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आंध्र प्रदेश के एक परिवार ने बनारस में की ख़ुदकुशी, ‘सूदखोरों से थे परेशान’

“सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं दलालों के चंगुल में फंसी हुई हैं। आम आदमी परेशान है और अधिकारी, बिचौलिए व सूदखोर इसका नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं।”
Banaras News

हिंदी साहित्य के कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के बनारस में आंध्र प्रदेश का एक पूरा परिवार बिखर गया। पति-पत्नी समेत दो बेटों ने फांसी के फंदे को गले लगा दिया। इस घटना ने हर किसी को हिलाकर रख दिया है। बताया जा रहा है कि परिवार सूदखोरों से परेशान था। इनके शव बनारस के देवनाथपुरा स्थित धर्मशाला ‘काशी कैलाश भवन’ के एक कमरे में रस्सी से लटके मिले। सुसाइड नोट से पता चलता है कि इनकी स्थिति भी मुंशी प्रेमचंद के गोदान के पात्र 'होरी' की तरह ही थी जो तंगहाली और सिर पर कर्ज की गठरी लादे हुए सूदखोरों के आतंक से कराह रहे थे।

आंध्र प्रदेश के ईस्ट गोदावरी जिले के धर्मागुडयू स्ट्रीट मंडापेटा कोंडा बाबू (50 साल), पत्नी लावन्या (45 साल), पुत्र राजेश व जयराज ( 25 व 23 साल) 03 दिसंबर 2023 को बनारस आए। आंध्र प्रदेश के रामतारक आश्रम ने बनारस में धर्मशाला का निर्माण कराया था, जिसे काशी कैलाश भवन के नाम से जाना जाता है। इस आश्रम के दूसरे तल पर यह दंपति ठहरा हुआ था। कोंडा बाबू ने 350 रुपये रोजाना पर काशी कैलाश आश्रम का एस-6 कमरा लिया था। 07 दिसंबर 2023 की सुबह नौ बजे इन्हें कमरा छोड़ना था, जिसकी सूचना इन्होंने आश्रम के संचालक वीवी सुंदर शास्त्री को दे दी थी। कैलाश आश्रम की साफ-सफाई करने वाली महिला पुष्पा शाम को आई तो कमरा बंद मिला। उन्होंने केयरटेकर को सूचना दी। दोनों ने कमरा खुलवाने की कोशिश की, लेकिन नहीं खुला। बाद में खिड़की की झिरी से झांकर देखा तो पति-पत्नी और उनके दोनों बेटे फांसी के फंदे से लटके नजर आए।
 
पहले तमिलनाडु, फिर हरिद्वार और कोलकाता और आखिर में बनारस आए
 
आश्रम संचालक वीवी सुंदर शास्त्री की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और कमरे का दरवाजा तोड़कर अंदर दाखिल हुई। आश्रम के प्रबंधक ने पुलिस को बताया कि 06 दिसंबर 2023 को उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन किए और अगले दिन तारपीन का तेल, रस्सी और लोहे के हुक लेकर आए थे। पुलिस को कमरे से जो सुसाइड नोट मिला है उसमें इस बात का जिक्र है कि तीन सूदखोरों से उन्होंने छह लाख रुपये कर्ज ले रखा था और वो उन्हें काफी परेशान कर रहे थे। बनारस के पुलिस कमिश्नर मुथा अशोक जैन के मुताबिक, "आंध्र प्रदेश का यह परिवार सूदखोरों के खौफ के चलते पिछले दो महीने से अपना गांव छोड़कर जहां-तहां भटक रहा था। सबसे पहले वो पहले तमिलनाडु गए। फिर हरिद्वार और कोलकाता में उन्होंने कई दिन गुजारा। आखिर में वो बनारस आए और सामूहिक रूप से सुसाइड कर लिया।"
 
फोरेंसिक टीम का मानना है कि सुसाइड से पहले कोंडा बाबू के परिवार ने एक-दूसरे का फंदा लगाने में मदद की होगी। कैलाश आश्रम के जिस कमरे में पति-पत्नी व बेटे रह रहे थे उसमें दो फोल्डिंग चारपाई और एक लकड़ी का बिस्तर व कुर्सी थी। अनुमान के मुताबिक इसी कुर्सी के सहारे लोहे के धरन में लगे हुक पर नायलान की रस्सी बांधी गई होगी। परिवार में सभी के पास से ब्लेड मिले हैं। राजेश ने अपने बाएं हाथ की नस भी काटी थी।

