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हर आत्महत्या का मतलब है कि हम एक समाज के तौर पर फ़ेल हो गए हैं

सुशांत को किसी ने समय नहीं दिया। न उस इंडस्ट्री ने, जिसके लिए उस इंसान ने एक सफल कैरियर छोड़ दिया, न उस मीडिया ने जो समाज का ध्वजवाहक बना फिरता है और न ही उस समाज ने, जिसने इस आत्महत्या को 'ज़िन्दगी जीने के 100 नायाब तरीक़े' सिखाने का एक ज़रिया बना दिया।
सुशांत
image courtesy : The Hindu

भारत में हर साल क़रीब लाख लोग आत्महत्या करते हैं। इस आंकड़े की तस्दीक़ करना मेरे लिये शायद मुमकिन नहीं हैलेकिन कहीं सुना था इसलिये भूमिका के तौर  पर लिख दिया है। आत्महत्या करने की वजह कुछ और नहीं हो सकतीसिर्फ़ मानसिक ही हो सकती है। तो क्या सिर्फ़ वही लाख लोग मानसिक तौर पर ज़िन्दगी से जूझ रहे हैंक्या उन लोगों के अलावा किसी की ज़िंदगी में मानसिक तौर पर कोई परेशानी नहीं हैनहींलेकिन जब कोई आत्महत्या कर लेता हैतब हम ये सोच कर ज़्यादा दुखी होते हैंकि यह इंसान लड़ नहीं पाया। साथ हीहम ख़ुद को और बाक़ी बचे लोगों को बहादुर तसव्वुर करने लगते हैंक्योंकि हम मरे नहीं। मुझे नहीं पता कि यह बात भी कितनी सही हैलेकिन हम ऐसा करते हैं।

हाल ही में सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या कर ली। और समाज ने यह कहने में कोई देरी नहीं की कि सुशांत कमज़ोर थेवह लड़ नहीं पाए और उन्होंने 'सरेंडरकर दिया। एक ख़याल पर बात होने लगी जिसमें कहा जाता है कि जो हार जाता हैवही अपनी ज़िंदगी क़ुर्बान करता है।

यहाँ मैं सबसे पहले इस बात पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि मौत के बाद का माहौल क्या होता है। मैंने मीडिया संस्थान में काम करते हुए एक साल और तीन महीने गुज़ार दिए हैं। इस समय में मैंने गिरीश करनाडइरफ़ान ख़ान की मौत पर स्मृति शेष लिखा है। मुझे अभी भी समझ नहीं आया है कि मरने के बाद इंसान कितने वक़्त बाद मरता है। लेकिन मैं अब भी ये बात मानता हूँ कि मरने वाले को समय देना चाहिये ताकि उसे ख़ुद समझ में आए कि वो मर गया है। और जब सुशांत की तरह कोई ख़ुदकुशी कर लेतब तो शायद थोड़ा ज़्यादा समय देना चाहिये। यही समय समाज ने सुशांत को नहीं दिया। सुशांत को किसी ने समय नहीं दिया। न उस इंडस्ट्री नेजिसके लिए उस इंसान ने एक सफल कैरियर छोड़ दियान उस मीडिया ने जो समाज का ध्वजवाहक बना फिरता है और न ही उस समाज नेजिसने इस आत्महत्या को 'ज़िन्दगी जीने के 100 नायाब तरीक़ेसिखाने का एक ज़रिया बना दिया।

आत्महत्या इंसान बेचारगी के लम्हों में करता हैकरता होगा। आत्महत्या इंसान कमज़ोरी के वक़्त में करता हैकरता होगा। लेकिन उसे बेचारा और कमज़ोर किसने बनाया हैक्या यह समाज और बॉलीवुड इंडस्ट्री सुशांत की इस हालत के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं?

देश में जब भी कोई ख़ुदकुशी करता हैउसका मतलब ये है कि एक समाज के तौर पर हमने उसे यह मानने पर मजबूर कर दियाकि यह दुनिया जीने लायक नहीं है। किसानोंमज़दूरोंबच्चोंबीवियोंबेटियोंयुवाओंसबकी ख़ुदकुशी का मतलब है कि हम एक समाज के तौर पर असफल हो गए हैं।

सुशांत सिंह राजपूत का मुख़्तसर सा करियर थालेकिन उसकी ज़िंदगी लंबी थीऔर बड़ी भी। कभी सुर्खियों में न रहने वाला बॉलीवुड की मेनस्ट्रीम फ़िल्मों का अभिनेताजिससे मौक़े छीन लिए गए। बताया जा रहा है कि पिछले महीने में सुशांत से पिक्चरें छीन ली गई थीं। कई बड़ी फ़िल्मों के लिए पहले सुशांत का नाम सुझाया गया थाकुछ में बात भी हो गई थीलेकिन उन्हें फ़िल्मों से निकाल दिया गया। एक फ़िल्म पानीजिसके लिए सुशांत ने साल मेहनत कीवो कभी बनी ही नहीं। आज इंडस्ट्री के सब लोग बारहा वीडिओज़ बना रहे हैंसुशांत की मौत पर रो रहे हैंक्या उन्होंने तब कुछ कहा होगा जब उनसे पिक्चरें छीन ली गई थींक्या उनकी ख़ुदकुशी की वजहों में से एक वजह यह इंडस्ट्री नहीं है?

सुशांत को अवार्ड्स नहीं दिए गएबड़े नाम वालों को दिए गए। यहाँ मैं यह भी बता दूंकि जिस तरह की यह इंडस्ट्री है उसके लिए अवार्ड्सनामपैसा सब ज़रूरी है।

क्या हमनेदर्शकों ने सुशांत की फ़िल्में देखींफेसबुकट्विटरइंस्टाग्राम, paparaazi के ज़माने में रहने वाले हम लोगों को कभी नेपोटिज़्म का पता नहीं चलाहमने उसका क्या कियाहमने छिछोरे के वक़्त में स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर देखी। चंकी पांडे की बेटी अनन्या पांडे को सुपरहिट बना दिया। हमने ब्योमकेश बक्शीसोनचिरैया नहीं देखा। जिस इंसान के मरने पर हम दुख भरे पोस्ट्स लिख रहे हैंउसके जीते जी हमने उसके काम की क़द्र नहीं की। क्या यह बॉयकॉट का नाटक हमने तब कियाजब कथित तौर पर सलमान ख़ान ने केसू फ़िरंगी उर्फ़ विवेक ओबेरॉय का करियर समाप्त कर दियानहींहमने हर ईद पर सलमान की फ़िल्में देखींउसे 300 करोड़ दिलवाए। आज हम जो सुशांत की मौत का दुख मना रहे हैंक्या हम उसके लायक भी हैंक्या हमनेइस समाज ने उसकी अनदेखी कर केउसे ग़ैर ज़रूरी मान कर उसे आत्महत्या के लिए नहीं उकसाया?

हम चाहे किसी की भी खुदकुशी पर कितना ही रो लेंलेकिन उसकी वजह कहीं न कहीं हम ही लोग हैं जो बचे रह गए हैं।

सुशांत सिंह को याद कीजिये तो इसलिए मत याद कीजिये कि वो एक अच्छा एक्टर थाया उसने स्ट्रगल बहुत किया थाबल्कि इसलिए याद कीजिये कि वो एक हाड़-मांस से बना इंसान था जिसने इस समाज के रवैये और नाकामी की वजह से ख़ुदकुशी कर ली।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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