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ख़बरों के आगे-पीछे: एलआईसी के पैसे को ऐसे डुबोया जा रहा है!

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन अपने साप्ताहिक कॉलम में एलआईसी-राजेश एक्सपोर्ट से लेकर पश्चिम बंगाल और तेलांगना तक की राजनीति पर बात कर रहे हैं।
LIC and Rajesh Exports

भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी देश की बड़ी सरकारी कंपनियों में से एक है। इसके पास देश के करोड़ों लोगों का पैसा है। लोग अपना पेट काट कर बीमा कराते हैं, लेकिन एलआईसी को संदिग्ध कंपनियों में पैसा लगाने के लिए बाध्य किया जा रहा है। ये खबरें दबे-छिपे ढंग से पहले भी आती थी कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों जैसे एलआईसी आदि के पैसे से शेयर बाजार को नियंत्रित करती है। लेकिन एक के बाद एक ऐसी खबरें अब सामने आने भी लगी हैं। 

ताजा खबर है कि एलआईसी ने राजेश एक्सपोर्ट में 10.8 फीसदी यानी करीब 11 फीसदी शेयर खरीदे हैं। पिछले 10 साल मे इस कंपनी में एलआईसी का निवेश पांच गुना बढ़ा है। दूसरी ओर एक रिपोर्ट बताती है कि इस 10 साल की अवधि में म्युचुअल फंड कंपनियों ने राजेश एक्सपोर्ट में लगभग जीरो पैसा लगाया है। यानी जो कंपनियां पेशेवर लोगों की सलाह से काम करती हैं, उन्होंने राजेश एक्सपोर्ट में पैसा नहीं लगाया पर एलआईसी का निवेश पांच गुना हो गया। अब घोटाला खुला है कि गुजरात के रहने वाले राजेश मेहता की इस कंपनी ने 15 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की गड़बड़ी की है। जिस दिन यह खबर आई उस दिन राजेश एक्सपोर्ट का शेयर पांच फीसदी और एलआईसी का शेयर एक फीसदी गिरा। गौरतलब है कि इससे पहले ऐसे ही एलआईसी ने लगातार अडानी की कंपनी मे अपना निवेश बढ़ाया था। हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट आने के बाद उसके शेयरों में बड़ी गिरावट हुई और इसका खामियाजा एलआईसी के करोड़ों बीमाधारकों और निवेशकों को उठाना पड़ा था।

बहुत ख़राब समय का संकेत है यह

पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद वह सब हो रहा है जो लोकतंत्र में कतई नहीं होता है। पिछले हफ्ते नौ जून को ममता बनर्जी दिल्ली में थीं। उनके भतीजे और तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी भी दिल्ली में थे। पश्चिम बंगाल की पुलिस, प्रशासन को यह बात मालूम थी। फिर भी नौ जून को दिन में सीआईडी की टीम हरीश चंद्र मुखर्जी लेन में स्थित ममता बनर्जी के पैतृक आवास पर पहुंच गई। पहले तो ममता के परिवार के लोगों और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रोका लेकिन जब बड़ी संख्या में पुलिस बुला ली गई तो वे नहीं रोक पाए। अब सवाल है कि ममता बनर्जी के आवास और उससे लगे पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में सीआईडी की टीम क्या खोजने गई थी?

बताया गया कि मामला विधायकों के जाली दस्तखत का है। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने आरोप लगाया है कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता विपक्ष चुने जाने के जिस प्रस्ताव की कॉपी स्पीकर को दी गई है उस पऱ उनके दस्तखत जाली है। अगर ऐसा है तो सीआईडी दोनों के असली दस्तखत लेकर हैंडराइटिग एक्सपर्ट से दस्तखत का मिलान कर ले और आगे की कार्रवाई करे। लेकिन ऐसा करने के बजाय पुलिस ममता के घर और केंद्रीय कार्यालय पर छापा मारने गई। वहां पुलिस को क्या मिलेगा? क्या वहां जाली दस्तखत कराने की कोई रिकॉर्डिंग रखी गई होगी? जाहिर है पुलिस कुछ और खोजने गई थी। विपक्ष के नेताओं के यहां कोई भी आधार बना कर इस तरह की तलाशी बहुत खराब समय का संकेत है।

'इंडियन एक्सप्रेस’ में नीतीश के 'लेख’ की हक़ीक़त

नेताओं के नाम से लेख छपना कोई नई बात नहीं है लेकिन इन दिनों यह चलन थोड़ा ज्यादा बढ़ गया है। एकाध अपवाद को छोड़ दें तो नेताओं के नाम से लिखे गए लेख उनकी पार्टी की नीतियों के प्रचार के लिए होते हैं या फिर वे अपने बड़े नेता को खुश करने के लिए लिखवाते हैं। कुछ ही नेता ऐसे होते हैं जो अपना लेख खुद ही लिखते हैं। बहरहाल नरेंद्र मोदी के बतौर प्रधानमंत्री 12 साल पूरे करने पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के नाम से भी अखबारों में लेख छपा है। 

लेकिन अंग्रेजी के अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस’ में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम से लेख छपा है, जिसमें नरेंद्र मोदी के शासन और उनकी राजनीति की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। हकीकत यह है कि नीतीश कुमार की मानसिक अवस्था ऐसी नहीं है कि वे साधारण सूचना को भी प्रोसेस कर सके। उनके करीबी लोग बताते हैं कि दो दिन के बाद भी कोई मिलने जा रहा है तो नीतीश कुमार को उसकी शक्ल और उसका नाम याद नहीं रह रहा है। यह बात 'इंडियन एक्सप्रेस’ के पटना के ब्यूरो चीफ से लेकर नई दिल्ली में प्रधान संपादक तक को मालूम है। फिर भी नीतीश कुमार का लेख छपा। नीतीश के जिस भी करीबी नेता ने उस लेख को पढ़ा होगा तो पता नहीं क्या सोचा होगा लेकिन 'इंडियन एक्सप्रेस’ की क्या साख रही, जिसने यह जानते हुए लेख छापा कि इसे नीतीश कुमार ने नहीं लिखा है! 

बिहार के एक मंत्री का अनोखा रिकॉर्ड

बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश के नाम एक अनोखा रिकॉर्ड दर्ज हो गया है। वे दो बार मंत्री बने और दोनों बार किसी सदन के सदस्य नहीं बन सके। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नवंबर 2025 में एनडीए की सरकार के गठन के समय राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने सबको चौंकाते हुए अपने बेटे को मंत्री बनवा दिया था, जो उस समय किसी सदन के सदस्य नहीं थे। तब कहा गया था कि मंगल पांडेय विधानसभा का चुनाव जीत गए हैं तो वे विधान परिषद की सीट खाली करेंगे और उस सीट पर दीपक प्रकाश को भेजा जाएगा। हालांकि भाजपा ने अपने कोटे की यह सीट राष्ट्रीय लोक मोर्चा के लिए नहीं छोड़ी। इस बीच राज्य में सत्ता परिवर्तन हुआ। नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल को इस्तीफा दिया। उसी दिन उनके मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों का इस्तीफा हो गया। सात मई को जब सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो फिर दीपक प्रकाश को मंत्री बना दिया गया। इस बार कहा गया कि विधानसभा सदस्यों द्वारा नौ विधान पार्षद चुने जाने हैं उनमें से एक सीट दीपक प्रकाश को मिलेगी। लेकिन उन नौ उम्मीदवारों में भी दीपक प्रकाश को जगह नहीं मिली। 

हालांकि अब भी वे सात नवंबर तक मंत्री रह सकते है। लेकिन उस समय तक कोई वैकेंसी नहीं आने वाली है इसलिए उनको इस्तीफा देना होगा। उनके अनोखे रिकॉर्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा है।

हिटलर से प्रेरणा लेते हैं रेवंत रेड्डी! 

राहुल गांधी केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार तानाशाही और फासीवाद के आरोप लगाते रहते हैं लेकिन उनके अपने चहेते मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा है कि वे हिटलर से प्रेरणा लेते हैं। हैरानी की बात है कि कोई भी व्यक्ति हिटलर से कैसे प्रेरणा ले सकता है? ज्ञात इतिहास में इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मनों में हिटलर का नाम आता है। उसके पूरे शासन में कुछ भी अच्छा नहीं था। इसीलिए आज जर्मनी में हिटलर का नाम लेना तक गुनाह माना जाता है। लेकिन लोकतांत्रिक भारत मे एक मुख्यमंत्री को हिटलर से प्रेरणा मिलती है! रेवंत रेड्डी ने हिटलर के हाइड्रा प्रोजेक्ट का जिक्र किया, जिसका काम मनमाने तरीके से निर्दोष लोगों की हत्या करना था। उस हाइड्रा के नाम पर उन्होंने हैदराबाद के वाटर प्रोजेक्ट का नाम रखा है। 

गौरतलब है कि रेवंत रेड्डी पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं। हालांकि संघ भी सार्वजनिक रूप से हिटलर, मुसोलिनी का जिक्र नहीं करता है। कहा जाता है कि हिंदू महासभा के नेता बीएस मुंजे ने इटली में मुसोलिनी के संगठन का अध्ययन किया था और संघ के संस्थापक हेडगेवार को इसके बारे में बताया था। मुंजे हेडगेवार के गुरू थे। संघ की विचारधारा पर उसका कुछ असर है भी लेकिन कोई सार्वजनिक रूप से हिटलर और मुसोलिनी से प्रेरित होने की बात नहीं करता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

 

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