। फिर कांशीराम ने अपनी रणनीति में बदलाव किया और 1993 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाया, असर ये हुआ कि अगले विधानसभा चुनाव में उसके 67 विधायक जीतने में सफल रहे, इस तरह पहली बार बसपा सत्ता की हिस्सेदार बनी, लेकिन 1995 में गेस्टहाउस कांड के कारण यह गठबंधन टूट गया। इसके बाद 1996 में हुए विधानसभा चुनाव में भी उसके 67 विधायक चुनकर आए, जब भाजपा के सहयोग से मायावती मुख्यमंत्री बनीं।

वहीं बात अगर लोकसभा की करें तो साल 1989 के लोकसभा चुनाव में बसपा के दो सांसद जीतने में सफल रहे, फिर 13वीं लोकसभा के चुनाव यानी 1999 में 14 सीटें जीतने में सफल रहे, इसके बाद 2004 में उसके 17 सांसद जीते। साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव तो बसपा के लिए बहुत ही ज़बरदस्त रहे और पार्टी की ओर से 21 सांसद चुने गए, इसके पीछे एक कारण ये भी था कि प्रदेश में बसपा की ही सरकार थी और मायावती मुख्यमंत्री थीं। हालांकि 2014 में इनकी सीटें ज़ीरो हो गईं और फिर 2019 में सपा के साथ गठबंधन कर बसपा ने 10 सीटें जीत लीं।

इन सीटों को देखकर ये कहना ग़लत होगा कि मायावती गठबंधन के साथ रहीं तो उन्हें बहुत ज़्यादा नुकसान सीटों या वोटों का नुकसान हुआ, हां ये ज़रूर कहा जा सकता है कि मायावती की पार्टी के साथ गठबंधन कर बाकी पार्टियों ने इनके वोट बैंक पर सेंधमारी ज़रूर की।

इसको आप ऐसे समझ सकते हैं कि मायावती की पार्टी के कई बड़े नेता भाजपा, कांग्रेस और सपा में शामिल हो गए। चाहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी हों या फिर स्वामी प्रसाद मौर्य।

स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ मिलकर तो अखिलेश यादव ने रायबरेली में बसपा के संस्थापक कांशीराम की प्रतिमा का अनावरण भी किया और दलित समाज को एक संदेश देने की कोशिश की। फिर साल 2014 के बाद चुनाव-दर-चुनाव ये भी देखा गया कि मायावती के कोर दलित वोटर भाजपा या सपा की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। जिसका उदाहरण उत्तर प्रदेश की विधानसभा में पार्टी का सिर्फ एक विधायक होना है।

फिलहाल मायावती अब अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाने में भी जुटी हैं। ये बात हम इसलिए कह रहे हैं कि क्योंकि उन्होंने इस बात के संकेत भी दिए है कि वो चुनाव के बाद विचार कर किसी न किसी पार्टी को समर्थन कर सकती हैं।

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