Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

क्यों सनातन धर्म पर बहस हिंदुओं में विभाजन पैदा कर रही है?

स्वामी दयानंद सरस्वती और कबीरदास उन लोगों में से हैं जिन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था द्वारा अपनाए गए तर्कहीन और अमानवीय अनुष्ठानों की आलोचना की थी।
Debates on Sanatan Dharma

डीएमके नेता द्वारा 'सनातन धर्म' के खिलाफ दिए गए बयान से विवाद खड़ा हो गया है। वे  तमिलनाडु के प्रगतिशील लेखकों के एक सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे, जिन्होंने 'सनातन धर्म' के नाम पर अंधविश्वासों, तर्कहीन प्रथाओं, अनुष्ठानों, जाति-संरचना, अस्पृश्यता और अमानवीय सामाजिक अन्याय के खिलाफ वैज्ञानिक सोच का प्रसार किया था।

आखिर 'सनातन धर्म' क्या है? इस शब्द का इस्तेमाल पहली बार मनुस्मृति के लेखक ने निम्नलिखित छंदों में उच्च जाति के हिंदू पुरुषों का बचाव करने के लिए किया था:

क्षत्रियञ्चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् ।  नावमन्येत वै भूष्णुः कृशानपि कदाचन ॥ 135 ॥ एतत्त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम्। तस्मादेतत्त्रयं नित्यं नावमन्येत बुद्धिमान् ॥ 136 ॥

(यानि, स्वस्थ और शांतिपूर्ण जीवन जीने की इच्छा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को कभी भी क्षत्रिय, साँप, वेदों के जानकार ब्राह्मण को नहीं मारना चाहिए या उनका अपमान नहीं करना चाहिए, भले ही वे शरीर से कमजोर हों, घायल होने पर भी ये तीनों व्यक्ति को नष्ट कर सकते हैं। इसलिए बुद्धिमान लोग कभी इन तीनों को चोट नहीं पहुंचाते हैं)। 

नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नेनां मन्येत दुर्लभाम् ॥ 137॥ 

(अर्थात, किसी व्यक्ति को गरीब होने पर दुखी नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके पास कोई पैतृक संपत्ति नहीं है, या वह आजीविका के साधन पाने में सफल नहीं हो सका, उसे खुद को अभागा या बेकार महसूस नहीं करना चाहिए, उसे प्रयास करते रहना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि धन उससे परे है)।  

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । प्रियञ्च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥ 138॥ ॥ 

(मतलब, सत्य बोलो, मीठे वचन बोलो, सत्य के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल मत करो। परंतु मीठे वचनों में भी झूठ मत बोलो। यही सनातन धर्म है।)-मनुस्मृति 4-135-138, इस शब्द का इस्तेमाल प्रयोग श्रीमद् भागवत पुराण (8.14.4). में भी अस्पष्ट रूप से किया गया है।  

डीएमके नेता (उदयनिधि स्टालिन) सनातन धर्म के नाम पर प्रचारित अमानवीय कृत्यों की निंदा करने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं। हालाँकि प्राचीन काल से ही हिंदू आबादी विभिन्न संप्रदायों में विभाजित रही है, लेकिन 'सनातन धर्म' शब्द 19वीं शताब्दी में आर्य समाज की स्थापना करने वाले सुधारवादी स्वामी दयानंद सरस्वती के विरोध में ही लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने अपने अनुयायियों का मार्गदर्शन करने के लिए ‘सत्यार्थ प्रकाश’ नामक एक पुस्तक लिखी और उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था की सदियों पुरानी पकड़ जिसका हिंदुओं के विशाल बहुमत पर असर था, उसके कई तर्कहीन अनुष्ठानों को खारिज कर दिया था। उन्होंने हिंदुओं को केवल वेदों का पालन करने की सलाह दी, पुराणों का नहीं जो तर्कहीन कहानियों और मिथकों से भरे हुए हैं।

