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आम चुनाव 2024: अमेठी और वायनाड क्यों छोड़ें राहुल ?

राहुल गांधी की सीट को लेकर ही सवाल क्यों उठाये जा रहे हैं? यही सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह को लेकर तो नहीं उठाये जा रहे हैं।
Rahul
फोटो साभार : ट्विटर

आजकल जितनी चर्चा राहुल गांधी की न्याय यात्रा की नहीं हो रही है उससे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि वे कहां से चुनाव लड़ेंगे। अमेठी से या वायनाड से? या दोनों ही जगहों से ? या अमेठी से लड़ेंगे भी या नहीं ? ये सब अभी काल्पनिक सवाल हैं जो गोदी मीडिया उछाले जा रही है। क्योंकि कांग्रेस ने अभी कहीं भी किसी भी राज्य में एक भी सीट पर अपने किसी भी उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। फिर राहुल गांधी की सीट को लेकर ही सवाल क्यों उठाये जा रहे हैं? यही सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह को लेकर तो नहीं उठाये जा रहे हैं।

आप कह सकते हैं कि दोनों में एक अंतर है। राहुल गांधी पिछली बार अमेठी से चुनाव हार गये थे जबकि ये तीनों चुनाव जीते हुए लोग हैं। लेकिन फिर भी यह पूछा जा सकता है कि क्या चुनाव जीतने के बाद लोग अपना निर्वाचन क्षेत्र नहीं बदलते? बीजेपी के सबसे प्रमुख नेता अटल बिहारी वाजपेयी अपना चुनाव क्षेत्र बदल चुके हैं, लालकृष्ण आडवाणी अपना चुनाव क्षेत्र बदल चुके हैं, राजनाथ सिंह अपना चुनाव क्षेत्र बदल चुके हैं। फिर अगर ये नेता अपना चुनाव क्षेत्र बदल सकते हैं तो नरेंद्र मोदी क्यों नहीं? लेकिन ये सवाल राहुल गांधी को लेकर पूछा जा रहा है नरेंद्र मोदी को लेकर नहीं।

बहरहाल मीडिया इस समय बीजेपी के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। जैसा बीजेपी और मोदी सरकार चाहती है वैसा ही वह व्यवहार कर रही है। अब तो ये भी आरोप लगने लगा है कि मीडिया डिबेट के विषय पीएमओ के कोई अफसर तय करते हैं। इसीलिए इसे गोदी मीडिया कहा जा रहा है। इसी आधार पर यह माना जा रहा है कि राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र की चर्चा भी बीजेपी और मोदी सरकार के इशारे पर ही चलाई जा रही है। उसका बड़ा मकसद यह है कि राहुल गांधी चाहे जितनी यात्रा कर लें, उनका कद चाहे जितना भी बढ़ गया हो, भले उन्होंने पप्पू की छवि से निजात पाकर एक पढ़े-लिखे और समझदार नेता होने की पुष्टि जनता के सामने कर दी हो लेकिन वे लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सकते। खासकर उत्तर भारत में, वह भी अमेठी जैसी सुरक्षित सीट पर।

ऐसा क्यों कहा जा रहा है कि वो अमेठी जैसी सुरक्षित सीट पर चुनाव नहीं जीत सकते। क्या इसलिए कि वो एक बार वहां से हार गये हैं? चुनाव में हार जीत लगी रहती है। इस देश में इंदिरा गांधी मजबूत नेता थीं। लेकिन वे भी एक बार रायबरेली से चुनाव हार गई थीं। तो क्या उन्होंने रायबरेली छोड़ दिया? फिर राहुल गांधी अमेठी क्यों छोड़ दें? उसी अमेठी से वे 2004 से लगातार तीन चुनाव जीते। 2004 में जहां उन्हें 66.18 प्रतिशत वोट मिले वहीं 2009 में 71.78 प्रतिशत। 2009 में इसी अमेठी से उन्होंने साढ़े तीन लाख वोटों से चुनाव जीता था। 2014 की मोदी लहर में भी उन्हें 46.71 प्रतिशत वोट मिले। उनकी जीत का अंतर भी एक लाख से ज्यादा था। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद 2019 में चुनाव हारे तो भी महज 55 हजार वोटों से। हारने के बावजूद उन्हें 43.86 प्रतिशत वोट मिले। लोकसभा चुनाव में 55 हजार वोटों का अंतर कोई मायने नहीं रखता। इससे ज्यादा वोट तो एक झटके में उलट-पलट हो जाते हैं। सत्ता विरोधी लहर ही इस वोट को खत्म करने के लिए पर्याप्त है। वैसे भी अमेठी में माहौल बदला हुआ है। लोग स्मृति ईरानी को जिताकर पछता रहे हैं।

