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कुलियों के बीच पहुंचे राहुल, सुनी परेशानी

दिल्ली के आनंद-विहार रेलवे स्टेशन पहुंचकर राहुल गांधी ने कुलियों से मुलाकात की, इस दौरान वो खुद भी कुली बनकर बोझ उठाते नज़र आए। कुलियों ने भी राहुल को अपनी समस्याएं बताईं।
Rahul gandhi

लाल शर्ट और हाथ में बिल्ला...इस जुगलबंदी का नाता हिंदुस्तान के रेल यात्रियों के साथ बहुत गहरा है। देश के किसी भी हिस्से में कहीं भी सफर के बाद आपकी ट्रेन रेलवे स्टेशन पर जब धीमी होती है, तो ट्रेन की रफ्तार से अपनी रफ्तार मिलाते हुए कुछ लोग ‘कुली-कुली’ की आवाज़ लगाते हुए दिखाई पड़ते हैं। आप ट्रेन से कदम नीचे भी नहीं रख पाते कि वो आकर आपके सामने खड़े हो जाते हैं, और आपके बोझ को खुद के कंधों पर उठाकर बाहर तक छोड़ कर आते हैं।

ठीक इसी तरह सफर की शुरुआत में भी लाल कमीज़ और हाथ में बिल्ला पहने कुली मिल जाते हैं, ताकि स्टेशन के बाहर से आपका सामान लेकर आपको ट्रेन में सुव्यवस्थित तरह से बैठा दें, और आपकी यात्रा मंगलमय हो सके।

ये कुली आपके बोझ को उठाने के बदले आपसे कुछ रुपये लेते हैं, और इसी के सहारे अपने परिवार का और अपना पेट पालते हैं। अब ख़ुद सोचिए कि आप इन्हें सामान उठाने के लिए कितने रुपये देते हैं? क्या इससे इनके परिवार का गुज़ारा हो जाता है? अगर ये रेलवे का अहम हिस्सा हैं, तो इन्हें सरकार की ओर से सुविधाएं क्यों नहीं दी जाती है?

इन कुलियों से जुड़े ये सवाल इस वक़्त चर्चा में इसलिए हैं क्योंकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी 21 सितंबर की सुबह अचानक दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर कुलियों से मिलने पहुंच गए। इस दौरान राहुल ने लाल शर्ट पहनी और 756 नंबर की बिल्ला बाहों पर चढ़ा लिया, फिर एक बैग उठाकर कुलियों की तरह चलते दिखाई पड़े जिसे आप नीचे इस वीडियो में देख सकते हैं:

इस वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे राहुल गांधी के लिए ज़िंदाबाद के नारे लग रहे हैं। अगर राजनीतिक लिहाज़ से देखा जाए कांग्रेस को 2024 के चुनाव से पहले इन नारों की ही दरकार सबसे ज़्यादा है और यही कारण है कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल गांधी की सक्रियता छोटे कामगारों के बीच बहुत ज़्यादा बढ़ गई है।

इस वीडियो के अलावा कांग्रेस पार्टी के ट्वीटर हैंडल से कुछ तस्वीरें शेयर की गई हैं, जिसमें राहुल कुलियों के साथ बातचीत करते हुए और तस्वीरें खिंचवाते हुए दिखाई पड़ रहे हैं।

कुलियों के प्रधान हारून समेत अन्य ने राहुल गांधी से बताया कि इस स्टेशन पर 165 कुली हैं। इतने कुलियों के लिए छोटा-सा विश्राम गृह बना हुआ है। मांग करने के बावजूद उसका दायरा नहीं बढ़ाया जाता। विश्राम गृह की लाइटें खराब हैं, उन्हें ठीक नहीं किया जा रहा। यहां तक बताया कि पंखे व कूलर की व्यवस्था कुलियों ने अपने स्तर पर की है। दुनिया का बोझ उठाने वालों के लिए कोई पेंशन व्यवस्था नहीं है। एक उम्र के बाद जब कुली काम नहीं कर पाते तो उनका जीवनयापन करना मुश्किल हो जाता है।

इन कुलियों से मिलने के बाद राहुल गांधी ने अपने व्हाट्सएप चैनल पर लिखा - “आज, दिल्ली के आनंद विहार टर्मिनल पर वहां काम करने वाले कुली भाईयों से मुलाकात की। काफ़ी समय से मेरे मन में भी इच्छा थी, उन्होंने भी बहुत प्यार से बुलाया था और भारत के परिश्रमी भाईयों की इच्छा तो हर हाल में पूरी होनी चाहिए।”

राहुल गांधी का यूं कामगारों से किसी भी तरह मिलना राजनीति से बाहर का विषय है, और इसी का हिस्सा आज कुलियों से मुलाकात भी थी। हालांकि भाजपा ने देर न करते हुए राहुल गांधी पर हमला बोल दिया और कहा कि वो सिर्फ दिखावा कर रहे हैं। उन्हें राजस्थान जाना चाहिए, जहां महिलाओं के साथ आए दिन घटनाएं घट रही हैं।

आरोप-प्रत्यारोप से अगर हम आगे बढ़ जाएं तो यहां एक सवाल पीछे छूट जाता है, कि कुलियों के बारे में क्या हमारी सरकार वाकई कुछ सोचेगी और उनके हक़ में फैसले करेगी? क्योंकि कुलियों का एक आरोप ये भी है कि जो थोड़ा-बहुत पैसा कुली पहले कमा लिया करते थे, अब रेलवे में निजीकरण की ओर बढ़ने और आधुनिकीकरण के कारण वो भी नहीं बचा पा रहे हैं।