कमरे से एक हेडफोन, चार्जर, और तारपीन का तेल भी मिला है। कोंडा बाबू के छोटे बेटे राजेश ने कैलाश भवन के गेस्ट रजिस्टर में जिस मोबाइल का नंबर नोट कराया था वह बंद मिला है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि सुसाइड करने से पहले उन्होंने मोबाइल स्विच ऑफ कर कहीं फेंक दिया होगा।
 
सूदखोरों के चलते गईं चार जिंदगियां?
 
बनारस कमिश्नरेट पुलिस को कमरे से ढाई पन्ने का जो सुसाइड नोट मिला है वह तेलुगु में लिखा गया है। पुलिस ने तेलगु भाषा में लिखे सुसाइड नोट का हिंदी अनुवाद कराया है, जिससे कई राज खुले हैं। सुसाइड नोट में कहा गया है कि सूदखोरों ने दंपति को छह लाख देकर 20 सादे चेक और 10 सफेद कागज पर परिवार वालों के दस्तखत कराए थे। बनारस के देवनाथपुरा चौकी इंचार्ज संजय यादव की तहरीर पर दुर्गा दिव्यश्री आटो कंसल्टेंसी के मालिक पेंटगदल प्रसाद के अलावा रामीरेड्डी वीर लक्ष्मी और मल्ली बाबू के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और धमकाने का मुकदमा दर्ज किया गया है।

एसीपी अवधेश कुमार पांडेय के मुताबिक, "दंपती का बड़ा बेटा राजेश, ईस्ट गोदावरी जिले के मंडापेटा इलाके में दुर्गा दिव्यश्री आटो कंसल्टेंसी कंपनी में काम करता था। इस कंपनी में सेकेंड हैंड गाड़ियां बिका करती थीं। गाड़ियों का कारोबार करने के लिए राजेश ने दुर्गा दिव्यश्री आटो कंसल्टेंसी के मालिक से छह लाख रुपये कर्ज लिया था। इसके बदले वो 20 लाख मांग रहे थे, जबकि पीड़ित परिवार उन्हें मूल धन लौटा चुका था। सूद पर पैसा उठाने वाला दुकान मालिक और उसके दो सहयोगी पूरे परिवार को प्रताड़ित कर रहे थे।"

"कोंडा बाबू ने बकाये का कई बार हिसाब किया, लेकिन कर्ज की राशि घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही थी। तीनों सूदखोर पूरे परिवार को धमकाते थे। कहते थे कि कहीं भी भाग कर जाओ, पैसा तो वसूल ही लेंगे। सूदखोरों से परेशान होकर कोंडा दंपति ने दो महीने पहले घर छोड़ दिया था। इस घटना के चलते कोंडा बाबू की गर्भवती बेटी काफी सदमें में है। बेटी का पति भी सड़क हादसे में जख्मी है। इस वजह से वो अपने परिजनों का शव लेने नहीं आ पा रहे हैं। शवों का अंतिम संस्कार करने के बाद अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस आंध्र प्रदेश जाएगी।"

बनारस में पर्यटकों की खुदकुशी की कई सनसनीखेज घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। इसी साल 21 सितंबर को गणेश महाल स्थित एक गेस्ट हाउस में बेंगलुरु के बीएच कृष्णमूर्ति नामक व्यक्ति ने फांसी लगाकर जान दे दी थी। इससे पहले 18 अगस्त 2023 को तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के रेवांथा मोहनराज और उनकी रिश्ते की चचेरी बहन श्रीसीजे शिवाला ने एक होटल में जान दे दी थी।

इसके अलावा देशभर में इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। साल 2018 में उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी कांड भी सबके ज़ेहन में ताज़ा है, जहां चुंडावत परिवार ने तंत्र-मंत्र के चक्कर में नारायणी देवी (77), इनके दो बेटे भावनेश भाटिया (50), ललित भाटिया (45), भावनेश की पत्नी सविता (48), ललित की पत्नी टीना (42), नारायणी देवी की विधवा बेटी प्रतिभा (57), तीनों भाई-बहनों के बच्चे प्रियंका (33), नीतू (25), मोनू (23), ध्रुव (15) और शिवम (15) समेत 11 लोगों की फांसी लगाकर जान दे दी थी। यह परिवार भी फंदे से लटकने के लिए बाजार से स्टूल लेकर आया था।

