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NCRB डेटा: देश में किसान-मज़दूरों की आत्महत्या के मामले बढ़े!

“जब NCRB के आकंडे कहते हैं कि पारिवारिक कारणों या बीमारी से ज़्यादातर मज़दूरों ने आत्महत्या की है तो इसका एक बहुत बड़ा कारण आर्थिक तंगी भी है।”
NCRB
प्रतीकात्मक तस्वीर।

बीते कुछ सालों में केंद्र और सरकारों ने किसान-मज़दूरों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए हालांकि NCRB यानी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताज़ा आंकड़ों में इन दावों की हक़ीक़त कुछ और ही नज़र आती है। NCRB के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ देश में किसान-मज़दूरों की आत्महत्या में बढ़ोतरी हुई है।

आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल 2022 में, इस तरह की 01 लाख 70 हज़ार 924 आत्महत्याएं दर्ज की गई थीं जबकि 2021 में ये आंकड़ा 1,64,033 था। यानी साल 2021 की तुलना में 4.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि ज़्यादातर मामलों में मज़दूरों ने पारिवारिक समस्याओं और बीमारी के कारण आत्महत्या की है। जहां पारिवारिक समस्याएं 31.7% और बीमारी 18.4% थी, वहीं बेरोज़गारी और पेशेवर मुद्दे क्रमशः 1.9% और 1.2% थे।

4 दिसंबर, 2023 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक़, लगातार तीसरे साल महाराष्ट्र में आत्महत्या के सबसे अधिक मामले (22,746) दर्ज किए गए, इसके बाद कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश का नंबर है।

इन आकड़ों को देखें तो पता चलता है कि ख़ुदकुशी के मामले में देश का मेहनतकश वर्ग सबसे ऊपर है। इस आकड़ों मे एक तिहाई आत्महत्या किसान और खेत मज़दूरों ने की है। इसके बाद सबसे अधिक आत्महत्या के मामले दैनिक दिहाड़ी मज़दूरों के हैं, जिसकी संख्या 44,713 है जो कुल आंकड़े का क़रीब 26.4 प्रतिशत है। ये आंकडा पिछले साल की तुलना मे 1% अधिक था।

इसके अलावा प्रोफेशनल यानी पेशेवरों की बात करें, तो ख़ुदकुशी के मामले में इनकी संख्या 9.2 प्रतिशत है, जिसमें 14,395 वेतनभोगी और 18,357 स्व-रोज़गार वाले लोग शामिल हैं। बेरोज़गारी के कारण होने वाली आत्महत्या को देखें तो यह 9.2 प्रतिशत है, जहां साल 2021 में इस तरह के 3,541 मामले रिपोर्ट किए गए, वहीं 2022 में यह संख्या मामूली रूप से कम - 3,170 दर्ज की गई।

देशभर में मज़दूरों की आत्महत्या में बढ़ोतरी दिखाने वाले इन आंकड़ों को लेकर हमने सेंट्रल ट्रेड यूनियन सीटू के राष्ट्रीय सचिव सुदीप्त घोष से बात की। उन्होंने कहा कि सबसे चिंताजनक बात ये है कि ये आंकड़े हर साल बढ़ रहे हैं।

सुदीप्त घोष कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में लोगों की क्रय शक्ति कम हुई है जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही बेरोज़गारी अपने चरम पर है। इसी का परिणाम है कि लोगों की सेविंग यानी बचत भी 5 प्रतिशत तक कम हुई है। जब NCRB के आकंडे कहते हैं कि पारिवारिक कारणों या बीमारी से ज़्यादातर मज़दूरों ने आत्महत्या की है तो इसका एक बहुत बड़ा कारण आर्थिक तंगी भी है।”

NCRB के अनुसार, 1,09,875 यानी 64.3 प्रतिशत आत्महत्या करने वाले व्यक्तियों की वार्षिक आय एक लाख रुपये से कम है। पिछले पांच वर्षों में आत्महत्याओं की संख्या में 27.06 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है और शहरी क्षेत्रों में आत्महत्या दर (16.4) अधिक थी।

सुदीप्त ने कहा कि "ये आंकड़े सरकारों के झूठे विकास के दावों की पोल खोलते हैं। पहले, किसान आत्महत्या ज़रूर करते थे लेकिन मज़दूरों के मामले में ऐसा नहीं था। मज़दूर काम के लिए प्रवास ज़रूर करते थे और कुछ भी करके अपना जीवनयापन करते थे लेकिन बीते सालों में मज़दूर भी अपनी जान दे रहे हैं। ये आंकड़ा बड़े शहरों मे भी बढ़ रहा है जो ज़्यादा गंभीर है। ये दिखाता है कि मज़दूर नाउम्मीद और हताश हैं और यही कारण है कि वे अपनी जान दे रहे हैं।"

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