Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

ढह गया मोरबी का झूला पुल: गुजरात सरकार जवाब दे

2016 में कोलकाता में विवेकानंद फ्लाईओवर के ढहने पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसे ‘भ्रष्टाचार की करतूत’ (एक्ट ऑफ फ्रॉड) क़रार देते हुए, ममता बनर्जी को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराने में कोई हिचक नहीं हुई थी। लेकिन, इस बार उन्हें पुल के ढहने में राज्य सरकार की कोई ज़िम्मेदारी याद ही नहीं आयी।
Morbi Bridge Collapse
फ़ोटो साभार: पीटीआई

मोरबी में मच्छू नदी पर बना पैदल चलने वालों का झूला पुल 30 अक्टूबर को ढह गया। इससे, 141 मौतें होने की अब तक पुष्टि हो चुकी है और सौ से ज़्यादा घायल हुए हैं। इस टिप्पणी में हम इस, भारत के बदतरीन पुल हादसों में से एक के बारे में, आम जानकारी में आ चुकी बातें नहीं दोहराना चाहेंगे। यहां हम इसी सवाल को लेना चाहेंगे कि भारत में इस तरह के किसी भी पुलिस की ज़िम्मेदारी किस पर होती है और क्या इस मामले में संबंधित अधिकारियों ने अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी की थीं। ज़ाहिर है कि अधिकारियों ने अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने के लिए सिर्फ़ इतना काफ़ी नहीं है कि हादसे के बाद पुलिस ने ओरेवा नाम की कंपनी के निचले दर्जे के कर्मचारियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है।

याद रहे कि यह कंपनी इलेक्ट्रॉनिक घड़ियां, सीएफएल बल्ब और ई-बाइकें बनाने का काम करती है। ओरेवा को इस पुल के पुनर्नवीकरण का ठेका दिया गया था, हालांकि उसे किसी भी तरह के निर्माण कार्य का कोई अनुभव ही नहीं था। बेशक, ओरेवा कंपनी की इस हादसे के लिए ज़िम्मेदारी बनती है क्योंकि उसने एक ऐसे काम का ठेका ले लिया था, जिसके बारे में उसके पास न तो कोई ज्ञान था और न ही उसके पास ऐसे काम के लिए कोई विशेषज्ञता थी। लेकिन, सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा ऐसा काम एक ऐसी कंपनी को सौंपा ही क्यों गया था, जिसे इस तरह के काम का पहले से कोई अनुभव था ही नहीं? इस सब में मोरबी के म्यूनिसिपल अधिकारियों की क्या भूमिका थी, जिन्होंने ओरेवा ग्रुप को यह ठेका देने से पहलेे, ऐसा लगता है कि न तो इस संबंध में कुछ निश्चित करने की कोर्ई कोशिश की थी कि पुल की मरम्मत, उसके पुनर्नवीकरण के लिए क्या-क्या किए जाने की ज़रूरत थी और न ही उन्होंने संबंधित काम सुरक्षित तरीक़े से पूरा हो जाने की जांच करने की कोई प्रक्रिया ही तय की थी।

यह हमें अपनी बुनियादी प्रश्न पर ले आता है कि भारत में, नदियों पर बने पुलों की ज़िम्मेदारी किस की होती है और इस मामले में राज्य सरकार की यानी गुजरात सरकार की क्या भूमिका थी? मच्छू नदी, गुजरात राज्य के वैधानिक प्राधिकार में आती है। इसलिए, नदी पर बने किसी भी पुल आदि की सुरक्षा की जांच करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार पर ही आती है। लेकिन, उस गुजरात सरकार ने इसके लिए किया क्या था, जो मोरबी के झूला पुल का, एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण के रूप में और इंजीनियरिंग के एक चमत्कार के रूप में जमकर विज्ञापन करती आयी थी।

आइए, पहले हम मोरबी नगर निगम और ओरेवा कंपनी के बीच हुए कॉन्ट्रैक्ट की छानबीन कर लें। मोरबी नगर निगम ने, इस 140 साल पुराने पुल की मरम्मत के काम के लिए कोई सार्वजनिक टेंडर जारी नहीं किया था। सार्वजनिक कामों में सामान्य रूप से जो तरीक़ा अपनाया जाता है उसके विपरीत, न तो नवीनीकरण के काम के संबंध में कोई ठोस तक़ाज़े रखे गए थे और न ही पूर्व-शर्तें रखी गयी थीं। यह तब था जबकि इस मामले में ऐसा करना और भी ज़रूरी था क्योंकि यह पुल, एक सौ चालीस साल पुराना था और अगर पुल की उम्र की बात को अगर छोड़ भी दिया जाए तब भी, किसी भी झूला पुल के मामले में सुरक्षा के विशेष मुद्दों का उठना स्वाभाविक होता है।