कर्नाटक का तुमकुरु शहर भी उस समय थर्रा गया था जब सदाशिवनगर इलाके में कबाब विक्रेता गरीब साब (36), उनकी पत्नी सुमैया (32), बेटी हजीरा (14), बेटे मोहम्मद शाभान (10) और मोहम्मद मुनीर (8) ने एक साथ सुसाइड कर लिया था। मरने वालों में पत्नी-पत्नी और तीन बच्चे शामिल थे। सुसाइड से पहले उन्होंने वीडियो भी बनाया था और सुसाइड नोट में सूदखोर से डेढ़ लाख कर्ज लेने का जिक्र किया था। कबाब विक्रेता ने सुसाइड करने से पहले वीडियो में कहा था कि सूदखोर उसकी पत्नी और बच्चों पर अत्याचार करता है। अगर मैं मर गया, तो वह उन्हें भी नहीं बख्शेगा।

इसी तरह तमिलनाडु के तिरुनेलवेली ज़िले के कलेक्टरेट परिसर में कुछ साल पहले एसाकिमुत्तू (28) ने अपनी पत्नी सुब्बूलक्ष्मी (25) और पांच एवं डेढ़ साल की दो बेटियों के साथ आत्मदाह कर लिया था। उस समय घटना की एक क्लिक सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी जिसमें छोटी बच्ची आग में जली हुई मां की ओर घिसट रही थी। यह वारदात भी सूदखोरों की देन थी।

बनारस में भी सूदखोरों का आतंक
 
पूर्वांचल में भी सूदखोरों का आतंक कम नहीं है। कुछ साल पहले बनारस के हुकुलगंज इलाके में मोमोज़ की दुकान से आजीविका चलाने वाले किशन गुप्ता ने अपनी पत्नी नीलम और दो बेटों शिखा व उज्जवल के साथ सुसाइड कर लिया था। बताया जाता है कि इन्होने भी सूदखोरों से कर्ज ले रखा था, जिसे वह चुका नहीं पा रहा था। आर्थिक तंगी के चलते बनारस के लक्सा इलाके में साल 2019 में एक ही परिवार के चार लोगों ने सुसाइड कर लिया था, जिनमें पिता दीपक गुप्ता के अलावा उसकी तीन मासूम बेटियां शामिल थीं। दीपक की होजरी कपड़े की दुकान थी। इन्होने भी सूदखोरों से कर्ज ले रखा था।

दरअसल, बनारस सदियों से पूर्वांचल का बड़ा बाजार रहा है। पूर्वांचल और बिहार के दर्जन भर जिलों में सभी बाजारों की मांग बनारस ही पूरी करता है। यहां सूदखोरी का धंधा सदियों से आबाद हैं। इस धंधे में पैसे डूबने का खतरा कम रहता है, क्योंकि सुबह दिया गया पैसा शाम तक बीस से तीस परसेंट ब्याज के साथ वापस जेब में पहुंच जाता है। पिछले पांच साल के आंकड़ों पर गौर करें तो औसतन हर माह दो लोग सूदखोरों से परेशान होकर अपनी जान दे देते हैं।

बनारस शहर के हर मार्केट और मुहल्ले में सूदखोरों का बड़ा जाल बिछा है। अगर गिरवी रखने को कुछ न भी हो तब भी सूदखोर कर्ज देने से पीछे नहीं रहते। एक बार जिसने सूदखोरों से कर्ज ले लिया, फिर उससे उबरना आसान नहीं रहता।
 
क्या है कहता है कानून?
 