इस प्रकार, स्वामी दयानंद सरस्वती ने अवतार, मूर्ति पूजा और जाति व्यवस्था के सिद्धांत को भी खारिज कर दिया था। उन्होंने पुस्तक में तर्क दिया कि महिलाओं और दलितों को वेदों की शिक्षा और अध्ययन से वंचित नहीं किया जा सकता है क्योंकि भगवान ने उन्हें वह सब करने के लिए आंखें और अन्य अंग भी दिए हैं जो अन्य मनुष्य कर सकते हैं।

उन्होंने भूत-प्रेत से जुड़े कई अंधविश्वासों और मिथकों को खारिज कर दिया। उन्होंने लिखा, कि 'सभी रसायनविद, करामाती, जादूगर, चमत्कारी, भूत-प्रेतवादी आदि धोखेबाज हैं और उनकी सभी प्रथाओं/कलाओं को धोखाधड़ी के अलावा और किसी नज़र से नहीं देखा जाना चाहिए। युवाओं को बचपन में ही इन सभी धोखाधड़ियों के खिलाफ अच्छी तरह से समझाया जाना चाहिए, ताकि वे किसी भी सिद्धांतहीन व्यक्ति से धोखा न खा सके... (सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ 27)।

स्वामी दयानंद सरस्वती तो कुंडली और ज्योतिष का भी मज़ाक उड़ाते हैं। पुस्तक, प्रश्न-उत्तर प्रारूप में है, जिसे समाज सुधारक ज्योतिबा फुले ने अपनी गुलामगिरी में इसी धारणा के साथ अपनाया था। स्वामी दयानंद सरस्वती उन सभी तर्कहीन अनुष्ठानों का मज़ाक उड़ाते हैं जो कठोर, रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी व्यवस्था हिंदू आबादी पर थोपती है, और यह रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी व्यवस्था है जिसे 'सनातन धर्म' कहा जाता है।

ब्राह्मणवाद के गहरे प्रभाव में अतार्किक कर्मकांडों के अनुयायी, आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती के खिलाफ लड़ रहे थे। कई लोगों का मानना है कि जिन कट्टरपंथियों का उन्होंने विरोध किया, उन्होंने उन्हें जोधपुर में जानलेवा रसायन से जहर दे दिया, जहां 30 अक्टूबर, 1883 को उनकी मृत्यु हो गई थी।

डीएमके नेता के खिलाफ भी कुछ वैसा ही नाराजगी और गुस्सा पैदा हो रहा है, जैसा कि सनातन धर्म के एक रूढ़िवादी कट्टर अनुयायी और अयोध्या के ऋषि ने आह्वान करते हुए कहा कि यदि कोई डीएमके नेता का सिर काट कर लाता है तो उसे बदले में 10 करोड़ रुपये देने की घोषणा की है। खबर है कि डीएमके नेता के खिलाफ दो एफआईआर भी दर्ज की गई हैं। 

लोगों को पता होना चाहिए कि सभी धर्म कुछ स्वस्थ मानवीय मूल्य सिखाते हैं, जैसे प्रेम, करुणा, सत्य, ईमानदारी, अहिंसा, दया, सहानुभूति और भाईचारा। गांधीजी, सनातन धर्म के इस सकारात्मक सार के अनुयायी थे और अन्य धर्मों में भी यही देखते थे। वे सभी धर्मों द्वारा प्रचारित सकारात्मक सार्वभौमिक मूल्यों का पूरा सम्मान करते थे।

लेकिन सभी धर्मों में कुछ अतार्किक सामग्री और अनुष्ठान भी होते हैं जो समाज में वैज्ञानिक सोच के विकास में बाधा डालते हैं। तथाकथित 'सनातन धर्म' में अतार्किक और कर्मकांडीय सामग्री की प्राचीन काल से ही विभिन्न संतों और बुद्धिजीवियों द्वारा तीखी आलोचना की जाती रही है। उदाहरण के लिए, कोई महाकाव्य कविता, वाल्मिकी की रामायण, अयोध्या कांड, सर्ग 108 देख सकता है, जिसमें ऋषि जाबालि भगवान राम के पिता राजा दशरथ के निधन के आठवें दिन श्राद्ध मनाने के लिए सनातन धर्म अनुष्ठान का मजाक उड़ाते हैं। जिसका मूल श्लोक इस प्रकार हैं:

