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मिशन-2021 : सफाई कर्मचारियों की स्वाभिमान यात्रा के मायने

मिशन-2021 का लक्ष्य है पूरे भारत से शुष्क शौचालय का ध्वस्तीकरण। इसके साथ ही गटर-सीवर-सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को रोकना।
Swabhiman Yatra

हाल ही में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखण्ड में सफाई कर्मचारियों ने मिशन-2021 के तहत  स्वाभिमान यात्राओं का आयोजन किया। इसके अंतर्गत, पदयात्रा, साइकिल रैली, बाइक रैली निकाली गईं। पर्चे बांटे गए। ये यात्राएं सफाई कर्मचारी आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने निकाली। आखिर क्यों निकालनी पड़ीं उन्हें ये यात्राएं?

क्या है मिशन-2021?

सफाई कर्मचारी आंदोलन (एसकेए) चाहता है कि पूरे देश में कहीं भी कोई शुष्क शौचालय न हो। जाहिर है कि जब शुष्क शौचालय नहीं होंगे तो शुष्क शौचालयों से मानवमल सफाई का काम भी नहीं होगा। इस तरह मैला प्रथा का एक अमानवीय पक्ष समाप्त हो जाएगा। मिशन-2021 का लक्ष्य है पूरे भारत से शुष्क शौचालय का ध्वस्तीकरण। इसके साथ ही गटर-सीवर-सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों को रोकना।

आज तकनीक का जमाना है। सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई मशीनों से होनी चाहिए ताकि किसी इंसान की जान न जाए। पर जातिवादी मानसिकता वाली सरकारें सफाई समुदाय के लोगों के बारे में ऐसे विचार रखती हैं कि इनका तो जन्म ही सफाई करने के लिए हुआ है। और ये सस्ते में उपलब्ध हैं तो क्यों मशीने खरीदने में पैसे खर्च किए जाएं। अगर सफाई कर्मचारी सफाई के दौरान मर भी जाते हैं तो सरकारों को फर्क नहीं पड़ता।

उत्तर प्रदेश, लखनऊ में रैली में भाग लेने वालों का प्रतिनिधित्व करने वाली डॉ. रिनिका प्रिया से पूछने पर उन्होंने बताया कि- “इस देश में जो जातिवादी व्यवस्था सदियों से व्याप्त है उसकी वजह से हम सफाई कर्मचारी समुदाय पर न केवल गन्दगी साफ़ करने यहां तक कि मानव मल साफ़ करने जैसे अमानवीय कार्य भी थोपा गया है। इतना ही नहीं,  जाति के आधार पर हम से भेदभाव किया जाता है। छूआछूत की जाती है। हमारी मानवीय गरिमा को आहत किया जाता है। जैसे कि हमारा कोई मान-सम्मान ही नहीं है। हमारा कोई स्वाभिमान ही नहीं है। देश का संविधान नागरिक के रूप में हमसे कोई भेदभाव नहीं करता फिर समाज द्वारा क्यों हमारे आत्मसम्मान से खिलवाड़ किया जाता है?“

उन्होंने कहा –“हम चाहते हैं कि देशभर में जितने भी शुष्क शौचालय हैं उनका ध्वस्तीकरण किया जाए या जल चालित शौचालयों में तब्दील किया जाए ताकि मानव मल ढोने की यह अमानवीय प्रथा बंद हो”। उन्होंने आगे कहा कि –“इस देश में मैला प्रथा के खिलाफ दो-दो कानून बन चुके हैं – एक वर्ष 1993 में और दूसरा 2013 में। इतना ही नहीं माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी 27 मार्च 2014 को अपने एक आदेश में स्पष्ट कहा है कि लोगों से मानव मल  ढुलवाना एक दंडनीय अपराध है। बावजूद इसके प्रशासन मैला ढुलवाने वाले लोगों को दण्डित नहीं कर रहा है। प्रशासन इसे बहुत हल्के में ले रहा है। तो हमारी प्रशासन के प्रति जो नाराजगी है उसे जताने और उसे यह बताने के लिए स्वाभिमान यात्रा निकाल रहे हैं कि हम भी इंसान हैं। हमारा भी सम्मान है, स्वाभिमान है। इसके साथ ही हम अपने सफाई समुदाय को भी संदेश देना चाहते हैं कि हम किसी भी जाति विशेष के नागरिक से कम नहीं हैं। हमें भी आत्मसम्मान के साथ, स्वाभिमान के साथ जीने का हक है।...”

सीतापुर के स्वाभिमान यात्रा के आयोजक  अजय प्रकाश बताते हैं कि –“हमने स्वाभिमान यात्रा बाइकों पर निकाली। हमने समाज में एक संदेश देने की कोशिश की है कि हमें भी समाज में सम्मान से जीने का हक है। हमारा भी स्वाभिमान है। बस्स बहुत हो चुका हमसे भेदभाव और हमें नीचा समझना। आज हमारी भी उतनी ही अहमियत है जितनी किस अन्य जाति-वर्ग की। हम बाबा साहेब अम्बेडकर को मानते हैं। उनके बनाए संविधान का पालन करते हैं। संविधान हमें एक नागरिक के तौर पर मान-सम्मान और गरिमा के साथ जीने का हक़ देता है।

