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उत्तराखंड: पहाड़ के गांवों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए हमें क्या करना होगा

“नर्स और पैरा-मेडिकल स्टाफ की भर्ती राज्य स्तर पर करने के बजाय ज़िला या ब्लॉक स्तर पर की जाए। स्थानीय युवा इसके लिए तैयारी करेंगे। क्वालिफ़िकेशन हासिल करेंगे और नौकरी पाएंगे। इससे पलायन भी रुकेगा और जब यह स्पष्ट रहेगा कि उसकी तैनाती उसी ब्लॉक के लिए है तो वह नियुक्ति मिलते ही ट्रांसफ़र के लिए कोशिश नहीं करेगा”।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर बनाने की सख्त जरूरत है
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर बनाने की सख्त जरूरत है

उत्तराखंड के मैदानी से लेकर पर्वतीय क्षेत्रों तक के गांव भी कोविड की दूसरी लहर की चपेट में हैं। सामान्य बीमारियों में ही लाइलाज पर्वतीय क्षेत्र के वासियों के लिए ये कई गुना बड़ी चुनौती है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां अस्पताल पहुंचने की दूरी और समय को कई गुना बढ़ा देती हैं। उत्तराखंड जैसे राज्य को स्वास्थ्य के मोर्चे को दुरुस्त करने के लिए क्या करना चाहिए?

वर्ष 2000 में अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में सुधार की उम्मीद थी। वर्ष 2021 में भी पर्वतीय राज्य की ज्यादातर आबादी को प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। साधारण दवाइयों से लेकर ब्लड टेस्ट, एक्सरे, अल्ट्रा साउंड जैसी मूलभूत स्वास्थ्य जरूरतों के लिए लोगों को तीन-चार घंटे का सफ़र तय करना पड़ता है। इसके लिए अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं।

पर्वतीय ज़िलों के ज्यादातर सरकारी अस्पताल (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, ज़िला अस्पताल सहित) लचर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए जाने जाते हैं और रेफ़रल सेंटर के तौर पर ही देखे जाते हैं। यहां पर्याप्त मानव संसाधन नहीं है। स्वास्थ्य सेवा विशेषज्ञ, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की सख्त कमी है। किसी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर है तो एनेस्थेटिस्ट नहीं है या पैरा-मेडिकल स्टाफ नहीं है। पर्वतीय क्षेत्र में शिशु का सुरक्षित जन्म ही बड़ी चुनौती है।

कोविड की दूसरी लहर में राज्य के गांवों में संक्रमण बुरी तरह फैला है। अल्मोड़ा में बेस अस्पताल के बाहर वाहनों में मरे पड़े मरीजों की तस्वीरें विचलित करती हैं। हल्द्वानी के सुशीला तिवाड़ी अस्पताल में कुमाऊं के गंभीर कोविड मरीजों का इलाज हो रहा है। देहरादून के अस्पताल और ऋषिकेश एम्स, गढ़वाल और मैदानी क्षेत्रों के गंभीर मरीजों से भरे हुए हैं। ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, आईसीयू बेड ये सब हासिल करना एक आम आदमी के लिए बड़ी जंग का हिस्सा है।

पौड़ी के चैड़चैनपुर गांव में परिवार में अकेली रह गई महिला, अन्य सदस्य रोज़गार-शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए पलायन कर गए

स्वास्थ्य क्षेत्र को मज़बूत बनाने के लिए क्या किया?

स्वास्थ्य सूचकांकों के लिहाज से उत्तराखंड की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मातृ-शिशु मृत्यु दर, पांच वर्ष से कम आयु के शिशु की मृत्यु दर, लिंगानुपात, टीकाकरण अभियान, संस्थागत स्वास्थ्य, टीबी, एचआईवी, स्वास्थ्य देखभाल के लिए डॉक्टर, नर्स समेत मानव संसाधन, पीएचसी, सीएचसी, कार्डियेक केयर यूनिट, आबादी के लिहाज से उपलब्ध स्वास्थ्य केंद्रों की उपलब्धता, वित्तीय संसाधन जैसे 23 इंडिकेटर के आधार पर किसी राज्य की सामान्य तौर पर स्वास्थ्य स्थिति तय होती है।

वर्ष 2019 में नीति आयोग की हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया रिपोर्ट आई। जिसमें वर्ष 2015-16 के आधार वर्ष और 2017-18 के संदर्भ वर्ष (2015-16 की स्वास्थ्य सेवाओं के आधार पर 2017-18 की स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति की तुलना) की स्थिति परखी गई। इस रिपोर्ट में बड़े राज्यों की श्रेणी में आधार वर्ष की तुलना में संदर्भ वर्ष में 7 राज्यों (आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, हरियाणा, असम और राजस्थान) ने अपने स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाया। सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य आंध्र प्रदेश और राजस्थान रहे।

हेल्थ इंडेक्स के अनुसार 7 राज्यों केरल, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, झारखंड और उत्तर प्रदेश की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। इनमें केरल देश में अव्वल रहा। 6 राज्यों की रैकिंग में एक प्वाइंट की गिरावट आई। पंजाब की रैंकिंग में 3 प्वाइंट और उत्तराखंड की रैकिंग में दो प्वाइंट की गिरावट आई। 2015-16 में 45.22 अंक हासिल करने वाले उत्तराखंड का स्कोर 2017-18 में 40.20 आ गया। इस सूची में उत्तराखंड से नीचे मध्य प्रदेश, उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश रहे।

हिमाचल प्रदेश से तुलना

किसी भी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता से हम उस क्षेत्र के लोगों की सेहत और उनकी स्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं।  

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) उत्तराखंड में 257 हैं जबकि हिमाचल प्रदेश में 538 हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) उत्तराखंड में 85 हैं जबकि हिमाचल में 89 हैं। एलोपैथिक डिस्पेन्सरी उत्तराखंड में 392 है, जबकि हिमाचल में 92 है। प्रति लाख आबादी पर सरकारी अस्पतालों में बिस्तर उत्तराखंड में 92 है, जबकि हिमाचल प्रदेश में 156 है।

सामान्य क्षेत्रों में 30,000 की आबादी पर एक पीएचसी और दुर्गम/आदिवासी/पर्वतीय क्षेत्रों में 20,000 की आबादी पर एक पीएचसी का मानक तय है। इसी तरह 1,20,000 की आबादी पर एक सीएचसी और दुर्गम/आदिवासी/पर्वतीय क्षेत्रों में 80,000 की आबादी पर एक सीएचसी होना चाहिए। नए अपनाए गए नियम यह भी कहते हैं कि पर्वतीय और रेगिस्तानी क्षेत्रों में घर से 30 मिनट की पैदल दूरी के दायरे में एक एसएचएसी सब-हेल्थ सेंटर यानी उप-स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिए।

यहां इस पर भी गौर करें कि पीएचसी या सीएचसी की इमारत होना और उसमें स्वास्थ्य सुविधाओं का होना दो अलग बात है।

रिखणीखाल के सीएचसी में सभी सुविधाएं होतीं तो यहां के लोगों को तीन-चार घंटे की दूरी तय कर कोटद्वार या देहरादून नहीं जाना पड़ता

विकेंद्रीकरण का केरल मॉडल

केरल में उप स्वास्थ्य-केंद्र (SHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) को ग्रामीणों के सुपुर्द कर दिया गया है ताकि स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य समस्याओं को पहचान कर उन्हें प्रभावी ढंग से दूर किया जा सके। इससे इन स्वास्थ्य केंद्रों पर पानी-स्वच्छता सुनिश्चित करने के साथ ही स्थानीय स्वास्थ्य समस्याओं के अनुरूप प्राथमिकताओं में बदलाव किया जाना संभव हो सका है। डॉक्टर और ग्रामीण मिलकर तय करते हैं कि पीएचसी स्तर तक किस चीज़ की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है और फिर उसके लिए काम करते हैं।

हालांकि राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा को नहीं लगता कि केरल मॉडल उत्तराखंड में सफल हो सकता है। वह कहते हैं “ग्राम पंचायतों को पीएचसी देना उत्तराखंड में संभव नहीं है, वे सक्षम नहीं है। स्वास्थ्य और शिक्षा राज्य की ज़िम्मेदारी है। राज्य अपनी ज़िम्मेदारी स्थानीय इकाइयों पर क्यों थोपना चाहेगी जबकि स्थानीय इकाइयां अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए राज्य पर निर्भर करती हैं”।

कांग्रेस नेता किशोर उपाध्याय कहते हैं “केरल में साक्षरता दर और वित्तीय स्थिति अच्छी है। यहां मुश्किल तो है, लेकिन सरकार सपोर्ट करे तो ग्राम पंचायतें पीएचसी चला सकती हैं”।

पीएचसी और सीएचसी को मज़बूत बनाकर ही हम ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचा सकते हैं।

मोबाइल हेल्थ यूनिट या टेलि-मेडिसिन यहां गांवों तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के विकल्प हो सकते हैं

मोबाइल हेल्थ यूनिट

पर्वतीय क्षेत्रों में मोबाइल हेल्थ यूनिट भी समाधान हो सकता है। राज्य में इस तरह के प्रयोग किए जा चुके हैं। लेकिन इन्हें सफल नहीं कहा जाएगा। उसमें भी उपकरण और स्टाफ की जरूरत होती है। पौड़ी में हंस फाउंडेशन कुछ क्षेत्रों में मोबाइल हेल्थ यूनिट संचालित कर रहा है। पर्वतीय क्षेत्र के ग्रामीण लोगों से लेकर, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और राजनीतिक दलों के लोग भी मानते हैं कि लोगों को सामान्य स्वास्थ्य सेवा देने के लिए ये एक अच्छा ज़रिया हो सकता है। इसे पीएचसी और सीएचसी से अटैच किया जा सकता है।

टेलि-मेडिसिन

उत्तराखंड में टेलि-मेडिसिन को लेकर वर्ष 2004 से बात की जा रही है। 2017 में राज्य के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक पद से सेवानिवृत्त डॉ. एलएम उप्रेती कहते हैं “आज 16 साल हो गए लेकिन इस पर कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई। इसके लिए पर्वतीय क्षेत्रों में कमज़ोर मोबाइल नेटवर्क भी एक बड़ी समस्या है”। वह कहते हैं “आज हम बहुत से काम व्हाट्सएप ग्रुप के ज़रिये कर रहे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में भी ये तरीका अपनाया जा सकता है। इसके लिए मोबाइल नेटवर्क मज़बूत करना होगा”।

पहाड़ों पर पीपीपी मोड का फॉर्मूला नहीं चला

पीपीपी मोड का फॉर्मूला उत्तराखंड में असफल साबित हुआ। हालांकि देहरादून के कोरोनेशन अस्पताल को इसका एक अपवाद कह सकते हैं। देहरादून कोरोनेशन, टिहरी ज़िला अस्पताल, डोईवाला अस्पताल समेत 5 अस्पतालों को पीपीपी मोड में दिया गया है। जबकि रामनगर, नैनीताल, अल्मोड़ा और पौड़ी में डब्ल्यूएचओ की मदद से सीएचसी को पीपीपी मोड में देने की प्रक्रिया चल रही है। स्थानीय स्तर पर इसका विरोध भी हो रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में पीपीपी के अनुभव अच्छे नहीं रहे।

कांग्रेस नेता किशोर उपाध्याय कहते हैं “टिहरी में जिला अस्पताल अच्छी स्थिति में था। उसे पीपीपी मोड में देकर बेकार कर दिया”।  देहरादून के डोईवाला समेत अन्य पीपीपी मोड पर दिए गए अस्पतालों से भी इसी तरह की नाराजगी है।

होम्योपैथी-आर्युवेद मेडिकल स्टाफ़ से पूरी हो सकती है कमी?

उत्तराखंड होम्योपैथिक मेडिसिन बोर्ड रजिस्ट्रार डॉक्टर शैलेंद्र पांडेय कहते हैं “उत्तराखंड में एलोपैथिक डॉक्टरों की भारी कमी है। अगर कोई डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में तैनात होता भी है तो वह एक-दो महीने में वहां से भागकर शहर की तरफ चला जाता है या आगे की पढ़ाई के लिए छुट्टी ले लेता है”।

वह दावा करते हैं कि इस कमी को होम्योपैथी की मदद से दूर किया जा सकता है। “उत्तराखंड में होम्योपैथी के लगभग 1000 रजिस्टर्ड डॉक्टर हैं जो दूर-दराज और पर्वतीय क्षेत्रों में सेवा देने को तत्पर हैं। कई दूर-दराज के क्षेत्रों में निवास और प्रैक्टिस भी कर रहे है”।

डॉक्टर शैलेंद्र कहते हैं “पढ़ाई के समय एलोपैथी और होम्योपैथी के एलाइड विषय एनाटोमी, फ़िज़ियोलॉजी, पैथोलॉजी, एफ़एमटी, सर्जरी, प्रैक्टिस ऑफ मेडिसिन, पीएसएम, गायनी एंड ऑब्स, ईइनटी, ऑप्थलमोलॉजी, पेडियाट्रिक्स आदि एक ही होते हैं। केवल फार्मेसी अलग होती है। इंटर्नशिप में होम्योपैथी के छात्र भी सभी तरह के प्रशिक्षण और मैनेजमेन्ट, फर्स्ट एड, इमरजेंसी आदि में प्रशिक्षित हो जाते हैं। उनकी सेवाएं लेने के लिए 6 माह का ब्रिज कोर्स करके इन्हें और भी कुशल बनाया जा सकता है”।

उत्तराखंड और अन्य राज्यों में COVID-19 के क्वारंटाइन सेंटरों, स्क्रीनिंग, सर्विलांस, टेस्टिंग आदि में 99 प्रतिशत होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक डॉक्टर और सहायक काम कर रहे हैं। डॉ. शैलेंद्र बताते हैं “कोरोना से पहले उत्तराखंड में डेंगू महामारी के रूप में फैला था तब भी होम्योपैथी विभाग ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला था और प्रिवेंटिव होम्योपैथिक दवा और होम्योपैथिक इलाज के माध्यम से काफी नियंत्रित किया था”।

“दूर-दराज के एलोपैथी चिकित्सालयों में भी एक्सीडेंटल केस में प्राथमिक उपचार देकर उच्च सुविधा वाले चिकित्सालयों में रेफ़र किया जाता है। यह काम होम्योपैथिक चिकित्सक भी कर सकते हैं। इसके अलावा सभी राज्यों में इमरजेंसी केस केवल 5 से 10% ही होते हैं, बाकी के 90-95% सामान्य तथा असाध्य बीमारियों के होते हैं। इसमें होम्योपैथिक औषधियों से सफलतापूर्वक इलाज किया जाता है”।

देश में सर्जन की कमी पूरी करने के लिए वर्ष 2020 आयुर्वेदिक डॉक्टरों को भी सर्जरी की अनुमति दी गई। केंद्र के इस फैसले का इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने विरोध किया था। उत्तराखंड में भी एलोपैथिक डॉक्टरों ने अपना विरोध दर्ज कराया था।

डॉक्टरों की कमी के पीछे आरक्षण का पेच

उत्तराखंड मे डॉक्टर्स की कमी की एक वजह आरक्षण भी है जिसकी वजह से करीब 250 पद खाली ही रहते हैं। उत्तराखंड मेडिकल सेलेक्शन बोर्ड के अध्यक्ष डॉ डीएस रावत के अनुसार “उत्तराखंड में डॉक्टरों के 250 से ज़्यादा पद अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इनके अलावा ओबीसी और आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए भी आरक्षण है। समस्या यह है कि इतने सारे पदों के लिए आरक्षित श्रेणी के डॉक्टर मिलते नहीं हैं इसलिए 250 से ज़्यादा पद खाली ही रहते हैं”।

बोर्ड के अनुसार “इन पदों पर रिटायर्ड डॉक्टरों, राज्य से एमबीबीएस करने वाले अनुबंधित नए ग्रेजुएट्स को कांट्रेक्ट पर रखकर डॉक्टरों की कमी पूरी करने की कोशिश की जाती है”।

उत्तराखंड में तीन सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं। दून मेडिकल, श्रीनगर मेडिकल कॉलेज और सुशीला तिवारी अस्पताल। कुछ प्राइवेट मेडिकल कॉलेज भी हैं। यहां से हर साल डॉक्टर्स निकलते हैं। लेकिन फिर भी राज्य में डॉक्टरों की कमी है। राज्य में मेडिकल ऑफिसर के 2700 पद हैं। इनमें कई पदों पर उम्मीदवार न मिलने पर डेंटल डॉक्टरों की बतौर मेडिकल ऑफिसर नियुक्ति की जाती है। जिन्हें सामान्य फिजिशियन के तौर पर कार्य करना होता है। 

सतपुली का बाज़ार, स्थानीय युवाओं को स्वास्थ्य कार्यकर्ता के तौर पर तैयार किया जा सकता है

ज़िला या ब्लॉक स्तर पर तैयार करें स्वास्थ्य कार्यकर्ता

पर्वतीय मुद्दों के जानकार योगेश भट्ट कहते हैं “पहाड़ों में सभी जगह डॉक्टर पहुंचाना संभव नहीं है तो क्या वहां प्रशिक्षित नर्सिंग-पैरामेडिकल स्टाफ़ भी नहीं हो सकता? क्या स्थानीय युवतियों को नर्सिंग की ट्रेनिंग देकर सक्षम नहीं बनाया जा सकता कि वह मूलभूत, प्राथमिक इलाज कर सकें या प्रसव करवा सकें?”

योगेश यह समाधान सुझाते हैं “नर्स और पैरा-मेडिकल स्टाफ की भर्ती राज्य स्तर पर करने के बजाय ज़िला या ब्लॉक स्तर पर किया जाए। स्थानीय युवा इसके लिए तैयारी करेंगे। क्वालिफ़िकेशन हासिल करेंगे और नौकरी पाएंगे। इससे पलायन भी रुकेगा और जब यह साफ़ रहेगा कि उसकी तैनाती उसी ब्लॉक के लिए है तो वह नियुक्ति मिलते ही ट्रांसफ़र के लिए कोशिश नहीं करेगा”।

इंडियन मेडिकल सर्विस कैडर की मांग

कोरोना की मौजूदा परिस्थितियों में केंद्र सरकार भी एक बार फिर आईएएस, आईपीएस, आईएफएस की तर्ज पर इंडियन मेडिकल सर्विस कैडर की बात करने लगी है। लोकसभा की समिति ने इस वर्ष मार्च में अपनी एक रिपोर्ट के ज़रिये इसे लागू करने का सही समय बताया।

पूर्व चिकित्सा निदेशक डॉ. एलएम उप्रेती भी कहते हैं “यह कई दशकों से लंबित चला आ रहा मामला है। स्वास्थ्य विभाग में कौन अधिकारी होना चाहिए, यह भी देखने की जरूरत है। कम से कम उसे विज्ञान बैकग्राउंड का होना चाहिए। एक ज़िलाधिकारी अस्पताल में जाकर मुख्य चिकित्सा अधिकारी को डांट लगा देता है या सीएमएस को अस्पताल से जुड़े कार्यों के लिए ज़िलाधिकारी की अनुमति लेनी पड़ती है। अगर आईएमएस कैडर होगा तो स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रशासनिक कार्यों में सुधार और तेज़ी आएगी”।

पिछले 4 साल से उत्तराखंड में अलग स्वास्थ्य मंत्री नहीं

स्वास्थ्य क्षेत्र की मुश्किलें इस क्षेत्र का दायित्व अलग मंत्री को दिए जाने की मांग करती हैं। उत्तराखंड की मौजूदा भाजपा सरकार में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री रहते हुए स्वास्थ्य मंत्री का ज़िम्मा भी संभाले रखा। मौजूदा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत भी यही कर रहे हैं। कोरोना की दूसरी लहर के बीच अब विपक्ष भी अलग स्वास्थ्य मंत्री की मांग कर रहा है।

योगेश भट्ट कहते हैं “स्वास्थ्य विभाग के मुखिया स्वास्थ्य महानिदेशक भी संभवतः इस पद से सिर्फ़ रिटायर होने के लिए ही बनाए जाते हैं। 20 साल में राज्य में 20 डीजी हेल्थ तो बने ही होंगे। कई तो सिर्फ़ कुछ महीनों के लिए रहे। जब स्वास्थ्य महानिदेशक के पास कुछ करने का समय ही नहीं है तो वह इस दिशा में कोशिश भी क्यों करेगा?”

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी

क्या स्वास्थ्य विभाग की बदहाली की असल वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है? सांसद प्रदीप टम्टा कहते हैं निश्चित तौर पर ये राजनीतिक समस्या है। वह अपने अनुभवों से बताते हैं “हल्द्वानी में कॉन्ट्रैक्ट पर डॉक्टर्स थे, उन्हें रेग्यूलर नहीं किया गया। एम्स अस्पताल खुले तो वे सब वहां चले गए। आप अपने कॉन्ट्रैक्ट पर रखे डॉक्टर को परमानेंट भी नहीं करते, तो उन डॉक्टरों को भी अपना भविष्य देखना है, वह चले जाएंगे”।

मौजूदा भाजपा सरकार के दो मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत और गणेश जोशी अपनी ही सरकार के स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य न करने पर सवाल उठा चुके हैं।

योगेश भट्ट कहते हैं “उत्तराखंड में स्वास्थ्य संबंधी नीति उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी राजनीतिक इच्छाशक्ति। दून मेडिकल कॉलेज में महीनों तक सीटी स्कैन, एमआरई मशीन खराब रहती हैं और कोई कुछ नहीं करता। पौड़ी और उत्तरकाशी में अस्पतालों में मशीनें तो आ गईं लेकिन वह खुली ही नहीं, उनका इस्तेमाल ही नहीं हो रहा। ऐसा क्यों हो रहा है? हम स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देते।”

कांग्रेस नेता किशोर उपाध्याय कहते हैं “केंद्र भी उत्तराखंड को 5 लोकसभा सीटों वाले राज्य के रूप में देखता है। हमें शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों में एक साथ सुधार लाना होगा। एक डॉक्टर पहाड़ में ड्यूटी करने को तैयार नहीं होगा यदि वहां उसके बच्चे को अच्छी शिक्षा नहीं मिलेगी”। वह मसूरी के अच्छे स्कूलों का उदाहरण देते हैं।

उत्तराखंड में बेहतर स्वास्थ्य सेवा के साथ शिक्षा, सड़क, रोज़गार पर भी कार्य करना होगा

उत्तराखंड को नए सिरे से देखने की जरूरत

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र की सभी समस्याएं एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। स्वास्थ्य के मोर्चे को मज़बूत बनाना है तो हमें शिक्षा, आजीविका, सड़क, कृषि समेत एक जगह और वहां रह रहे लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के सभी पहलुओं पर कार्य करना होगा। पर्वतीय क्षेत्रों में जहां अच्छे स्कूल हैं, वहां डॉक्टर भी हैं। सरकार की ओर से बेहतर प्रबंधन के साथ ही हमें समुदायिक भागीदारी की भावना के साथ भी कार्य करना होगा।  

कोरोना के इस बेहद मुश्किल दौर में उत्तराखंड की स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी इस श्रृंखला की पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी कड़ियां आप यहां पढ़ सकते हैं। ये समस्या को समझने और समाधान तक पहुंचने के लिए तैयार की गई रिपोर्ट हैं।

उत्तराखंड स्वास्थ्य सेवाएं भाग-1: स्वास्थ्य के मोर्चे पर ख़स्ताहाल, कोरोना के एक साल के सफ़र में हांफता पहाड़

उत्तराखंड स्वास्थ्य सेवाएं भाग-2: इलाज के लिए भटक रहे मरीज, सुविधाओं के लिए तरस रहे डॉक्टर-अस्पताल

उत्तराखंड स्वास्थ्य सेवाएं भाग 3- पहाड़ की लाइफ लाइन 108 एंबुलेंस के समय पर पहुंचने का अब भी इंतज़ार 

उत्तराखंड स्वास्थ्य श्रृंखला भाग-4: बढ़ता कोरोना; घटते वैक्सीन, रेमडेसिविर, बेड, आईसीयू, वेंटिलेटर

सभी फोटो: वर्षा सिंह

देहरादून स्थित वर्षा सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं।

(This research/reporting was supported by a grant from the Thakur Family Foundation. Thakur Family Foundation has not exercised any editorial control over the contents of this reportage.)

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