तिरछी नज़र: सरकार की मिलावट को मिलावट नहीं सम्मिश्रण कहिए जनाब
एक राजा था। अब राजा ऐसा ही था जैसे राजा होते हैं। दिन भर चापलूसों से घिरे रहना, हर समय हम हम करना और दिन में कम से कम चार बार कपड़े बदलना। राजा का यही काम था। इसी काम में वह दिन के अठारह बीस घंटे बिता देता था। हाँ, इन सब कामों के अतिरिक्त वह भजन पूजा में भी बहुत सारा समय बीतता था। मतलब सबकुछ मिला कर वह पूरा दिन आराम से बिता देता था।
राजा जब कभी अपने देश में बोर होता तो किसी और देश में घूम आता। उस देश में भी खूब मौज मस्ती होती। शाही सत्कार, राजकीय सम्मान, नाच गाना, खाना पीना, मतलब सब कुछ होता। हाँ, वहाँ से कोई मैडल वैडल भी ले आता। तो राजा के दिन इस तरह आराम से गुजर रहे थे।
इन सब कामों से समय मिलता तो राजा राजकाज की भी सोचता था। जब राजकाज सूझता था तो राजदरबार सजता था। राजदरबार होता तो राजा का था पर उसमें वह आता कम ही था। उसके नवरत्न ही कामकाज सम्हालते थे। वह जब भी आता था तो या तो हंसी ठिठोली में ही लगा रहता था या फिर पुराने राजाओं की बुराई में। तो इस तरह से राजा के दिन बड़े अच्छे गुजर रहे थे।
एक बार राजा के राज में अकाल पड़ा। हुआ यह कि जिस देश से अन्न आता था, वहाँ युद्ध छिड़ गया। आने जाने के रास्ते बंद हो गए। जिन गाड़ियों से अन्न आता था, वे जहाँ थीं, वहीं रुक गईं। राज्य में अनाज का संकट पड़ गया। ऐसे में राजा ने अपने राजदरबार की बैठक बुलाई। बैठक वैसे ही शुरू हुई, जैसे शुरू होनी चाहिए थी। सारे राजदरबारी आ गए, नवरत्न भी पधार गए। उसके बाद परम्परा का निर्वाह करते हुए, दरबारी ने हुंकार लगाई-
इंडोनेशियारत्न,सेशेल्सश्री,
पापुआ न्यू गिनी ज्योति, फिजी विभूषण,
भूटानचंदन,अमरीका पाबंद ..
गॉब्लेट ऑफ फायर, ऑर्डर ऑफ फीनिक्स,
गार्डियन ऑफ गैलेक्सी, पाइरेट ऑफ कैरेबियन
ब्रदर फ्रॉम अदर मदर,
जुमलेसुभानी, तमससृष्टा, असत्य वक्ता,...
गौतमी मित्र, पठानपुत्र, चौकीदार श्री, श्री 1008, नॉन बायोलॉजिकल, श्री सरेंडरनाथ जी महाराज, मास्टर इन इंटायर पोलिटिकल साइंस, पधार रहे हैं SSS !!!
आत्म प्रसंशा और पुराने राजाओं की फजीहत के बाद राजदरबार का काम शुरू हुआ।
अनाज के वज़ीर ने उठ कर कहा, "हे राजाओं के राजा, पूरे विश्व के गुरु, समस्या यह है कि देश में अनाज की कमी हो रही है। जिस रास्ते से हमारे यहाँ अनाज आता है, उस रास्ते पर युद्ध के कारण आवागमन बंद है"।
"तो अनाज की, गेहूं, चावल और दालों की कीमत बढ़ा दो", राजा को हर समस्या का उपाय कीमत बढ़ाना लगता था। और राज्य की धर्मभीरू प्रजा भी धार्मिक राजा के हर जुल्म को सहने के लिए तैयार बैठी थी।
"पर महाराज, उससे अन्न की कमी तो पूरी नहीं होगी। प्रजा खायेगी क्या"? अनाज मंत्री ने डरते डरते कहा।
राजा कहना चाहता था, मशरूम खा लेगी, बादाम, काजू और अखरोट खा लेगी पर कुछ पुरानी बात सोच कर चुप रहा।
एक दूसरे मंत्री ने, जिसका अनाज मंत्रालय से दूर दूर का कोई संबंध नहीं था और जिसके बेटों ने पत्थर काटने की मशीन लगाई हुई थी, बोला, "महाराज की जय हो। महाराज, मेरे मन में एक विचार आया है। क्यों ना हम अनाज में पत्थर मिला दें। पत्थर सस्ता भी होता है और अनाज में मिलाया भी जाता है। मेरे बेटों की पत्थर की फैक्ट्री है। वे ऐसे पत्थर बनाएंगे कि प्रज़ा को अनाज में पत्थर का पता भी नहीं चलेगा"।
"विचार तो अच्छा है पर जरा देखना पत्थर ऐसे हों कि अनाज में ऐसे घुल मिल जाएं जैसे दूध में पानी मिल जाता है। पेट्रोल में एथेनॉल मिल जाती है। किसी को पता भी नहीं चलता है और नुकसान भी भरपूर होता है।",राजा जी ने कहा। "वैसे भी हम यह काम प्रजा को बता कर ही करेंगे। प्रजा को ठगने में मज़ा तभी है जब उसको बता कर ठगा जाए"।
"राजन, हम सबकुछ प्रजा को बता कर ही करेंगे। इसे मिलावट नहीं, सम्मिश्रण का नाम देंगे। सम्मिश्रण मतलब सरकारी मिलावट। जब व्यापारी करे तो मिलावट है, सरकार करे तो सम्मिश्रण है। साथ ही जनता को समझा भी देंगे कि इससे हानि कम, लाभ ज्यादा है"।
और उस दिन के बाद प्रजा को पत्थर सम्मिश्रित अनाज मिलने लगा।
(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं)
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