बहुत दुखद है कि आज भी उत्तर प्रदेश में मानव मल ढोना जारी है। हम इस अमानवीय प्रथा का उन्मूलन चाहते हैं। आखिर एक इंसान का मल दूसरा इंसान क्यों ढोए? क्यों ये अमानवीय प्रथा जारी रहे? हमारी जाति के लोग अब और मानव मल नहीं ढोएंगे। पर सरकार हमारी समस्या को गंभीरता से नहीं ले रही है। मैलाप्रथा के खिलाफ कानून होने पर भी जातिवादी मानसिकता से ग्रसित सरकार इन्हें लागू नहीं करती। वो हमें हमेशा सफाई कर्मचारी बनाए रखना चाहती है। हमारा सन्देश सरकार के लिए भी है कि वो हमसे मानव मल न ढुलवाए, सीवर-सेप्टिक टैंक की सफाई के नाम पर हमारी हत्या न करे। हमारी मुक्ति और पुनर्वास करे। ताकि हम भी इज्जत की जिंदगी जीयें और गरिमा तथा  स्वाभिमान के साथ जीवन यापन करें। हम सरकार को ये चेतावनी देना चाहते हैं कि हमारा इज्जतदार पेशे में पुनर्वास कर दे। हमें आंदोलन  करने को विवश न करे...।”  

उन्होंने कहा –“हमारा संविधन जाति, लिंग, नस्ल, क्षेत्रा, भाषा आदि के आधार पर किसी भी नागरिक से किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करता है। पर हमारी सामाजिक और प्रशासन व्यवस्था जाति के आधार  पर भेदभाव करती है खासतौर से हम सफाई कर्मचारियों के साथ बहुत भेदभाव होता है। प्रशासन की जातिवादी मानसिकता हमें हमारे अधिकारों से वंचित करती है।

गौरतलब है कि सफाई कर्मचारी आंदोलन पिछले तीस-पैंतीस सालों से भारत से मैलाप्रथा उन्मूलन और सफाई कर्मचारियों की मुक्ति और पुनर्वास के लिए काम कर रहा है। यह एक राष्ट्रीय आंदोलन है और बाइस राज्यों में काम कर रहा है। उत्तर प्रदेश में यह मैलाप्रथा उन्मूलन और सफाई कर्मचारियों की मुक्ति तथा पुनर्वास के लिए काम कर रहा है। आज भी देश भर में सेप्टिक टैंक-सीवर सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की मौतें हो रही हैं।

गाज़ियाबाद में बाइक रैली के आयोजक मयंक झिंझोट कहते हैं कि –“सरकारी मानसिकता तो हमें हमारी इसी दयनीय स्थिति में रखना चाहती है। क्योंकि उसकी नजर में हमारा काम सफाई करना ही है। इस मनुवादी व्यवस्था के तहत सदियों से हमारे पूर्वज सफाई का ही तो काम करते आ रहे हैं। और मनुवादी मानसिकता यही चाहती है कि आगे भी हम सफाई के कार्य में ही लगे रहें। जैसे हमारा जन्म ही इनकी गंदगी साफ करने के लिए हुआ है। क्या हमारा कोई मान-सम्मान नहीं है? क्या हमारा स्वाभिमान नहीं है?”

वह आगे कहते हैं - “बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने हमें मानवीय गरिमा से जीना सिखाया। उन्होंने हमें तीन मूल मंत्र दिए - ‘‘शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो।’’ इन्हीं को हमने जब अपनाने का प्रयास किया। उनके द्वारा बनाया गया देश का संविधन पढ़ा। तब हमारे अंदर चेतना आई। हम जागरूक हुए। हमें ज्ञान हुआ कि हमें भी मानवीय गरिमा के साथ जीने का हक है। आज हमें अपनी युवा पीढ़ी को उच्च शिक्षित बनाना है, सभी दलितों को एकसाथ आकर संगठित होना है और मिलकर संघर्ष करना है। बाबा साहेब ने सही कहा है कि अधिकार मांगने से नहीं मिलते, इन्हें छीनना पड़ता है। और छीनने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए हमने  संघर्ष करने के लिए अपनी कमर कस ली है। हम लड़ेंगे और जीतेंगे। इसी भावना के साथ हम सब एक हो रहे हैं और अपने अधिकारों को पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार से अपनी मांगे मनवाने के लिए एकजुट होकर मुहिम चला रहे हैं। हम चाहते हैं कि नागरिक समाज भी हमारी इस मुहिम में, हमारी इस स्वाभिमान यात्रा में हमारे सहभागी बने। हमारी साइकल यात्रा/बाइक यात्रा/जीप यात्रा में तन-मन-धन  से यथायोग्य सहयोग करें। हम हमारी हक-अधिकार पाने, सम्मान पाने और मानवीय गरिमा से जीने के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। हम इन से वंचित हैं तो इन्हें पाने की लड़ाई भी हमें खुद ही लड़नी होगी। पर हमें इतना विश्वास है कि हम एकजुट होकर लड़गें तो जीतेंगे अवश्य और पूरे स्वाभिमान और सम्मान से जीएंगे। स्वाभिमान की इस लड़ाई में आईए हम सब मिलकर एकता का परिचय दें और कहें हम सब एक हैं। हम जीएंगे शान से, स्वाभिमान से।“

(लेखक सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)  

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