ओरेवा कंपनी और मोरबी म्यूनिसिपल अधिकारियों के बीच जो समझौता हुआ था, उसमें एक प्रावधान ऐसा भी था जो कहता था कि पंद्रह साल तक, सरकार का इस पुल पर कोई क्षेत्राधिकार ही नहीं होगा। इस तरह, इस पुल को पूरी तरह से उक्त निजी कंपनी के हवाले ही कर दिया गया था। क्या इस तरह का कॉन्ट्रैक्ट गुजरात राज्य सरकार की स्पष्ट अनुमति के बिना किया जा सकता था? अंतर्राज्यीय नदियों को छोड़कर, किसी भी नदी पर कोई भी निर्माण, राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। क्या गुजरात सरकार ने मोरबी नगरपालिका को इस तरह की ख़ास छूट दे दी थी या फिर इस तरह का कॉन्ट्रैक्ट राज्य सरकार की इजाज़त के बिना ही कर लिया गया था? फिर गुजरात सरकार तो मोरबी के पुल को ‘‘इंजीनियरिंग का चमत्कार’’ ही मानती थी, तब क्या वहां के ज़िला मैजिस्ट्रेट और सार्वजनिक निर्माण विभाग को इस तरह के झूला पुल की सुरक्षा के मुद्दों का कुछ अता-पता ही नहीं था?

म्यूनिसिपल अधिकारियों ने यह दावा भी किया है कि ओरेवा कंपनी ने उसके फिटनेस के सर्टिफिकेट दिए बिना ही, पुल को लोगों के लिए खोल दिया था। पुन: कॉन्ट्रैक्ट में इसका उल्लेख होना चाहिए था कि मरम्मत वग़ैरह के बाद पुल को दोबारा खोलने के लिए, फिटनेस सर्टिफिकेट लेना होगा और लोगों के उपयोग के लिए पुल के खोले जाने के लिए उसकी फिटनेस में ठीक क्या-क्या आता है और इस सिलसिले में सुरक्षा की क्या-क्या शर्तें पूरी करनी होंगी। लेकिन, कॉन्ट्रैक्ट में तो इस संबंध में भी कुछ भी नहीं है। बहरहाल, मोरबी नगर निकाय की इन विफलताओं में से कोई भी, ओरेवा को इस मामले में अपनी ज़िम्मेदारी से बरी नहीं कर सकती है। भारतीय क़ानून तथा दिल्ली में ओलियम गैस रिसाव मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के हिसाब से, ओरेवा पर उन लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी थी, जिन्हें उसके टिकट से पुल पर जाने दिया गया था। और इस मामले में ओरेवा की विफलता, मोरबी नगर निकाय के अधिकारियों को पूरे मामले में उनकी ज़िम्मेदारी से बरी नहीं कर सकती है क्योंकि ओरेवा से उन्होंने चाहे जो भी कॉन्ट्रैक्ट किया हो, यह झूला पुल तो उसी की मिल्कियत थी।

किसी झूला पुल या सस्पेंशन ब्रिज की इंजीनियरिंग ज़्यादा चुनौतीपूर्ण क्यों मानी जाती है? झूला पुल का पूरा का पूरा बोझ, सबसे ऊपर तने दो लोहे के रस्सों या केबलों द्वारा ही संभाला जाता है, पुल का लोगों के चलने का पूरा ढांचा उन्हीं के सहारे लटका रहता है। इस तरह, पुल के पूरे ढांचे का बोझ, पुल को थामे दो जोड़ी केबल ही संभालते हैं और उनका बोझ अंतत: पुल के दोनों ओर बने दो-दो स्तंभों या मीनारों द्वारा संभाला जाता है। कई-कई स्तंभों या सहारों से खड़े किसी दूसरे पुल के विपरीत, इस तरह का पूरा झूला पुल एक ही इकाई की तरह काम करता है और अगर यह पुल कहीं से भी टूटता है, तो पूरा पुल ही ढह जाता है। पुन: इस तरह की हवा में झूलती हुई संरचना को, हवा के थपेड़ों आदि से हिलने की समस्या का भी सामना करना पड़ता है, जो ऐसे पुल को ढहा भी सकती है। 1940 के चर्चित टाकोमा नैरोज़ ब्रिज के ढहने के मामले में, ठीक ऐसा ही हुआ था।

अंत में यह कि इस तरह का पुल, अपना सबसे कमज़ोर हिस्सा जितना ही मज़बूत होता हैै, जो इस मामले में पुल को थामने वाली रस्सियां या केबल थे। मोरबी झूला पुल के ये केबल चूंकि एक सदी से ज़्यादा पुराने थे, स्वाभाविक रूप से इन केबलों की मज़बूती की, उनके जंग लगने से कमज़ोर होने तथा बार-बार खिंचाव आने से पुराने व शिथिल पड़ने की, जांच होनी चाहिए थी। पुन: संबंधित कॉन्ट्रैक्ट में पुल को थामने वाले केबलों की अवस्था और अगर ज़रूरी हो तो उन्हें बदले जाने के संबंध में तो, कुछ कहा ही नहीं गया था। और आख़िरी बात, एक बड़ी सुरक्षा सावधानी के संबंध में। चूंकि यह पुल इतना पुराना था, इसका आकलन किया जाना चाहिए था कि इस पुल को लोगों के लिए खोला जाना भी चाहिए या नहीं और अगर खोला जाता भी है तो एक साथ ज़्यादा से ज़्यादा कितने लोगों को पुल पर जाने की इजाज़त दी जाए? पुन: इस मामले में भी यह कॉन्ट्रैक्ट पूरी तरह से खामोश ही है। जो थोड़ी-बहुत जानकारी अब तक निकलकर सामने आयी है, उससे ऐसा लगता है कि ओरेवा कंपनी ने मरम्मत के क्रम में इस पुल के डैक यानी पुल पर लोगों के खड़े होने-चलने के फ़र्श को ही बदला था। पुन: इस तरह के पुल के वज़न पर इस तरह के बदलाव का क्या असर पड़ेगा, इसको हिसाब में लिए बिना ही इस तरह के झूला पुल के फ़र्श को बदला जाना भी, गंभीर लापरवाही का ही मामला था।

इन सभी मुद्दों पर म्यूनिसिपल अधिकारियों और राज्य सरकार के राडार पर होना चाहिए था? आखिरकार, मोरबी के झूला पुल का इंजीनियरिंग के चमत्कार और गुजरात के एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण के रूप में इतना प्रचार किया जाता रहा था। सवाल यह है कि ऐसे पुल के सुरक्षा ऑडिट के संबंध में गुजरात सरकार ने क्या किया था?

2016 में कोलकाता में विवेकानंद फ्लाईओवर के ढहने पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसे ‘भ्रष्टाचार की करतूत’ (एक्ट ऑफ फ्रॉड) क़रार देते हुए, ममता बनर्जी को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराने में कोई हिचक नहीं हुई थी। लेकिन, इस बार उन्हें पुल के ढहने में राज्य सरकार की कोई ज़िम्मेदारी याद ही नहीं आयी। दोनों मामलों का अंतर स्वत:स्पष्ट है। विवेकानंद फ्लाईओवर का मामला जब सामने आया था, चुनाव को देखते हुए ममता बनर्जी तथा तृणमूल कांग्रेस को फ्लाईओवर के गिरने के लिए ज़िम्मेदार ठहराने में ही, उनका राजनीतिक फ़ायदा था। लेकिन, इस बार मामला गुजरात का है, जहां भाजपा की सरकार है और राज्य में चुनाव एकदम सिर पर आ चुके हैं, राज्य सरकार को इस मामले में हर प्रकार से ज़िम्मेदारी से बरी करने में ही उनका स्वार्थ है।

बहरहाल, यह मामला अदालत तक पहुंच जाने और अदालत के अपनी निगरानी में जांच कराए जाने के बावजूद, राज्य व केंद्र सरकारें इसकी ज़िम्मेदारी से बरी नहीं हो जाती हैं कि पूरे मामले की जांच कराएं और मोरबी के झूला पुल की सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने के संबंध में पीछे उठाए गए सभी सवालों के जवाब दें। राज्य में इस झूला पुल की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जवाबदेही के सवाल से बच कर गुजरात सरकार, अपने चुनावी स्वार्थों को जनता की सुरक्षा से ऊपर रख रही है। ऐसी संरचनाओं के संबंध में गंभीर सवालों के जवाब दिए जाने की ज़रूरत है। अगर हम मोरबी की अपनी ग़लतियों से नहीं सीखेंगे, तो हम उन ग़लतियों को दोहराने के लिए अभिषप्त होंगे। चूंकि हमारे देश में और बहुत से झूला पुल बने हुए हैं, आइए हम मोरबी में हुई ग़लतियों को नहीं दोहराएं और आइंदा ऐसी महा-त्रासदियों का रास्ता नहीं बनाएं।

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित साक्षात्कार को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करेंः

Questions Gujarat Government Must Answer on Morbi Bridge Collapse

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest