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क्यों बढ़ रहे टमाटर के दाम?

टमाटर की ऊंची क़ीमतें उपभोक्ताओं को परेशान कर रही हैं, जबकि किसानों को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हो रहा है।
tomato

मैकडॉनल्ड्स (Mc Donalds) द्वारा अपने बर्गर में टमाटर के स्लाइस का उपयोग न करना, और चोरों द्वारा कर्नाटक के खेतों और तेलंगाना व आंध्र प्रदेश की मंडियों से टमाटर चुराना सनसनीखेज सुर्खियां बना सकता है। लेकिन टमाटर की ऊंची कीमतें उपभोक्ताओं को परेशान कर रही हैं, जबकि किसानों को कोई खास फायदा नहीं हो रहा है।

इस साल टमाटर की कीमतों में इतनी तेज़ बढ़ोतरी क्यों हुई? आइए टमाटर उत्पादन और विपणन चक्र पर एक नजर डालें।

टमाटर खेती की लागत

जब लागत की बात आती है, तो टमाटर उत्पादन में श्रम लागत ही मुख्य लागत होती है। फसल के मौसम के दौरान, एक हेक्टेयर में एक बार की फसल तोड़ने के लिए 35-40 मजदूरों की आवश्यकता होती है। पूरी फसल अवधि के लिए कम से कम पांच बार तुड़ाई होगी, प्रत्येक दस दिन के अंतराल के बाद। अकेले एक तुड़ाई के लिए श्रम लागत लगभग 12,000 रुपये (दक्षिणी राज्यों में औसत मजदूरी दरों के अनुसार) आएगी और सभी पांच तुड़ाई के लिए कुल तुड़ाई लागत लगभग 60,000 रुपये होगी। इसके अलावा, जुताई, बुआई, रोपाई, निराई, खाद, कीटनाशकों का छिड़काव, पैकिंग और मंडियों तक परिवहन आदि के लिए मजदूरों को नियोजित करना होता है। इन सभी को मिलाकर, कुल श्रम लागत लगभग 1 लाख रुपये हो सकती है, भले ही वह कुछ भी हो- किराए पर दिहाड़ी मजदूरों के लिए लागत या पारिवारिक श्रम के लिए आरोपित।

आम तौर पर, टमाटर की फसल के लिए 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन उर्वरक (यूरिया) की आवश्यकता होती है, जिसकी लागत 2880 रुपये है, 50 किलोग्राम फॉस्फेट की लागत 1050 रुपये और 50 किलोग्राम पोटाश उर्वरक, जिसकी लागत 1200 रुपये प्रति हेक्टेयर होती है, तो टमाटर की खेती के लिए कुल उर्वरक लागत 5130 रुपये प्रति हेक्टेयर हो सकती है।

उर्वरता और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर, प्रति हेक्टेयर भूमि की किराये की लागत 30,000 रुपये से 35,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। ऋण पर ब्याज, सिंचाई के लिए बिजली या डीजल की लागत, बीज, उपकरण किराये (जैसे स्प्रेयर, पंपसेट और ट्रैक्टर के लिए), और कीटनाशकों आदि को शामिल करते हुए, श्रम लागत के अलावा अन्य लागत 1 लाख रुपये तक आ सकती है। आइए इसकी तुलना टमाटर की उपज और आय से करें।

प्रति हेक्टेयर उपज

तमिलनाडु में, प्रति हेक्टेयर देसी टमाटर की उपज लगभग 40-45 टन है और संकर (hybrid) टमाटर की उपज 80-90 टन है। अक्सर, फसल के चरम मौसम के दौरान, किसानों को हाइब्रिड टमाटरों के लिए केवल 4 रुपये प्रति किलोग्राम या उससे भी कम दाम मिलते हैं और देसी किस्मों के लिए 6-8 रुपये प्रति किलोग्राम मिलते हैं, तब जब खुदरा बाजार दर तीन से चार गुना अधिक होती है। फसल के बाद के नुकसान का हिसाब लगाने के बाद, किसान के पास जो अधिशेष बचेगा वह मुश्किल से छह महीने या खेती के अगले दौर के पारिवारिक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त होता है। यह मूल कारक है जो मूल्य वृद्धि के लिए बारहमासी दबाव बनाता है।

उत्पादन लागत के अलावा, मांग-आपूर्ति का असंतुलन भी टमाटर की खुदरा कीमतों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करता है।

तो, आइए अब खुदरा कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के अन्य तात्कालिक कारणों का पता लगाएं, जैसे टमाटर की समग्र विपणन गतिशीलता (marketing dynamics) की पृष्ठभूमि में आपूर्ति में कमी।

टमाटर उत्पादन एवं विपणन चक्र

विभिन्न किस्मों के लिए टमाटर की फसल की अवधि 90 से 150 दिन है। अल्पकालिक संकर (hybrid) किस्मों की तुड़ाई लगभग तीन महीने में की जा सकती है और देसी किस्मों की तुड़ाई में पांच महीने तक का समय लग जाता है। लेकिन देसी किस्मों की कीमत हाइब्रिड किस्मों से लगभग दोगुनी होगी।

एक वर्ष में बुआई के दो मौसम मई-जून और नवंबर-दिसंबर होते हैं। इसका मतलब है कि फसल का मौसम जुलाई से अक्टूबर और जनवरी से अप्रैल होता है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में कुछ भिन्नताएं होती हैं।

टमाटर अत्यधिक जल्दी खराब होने वाली सब्ज़ी होती है, और बाहर, सामान्य कमरे के तापमान में इसकी शेल्फ लाइफ अधिकतम 72 घंटे होती है। टमाटरों को कोल्ड स्टोरेज में 13-16 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर संग्रहित किया जाना चाहिए। इनकी कोल्ड स्टोरेज लाइफ भी 3 से 4 हफ्ते ही होती है। इसे5 डिग्री सेल्सियस से नीचे अधिक समय तक भी संग्रहित नहीं किया जा सकता, क्योंकि कम तापमान पर ये जल्दी सड़ जाते हैं। परिवहन और कोल्ड स्टोरेज की लागत लगभग 2 रुपये प्रति किलोग्राम आती है, लेकिन कई टमाटर उगाने वाले क्षेत्रों में ऐसी कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं नहीं हैं।

यह ध्यान में रखते हुए कि टमाटरों को कोल्ड स्टोरेज में लगभग एक महीने तक संग्रहीत किया जा सकता है, यानी, पहली फसल के मौसम में मई तक और साल में दूसरी फसल के मौसम में नवंबर तक, जून और दिसंबर ऐसे महीने हैं जिनमें कमी होगी; इस वजह से कम आपूर्ति और कीमतें चरम पर होंगी। आम तौर पर, टमाटर की कीमतों में अगस्त और फरवरी से गिरावट शुरू हो जाती है जब तुड़ाई शुरू होती है। लेकिन, अक्सर, साल में जुलाई-अगस्त के दौरान टमाटर की कीमतें बढ़ जाती हैं क्योंकि मानसून के कारण इस जल्द खराब होने वाली वस्तु की तुड़ाई और परिवहन प्रभावित होती है और इसलिए स्थानीय बाजार में इसकी आपूर्ति कम हो जाती है।

आमतौर पर, सभी खराब होने वाली सब्जियों के मामले में आपूर्ति-मूल्य की गतिशीलता ऐसी है कि आपूर्ति में 15-20% की कमी से कीमतों में 50% या उससे अधिक की बढ़ोतरी हो सकती है। बारिश के कारण आपूर्ति में तीन-चार दिन की बाधा से भी कीमतें दोगुनी हो सकती हैं।

