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राष्ट्रीय युवा दिवस: स्वामी विवेकानंद की आज किसे ज़रूरत है?

स्वामी विवेकानंद आज संघ परिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक बड़े आइकॉन के रूप में उभरे हैं, शायद इसकी कल्पना ख़ुद उन्होंने भी नहीं की होगी।
vivekanand

स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस हर वर्ष 12 जनवरी को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भाजपा के शासन में आने के बाद विवेकानंद को हिन्दुत्व के एक आइकॉन के रूप में पेश किया जाने लगा। वास्तव में स्वामी विवेकानंद का मूल्यांकन उतना ही जटिल है, जितना भारतीय पुनर्जागरण का मूल्यांकन। उन्नीसवीं सदी‌ में भारत में या कहें बंगाल का पुनर्जागरण; वह यूरोपीय पुनर्जागरण से बिल्कुल भिन्न था। यूरोपीय पुनर्जागरण में उभरते हुए पूंजीवाद ने सामंतवाद को चुनौती दी। वहां पर सामंतवाद का आधार चर्च था, इसलिए चौदहवीं और सत्रहवीं सदी में जो पुनर्जागरण हुआ, उसने सर्वप्रथम चर्च की सत्ता को चुनौती दी, जो सामंतवाद का मुख्य आधार था। इसके फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नवीन चेतना आई। यह आंदोलन केवल पुराने ज्ञान के उद्धार तक ही सीमित नहीं था बल्कि इस युग में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन प्रयोग हुए। नए अनुसंधान हुए और ज्ञान-प्राप्ति के नए-नए तरीके खोज निकाले गए। इसने परलोकवाद और धर्मवाद के स्थान पर मानववाद को प्रतिष्ठित किया।

पुनर्जागरण वह आंदोलन था जिसके द्वारा पश्चिम के राष्ट्र मध्ययुग से निकलकर आधुनिक युग के विचार और जीवन-शैली अपनाने लगे। यूरोप के निवासियों ने भौगोलिक, व्यापारिक, सामजिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रगति की। इस युग में लोगों ने मध्यकालीन संकीर्णता छोड़कर स्वयं को नयी खोजों, नवीनतम विचारों तथा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक उन्नति से सुसज्जित किया। प्रत्येक क्षेत्र में सर्वथा नवीन दृष्टिकोण, आदर्श और आशा का संचार हुआ। साहित्य, कला, दर्शन, विज्ञान, वाणिज्य-व्यवसाय, समाज और राजनीति पर से धर्म का प्रभाव समाप्त हो गया। इस प्रकार यूरोपीय पुनर्जागरण उस बौद्धिक आंदोलन का नाम है जिसने रोम और यूनान की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का पुनरुद्धार कर नयी चेतना को जन्म दिया लेकिन उन्नीसवीं सदी में बंगाल का‌ पुनर्जागरण यूरोपीय पुनर्जागरण की प्रतिछाया मात्र था। उपनिवेशवाद के दबाव तथा अंग्रेजी शिक्षा के कारण बंगाल में एक मध्यवर्ग पैदा हुआ था। बंगाल में संभ्रांत ब्राह्मण परिवार के अनेक नौजवान इंग्लैंड शिक्षा ग्रहण करने गए। वे ही बाद में भारतीय पुनर्जागरण के आधार बने जिसमें राजा राममोहन राय प्रमुख थे। उस समय थियोसोफिकल सोसायटी, ब्रह्मसमाज और आर्यसमाज जैसे संगठन बन रहे थे। सतही तौर पर यह देखने में लगता है कि वे लोग हिंदू धर्म में ‌सुधार करना चाहते थे परंतु ऐसा नहीं था। वे सारे लोग हिंदू वर्णव्यवस्था के ज़बरदस्त समर्थक थे। सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह जैसी समस्याएँ उच्चवर्ग के ब्राह्मणों की समस्या थी, हिंदू दलितों की नहीं।‌ यही कारण है कि यह पुनर्जागरण हिंदू धर्म और समाज में कोई व्यापक परिवर्तन नहीं कर सकता था और ऐसा ही हुआ। सती प्रथा का विरोध और धार्मिक सुधारों का बीड़ा उठाने पर भी राजा राममोहन राय पर कुलीन भारतीयों की सक्रियता और जागरूकता नफासतवाले‌ प्रतिनिधि से ज़्यादा महत्व हासिल नहीं हो सका। विवेकानंद इसी पुनर्जागरण के सर्वोच्च स्तर के प्रतिनिधि थे लेकिन वे कई अर्थों में नवजागरण के अनेक अग्रदूतों से भिन्न थे।