बीजेपी समर्थित गोदी मीडिया के सर्वे चाहे जो कह रहे हों लेकिन जमीनी हालात स्मृति ईरानी के खिलाफ साफ नजर आते हैं। यही वजह है कि बीजेपी इंडिया गठबंधन के विधायकों पर दबाव बनाकर और लालच देकर उन्हें अपनी ओर मिलाने में लगी हुई है। लेकिन वो यह भूल जा रही है कि ये विधायक अपने वोट से नहीं बल्कि पार्टी के वोट से जीते हुए हैं। पार्टी छोड़कर जाते ही इनका कद अचानक कम हो जाता है। वैसे ही जैसे महाराष्ट्र में शिव सेना (उद्धव गुट) छोड़कर गये विधायकों और सांसदों का हुआ है। वो उद्धव को छोड़ तो गए पर वोट उद्धव के साथ ही रह गया।

वैसे तो बड़े नेताओं का चुनाव जातीय आधार पर नहीं बल्कि उनके कद के आधार पर होता है। नरेंद्र मोदी जिस जाति से आते हैं उनकी जाति के लोग वाराणसी क्षेत्र में नगण्य हैं। लेकिन मोदी जी ने यूपी लोकसभा की सबसे बड़ी जीत दर्ज की। इसी तरह राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र अमेठी में भी वोट जाति के आधार पर नहीं बल्कि नेता के कद पर पड़ेगा। 2019 का चुनाव हराने के बाद वहां की जनता को भी समझ में आ गया है कि राहुल गांधी का कद स्मृति ईरानी की तुलना में बहुत बड़ा है।

वैसे जातीय गणित के मामले में भी इंडिया गठबंधन बीजेपी की गणित से कमजोर नहीं है। अगर सवर्ण वहां करीब 25 प्रतिशत हैं तो मुस्लिम और ओबीसी करीब 42 प्रतिशत। 15 फीसदी दलित आबादी है। अगर वह आबादी भी पूरी की पूरी बीजेपी को सपोर्ट करती है तब जाकर कहीं मुकाबला कांटे का होगा। लेकिन दलित वोटों पर बसपा की कमजोर होती पकड़ से वह भी संभव नहीं दीख रहा।

लेकिन राहुल गांधी जैसे बड़े कद के नेता को जीत-हार का विचार करके चुनाव क्षेत्र तय करने की चिंता नहीं करनी चाहिए। ये बात सही है कि बड़े कद के नेता को चुनाव जीतना ही चाहिए लेकिन अगर वह हार के डर से अमेठी से नहीं लडेंगे तो इंडिया गठबंधन लड़ने से पहले ही हार मान लेगा। उनके अमेठी न लड़ने से पूरे देश में माहौल बनेगा कि राहुल गांधी ने हार के डर से अपना चुनाव क्षेत्र बदल दिया। अगर राहुल गांधी वहां से लड़ते हैं और एक बार को मान भी लिया जाए कि वे वहां से हार जाएंगे तो भी सिर्फ एक सीट का नुकसान होगा। लेकिन अगर वे वहां से नहीं लड़ते हैं तो पूरे इंडिया गठबंधन की बहुत सारी सीटों पर इसका असर पड़ेगा। इसलिए राहुल गांधी को हार-जीत के संशय के बगैर अमेठी से ही लड़ना चाहिए। वैसे भी हारने से नेता का कद नहीं छोटा होता है। उसका कद उसकी पूरे देश और समाज में लोकप्रियता घटने से कम होता है। अटल बिहारी वाजपेयी पांच बार लोक सभा के चुनाव हारे। लोहिया भी कई बार चुनाव हारे। इंदिरा गांधी भी एक बार चुनाव हार गईं। लेकिन इनमें से किसी का भी कद छोटा नहीं हुआ। ये सब लोग बड़े नेता थे और बड़े नेता ही रहे। इसी तरह राहुल गांधी ने अपना कद बढ़ा लिया है। वे हारें या जीतें बड़े नेता ही रहेंगे। न केवल कांग्रेस के बल्कि देश के भी। इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हारीं तो वे दक्षिण के मेढक से चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचीं। राहुल गांधी के सामने तो ये खतरा भी नहीं है। वे वायनाड से चुनाव जीते हैं। इस बार भी दोनों जगहों से चुनाव लड़ सकते हैं।

जैसे अमेठी में उनके न लड़ने का तर्क दिया जा रहा है वैसे ही वायनाड से भी उनके न लड़ने की बात कही जा रही है। कहा जा रहा है कि सीपीआई के डी राजा उनके बहुत अच्छे मित्र हैं। केरल में वाम मोर्चे की ओर से वायनाड की सीट उनकी पार्टी सीपीआई को मिली है। सीपीआई ने उस सीट पर उनकी जीवनसाथी एनी राजा को उम्मीदवार बनाया है। अब राहुल गांधी से उम्मीद की जा रही है कि वे डी राजा से मधुर संबंधों को देखते हुए वहां से चुनाव न लड़ें। क्योंकि डी राजा तो पार्टी के आदर्शों और सिद्धांतों से बंधे हुए हैं। वे पार्टी को अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाने से मना नहीं कर सकते। ठीक है, अगर डी राजा के सामने आदर्श और सिद्धांत हैं तो क्या राहुल गांधी के सामने अपनी पार्टी के सिद्धांत और आदर्श नहीं हैं। अगर डी राजा या ख़ुद एनी राजा राहुल गांधी के सामने चुनाव लड़ने से मना नहीं कर सकते तो फिर राहुल गांधी इन चीजों का विचार क्यों करें ?

आपको याद होगा जब नरेंद्र मोदी 2014 में बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हुए तो उन्होंने गुजरात के साथ उत्तर प्रदेश के वाराणसी से लोकसभा का चुनाव लड़ने का मन बनाया। वे गुजरात में तो कहीं से भी आसानी से जीत जाते। जबकि तब यूपी में बीजेपी की वह स्थिति नहीं थी। 2009 के लोकसभा चुनावों में पूरे देश के साथ ही यूपी में भी कांग्रेस बीजेपी से बड़ी पार्टी थी। लेकिन मोदी ने वाराणसी को चुनकर ये खतरा उठाया। अगर वे तब वहां से हारते तो सिर्फ एक सीट से हारते लेकिन उनके वहां से लड़ने का असर करीब डेढ़ सौ सीटों पर पड़ा। बनारस से यूपी और बिहार दोनों को ही प्रभावित किया जा सकता है। यूपी और बिहार में कुल 120 सीटें हैं। यूपी और बिहार साधने से झारखंड और उत्तराखंड भी सध जाते हैं। इन दोनों राज्यों में भी 19 सीटें हैं। तो राहुल गांधी को भी यही सोच अपनानी चाहिए। खुद तो अमेठी से लड़ें ही मोदी के सामने भी प्रियंका जैसी लोकप्रिय नेता को उतार कर कड़ी चुनौती देनी चाहिए। क्या होगा यही न कि मोदी जीत जाएंगे और प्रियंका हार जाएंगी। लेकिन तय मानिये मोदी की साढ़े पांच लाख वोटों से जीत नहीं होगी। जीत का मार्जिन बहुत कम हो जाएगा। वैसे ही जैसे अमेठी में स्मृति इरानी ने 2014 में राहुल के सामने दांव खेला। 2014 में वे हारीं लेकिन 2019 में राहुल को हराने में सफल हो गईं। इससे प्रियंका का कद नहीं घटेगा बल्कि बढ़ेगा ही। दूसरा उदाहरण अरविंद केजरीवाल का है। उन्होंने पहली बार जब दिल्ली में विधानसभा का चुनाव लड़ा तो सीधे तब की लोकप्रिय और मजबूत मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चुनौती दी। नतीजा ये हुआ कि अब अरविंद केजरीवाल लोकप्रिय नेता बन गये हैं। इसी नीति के आधार पर उन्होंने नरेंद्र मोदी को वाराणसी में भी चुनौती दी। वे मोदी को जीतने से तो नहीं रोक पाए लेकिन उनकी जीत का मार्जिन काफी कम कर दिया। इसलिए राहुल गांधी को चुनौती से घबराना नहीं चाहिए बल्कि इस चुनौती में प्रियंका गांधी को भी शामिल कर लेना चाहिए। वे जानते हैं कि देश में उसी की सत्ता होती है जो यूपी में मजबूत होता है। यह दांव खेलकर उन्हें यूपी में भी इंडिया गठबंधन को मजबूत बनाना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।) 

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