अपने देश से अंग्रेज भले ही चले गए, लेकिन बनारस में महाजनी कानून आज भी चलन में है। अंग्रेजी हुकूमत में अगर कोई व्यक्ति कर्ज नहीं चुका पाता था तो उसकी संपत्ति साहूकार गिरवी रख लिया करते थे, चाहे वह गहना होता था अथवा जमीन। उनकी ब्याज दरें काफी अधिक होती थीं। यह महाजनी प्रथा कही जाती थी। करीब लाख आबादी वाले बनारस शहर में सूदखोरी पर पैसा देने के लिए सिर्फ 55-60 लोगों ने ही साहूकारी का लाइसेंस ले रखा है। इसकी लाइसेंस फीस भी ज़्यादा नहीं है। इसके बावजूद अवैध तरीके से सूद पर पैसा बांटने वालों का एक बड़ा नेक्सेस काम कर रहा है। सरकार ने कानून बनाकर सूदखोरी पर रोक लगा रखी है। उल्लंघन पर सजा का भी प्रावधान है। लेकिन पर्याप्त बैंकिंग सुविधाओं के अभाव में बहुत से लोग साहूकारों के चंगुल में फंस कर कर्ज के भंवर जाल में फंस जाते हैं।

पुलिस से एक रिटायर्ड अफसर ने न्यूज़क्लिक को बताया कि "निर्धारित समय पर ब्याज और किश्त का पैसा नहीं मिलने पर सूदखोर चक्रवृद्धि ब्याज वसूलते हैं। उधार लेने वाले जब हाथ खड़े करते हैं तो उनके घरों के कीमती सामान भी जबरिया उठा ले जाते हैं। कई बार जमीन और मकान पर कब्जा करने से भी वो पीछे नहीं रहते। दरअसल, बैंकों में तमाम लिखापढ़ी और कागजी कार्रवाई के के बाद लोन मिल पाता है। पैसे के लिए लोगों को कई बार बैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद भी कर्ज मिलने की गारंटी नहीं होती। सूदखोरों से पैसे लेना आसान होता है। वो बगैर किसी जांच-पड़ताल के ही ब्याज पर पैसा दे देते हैं। सूदखोर उधार लेने वाले की हैसियत और उसकी जरूरत को देखते हैं। इसके बाद प्रतिमाह 10 से 40 फीसदी तक ब्याज तय करते हैं।"

कानूनी रूप से कर्ज देने वाले साहूकार को अपना पंजीकरण कराना होता है। निर्धारित दर से अधिक ब्याज वसूलने पर कार्रवाई की जाती है। यूपी का साहूकारी कानून कहता है कोई कर्ज न अदा करे तो उसकी वसूली भी प्रशासन की सहायता के बगैर नहीं होनी चाहिए। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। एक किसान की फसल यदि खराब हो जाती है तो उसका साल भर का अर्थशास्त्र बिगड़ जाता है। इस बीच जरूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज ही एकमात्र सहारा रह जाता है। बैंकों से तत्काल और आसानी से ऋण नहीं मिल पाने के कारण सूदखोरों की शरण में जाना इनकी मजबूरी हो जाती है।
 
सूदखोरों की मोडस ऑपरेंडी
 
बनारस में पुलिस से सेवानिवृत्त क्षेत्राधिकारी अनिल राय कहते हैं, "आमतौर पर सूदखोरी का शिकार बेहद गरीब और कमजोर तबकों के लोग होते हैं। कई बार उनके परिवार को भी नहीं पता होता कि इतने ऊंचे ब्याज पर कर्ज लिया है। अभी समाज में इस बात की जागरूकता नहीं है कि यह भी एक अपराध है। मीडिया को यह पता नहीं रहता कि सूदखोरी एक संगीन अपराध है। बनारस में नगर निगम के ज़्यादातर सफाई कर्मचारी सूदखोरों के चंगुल में फंस हुए हैं। सूदखोरों ने सरकारी विभागों में भी अपना जाल फैला रखा है और वेतन मिलते ही वे वसूली करने पहुंच जाते हैं। सूदखोरों की मोडस ऑपरेंडी बहुत साफ है। ये कर्ज लेने वाले की जरूरत के अनुसार दो से पांच रुपये प्रति सैकड़ा के हिसाब से पैसे देते हैं। हरेक माह की नियत तारीख को कर्जदार को ब्याज की रकम उन्हें देनी पड़ती है। इसके लिए पैसे लेने वाले को एक तरह का लिखित करार भी करना पड़ता है। निश्चित अवधि में उन्हें मूलधन लौटा देना होता है।