इतिहास में व्यक्तियों के चकाचौंध से ज़यादा उन‌ शक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है जो इतिहास को संचालित करते हैं और आगे ले जाते हैं। क्या विवेकानंद इस मूल्यांकन में खरे उतरते हैं? वास्तव में उनका जीवन और विचार बड़े अंतर्विरोधों से‌ भरा हुआ है। क्या ये‌ अंतर्विरोध भारतीय नवजागरण के अंतर्विरोध और सीमाएँ‌ थीं? उन्नीसवीं सदी में बंगाल के अनुशीलन क्रांतिकारियों के पास‌ क्रांतिकारी साहित्य के साथ-साथ विवेकानंद का साहित्य भी मिलता है। इससे यह पता लगता है कि प्रारंभिक राष्ट्रवादी आंदोलन में उनके विचारों की भूमिका भी थी।

रामकृष्ण परमहंस के परम शिष्य विवेकानंद (12/1/1863 - 4/7/1902) का नाम लेने पर 1893 में शिकागो में आयोजित पार्लियामेंट ऑफ वर्ल्ड रिलिजन्स में हिंदू धर्म का परिचय देते हुए उनका बहुचर्चित व्याख्यान याद आता है। कायस्थ परिवार में जन्मे विवेकानंद को विदेश यात्रा से लौटने के बाद शूद्र होने का अभिशाप झेलना पड़ा। इसे लेकर पश्चिमी जगत में वेदान्त और योग के दर्शनों के प्रसार में उनके योगदान की चर्चा सामने आती है। रामकृष्ण मठ स्थापना में उनकी पहल या फिर ब्रिटिश हुकूमत के अंतर्गत भारत में हिंदू धर्म के पुनर्जीवन में उनके हस्तक्षेप या जगह-जगह व्याख्यानों का सिलसिला सभी कुछ आँखों के सामने गुजरता है और बमुश्किल 39 साल की उम्र में उनके तूफानी जीवन का अंत भी हो जाता है।

अगर हम विवेकानंद का मूल्यांकन करें तो हमें क्या दिखता है, निश्चित ही उस समय तक सामाजिक पृष्ठभूमि में परिवर्तन आए थे।‌ ज्योतिबा सावित्री फुले, जयोति दास, नारायण गुरु आदि का सामाजिक मंच पर अवतरण हो‌ चुका था, क्या उनके चिंतन और विवेकानंद के चिंतन के बीच कोई गुणात्मक अंतर दिखता है?

* दयानन्द सरस्वती के लगभग चालीस साल बाद जन्मे विवेकानंद हिंदू धर्म के नाम पर उपस्थित तमाम पतनशीलताओं पर जोरदार हमला बोलते हैं, लेकिन उसी के साथ अत्यंत प्रभावशाली तरीके से अतीत का गुणगान करते दिखाई देते हैं। एक प्रगतिशील और नवीन भारत का उनका सपना इतिहासकार सुमित सरकार के अनुसार, “सामाजिक आर्थिक कार्यक्रमों की अस्पष्टता और जनसंपर्कों की पद्धतियाँ राजनीतिक उद्देश्यों से विहीन होती हैं।” उन्होंने ‘दरिद्र नारायण’ की बात अवश्य की, मगर इस संबंध में संबंधित कार्यक्रमों के बारे में उनकी स्पष्टता नहीं थी।

* इसमें कोई दो‌ राय नहीं कि उन्होंने निम्नजातियों को दी जा रही प्रताड़नाओं की भर्त्सना की या ग़रीबों का खून चूसने का विरोध किया मगर जैसा कि ब्रज रंजन मणि अपनी पुस्तक ‘Debrahmanising History’ के पेज नंबर 87 में लिखते हैं, “उन्होंने दक्षिण के ग़ैरब्राह्मण आंदोलन की इस बात के लिए आलोचना की, कि वे बहुत जल्दी में हैं तथा जातियों के बीच विवादों को बढ़ावा दे रहे हैं।”

* “जैसा कि मनु कहते हैं,यह सभी विशेषाधिकार और सम्मान ब्राह्मणों को दिए गए हैं, क्योंकि उनके पास सद्गुणों का खजाना है।” (विवेकानंद कलेक्टेड वर्क)

* ग़ैरब्राह्मण जातियों को मैं कहता हूं कि जल्दी में मत रहो, तुम अपनी ही गलतियों का ख़ामियाजा भुगत रहे हो। किसने आपको आध्यात्मिकता और संस्कृत शिक्षा की उपेक्षा करने को कहा? अब क्यों इस बात पर गुस्सा करते हो‌ कि किसी अन्य के पास अधिक दिमाग है, अधिक ऊर्जा है, अधिक हिम्मत है। (कलेक्टेड वर्क विवेकानंद)

* वे वंचितों को सलाह देते हैं कि “अपनी ऊर्जा झगड़ों में व्यय करने के‌ बजाय अपनी सारी ऊर्जा ब्राह्मण के पास जो संस्कृति है, उसे हासिल करने में लगा दें। आप क्यों नहीं संस्कृत विद्वान बन सकते हो? संस्कृत शिक्षा सभी जातियों तक पहुँचे, इसके लिए आप क्यों नहीं लाखों खर्च कर सकते हो?(वहीं संस्कृत भाषा भारत में सत्ता का रहस्य है)।” इस पर ब्रज रंजन मणि पूछते हैं कि, “संस्कृत के‌ जरिए ब्राह्मणत्व की प्राप्ति और उत्पीड़ितों की आज़ादी की बात रखने वाले विवेकानंद क्या इस बात से अनभिज्ञ थे कि संस्कृत धर्मग्रंथ पढ़ने को लेकर स्त्रियों और शूद्रों को‌ मनाही थी?”

* विवेकानंद के विपुल लेखन में हम यह भी पाते हैं कि निम्नजातियों की शिक्षा के प्रति उनका क्या नज़रिया था:-

“और यह यूरोपीय अब इन अज्ञानी निरक्षर निम्नजातियों को शिक्षित कर रहे हैं जो अपने मोटे कपड़ों में खेतों में मेहनत करते हैं और जो अनार्य नस्ल के हैं। यह हमें कमज़ोर कर देगा और यूरोपीय तथा निम्न जाति के लोगों को लाभान्वित करेगा।” (अमिया पी सेन, हिंदू रिव्यूलिजम इन इंडिया,पेज-321)

इसमें कोई दो राय नहीं कि विवेकानंद के लेखन में हमें आसन्न शूद्रराज की बात मिलती है जिसके उनके लिए मायने हैं कि निम्नजातियों का उभार। मगर यह समझना महत्वपूर्ण है कि वे मानते थे कि इससे संस्कृति का स्तर नीचे जाएगा और ‌इस बात का प्रतिवाद करते दिखते थे कि अपने सामाजिक ओरिएंटेशन का उनका मकसद सामाजिक नहीं धार्मिक एकता था। (उसी पुस्तक से,पेज-130)

प्राचीन वर्ण संस्कृति पर उनके यकीन के चलते उन्होंने मनु एवं याज्ञवल्क्य की सामाजिक-धार्मिक प्रणाली की वापसी की बात कही। (उसी पुस्तक से,पेज-341)

जाति की उनकी समझदारी काफी समस्याग्रस्त थी, जैसा कि उनके‌ निम्न वक्तव्यों से स्पष्ट है:-

“जाति ने एक राष्ट्र के तौर पर हमें ज़िन्दा रखा है। यह‌ समाज का स्वरूप ही है कि वह समूहों का निर्माण करता है। जाति एक स्वाभाविक प्रणाली है। मैं सामाजिक जीवन में एक काम मैं करता हूं,आप‌ दूसरा करते हैं। आप देश का कारोबार संभाल सकते हैं और‌ मैं पुराने जूतों के जोड़े ठीक कर सकता हूं मगर यह कोई वजह नहीं कि आप मुझसे बड़े हैं क्योंकि क्या आप‌ मेरा जूता ठीक कर सकते हैं? जाति अच्छी है, जीवन का वही स्वभाविक तरीका है। हर जाति एक अलग जातीय तत्व से बनी है। अगर कोई व्यक्ति भारत में लंबे समय तक रहता है, तो वह उन विशिष्टताओं के‌ जरिए बता सकता है कि कोई व्यक्ति किस जाति से जुड़ा है?” (कलेक्टेड वर्क,भाग-8, पृष्ठ-54)