अष्टका पितृ दैवत्यम् इत्य अयम् प्रसृतो जनः |
अन्नस्य अपवित्रम् पश्य मृतो हि किम् अशिष्यति || 2-108-14

इस पर (लोगों का कहना है कि आठवें दिन मृत पूर्वज को भोजन कराना चाहिए। यह सरासर भोजन की बर्बादी है। कोई मृत व्यक्ति दूसरों के माध्यम से भोजन कैसे खा सकता है?) 

यदि भुक्तम् इह अन्येन देहम् अन्यस्य गच्छति |
दद्यात् प्रवसतः श्राद्धम् न तत् पथ्य अशनम् भवेत् || 2-108-15

(यदि किसी के द्वारा खाया गया भोजन दूर से ही दूसरे व्यक्ति के पेट में पहुंच जाता, तो यात्रा में भोजन ले जाने की कोई जरूरत नहीं है। घर पर किसी के द्वारा खाया गया भोजन यात्री के शरीर में पहुंच सकता है, जैसा कि श्राद्ध में होता है।) 

सनातन धर्म में प्रचलित रीति-रिवाजों की ऐसी ही आलोचना 15वीं सदी के हिंदी कवि कबीर दास की कविताओं में देखी जा सकती है। हालाँकि, कबीर दुनिया के पहले रचनात्मक लेखक थे जो हिंदुओं, मुसलमानों और यहां तक कि ईसाइयों द्वारा किए जाने वाले सभी अतार्किक अनुष्ठानों के निर्भीक आलोचक थे।

हालाँकि हिंदू मान्यताओं और अंधविश्वासों की आलोचना पहले भी कई प्राचीन दार्शनिकों द्वारा की गई थी, लेकिन 15वीं शताब्दी में दुनिया में कहीं भी किसी भी दार्शनिक ने बाइबिल या कुरान की आलोचना करने की हिम्मत नहीं की थी। ये कबीर ही थे, जिन्होंने पहली बार इन पाक-पवित्र ग्रन्थों में वर्णित सभी तर्कहीन विचारों की आलोचना की थी। वे एक सनातनी पंडित की बात को खारिज करते हुए कहते हैं कि वह झूठा है, 'पंडित वाद वादै सो झूठा'। अपने तर्कसंगत दृष्टिकोण के साथ, कबीर अपनी सोच और शब्द-दृष्टिकोण में एक बिंदु पर पहुँचते हैं कि वे भगवान राम की अवधारणा को दृढ़ता से अस्वीकार करते हैं और पारसनाथ तिवारी द्वारा संपादित उनकी एकत्रित कविताओं के गीत संख्या 140 में अपनी अस्वीकृति में फटकार लगाते हैं या तंज़ कसते हैं:

अब मेरी रांम कहइ रे बलइया। (मैं कभी भी 'राम' शब्द का उच्चारण नहीं करूंगा)

जांमन मरन दोऊ डर गइया।। (अब जन्म और मृत्यु का भय दूर हो गया)

ज्यों उघरी कों दे सरवांनां।  (जैसे उजागर हुए सुनने लायक नहीं है)

राम भगति मेरे मनहुं न मांनां।। (अत: मेरा मन राम की भक्ति को स्वीकार नहीं करता है)

हंम बहनोई राम मेरा सारा।  (मैं बहनोई राम का और वह मेरा साला) नोट: यह उत्तर भारत में तंज़ कसने वाला अप-शब्द हैI 