पूर्व पुलिस अफसर अनिल राय कहते हैं, "सूदखोरों को जेल भेजना ही इस समस्या का समाधान नही है। असली समस्या यह है कि चाय वाले, सब्जी वाले, फल वाले, पान वाले, रिक्शा वाले, दर्जी, मोची, छोटे दुकानदार, किसान और मज़दूर को बैंकों से कर्ज मिलने में ज़्यादा कठिनाई होती है। यूपी में माइक्रो फाइनेंस का आंदोलन नहीं पनपने की वजह से सूदखोरी का चलन बढ़ता जा रहा है। कई बार गरीबों को लोन देने वाली कंपनियां आती हैं और वसूली नहीं होने के कारण वह लौट जाती हैं। सरकार ने लघु उद्योग विकास बैंक के माध्यम से छोटे कर्ज देने के लिए माइक्रो फाइनेंस कंपनियां खड़ी करने की योजना बनाई थी। इसी योजना के तहत गुजरात और आंध्र प्रदेश की कई कंपनियां यूपी में आईं, लेकिन राजनीतिक दखलंदाजी के चलते वो अपना धंधा नहीं खड़ा कर सकीं।"

वरिष्ठ पत्रकार विनय मौर्य कहते हैं, "मुंशी प्रेमचंद के 'गोदान' में सांसें टूटने से पहले होरी अपनी पत्नी धनिया से सिर्फ इतना बोल सका था, "मेरा कहा-सुना माफ करना धनिया, अब मैं जाता हूं'। वक्त ने भले ही वहां से यहां तक सफर तय कर लिया हो, लेकिन मुफलिसी की मार झेल रहे लोगों के रूप में होरी का किरदार आज भी जिंदा है। सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं दलालों के चंगुल में फंसी हुई हैं। आम आदमी परेशान है और अधिकारी, बिचौलिए व सूदखोर इसका नाजायज फायदा उठा रहे हैं।"

"ऐसा नहीं है कि सिर्फ किसान और गरीब तबके के लोग ही सूदखोरों के चंगुल में फंसते हैं। व्यापारी, कम पगार वाले सरकारी या निजी कर्मचारी भी इनकी मदद लेते हैं। व्यापारी तो सामान की मनमानी कीमत लेकर मुनाफे में आ जाता है, लेकिन अन्य लोगों के लिए सूद की रकम देना ही भारी पड़ जाता है। फिर शुरू होता है उनकी प्रताड़ना का दौर। सिर्फ बनारस ही नहीं, यूपी के हर गांव, कस्बा और शहर में सूदखोरी का धंधा बदस्तूर जारी है। सरकार की लाभकारी योजनाएं अगर त्वरित गति से लोगों के लिए सुलभ न हुईं तो आदमखोर बन चुके ये मनी लैंडर्स एक दिन सरकार, सिस्टम, अर्थव्यवस्था व समाज के लिए बड़ी चुनौती बन जाएंगे।"
 
क्या कहते हैं सुसाइड के आंकड़े?
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, दुनिया में हर साल सात लाख से ज़्यादा लोग सुसाइड करते हैं। यानी, जितने लोग मलेरिया, ब्रेस्ट कैंसर, एचआईवी से नहीं मरते, उससे ज़्यादा सुसाइड से मर जाते हैं। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि 15 से 29 साल के युवाओं में मौत की चौथी सबसे बड़ी वजह आत्महत्या है। साल 2023 में आंध्र प्रदेश बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट परीक्षा में कक्षा 11 और 12 की परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद नौ छात्रों ने सुसाइड कर लिया था। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के विभिन्न परिसरों में संदिग्ध आत्महत्याओं में चार छात्रों की मौत हुई है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट (भारत में आकस्मिक मृत्यु और आत्महत्या) के अनुसार, भारत में 2021 में हर दिन 35 से अधिक की दर से 13,000 से अधिक छात्रों की मृत्यु हुई, जो 2020 में 12,526 मौतों से 4.5 फीसदी अधिक है। 864 आत्महत्याएं 'परीक्षा में विफलता' के कारण हुईं। साल 2021 में 1,834 मौतों के साथ महाराष्ट्र में आत्महत्या से सबसे अधिक छात्रों की मौत हुई, इसके बाद मध्य प्रदेश में 1,308 और तमिलनाडु में 1,246 मौतें हुईं। आंकड़े बताते हैं कि सुसाइड के मामले में पुरुष, महिलाओं से आगे हैं। हर एक लाख पुरुषों में से 12.6 फीसदी सुसाइड करके अपनी जान दे देते हैं। वहीं, महिलाओं में यह दर 5.4% है।

एनसीआरबी की 2021 की रिपोर्ट बताती है कि 30 से 45 साल की उम्र के लोग ज़्यादा आत्महत्या करते आते हैं। इसके बाद 18 से 30 और फिर 45 से 60 साल की उम्र के लोगों में सुसाइड के मामले ज़्यादा सामने आते हैं। साल 2021 में 30 से 45 साल की उम्र के 52,054 लोगों ने आत्महत्या की थी। इनमें से लगभग 78 फीसदी पुरुष थे। इसी तरह 18 से 30 साल की उम्र के 56,543 लोगों ने सुसाइड की, जिनमें से 67 फीसदी पुरुष थे। वहीं, 45 से 60 साल की उम्र के आत्महत्या करने वाले 30,163 लोगों में से 81 फीसदी से ज़्यादा पुरुष शामिल थे।

यह रिपोर्ट ये भी बताती है कि आत्महत्या करने वाले ज़्यादातर लोग शादीशुदा होते हैं। पिछले साल 1,09,749 शादीशुदा लोगों ने सुसाइड की। इनमें करीब 74 फीसदी पुरुष थे। सुसाइड के अलग-अलग कारण होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि डिप्रेशन, तनाव की वजह से आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। कई बार मेडिकल कारण भी होता है। इसके अलावा जब इंसान के पास अपनी परेशानी से निकलने का कोई रास्ता नहीं होता, तो वो आत्महत्या कर लेता है। हृदय, किडनी, कैंसर, एड्स संबंधी गंभीर बीमारियों में भी लोग आत्महत्या करते हैं, वहीं महिलाएं पारिवारिक रिश्तों में मुश्किलों के चलते ज़्यादा आत्महत्या करती हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक साल 2021 में भारत में जिन 1,64,033 लोगों ने आत्महत्या की उनमें 25.6 फीसदी दिहाड़ी मज़दूर थे। कुल 42,004 दिहाड़ी मज़दूरों ने आत्महत्या कीं, जिनमें 4,246 महिलाएं भी शामिल थीं। कृषि क्षेत्र में लोगों की श्रेणी में साल 2021 में 10,881 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 5,318 किसान थे और 5,563 खेतिहर मज़दूर। रिपोर्ट के मुताबिक 42,004 दिहाड़ी मज़दूरों की आत्महत्याओं में सबसे ज़्यादा मामले तमिलनाडु (7673), महाराष्ट्र (5270), मध्य प्रदेश (4657), तेलंगाना (4223), केरल (3345) और गुजरात (3206) से थे।

एनसीआरबी ने अपनी रिपोर्ट में सुसाइड की खास वजह फैमिली प्रॉब्लम और बीमारी (एड्स, कैंसर आदि) बताया हैं। पिछले साल 33 फीसदी सुसाइड की घटनाएं फैमिली प्रॉब्लम और 19 फीसदी बीमारी की वजह से हुई। रिपोर्ट बताती है कि आत्महत्या करने वाले पुरुषों में से 57 फीसदी से ज़्यादा ऐसे थे जो या तो दिहाड़ी मज़दूर थे या अपना खुद का कुछ काम करते थे या फिर बेरोजगार थे। यानी, हो सकता है कि इनकी आत्महत्या करने की वजह आर्थिक तंगी रही हो। इसके बाद ‘प्रेम प्रसंग’ (1,495 मामले या कुल मामलों का 14 फीसदी), बीमारी (1408 मामले या कुल मामलों का 13 फीसदी) और ‘परीक्षा में विफलता’ (864 मामले या कुल का 8 फीसदी) का नंबर आता है।
 
क्यों बढ़ रही सुसाइड की टेंडेंसी?
 