हमें इस संदर्भ में इस पक्ष पर भी विचार करना चाहिए कि किस तरह उच्च जातियों के अभिजात्यों ने आध्यात्मिक गुरु के तौर पर उभर रहे विवेकानंद का विरोध किया था और किस तरह उनके शूद (अर्थात कायस्थ) होने की‌ बात कही थी। ज्ञात है कि तत्कालीन बंगाल में कायस्थ जाति; जिसमें विवेकानंद जन्मे थे, शूद्रों की श्रेणी में गिनी जाती थी। विदेश यात्रा से लौटने के बाद उनके ऊपर समुद्रोल्लंघन, म्लेच्छों से संपर्क और प्रतिबंधित अन्न खाने के आरोप लगे थे। जाति के मसले की तरह स्त्रियों के‌ मामले में विवेकानंद का रुख संतुलित नहीं कहा जा सकता।

“वे अंदर से पितृसत्तात्मक थे और महिलाओं को आध्यात्मिक जीवन में एक बाधा के तौर पर देखते थे। स्त्रीत्व का सबसे उत्तम रूप वे माँ में देखते थे। स्वायत्तता और स्त्रियों की आकांक्षा के प्रति उनकी असहमति थी। उनके हिसाब से सीता स्त्री गुण का मूर्त रूप थीं। भारतीय समाज में महिलाओं की पारंपरिक स्थिति की हिमायत में वे हिंदू स्त्रियों के ‘सुखी चित्र’ खींचने में किसी हद तक जा सकते थे।” (अमिया पी सेन की पुस्तक से,पेज-330)

उनके लिए भारतीय संस्कृति और हिंदू संस्कृति एक ही‌ थी। यही वह समझदारी थी जिसके चलते ईसाईयत, इस्लाम और बौद्ध धर्म को‌ लेकर‌ उनके विचार अत्यन्त एकांगी थे। वे उन्हें हीन समझते थे। अमिया पी सेन अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख करते हैं कि, “जब ईसाई मिशनरियों ने जाति और अस्पर्श्यता को लेकर हिंदू धर्म की आलोचना की तो उन्होंने ईसा मसीह की ऐतिहासिकता पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि दरअसल शुरूआती ईसाइयों की हिंदू जड़ें थीं मगर इस्लाम की चर्चा करने पर अन्य ग़ैर हिंदूधर्म की तुलना में और अधिक आक्रामक होते दिखते हैं। इस्लाम को‌ उन्होंने बुनियादी तौर पर अतार्किक और हिंसक धर्म कहा और मुसलमानों कसाइयों के तौर पर संबोधित किया। एक तरह से देखें तो मुसलमान उनके लिए महज़ विदेशी नहीं थे, बल्कि उनके धर्म की उपस्थिति भी उनके लिए अस्वीकार्य थी। (अमिया पी सेन, हिंदू रिव्यूलिजम इन इंडिया, पेज-338)

निश्चित रूप से विवेकानंद भारतीय पुनर्जागरण के सबसे बड़े आइकॉन थे। सबसे बड़ी बात उनका ब्राह्मण न होना भी था। वे पुनर्जागरण की सीमाओं को तोड़कर भारतीय समाज के सबसे बड़े नायक बन सकते थे तथा ज्योतिबा फुले की बहुजन विचारधारा से अपने को जोड़ सकते थे, लेकिन यह भारतीय इतिहास की त्रासदी थी या खुद इनकी, इसके उत्तर की तलाश अभी की जानी बाकी है। फिलहाल वे आज संघ परिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक बड़े आइकॉन के रूप में उभरे हैं, शायद इसकी कल्पना उन्होंने खुद भी नहीं की होगी।

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