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हसदेव अरण्य: केते बेसन पर 14 जुलाई को होने वाली जन सुनवाई को टाले जाने की मांग ज़ोर पकड़ती जा रही है

छत्तीसगढ़ के सुरगुजा जिले में गोंड आदिवासी घने जंगलों के बीच में स्थित केते बेसन नामक एक और कोयला ब्लॉक में कार्य-संचालन के खिलाफ अपने प्रतिरोध को जारी रखे हुए हैं।
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चित्र साभार: मोंगाबे-इंडिया

नई दिल्ली: इस वर्ष भारत द्वारा कोयला खनन के निजीकरण के बाद, जारी कोरोना महामारी के बावजूद इसके परिचालन को अबाध गति से जारी रखा गया है और उसी प्रकार से कुछ क्षेत्रों में सामुदायिक प्रतिरोध भी लगातार कायम है।

छत्तीसगढ़ के सुरगुजा जिले में गोंड आदिवासी समुदाय हसदेव अरण्ड के घने जंगल के बीचो-बीच में स्थित एक और कोयला ब्लॉक - केते बेसन में चल रहे अभियान के खिलाफ अपने प्रतिरोध को जारी रखे हुए हैं।

यह ब्लॉक 17.6 वर्ग किमी से अधिक के क्षेत्र में चार गाँवों में फैला हुआ है, और इसका स्वामित्व राज्य-संचालित राजस्थान राज्य विद्युत् उत्पादन निगम लिमिटेड के हाथ में है। इस कोयला ब्लॉक के आवश्यक मंजूरी प्रकिया के हिस्से के तौर पर 14 जुलाई को एक जन सुनवाई होने जा रही है। 

खदान के संचालन की प्रक्रिया को लेकर वर्तमान विरोध की जड़ें आदिवासी समुदायों के बीच में पूर्व के अनुभवों पर आधारित हैं, जिनकी ओर से आरोप लगाया जाता रहा है कि हसदेव अरण्य की 98% वन आच्छादित भूमि, जो कि 1,70,000 हेक्टेयर में फैली हुई है, में खनन कार्यों का अर्थ उनके प्राकृतिक आवास, उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान के लिए पूर्ण तबाही का सबब बनने जा रही है। 

2009 में, हसदेव अरण्य को इसके समृद्ध जंगल क्षेत्र के कारण खनन के लिए “नो-गो” जोन नामित किया गया था। हालाँकि बाद में इसे उलट दिया गया। वर्तमान में कई कोयला ब्लाकों में अधिग्रहण और संचालन की प्रक्रिया विभिन्न चरणों में जारी है, जिसमें परसा, परसा पूर्व, केते बेसन और तारा कोयला ब्लॉक शामिल हैं। इस क्षेत्र में ऐसे कुल 22 ब्लॉक्स हैं।

23 जून, 2011 को तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने तीन कोयला ब्लाकों - तारा, परसा पूर्व एवं केते बेसन के लिए वन मंजूरी दे दी थी, लेकिन वादा किया था कि इसके बाद इस क्षेत्र में किसी भी अन्य कोयला खनन परियोजना को कोई मंजूरी नहीं दी जायेगी।

14 जुलाई को होने वाली जन सुनवाई को स्थगित किये जाने के लिए एक अनुरोध पत्र। 

इस क्षेत्र के निवासी, रामलाल करियाम ने न्यूज़क्लिक को बताया: “केते विस्तार के उद्घाटन ने तमाम उल्लंघनों से गुजरने के बाद हमारे सामने एक भारी संकट खड़ा कर दिया है, जैसा कि परसा कोयला ब्लॉक के मामले में देखा गया है। अगर केते के लिए भी मंजूरी मिल जाती है तो यह हमारे प्राकृतिक आवास और इस क्षेत्र में रह रहे आदिवासी समुदायों के लिए किसी भारी आघात से कम नहीं होगा। खनन गतिविधि का अर्थ है कि हम अपनी वन उपज से हमेशा-हमेशा के लिए हाथ धो बैठेंगे।”

कोविड-19 संक्रमण, बारिश आदि के कारण जन सुनवाई को स्थगित किये जाने की मांग करते हुए करियाम का कहना था: “पिछली प्रकियाओं को देखते हुए इस बारे में लोगों का अनुभव काफी कड़वा रहा है, यही वजह है कि खनन गतिविधियों के खिलाफ इतना मजबूत प्रतिरोध देखने को मिल रहा है। वर्तमान में बारिश एवं और खरीफ का मौसम होने के कारण, ज्यादातर लोग 14 जुलाई को होने वाली जन सुनवाई प्रकिया में भाग ले पाने में असमर्थ हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जमीन पर यह प्रक्रिया पूरी तरह से जनभावनाओं को प्रतिबिंबित कर पाने में असमर्थ रहने वाली है - हम इसे सुनवाई को आगे बढ़ाने के एक और तरीके के तौर पर देख रहे हैं, जिसमें विरोध के बावजूद सहमति का नाटक किया जा रहा है।”

इससे पहले, न्यूज़क्लिक ने पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सरगुजा और सूरजपुर जिलों के परसा कोयला ब्लॉक में सल्ही, हरिहरपुर और फतेहपुर के गांवों में शुरू की गई भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को समाप्त किये जाने के लिए आदिवासियों की मांग की रिपोर्टिंग की थी। इन समुदायों का दावा है कि कोयला खनन में तेजी लाने की प्रक्रिया संविधान की पांचवीं अनुसूची एवं पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, या पेसा अधिनियम के तहत हासिल उनके अधिकारों का उल्लंघन है, जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि किसी भी प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण करने से पहले ग्राम सभाओं से सहमति पत्रों को हासिल करना अनिवार्य है। 

समुदायों के लिए विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा कोयला धारक अधिनयम को लागू करना रहा है, जिसके मूल में इस क्षेत्र में खनन को मंजूरी देना छिपा हुआ है। पिछले साल दिसंबर माह में केंद्र सरकार ने 700 हेक्टेयर से अधिक भूमि का अधिग्रहण करने के लिए कोयला धारक क्षेत्र (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 को लागू किया था।  

यह अधिनियम केंद्र सरकार को इस बात की अनुमति देता है कि यदि वह इस बारे में संतुष्ट है कि कोयले को समूचे या भूमि के एक हिस्से से निकाला जा सकता है, तो क्षेत्र में कोयले की संभावना को देखते हुए अधिसूचना जारी करने के दो वर्षों के भीतर इसे खनन के लिए अधिग्रहित किया जा सकता है। कोयला धारक अधिनियम सर्वोपरि क्षेत्र के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके तहत सरकार के पास निजी भूमि को हस्तगत करने और इसे सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए परिवर्तित करने की शक्तियाँ निहित हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

https://www.newsclick.in/Hasdeo%20Aranya-demand-defer-kente-besan-public-hearing-july-14-grows

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