बनारस में अग्रसेन महिला महाविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. संध्या ओझा कहती हैं, "समाज में पुरुषों को अक्सर ताकतवर और मजबूत समझा जाता है और इस वजह से वो अपने डिप्रेशन या सुसाइडल फीलिंग को दूसरे से साझा नहीं कर पाते और आखिर में थक-हारकर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। साल 2003 में पुरुषों में सुसाइड पर यूरोप में स्टडी हुई थी, जिसमें बताया गया था कि बेरोजगारी के समय पुरुषों के सुसाइड करने का रिस्क बढ़ जाता है। उन्हें ऐसा लगता है कि समाज और परिवार को जो उनसे उम्मीद है, उस पर वो खरे नहीं उतर पा रहे हैं। पुरुषों में सुसाइड की एक वजह शराब और ड्रग्स की लत को भी माना जाता है, क्योंकि नशा सुसाइडल टेंडेंसी को बढ़ाता है।"
"ज़रूरी नहीं है कि आत्महत्या का विचार वाले सभी लोगों में इसके संकेत दिखे। वे जो बोलते हैं या करते हैं, उससे भी यह ज़ाहिर हो सकता है। व्यक्ति के मन में नकारात्मक ख्यालों का आना साधारण बात है। कई बार ऐसे ख्याल कुछ ही पलों के लिए आते है लेकिन कुछ लोगों में ये धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। मानसिक विकारों को लेकर अभी भी काफ़ी ग़लतफहमियां है, इसलिए लोग इस बारे में ज़्यादा बात नहीं करते। ऐसी स्थिति में मानसिक काउंसलिंग करने वाली हेल्पलाइन की भूमिका अहम होती है। अगर मन में सुसाइड जैसा ख्याल आए तो अपने दोस्तों, परिवार अथवा थेरेपिस्ट से मदद लेनी चाहिए। ऐसे मामलों में इलेक्ट्रोकनवल्सिव (ईसीटी) थेरेपी काफ़ी कारगर होती है। इसे आमतौर पर शॉक थेरेपी भी कहते हैं लेकिन इसमें कोई इलेक्ट्रिक शॉक नहीं दिया जाता और सुधार भी तेज़ी से होता है।"

आर्थिक विपन्नता के अलावा बेरोजगारी को सुसाइड का बड़ा कारण बताते हुए डॉ. ओझा कहती हैं, "लोग अपने मन में ख्याल बना लेते हैं कि हमें ऐसी ही नौकरी करनी है। जब वो नहीं मिलती तो डिप्रेशन में चले जाते हैं। आत्महत्या की घटनाओं को रोकने पर ध्यान नहीं दिया गया तो आगे हालात और गंभीर हो सकते हैं। जो लोग हमेशा मुस्कुराते दिखते हों या आसानी से दूसरे लोगों से घुल-मिल जाते हों वो भी मानसिक विकार की चपेट में आने के बाद अचानक से अकेला महसूस करने लगते हैं। मानसिक विकार से पीड़ित शख्स अधिक शराब पीने लगता है। वह नकारात्मक ढंग से चीज़ों को देखने लगाता है, उस पर जीवन को लेकर निराशावादी दृष्टिकोण हावी होने लगता है।"

डॉ. ओझा यह भी कहती हैं, "आत्महत्या की कोशिश करना आईपीसी की धारी 309 के तहत अपराध है। ऐसा करने पर एक साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों की सज़ा हो सकती है। हालांकि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 की धारा 115 आत्महत्या की कोशिश करने वाले तनाव से जूझ रहे लोगों को इससे राहत देती है। यह धारा कहती है कि अगर यह साबित हो जाता है कि सुसाइड की कोशिश करने वाला व्यक्ति बेहद तनाव में था, तो उसे किसी तरह की सज़ा नहीं दी जा सकती। बहरहाल, आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है। आत्महत्या पर अब भी ख़ुलकर बात नहीं होती। इसे कलंक के तौर पर देखा जाता है और अधिकतर परिवार इसे छुपाने की कोशिश करते हैं। अगर आपको भी कोई परेशानी है तो दोस्तों-रिश्तेदारों से बात करें या डॉक्टरी सलाह लें। सही समय पर सही सलाह ले ली तो इसे काफी हद तक रोका जा सकता है।"
 
(लेखक बनारस स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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