पर यूपी के प्रयागराज के बाहरी इलाके करछना में टमाटर की खेती करने वाले किसान गिरिधारी कुशवाहा ने न्यूज़क्लिक को बताया, ''कम उत्पादन की भरपाई करने के अलावा, ऊंची कीमतें किसानों को कोई अतिरिक्त आय नहीं दिलाती हैं।''

आपूर्ति में व्यवधान और टमाटर की कमी

भारत में जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं की कीमतों में उच्च अस्थिरता सर्वविदित है। सामान्य धारणा यह है कि तेज वृद्धि मौसमी है और अगली फसल तक अल्पकालिक होती है। लेकिन जून 2023 में केवल एक महीने में टमाटर की कीमतों में 400% से अधिक की वृद्धि को कैसे समझाया जाए? चलिये इसकी विस्तार से जांच करें।

2012-13 तक, भारत में बागवानी उत्पादन खाद्यान्न उत्पादन से आगे निकल गया था। अब, देश में कुल कृषि उत्पादन में बागवानी का हिस्सा लगभग 35% है। यदि फलों के उत्पादन को छोड़ दें तो देश में कुल सब्जी उत्पादन का 10% हिस्सा अकेले टमाटर का है। इसलिए, यह एक प्रमुख फसल है जो देश में हेडलाइन मुद्रास्फीति (यानी, कुल मुद्रास्फीति) और व्यापक आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित करने में सक्षम है।

अप्रैल 2023 में भी उत्तर प्रदेश के कई शहरों में टमाटर की कीमतें 10 रुपये प्रति किलोग्राम पर थीं। हाल ही में 20 मई 2023 को भी, कई किसानों ने नासिक में एपीएमसी बाजार यार्ड, जो हिमाचल प्रदेश में सोलन के अलावा देश में टमाटर के थोक बाजार के रूप में सबसे बड़ा है, के सामने सड़कों पर टमाटर फेंक दिये, क्योंकि उन्हें केवल 30 रुपये प्रति क्रेट (प्रत्येक 20 किलोग्राम) या 1.50 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत दी जा रही थी! मई 2022 में उन्हें प्रति क्रेट 800 रुपये यानी 40 रुपये किलो मिले. लेकिन नासिक में टमाटर की एक क्रेट की उत्पादन लागत 45 रुपये आई थी! फिर भी उत्पादन प्रचुर मात्रा में हुआ और मध्य मई के बाद सामान्य 15,000 क्रेटों के बजाय प्रति दिन 30,000 क्रेटों से अधिक की पैदावार हुई। इसलिए, कीमतों में गिरावट आई।

फिर मई के अंत में पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और यहां तक कि कर्नाटक में बेमौसम बारिश हुई। इसके अतिरिक्त, दो प्रमुख टमाटर उत्पादक राज्य- महाराष्ट्र और कर्नाटक में, टमाटर की फसल पर दो वायरस के हमले हुए, जिससे कुल उत्पादन में काफी कमी आई। इससे बड़ी अड़चनें आईं और आपूर्ति में कमी हुई। टमाटर की कीमतें जो 1 जून को धीरे-धीरे यूपी के कुछ शहरों में लगभग 40 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थीं, जून के अंत तक चार गुना बढ़कर 150-160 रुपये तक पहुंच गईं। कोलकाता में भी यही स्थिति थी और दिल्ली और बेंगलुरु में कीमतें 140 रुपये पर चल रही थीं।

लू और बेमौसम बारिश

आपूर्ति में व्यवधान के दो प्रमुख कारक थे- गर्मी की लहर और उसके बाद हुई बेमौसम बारिश। गर्मी की लहर ने टमाटर की पैदावार को काफी कम कर दिया और बेमौसम बारिश ने या तो फसलें नष्ट कर दीं या आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान पैदा कर दिया। शीतगृहों में स्टॉक किसी काम का न रहा। ऐसा इसलिए था क्योंकि कीमतों में बढ़ोतरी के पहले संकेत पर, अधिक से अधिक किसान आने वाले दिनों में बेहतर कीमत की उम्मीद में अपने स्टॉक को कोल्ड स्टोरेज में रखने के लिए ले आए। जमाखोरी बढ़ती ही गई. कुछ थोक व्यापारियों के बजाय हजारों किसानों और छोटे व्यापारियों ने भी कोल्ड स्टोरेज में जमाखोरी शुरू कर दी।

दूसरा कारण टमाटर की थोक कीमत और खुदरा कीमत के बीच भारी अंतर है। सभी प्रमुख शहरों में सभी सब्जियों की दैनिक कीमत का विवरण देने वाली CommoditiesOnline.Com वेबसाइट के अनुसार, 7 जुलाई 2023 को प्रयागराज में थोक विक्रेताओं के पास टमाटर 30-40 रुपये की दर पर उपलब्ध था, लेकिन खुदरा दरें 120-140 रुपये थीं। व्यापारियों द्वारा सट्टेबाजी और सुपर-मुनाफाखोरी के एक मजबूत तत्व की भागीदारी को छोड़कर इतना बड़ा अंतर समझ से परे है।

विशेषज्ञ और रेटिंग एजेंसियां क्या कहती हैं?

नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च(NCAER) के अग्रणी नवउदारवादी कृषि अर्थशास्त्री और पीएम मोदी के सलाहकार, अशोक गुलाटी और उनके दो सहयोगियों ने भारत में कृषि मूल्य-श्रृंखला (Agricultural Value-Chains in India) नामक एक पुस्तक निकाली है। उस पुस्तक में, लेखकों ने एक पूरा अध्याय TOP (Tomato, Onion, Potato), या जल्दी खराब होने वाले टमाटर, प्याज और आलू की कीमत की गतिशीलता पर समर्पित किया था। पुस्तक के मुख्य निष्कर्ष हैं:

• भारत दुनिया में टमाटर का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन मुख्य रूप से खराब बुनियादी ढांचे के कारण वैश्विक निर्यात में इसकी हिस्सेदारी केवल 2% है।

• किसानों को टमाटर के अंतिम खुदरा मूल्य का केवल 30% ही मिलता है और बाकी थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं की कई परतों द्वारा साझा किया जाता है।

• केंद्र ने 2018 में ऑपरेशन ग्रीन की शुरुआत की, जिसमें TOP के मामले में भंडारण और परिवहन लागत पर 50% की सब्सिडी की पेशकश की गई, जिसे बाद में सभी सब्जियों और फलों तक विस्तारित किया गया। लेकिन किसान इस योजना का नके बराबर उपयोग कर रहे हैं क्योंकि उनमें से अधिकांश को इस योजना के बारे में पता ही नहीं है, कुछ हद तक नौकरशाही की उदासीनता के कारण और कुछ हद तक मुख्य रूप से व्यापारी-माफिया इसे हड़प लेते हैं।

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) मासिक आंकड़े पेश करती है कि भारत में आम लोगों (मस्लन, अनौपचारिक मजदूरों) द्वारा उपभोग की जाने वाली जनता भोजन की एक थाली की कीमत औसतन कितनी है। क्रिसिल अध्ययन से पता चलता है कि थाली की कीमत अप्रैल 2023 तक कम हो रही थी और मई 2023 से अचानक बढ़ना शुरू हो गई (आंकड़ा देखें) और इस वृद्धि का कारण मुख्य रूप से टमाटर की कीमत में बढ़ोतरी है।

इसके अतिरिक्त, भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, जून के अंत तक भारत के 50% क्षेत्रों में कम वर्षा हुई थी। इससे उपज में कमी और खाद्य मुद्रास्फीति का बढ़ना भी तय है।

सिर्फ खाना ही महंगा नहीं होगा. चुनावी वर्ष में खाद्य मुद्रास्फीति शासकों के लिए राजनीतिक रूप से भी महंगी साबित होगी।

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