अब ज़्यादातर यात्री ट्रॉली वाले बैग लेकर सफर करते हैं, या अगर उनके पास बहुत ज़्यादा सामान न हो तो वो कुली की ज़रूरत महसूस नहीं करते हैं। आधुनिकीकरण और तरक्की से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन कुलियों के लिहाज़ वैकल्पिक रास्ते भी ढूंढने की ज़रूरत है। क्योंकि इलेक्ट्रिक सीढ़ियों की सुविधा से पैसेंजर को तो राहत हो गई पर कुली का काम कम हो गया। कई बार तो ये कुली बुज़ुर्ग यात्रियों को देखकर बिना पैसे ही उनकी मदद कर देते हैं, लेकिन कुलियों की मदद के लिए कोई आगे नहीं आता।

इस बार जब सरकार ने बजट पेश किया, उससे पहले कुलियों को बहुत आस थी, कि उनकी कुछ मांगे तो पूरी होंगी और बजट में उनके लिए भी बहुत कुछ होगा। इसी साल सरकार ने अपना बजट पेश किया, जिसमें रेलने को 2.40 लाख करोड़ रुपये आवंटित हुए मगर उसमें कुलियों के हाथ खाली ही रह गए।

हर बार हाथ खाली रह जाने के बावजूद कुली इसी उम्मीद में बेहद कम पैसे में काम करने को मजबूर रहते हैं, कि उन्हें कभी तो स्थाई किया जाएगा, जिसमें कुलियों की कुछ मांगे भी हैं...

* प्रमोशन देकर ग्रुप डी में नौकरी व पेंशन की सुविधा

* आवास की व्यवस्था व मुफ्त ईलाज की सुविधा

* पूरे परिवार के लिए रेलवे पास

* बच्चों को केंद्रीय विद्यालय में शिक्षा की व्यवस्था

* मृत्यु के बाद उनके परिजन को रेलवे में नौकरी

* रेट कार्ड में बदलाव

वैसे तो कुली रेलवे में एक मज़दूर की तरह काम करते हैं, लेकिन इनकी मांग हमेशा से रेलवे में ग्रुप डी के तहत नौकरी की रही है जिसके लिए इन्होंने इसी साल 30 फरवरी को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी किया था।

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दिल्ली के जंतर-मंतर पर “अखिल भारतीय रेलवे कुली संगठन” की तरफ से एक विशाल धरना प्रदर्शन का आयोजन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता इस संगठन के अध्यक्ष मंगत राम सैनी ने की थी। देशभर के अलग-अलग राज्यों से जंतर-मंतर पर पहुंचे कुलियों ने सरकार से गुहार लगाई। इस दौरान कुलियों ने मांग की कि कुलियों को रेलवे में ग्रुप-डी का दर्जा दिया जाए। मांगों को लागू नहीं करने पर बड़ा प्रदर्शन करने की चेतावनी भी दी गई थी।

कुलियों के लिए आख़िरी बार अगर संसद में आवाज़ उठी थी, तो साल 2021 में, जब देश कोरोना काल से थोड़ा स्थिर हुआ था। तब राज्यसभा सांसद डॉ. फौजिया खान ने प्रश्नकाल के दौरान सवाल करते हुए कहा था कि, "भारत में कुल 19 हज़ार 500 कुली हैं जो सालों से रेलवे की सेवा कर रहे हैं, लॉकडाउन में इनके सामने भूखों मरने की नौबत आ गई थी, इसके अलावा अब रेलवे स्टेशनों पर डिजिटिलाइज़ेशन हो रहा है, ऑटोमेशन हो रहा है, जैसे रैंप है, एस्केलेटर, लिफ्ट और ट्रॉली बैग हैं, इसलिए कुलियों का काम भी बहुत कम बचा है।"

फैजिया ने सरकार से पूछा कि "जैसे पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने 2008 में कुलियों को ऊपर उठाने के लिए मौका दिया था तो क्या मंत्री महोदय इस कोरोना महामारी के बैकग्राउंड में कुलियों को नौकरी देने का मौका देंगे?”

इसका जवाब देते हुए पीयूष गोयल ने कहा था कि "लालू प्रसाद यादव ने ज़रूर कुछ कुलियों को सर्विस देने का ऑफर दिया था, लेकिन हमने जब उसका डाटा निकाला तो पाया कि अधिकांश लोग, जिन्होंने जॉब स्वीकार की थी, वे थोड़े महीनों बाद वापस चले गए।"

वहीं जॉब छोड़ने का तर्क देते हुए पीयूष गोयल ने बताया था कि कुलियों से सख्त काम नहीं किया जा रहा था। गोयल ने कहा कि सभी चाहते थे कि उन्हें एमटीएस बना दीजिए जो मल्टी टास्क सर्विस करते हैं, एक प्रकार से ऑफिस के चपरासी की तरह होते हैं। लेकिन रेलवे में आज के दिन उनकी आवश्यकता नहीं है। वास्तव में वह बहुत सरप्लस हैं।

साल 2021 के बाद कुलियों की बात बहुत ज़्यादा नहीं उठाई गई, ऐसे में एक बात तो समझनी होगी कि जब तक सरकार कुलियों को पक्का नहीं करेगी तब तक उनकी बाकी मांगों, जैसे पेंशन, मेडिकल, मृत्यु होने पर आश्रितों को नौकरी जैसी मांगों का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। सही मायने में रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड पर काम करने वाले कुलियों के बेहतर भविष्य की तरफ सरकार को ध्यान देना चाहिए।

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