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मौलाना आज़ाद फ़ेलोशिप कब होगी रिवाइज़? हज़ारों अल्पसंख्यक छात्र कर रहे गुहार!

केंद्र सरकार ने हाल ही में संसद में एमएएनएफ को बंद करने की घोषणा की थी। लेकिन इस बात को भी स्पष्ट किया था कि जो छात्र इस फ़ेलोशिप के तहत 2022 तक एनरोल हो चुके हैं, उन्हें इसका लाभ मिलता रहेगा।
Fellowship
प्रतीकात्मक तस्वीर।

"मैं अपने परिवार में इकलौता कमाने वाला हूं। मेरे और मेरे परिवार के खर्चे पूरी तरह मेरी फ़ेलोशिप पर ही निर्भर हैं। ऐसे में अगर फ़ेलोशिप ही टाइम से नहीं आएगी, तो मैं अपनी पढ़ाई और रिसर्च पर फोकस कैसे कर पाउंगा।"

ये परेशानी गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के एक पीएचडी स्कॉलर ने न्यूज़क्लिक को एक मैसेज के माध्यम से बताई। छात्र का कहना था कि वो और उनके जैसे करीब 2000 छात्र जो मौलाना आज़ाद नेशनल फ़ेलोशिप (एमएएनएफ) के तहत छात्रवृत्ति के लाभार्थी हैं, इस वक्त बेहद दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। और इसकी सबसे बड़ी वजह है कि एमएएनएफ फ़ेलोशिप न तो इन्हें समय से मिल पा रही है, और ना ही बाक़ि छात्रवृत्तियों की तरह इसमें कोई बढ़ोतरी हो रही है। इन छात्रों ने सरकार पर अल्पसंख्यक छात्रों के साथ भेदभाव का भी आरोप लगाया है।
ध्यान रहे कि बीते साल 8 दिसंबर को अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में मौलाना आज़ाद नेशनल फ़ेलोशिप को बंद करने के बारे में बताया था। सरकार की दलील थी कि मौलाना आज़ाद नेशनल फ़ेलोशिप केंद्र की दूसरी स्कीम्स के साथ ओवरलैप कर रही है और अल्पसंख्यक छात्र पहले से ही ऐसी योजनाओं के पात्र होते हैं। हालांकि, सरकार की इस दलील को सिरे से नकारते हुए कई छात्र और शिक्षक संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर इसे "अल्पसंख्यक विरोधी" बताया।

बता दें कि इस फ़ेलोशिप को बंद करते समय सरकार ने इस बात को स्पष्ट किया था कि जो छात्र इस फ़ेलोशिप के तहत 2022 तक इनरोल हो चुके हैं, उन्हें इसका लाभ मिलता रहेगा। लेकिन फिलहाल इन छात्रों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। शोधकर्ताओं ने कहा कि छात्रवृत्ति का अंतिम संशोधन 2019 में किया गया था, वहीं इन्हें आखिरी स्टाइपन भी बीते साल सितंबर महीने में ही मिला था। जबकि यूजीसी द्वारा अनुमोदित विभिन्न योजनाओं की फ़ेलोशिप राशि 01 जनवरी, 2023 से रिवाइज़ कर दी गई हैं। 

छात्रवृत्ति में राशी बढ़ोतरी का इंतज़ार

छात्रों के मुताबिक अन्य फ़ेलोशिप के तहत जहां जूनियर शोधकर्ताओं के लिए राशि 31,000 रुपये से 37,000 रुपये और वरिष्ठ शोधकर्ताओं के लिए 35,000 रुपये से 42,000 रुपये तक कर दी गई है। वहीं एमएएनएफ में अभी भी जूनियर स्तर पर 31 हज़ार और सीनियर स्तर पर 35 हज़ार ही मिल रहे हैं, इसे रिवाइज़ नहीं किया गया। इसे लेकर देश के लगभग 30 विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं और डॉक्टरेट छात्रों ने अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर कहा है कि सरकार मौजूदा एमएएनएफ फ़ेलोशिप के लिए छात्रवृत्ति राशि में

बढ़ोतरी नहीं करके अल्पसंख्यक छात्रों के ख़िलाफ़ भेदभाव कर रही है।
रिसर्च स्कॉलर्स के संगठन, ऑल इंडिया रिसर्च स्कॉलर्स एसोसिएशन ने भी स्मृति ईरानी को लिखे अपने पत्र में कहा है कि "शोध देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसमें निवेश करना और फ़ेलोशिप को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। एमएएनएफ योजना क्रीमीलेयर आय से नीचे आने वाले अल्पसंख्यक छात्रों के लिए एक वरदान की तरह थी, ताकि उन्हें वित्तीय बाधाओं की चिंता किए बिना पीएचडी और एमफिल जैसी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इसलिए संगठन इसे वितरित करने वाली नोडल एजेंसी से एमएएनएफ वृद्धि प्रक्रिया में तेजी लाने और मासिक आधार पर फ़ेलोशिप देने का आग्रह करता है।"

सच्चर कमिटी की सिफारिश और अल्पसंख्यक छात्रों को प्रोत्साहन

ज्ञात हो कि साल 2005 में कांग्रेस सरकार द्वारा गठित सच्चर कमिटी की सिफारिशों पर 2009 में सरकार ने हायर एजुकेशन में अल्पसंख्यक जिसमें ज़्यादातर मुस्लिमों छात्रों की मदद के लिए मौलाना आज़ाद नेशनल फ़ेलोशिप की शुरुआत की थी। सच्चर कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारत में दूसरे समुदायों की तुलना में मुसलमान सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से काफी पिछड़े हैं। रिपोर्ट में 2001 की जनगणना के हवाले से बताया गया था कि भारत में कुल आबादी में 7 फ़ीसदी ग्रेजुएट या डिप्लोमा वाले हैं। वहीं मुस्लिमों में यह संख्या सिर्फ 4 फ़ीसदी थी। इसके अलावा मुस्लिम छात्रों में ड्रॉप-आउट रेट भी ज़्यादा था। हालांकि ये फ़ेलोशिप देश में मौजूद सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए थी, जिसमें सिख, बौद्ध, ईसाई और जैन समुदाय के छात्र भी शामिल थे।

इस फ़ेलोशिप के तहत NET क्वालीफाइड अल्पसंख्यकों छात्रों को ही सरकारी संस्थानों से M.Phil और PhD के लिए फ़ेलोशिप मिलती थी। वो भी तब, जब उनके परिवार की सालाना आय 6 लाख रुपये से कम हो। इसके अलावा पोस्ट ग्रेजुएशन में कम से कम 55 फ़ीसदी मार्क्स होने ज़रूरी थे। पहले दो सालों में जूनियर रिसर्च फ़ेलोशिप के लिए 31 हज़ार रुपये प्रति महीने मिलते थे और इसके बाद बाकी तीन सालों के लिए 35 हज़ार रुपये प्रति महीने दिए जाते थे।

शोधार्थी आर्थिक दिक्कतों के साथ ही मानसिक पीड़ा को भी मजबूर

गौरतलब है कि मौजूदा समय में इस फ़ेलोशिप से कई छात्रों की पढ़ाई आगे बढ़ पा रही है। कई छात्र इसके स्टाइपन पर ही निर्भर हैं और इसकी देरी उन्हें आर्थिक दिक्कतों के साथ ही मानसिक पीड़ा भी दे रही है। ऐसे में छात्र बार-बार सरकार से इस उम्मीद में गुहार लगा रहे हैं कि 'सबका साथ-सबका विकास' में सरकार इन अल्पसंख्यक छात्रों का विकास भी सुनिश्चित करेगी। इसके साथ ही 'जय विज्ञान' और 'जय अनुसंधान' जैसे नारे भी कभी हक़ीकत का रूप लेंगे।

हालांकि छात्रों को अब तक 'कार्य प्रोसेस में है' के अलावा कोई जवाब नहीं मिला लेकिन वित्तीय वर्ष 2023-24 में एमएएएफ के अलावा अल्पसंख्यकों के लिए कई अन्य योजनाओं के बजट में काफी कटौती कर सरकार ने कुछ इशारा ज़रूर किया है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए केंद्रीय बजट का अनुमान 2022-23 में 5,020.50 करोड़ रुपये था जोकि इस बार घटाकर 3,097 करोड़ रुपये कर दिए गए हैं। ये पिछले साल की तुलना में 38 फ़ीसदी कम है। जाहिर है, ये हज़ारों छात्रों की उम्मीदों पर पानी फिरने जैसा है, जिसे लेकर उन्हें उनका भविष्य अधर में लटका नज़र आ रहा है।

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