हमहि बाप रांम पूत हमारा।। (मैं पिता हूं और राम मेरी संतान हैं) इसे भी लोगों द्वारा और हिंदी फिल्मों द्वारा तंज़ कसने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

कहै कबीर ए हरि के बूता।  (कबीर अपने ईश्वर की शक्ति अर्थात् सत्य के आधार पर यह सब कहते हैं) 

रांम रमे तो कुकुर के पूता।। (यदि वह भगवान राम की पूजा करता है तो उसके साथ कुत्ते के बच्चे जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए)

यह वह कठोर भाषा है जिसका इस्तेमाल कबीर ने सनातन धर्म के विरुद्ध किया था। उन्होंने ईश्वर द्वारा पुरुष और स्त्री की रचना के मिथक को भी खारिज कर दिया था जो बाइबिल के पहले अध्याय में है जो कहता है: '27 इसलिए ईश्वर ने मानव जाति को अपनी छवि में बनाया, ईश्वर की छवि में उसने उन्हें बनाया; नर और नारी बनाकर उन्हें पैदा किया।'

इस मिथक को कुरान ने भी अपनाया है। कबीर दास इस मिथक की आलोचना करते हैं और मनुष्य के जन्म के बारे में वाल्मिकी रामायण में जाबालि ने जो कहा है उसका हवाला देते हैं:

बीजमात्रम् पिता जन्तोः शुक्लं रुधिरामेव च |
संयुक्तमृत्युमान्मात्रा पुरुषस्येह जन्म तत् || 2-108-11

(मनुष्य का जन्म स्त्री और पुरुष के द्रव्य (वीर्य और अंडे) के मिश्रण से होता है) कबीर भी ईश्वर द्वारा आदम और हव्वा के मिथक को खारिज करने के लिए यही बात कहते हैं। 

आदम आदि सुधि नहिं पाई / मामा हौवा कहां ते आई ।। (आदम को शुरू में नहीं पता था कि मम्मा ईव कहाँ से आई है)

तब नहिं होते तुरुक न हिंदू / मां का उदर पिता का बिंदू ।। (उस समय न तो मुसलमान थे और न ही हिंदू, यह मां की कोख और पिता का वीर्य था) —मैनी, कबीर ग्रंथावली, सं. पारसनाथ तिवारी, पृ. 119

फिर पृष्ठ 120 पर, कोई भी तथाकथित सनातन धर्म, ब्राह्मणवादी व्यवस्था की कबीर की आलोचना देख सकता है। मैं उन्हें मूल छंदों में उद्धृत करता हूं:

किरतिम सो जु गरभ अवतरिया / किरतिम सो जो नांमहिं धरिया ।। (गर्भ में अवतार एक मिथक है, दिया गया नाम भी एक मिथक है)

किरतिम सुन्नति और जनेऊ / हिंदू तुरुक न जानैं भेऊ ।। (खतना और जनेऊ संस्कार दोनों ही बनावटी हैं, हिंदू और मुसलमान सच्चाई नहीं जानते)....

पंडित भूलै पढ़ि गुनि बेदा / आपु अपनपै जांन न भेदा ।। (वेद पढ़कर ब्राह्मण ज्ञान भूल गये, वे स्वयं कुछ नहीं जानते)

संझा तरपन अरु खटकरमा / लागि रहै इनकै आसरमां ।। (पानी चढ़ाना और अन्य अनुष्ठान उन्हें हर समय व्यस्त रखते हैं)

गाइत्री जुग चारि पढ़ाई / पूछहु जाइ मुकुति किन पाई ।। (चार युगों तक वे गायत्री का जाप करते रहे, उनसे पूछो कि मोक्ष किसको मिला?)

