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हरियाणा: आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का खट्टर सरकार पर वादाख़िलाफ़ी का आरोप, कई ज़िलों में विरोध जारी

सरकार ने साल 2022 के आंदोलन में जिन मांगों को माना था, उनमें से अधिकांश को अभी तक लागू नहीं किया है।
Anganwadi workers

हरियाणा में बीते लंबे समय से आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका राज्य की मनोहरलाल खट्टर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और हड़तालें कर रही हैं, लेकिन सिवाय आश्वासन के अब तक उनकी मांगों पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। इसी कड़ी में बीते एक सप्ताह से ये कार्यकर्ता और सहायिकाएं रोहतक, नारनौल समेत प्रदेश के कई अलग-अलग जिलों में अपना विरोध दर्ज करवा रही हैं। साथ ही प्रशासन को मुख्यमंत्री के नाम का एक ज्ञापन भी सौंप रही हैं, जिसमें सीएम साहब को उनके पुराने वादे याद दिलाए जा रहे हैं।

बता दें कि सरकारी आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग 1,320,708 आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, जिनमें से 25,152 कार्यकर्ता हरियाणा में हैं। वहीं, देशभर में कुल 1,182,263 आंगनवाड़ी सहायिकाएं हैं, जिनमें से हरियाणा में 24,485 सहायिकाएं हैं। इनमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को जहां 12 हज़ार के करीब मानदेय मिलता है, वहीं सहायिकाओं को करीब 7 हज़ार भुगतान किया जाता है। ऐसे में 2018 से ही आंगनबाडी कार्यकर्ता मांग करती आ रही हैं कि सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा मानदेय बढ़ाने के वादे को पूरा करे। हरियाणा में वर्कर्स और सहायिकाओं के मासिक मानदेय में क्रमश: 1500 रुपये और 750 रुपये की बढ़ोतरी की मांग की जा रही है।

मानी हुई मांगे नहीं लागू कर रही सरकार

सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन समर्थित आंगनवाड़ी संगठन से जुड़ी बिजनेज न्यूज़क्लिक को बताती हैं कि सरकार ने साल 2022 के आंदोलन में जिन मांगों को माना था, उनमें से अधिकांश खट्टर सरकार ने अभी तक लागू ही नहीं की हैं। इसके उलट आंगनवाड़ी कर्मियों को मानदेय समय पर नहीं मिल रहा, आए दिन अलग-अलग तरीके से उनके काम का बोझ बढ़ाया जा रहा है। जिसके चलते आंगनबाड़ी वर्कर व हैल्पर में असंतोष बढ़ रहा है।

बिजनेज के मुताबिक सरकार से हड़ताल के दौरान 100 रुपये मानदेय कटौती की बात हुई थी, जिसमें बड़े अधिकारी भी शामिल थे। लेकिन जब कार्यकर्ताओं को मानदेय दिया गया तो उसमें 75% कटौती कर दी गई। यह कदम सरकार के उच्च अधिकारियों और आंगनवाड़ी तालमेल कमेटी के साथ हुई वार्ता में बनी आपसी सहमति के खिलाफ है। ये एक तरह से कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाकर आवाज़ दबाने की कोशिश की जा रही है।

आंगनवाड़ी केंद्रों को बंद करने की साज़िश

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सहायिका यूनियन के अनुसार तीन साल से आंगनवाड़ी वर्कर्स को वर्दी और फ्लेक्सी फंड का पैसा सरकार की तरफ से नहीं दिया गया है। चार माह से भी ज्यादा समय से आंगनवाड़ी वर्कर्स का पैसा बकाया है। इसके अलावा सरकार बगैर संसाधन के आंगनवाड़ी वर्कर्स से ऑनलाइन काम करा रही है। जबकि न तो उन्हें इसकी ट्रेनिंग दी गई और न ही उनके पास संसाधन है। इसके अलावा समय पर कंटीजेंसी नहीं मिल रही है और न हीं आंगनवाडी सेंटरों का किराया दिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि सरकार एक साजिश के तहत इन आंगनवाड़ी सेंटरों को बंद करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानी तो वह सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगी।

ध्यान रहे कि इन कार्यकर्ताओं की प्रमुख मांगों में इनकी ग्रेच्युटी का मुद्दा भी शामिल है, जिसका हक़ बीते साल लंबी लड़ाई लड़ने के बाद इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट से हासिल किया था। इसके अलावा आंगवाड़ी केंद्रों में खाली पड़े पदों पर भर्ती के साथ ही प्रमोशन और समय से वेतन की मांग भी ये कार्यकर्ता प्रमुखता से उठा रही हैं।

गौरतलब है कि आंगनवाड़ी से जुड़ी ये महिलाएं वो फ्रंटलाइन वर्कर हैं, जिन्हें 'कर्मचारी' का दर्जा नहीं दिया जाता है। ये सभी महंगाई भत्ते, सेवानिवृत्ति लाभ, सेवा नियम आदि की भी मांग लंबे समय से कर रही हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार ने उन्हें अग्रिम पंक्ति का कार्यकर्ता भी घोषित किया था। लेकिन तब भी इनकी अनदेखी हुई थी और अब भी सरकार इनकी मांगों को अनसुना करती ही नजर आ रही है।

ये सभी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं भारत सरकार की एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) का एक हिस्सा हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा कार्यक्रम है, जो छोटे बच्चों की देखभाल और उनके विकास के लिए काम करता है। इसके लाभार्थियों में 6 साल की उम्र से कम बच्चे, गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली महिलाएं शामिल हैं।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चों को पूरक पोषण, स्कूल जाने से पहले दी जाने वाली अनौपचारिक शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य शिक्षा, टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच और अन्य सेवाएं उपलब्ध कराती हैं। आंगनवाड़ी केंद्र 6 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए 'क्रेच' की तरह भी काम कर रहे हैं लेकिन आंगनवाड़ी संगठनों का आरोप है कि सरकार निजीकरण के लाभ के लिए इन केंद्रों को बंद करने की साजिश रच रही है।

साल 2021 के स्वास्थ्य मंत्रालय के एनएफएचएस-5 आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में पांच साल से कम उम्र के अविकसित बच्चों की संख्या 27.5 प्रतिशत थी। ऐसे में इन केंद्रों की महत्ता और बढ़ जाती है लेकिन हाल ही में मनोहर लाल खट्टर सरकार की तरफ से इन कार्यकर्ताओं को लेकर की गई अनर्गल टिप्पणी भी कुछ और ही कहानी कहती है। वहीं इन कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं का कहना है कि सरकार उन्हें बुरा बनाकर धीरे-धीरे आंगनवाड़ी केंद्रों को बंद कर देना चाहती है, जिसकी शुरुआत पहले कदम के तौर पर हो चुकी है।

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