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सिंधु घाटी सभ्यता के शासक वर्ग से जुड़े साक्ष्य आख़िर क्यों नहीं ढूंढ पा रहे पुरातत्वविद?

सिंधु घाटी सभ्यता पर एक सदी के शोध के बाद भी पुरातत्वविदों को शासक वर्ग के साक्ष्य नहीं मिले हैं, ऐसे में सिंधु घाटी के समतावाद पर विचार करने का समय आ गया है।
Harappa
हड़प्पा का पुरातात्विक स्थल। छवि सौजन्य: विकिमीडिया कॉमन्स

एक सदी से कुछ अधिक समय पहले, ब्रिटिश और भारतीय पुरातत्वविदों ने सिंधु घाटी में खुदाई शुरू की थी। इसके बाद इस बात का एहसास हुआ कि उन्हे इस खुदाई में सिंधु घाटी की पुरानी अज्ञात सभ्यता के अवशेष मिले हैं। यह इलाका पाकिस्तान और भारत के कुछ हिस्सों से होते हुए अफगानिस्तान तक जाता है। खोजकर्ताओं को इस खुदाई से जिस संस्कृति का पता लगा, वह उसी समय में प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया में मौजूद थी, और एक बहुत बड़े इलाके को कवर करती थी। आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण रूप से यह एक उन्नत सभ्यता थी जो परिष्कृत और जटिल थी, जिसमें बड़े मगर सावधानीपूर्वक बनाए गए शहर थे। इसमें अपेक्षाकृत समृद्ध आबादी थी, लेखन का काम था, पाइपलाइन और स्नानघर थे, व्यापक व्यापार कनेक्शन थे और यहां तक कि मानकीकृत वजन और माप के उपकरण भी मौजूद थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में किस प्रकार का समाज था? वहां कौन रहते थे और उन्होंने खुद को कैसे संगठित किया? पुरातत्वविद और अन्य विशेषज्ञ आज भी ये प्रश्न पूछते हैं, लेकिन पहले के खोजकर्ता भी पहले से मौजूद घाटी की कुछ अनूठी विशेषताओं को नोटिस कर रहे थे।

मेसोपोटामिया और मिस्र में, "देवताओं के भव्य मंदिरों के निर्माण और राजाओं के महलों और कब्रों पर बहुत पैसा खर्च किया गया और उन्हे बड़े सोच-विचार के साथ बनाया गया था" ऐसा कहना है सर जॉन मार्शल का, जिन्होंने पांच मुख्य शहरों में से दो, हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की खुदाई की निगरानी की थी। "लेकिन बाकी लोगों को मिट्टी के मामूली घरों के मिले अवशेष से ही संतुष्ट होना पड़ा था।"

लगता है सिंधु घाटी में अब, “तस्वीर उलट गई है क्योंकि इसके सबूत मिले हैं कि वहां बेहतरीन संरचनाएं वे थीं जिन्हे आम नागरिकों की सुविधा के लिए बनाया गया था। बेशक वहां मंदिर, महल और कब्रें रही होंगी, लेकिन यदि ऐसा है, तो वे अब दिखाई नहीं देती हैं या वे अन्य इमारतों की तरह ही थीं क्योंकि उन्हें आसानी से अलग नहीं किया जा सकता है।”

जब ये शहर अपने उत्कर्ष पर थे, वह समय लगभग ईसा पूर्व 2600 से ईसा पूर्व 1900 के बीच का है, सिंधु घाटी सभ्यता ने, अतीत में शहरीकरण और असमानता के बीच संबंधों के बारे में लंबे समय से चली आ रही धारणाओं को खारिज करते हुए, दुनिया का सबसे समतावादी प्रारंभिक जटिल समाज बनाया होगा। लगता है इन बड़े शाहरों को योजनाबद्ध और बड़े पैमाने पर वास्तुकला का इस्तेमाल कर बनाया गया था जिसमें विशाल आवासीय घर भी शामिल थे, और आसपास के इलाकों में छोटी बस्तियां समान जीवन स्तर के साथ समान संस्कृति का आनंद उठाती नज़र आती थीं।

प्राचीन सिंधु घाटी के अवशेषों की एक सबसे आकर्षक विशेषता है और जो नज़र नहीं आती है: वह है शासक वर्ग या प्रबंधकीय अभिजात वर्ग से जुड़े किसी निशान का न मिलना। यह लंबे समय से चली आ रही उस सैद्धांतिक धारणा को खारिज करता है कि किसी भी जटिल समाज में सामाजिक संबंधों को स्तरीकृत किया जाना चाहिए: जिसमें सामूहिक कार्रवाई, शहरीकरण और आर्थिक विशेषज्ञता, केवल किसी बहुत ही असमान संस्कृति में विकसित होती है जो ऊपर से दिशा लेती है, और सभी सामाजिक ट्रेजेक्टरी से होते हुए सामान्य तौर पर विकसित होती है और जिसका सार्वभौमिक परिणाम राज्य के रूप में निकलता है यानि राज-सत्ता। लेकिन, यहां एक स्थिर, समृद्ध सभ्यता थी जो सदियों तक बिना किसी राज्य, राजसत्ता, या खुदा के आदेश पर राज करने वाले राजाओं या व्यापारी कुलीन वर्गों के बिना चली थी और जिसमें कोई कठोर जाति व्यवस्था या योद्धा वर्ग नहीं था। सवाल यह है कि उन्होंने इसे कैसे प्रबंधित किया?

दुर्भाग्य से, अन्वेषण और अनुसंधान के शुरुआती दशकों में, पुरातत्वविदों ने यह बात मान ली थी कि यदि सिंधु घाटी में समाज के ऊपर से नीचे के पदानुक्रम के अवशेष नहीं मिले तो इसका मतलब यही था कि वे अभी मिले नहीं हैं। कुछ लोगों ने तर्क दिया था कि असमानता के साक्ष्य न मिलने का मतलब यह भी हो सकता है कि, इलाके का शासक वर्ग अपने और अन्य सामाजिक समूहों के बीच के अंतर को छिपाने में बहुत चतुर था।

यह इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि सिंधु घाटी में दफन हुए शवों की कोई स्मारकीय कब्रें नहीं मिली थीं, कुछ शोधकर्ताओं का सुझाव था कि शासकों का अंतिम संस्कार नदियों में बहाकर कर दिया जाता होगा, जैसा कि अन्य शाही संस्कृतियों में ऐसी प्रथा थी। लेकिन दाह संस्कार पुरातात्विक रूप से अदृश्य नहीं है; अन्य संस्कृतियों के अवशेषों में अक्सर इसके साक्ष्य शामिल होते हैं।

हाल ही में, पुरातत्वविद, मूल खोजकर्ताओं की टिप्पणियों पर वापस गौर करने और सिंधु घाटी सभ्यता में प्राचीन जीवन के बारे में सिद्धांत विकसित करने के लिए सीधे उनके सामने मौजूद सबूतों का इस्तेमाल करने के इच्छुक दिख रहे हैं।

दक्षिण एशिया के पुरातात्विक डेटा में काफी सुधार हुआ है और इसमें और भी बहुत कुछ है। कई ऐसे सिंधु स्थल अब पुरातत्वविदों की जानकारी में आए हैं जो दशकों पहले नहीं थे। इसके अलावा पर्यावरणीय संदर्भ भी मिले हैं जो इस क्षेत्र में शहरीकरण को सक्षम बनाते थे – यानि जलवायु, प्राकृतिक संसाधन – जो अब बहुत स्पष्ट है।

पुरातत्वविदों ने असमानता और वर्ग विभाजन की पहचान करने के लिए उपकरणों का एक मजबूत सेट तैयार किया है: मुर्दाघर डेटा, महल संयोजन, भव्य स्मारक, लिखित रिकॉर्ड और जल्द ही, संभवतः घरेलू डेटा का भी इस्तेमाल किया जाएगा। फिर भी, एक सदी के शोध में, पुरातत्वविदों को सिंधु घाटी में शासक वर्ग का कोई सबूत नहीं मिला है जो अन्य प्रारंभिक समाजों में हासिल सबूतों के बराबर हो।

1990 के दशक के उत्तरार्ध में, सिंधु के पुरातत्वविदों ने एक नई अवधारणा पर विचार करना शुरू किया जो तथ्यों पर बेहतर फिट बैठती थी। पित्रसत्तात्मक के मुताबिक एक जटिल राजनीतिक संगठन, शहरों समेत एक अभिजात वर्ग द्वारा ऊपर से नीचे के निर्णयों के बजाय कई अलग-अलग, गैर-रैंक वाले सामाजिक समूहों के बीच बातचीत के माध्यम से उभर सकता है: जिसमें सहयोग होगा वर्चस्व नहीं, जो सामूहिक कार्रवाई का जरिया बन सकता है। अब व्यापक रूप से यह तर्क दिया जा रहा है कि कई सामाजिक समूहों ने सिंधु शहरों के निर्माण और उनमें होने वाली आर्थिक गतिविधियों में योगदान दिया था, और कोई भी एक-दूसरे पर हावी नहीं हुआ था।

यह तर्क इस बात से भी मजबूत होता है कि इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि सिंधु उत्पादकों के किसी भी समूह को उन दुर्लभ सामग्रियों के इस्तेमाल से बाहर रखा गया था जिन्हें शिल्पकारों को लंबी दूरी से हासिल करना पड़ता था, या कि विशेष समूहों ने सिंधु समाज में अपने लिए उच्च स्थान हासिल करने के लिए उन सामग्रियों तक अन्य की पहुंच को सीमित किया था।

सिंधु संस्कृति के सबसे खास और तकनीकी रूप से बेहद कीमती उत्पादों में से एक उत्कीर्ण मुद्रांकित मुहरें थीं जिनमें टेक्स्ट और तस्वीरें थीं; अकेले मोहनजोदड़ों में ही ये 2,500 से अधिक की संख्या में पाई गई हैं। लेकिन इन मुहरों का उत्पादन कई स्थानों पर कारीगरों के अलग-अलग समूहों ने किया होगा, और इसका कोई सबूत नहीं है कि शासक वर्ग ने इनके उत्पादन को नियंत्रित किया था। तकनीकी शैलियां कारीगरों के विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से जोड़ने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जो काफी हद तक खुलेपन और ज्ञान के आदान-प्रदान का संकेत देती हैं।

सिंधु शहर के निवासियों ने बड़े और छोटे पैमाने पर सार्वजनिक भवन बना; जैसे मोहनजोदड़ों का महान स्नानघर जिसकी एक विशाल संरचना है और इसमें कसकर फिट की गई पक्की ईंटों से बना एक बड़ा पक्का स्नानघर है, जिसका जल कोलतार से रोका है और पाइप और नालियों से सुसज्जित है जो पानी के प्रवाह और तापमान पर नियंत्रण करता है। मोहनजोदड़ों में, ईंटों के चबूतरों के ऊपर गैर-आवासीय संरचनाएं बनाई गईं, जो उनके ऊपर बनी संरचनाओं जितनी ही महत्वपूर्ण थीं और इसके लिए बहुत अधिक समन्वित कार्रवाई की जरूरत होती है। यह गणना की गई है कि केवल एक फाउंडेशन प्लेटफॉर्म के लिए चार मिलियन दिनों के श्रम की जरूरत पड़ी होगी, या 10,000 बिल्डरों को एक वर्ष से अधिक समय तक काम करना पड़ा होगा।

फिर भी, हड़प्पा और मोहनजोदड़ों दोनों में, ये बड़ी गैर-आवासीय संरचनाएं अपेक्षाकृत सुलभ थीं जिससे पता चलता है कि वे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग तक सीमित महलों या प्रशासनिक केंद्रों के विपरीत "सार्वजनिक" थीं। इनमें से कुछ ने पड़ोस में या महत्वपूर्ण सड़कों और सड़कों के किनारे बसे विभिन्न समूहों के बीच आदान-प्रदान, संपर्क और बातचीत के लिए विशेष स्थानों के रूप में काम किया होगा। इन स्थानों ने शहरवासियों को योजना और नीति पर उच्च स्तर की आम सहमति बनाए रखने में मदद की होगी और यह सुनिश्चित किया होगा कि कोई भी समूह दूसरों की कीमत पर धन संचय करने में सक्षम न हो।

सिंधु घाटी के अवशेषों से अभी भी उनकी सारी संपत्ति/अवशेष हासिल नहीं हुए हैं। सिंधु लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, और हम अभी भी नहीं जानते हैं कि दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सभ्यता का पतन क्यों शुरू हुआ था। हाल के सबसे सकारात्मक विकासों में से एक सभ्यता की लघु-स्तरीय बस्तियों में डेटा और रुचि में नाटकीय वृद्धि है, जो इस सवाल पर रोशनी डालती है कि क्या ये बस्तियां एक-दूसरे से या शहरों से गुणात्मक रूप से अलग थीं - और सिंधु समतावाद कितनी दूर तक इसके व्यापक परिदृश्य में विस्तारित हुआ था।

हालांकि, हमने पहले जो पाया है, वह बताता है कि समतावाद सामूहिक कार्रवाई के लिए एक वरदान हो सकता है: यदि लाभ अभिजात वर्ग के एक उपसमूह तक सीमित नहीं थे, तो अलग-अलग सामाजिक समूह सामूहिक कार्रवाई में निवेश करने के लिए अधिक इच्छुक हो सकते हैं। इससे पता चलता है कि पित्रसत्ता सामाजिक समूहों के बीच और पूरे समाज में बलपूर्वक सत्ता पर एक तरह के ब्रेक के रूप में कार्य कर सकती है।

यदि मामला यही है और सिंधु सभ्यता पर एक सदी के शोध के बाद, पुरातत्वविदों को अन्य प्रारंभिक जटिल समाजों में हासिल साक्ष्यों की तुलना में शासक वर्ग के साक्ष्य नहीं मिले हैं, तो सिंधु घाटी के समतावाद पर विचार करने का समय आ गया है।

सबूत बताते हैं कि शहरीकरण, सामूहिक कार्रवाई और तकनीकी नवाचार किसी बहिष्कृत शासक वर्ग के एजेंडे से प्रेरित नहीं हैं, और उनकी पूर्ण अनुपस्थिति में हो सकते हैं। सिंधु घाटी समतावादी थी, इसलिए नहीं कि इसमें जटिलता का अभाव था, बल्कि इसलिए कि शासक वर्ग सामाजिक जटिलता की कोई पूर्व शर्त नहीं है। यह हमें सामूहिक कार्रवाई और असमानता के बीच बुनियादी संबंधों पर पुनर्विचार करने की चुनौती देता है।

उपरवाले के प्रतिनिधि के रूप में राज करने वाला राजा मर चुका है या इस मामले में, सबसे अधिक जो संभावना है वह यह कि वह कभी अस्तित्व में ही नहीं था।

एडम एस. ग्रीन यॉर्क विश्वविद्यालय में सस्टेनबिलिटी के अध्यापक हैं। वे दक्षिण एशिया पर केंद्रित एक पुरातात्विक मानवविज्ञानी हैं जो प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और राजनीतिक अर्थव्यवस्था के लेंस के माध्यम से प्रारंभिक राज्यों के तुलनात्मक अध्ययन में विशेषज्ञता रखते हैं।

स्रोत: इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट

क्रेडिट लाइन: यह लेख इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट की एक परियोजना है, जिसे ह्यूमन ब्रिजेस ने प्रकाशित किया था।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Why Are Archaeologists Unable to Find Evidence of a Ruling Class of Indus Civilisation?

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