और के छुएं लेत हैं सींचा / इनतैं कहहु कवन है नींचा।। (वे छुआछूत करते हैं, उनसे पूछो कि कौन है इतना नीचा) -- वही, पृष्ठ 120

आरएसएस-भाजपा विचारधारा के समर्थक, सनातन धर्म के अतार्किक पहलुओं का समर्थन करते हैं क्योंकि वे वैज्ञानिक सोच के दुश्मन हैं। भीमराव अंबेडकर ने भी सनातन धर्म की ब्राह्मणवादी विचारधारा की आलोचना की थी और इसलिए उन्होंने हिंदू धर्म को त्यागकर बौद्ध धम्म को अपना लिया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा उन बुद्धिजीवियों, तर्कसंगत विचारकों और संस्थानों की विरोधी है जो हमारे भारत की भलाई के लिए सच्चे ज्ञान को बढ़ावा देते हैं। वर्तमान सरकार सनातन धर्म के अमानवीय ब्राह्मणवादी पहलू का समर्थन करती है और इसके आलोचकों के खिलाफ लड़ती है जो  संविधान के अनुच्छेद 51 ए (एच) में दिए गए मौलिक संवैधानिक कर्तव्य के रूप में वैज्ञानिक स्वभाव का प्रसार करना चाहते हैं, और अनुछेद कहता है:

कि 'यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा-...

 (ह) वैज्ञानिक स्वभाव, मानवतावाद और जांच और सुधार की भावना विकसित करना।' 

संघ परिवार के सदस्य विश्व हिंदू परिषद ने तथाकथित 'धर्म योद्धाओं' (हिंदुत्व के योद्धाओं) की भर्ती के लिए 30 सितंबर से 14 अक्टूबर, 2023 तक पांच लाख गांवों को कवर करने वाली रथ यात्राओं के एक पखवाड़े लंबे अभियान की योजना बनाई है। क्या इन युवाओं का इस्तेमाल सनातन धर्म की रक्षा के नाम पर अन्य धर्मों के अनुयायियों और विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन के खिलाफ हिंसा फैलाने के लिए किया जाएगा?

आरएसएस-भाजपा नेतृत्व, चुनावों में पहले किए गए मुख्य वादों को पूरा करने में विफल रहा है, जैसे किसानों की आय दोगुनी करना, मूल्य वृद्धि या महंगाई को नियंत्रित करना, मजबूत औद्योगिक आधार बनाना आदि। शायद, धार्मिक विभाजन ही एकमात्र हथियार है जो उन्हें लगता है कि आगामी आम चुनाव उन्हे सत्ता में वापस लाएगा। 

वर्तमान प्रधानमंत्री खुद अपने बयानों और कामों से अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं। उनके बयान कि प्लास्टिक सर्जन ने गणेश के सिर की सर्जरी की थी और प्राचीन भारत में कर्ण के टेस्ट-ट्यूब के माध्यम से जन्म के बारे में उनके कथन प्रसिद्ध हैं। हमने देखा है कि उनके द्वारा किए गए अनुष्ठानों, उद्घाटन समारोहों में आधिकारिक कृत्य के रूप में 'सनातन धर्म' पर आधारित अनुष्ठान हुए हैं, फिर चाहे वह 'भूमि पूजन' हो या कोई अन्य अवसर।

हाल के दिनों में हमने नए संसद भवन और भारत मंडपम के उद्घाटन पर इन अनुष्ठानों को देखा, जो सरकारी धन से वित्त पोषित थे, जिस वित्त का भुगतान करों के माध्यम से सभी धर्मों के नागरिकों और यहां तक ​​​​कि नास्तिक लोग करते हैं। यही कारण है कि भारत का नेतृत्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने में विफल रहता है। याद करें कि थॉमस ग्रे ने एक बार अपनी एक प्रसिद्ध कविता में लिखा था कि "जहां अज्ञानता आनंद बन जाए, वहां बुद्धिमान होना मूर्खता है"। 

लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाते थे। वे हिंदी-उर्दू लेखकों के अखिल भारतीय संगठन जनवादी लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें:

Why is the Sanatan Dharma Debate Creating a Divide Among Hindus

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest