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बनारस की एक बड़ी आबादी ब्रेक-बोन फीवर की चपेट में!

“पहले डेंगू-चिकनगुनिया के गिने-चुने मरीज़ मिला करते थे लेकिन इस बार इनकी तादाद कुछ ज़्यादा है। बुख़ार उतरने के बाद भी तीन से चार सप्ताह तक जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द हो रहा है।”
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बनारस के कबीरचौरा स्थित मंडलीय चिकित्सालय का हाल

उत्तर प्रदेश के बनारस शहर की लगभग एक तिहाई आबादी ब्रेक-बोन फीवर (हड्डीतोड़ बुखार) से परेशान है। पहले बुखार और फिर हाथ-पैर के जोड़ों में बेतहाशा दर्द के बढ़ते मामलों को लेकर यहां अफ़रातफ़री का मौहाल है। चाहे बीएचयू का सर सुंदरलाल हॉस्पिटल हो या फिर कबीरचौरा का शिवप्रसाद गुप्त मंडलीय अस्पताल अथवा पांडेयपुर का पंडित दीनदयाल चिकित्सालय। ये सभी सरकारी अस्पताल बुखार के मरीज़ों से भरे हैं। बनारस में डॉक्टरों के निजी क्लिनिक में रोगियों का तांता लगा है। हर कोई जोड़ों में दर्द, जी मिचलाना, सिर दर्द और बुखार की शिकायत कर रहा है।

पूर्वांचल में तेज़ी से फैल रहे जानलेवा बुखार ने योगी आदित्यनाथ सरकार को सकते में डाल दिया है। सरकारी अस्पतालों के बाहर उमड़ रही भीड़ बता रही है कि बुखार का प्रकोप काफी ज़्यादा है, जिसे नियंत्रित करने में स्वास्थ्य विभाग के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी हो गईं हैं। चिकित्साविदों का मानना है कि ब्रेक-बोन फीवर (हड्डीतोड़ बुखार) तभी आता है जब डेंगू या चिकनगुनिया हमला करती है। ये एक ख़ास प्रजाति के एडीज एजेप्टी मच्छरों से फैलती है। जर्मनी के डॉक्टर जोहान विल्हेम ने साल 1818 में सबसे पहले इस मच्छर की पहचान की थी।

बनारस के कबीरचौरा स्थित शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय चिकित्सालय के इमरजेंसी वार्ड के बाहर अपनी बेटी के साथ खड़ी 61 साल की नाज़मीन बेग़म दो कदम भी ठीक से नहीं चल पा रही थीं। मुकीमगंज की इस महिला को कुछ रोज़ पहले बुखार हुआ तो वह सरकारी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती हो गईं। जैसे ही बुखार उतरा, तभी नाज़मीन के हाथ-पैर के जोड़ों में तेज़ दर्द होने लगा। अब इनका चलना-फिरना मुहाल हो गया है। वह कहती हैं, "मैं कबीरचौरा अस्पताल में आई तो मुझे पैरासिटामोल (बुखार की एक दवा) दिया गया, लेकिन उससे आराम नहीं मिला। हम बिस्तर पर पड़े चीखते-चिल्लाते रहे, पर दर्द से आराम नहीं मिला। समझ में यह नहीं आ रहा है कि यह बीमारी हमारा पीछा कब छोड़ेगी? शरीर के जोड़ों का दर्द आखिर कब और कैसे ठीक होगा? "

वाराणसी में इस बुखार से पीड़ित लोगों की तादाद में तेज़ी से इजाफा हो रहा हैं। नगर निगम और स्वास्थ्य महकमे के अफसर शहर में साफ-सफाई, मच्छररोधी दवाओं के छिड़काव और रोकथाम का दावा कर रहे हैं। हालांकि इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों के घरों में ब्रेक-बोन फीवर दस्तक दे रहा है। इस बीमारी ने बनारस की एक बड़ी आबादी को अपने शिकंजे में ले लिया है। बनारस शहर में हेल्थ महकमा पिछले दो महीने से मच्छरमार अभियान चला रहा है, लेकिन उसकी मुहीम इस बीमारी के आगे कमज़ोर पड़ती नज़र आ रही है। बीमार मरीज़ और उनके परिजन अस्पताल से लेकर दवाओं की दुकानों पर भाग-दौड़ करते दिखाई दे रहे हैं।

छित्तूपुर की रश्मि जायसवाल इमरजेंसी वार्ड में कराहती मिलीं। तेज़ बुखार आने पर परिजनों ने इन्हें 24 अक्टूबर 2023 को कबीरचौरा स्थित मंडलीय अस्पताल में भर्ती कराया। 22 अक्टूबर को इन्हें तेज़ बुखार आया और इसी के साथ हाथ-पैर के जोड़ों में दर्द शुरू हो गया। तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ तो उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। रश्मि के पति का निधन हो चुका है। इनकी बेटी अमृता जायसवाल (17 साल) और पुत्र यश (14 साल) इनकी तीमारदारी में जुटे हैं। सास-ससुर घर पर परचून की दुकान चलाते हैं, जिससे परिवार का खर्च चलता है। इमरजेंसी वार्ड में मुलाकात हुई तो रश्मि डबडबायी आंखों और रूंधे गले से बहुत मुश्किल से बोल पाईं। उन्होंने कहा, "पूरे शरीर में असहनीय दर्द है। सिस्टर दिन में सिर्फ तीन बार आती हैं और कुछ दवाएं देकर चली जाती हैं। यहां रात में मरीज़ को देखने वाला कोई नहीं होता।"

इस अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड में भर्ती मरीज़ों और उनके परिजनों के पास अस्पताल की व्यवस्था को लेकर ढेरों शिकायतें हैं। बुखार से तप रहे कबीरचौरा के 68 वर्षीय कैलाश, कोटवां की मीना (45 साल), सोएपुर (पांडेयपुर) के फूलगेन सिंह (60 साल) से बात करने पर उनका गुस्सा साफ़ झलकता है।

शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय चिकित्सालय का डेंगू वार्ड भी खचाखच भरा है। नक्खीघाट की नगमा, दारानगर के आदर्श तिवारी, वरुणापुल के विशाल, नदेसर की डाली गुप्ता और सुमित पाल को तेज़ बुखार होने पर इस अस्पताल में तब भर्ती कराया गया जब इनकी प्लेटलेट्स काफी नीचे आ गईं।

बनारस के इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल से मिलती-जुलती तस्वीर पंडित दीनदयाल जिला चिकित्सालय की भी है। इस अस्पताल से एक दैनिक अखबार के लिए न्यूज़ कवर करने वाले पत्रकार राजकुमार कुंवर कहते हैं, "योगी सरकार लाख दावे कर ले कि काशी की आबोहवा सही है, लेकिन स्थिति काफी चिंताजनक है। रोज़ाना मरीज़ों की तादाद में लगातार इजाफा होता जा रहा है। सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीज़ भले ही खुलकर बोल पाने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन सभी के मन में गहरी पीड़ा है। मरीज़ों की आम शिकायत है कि डॉक्टर खुद देखने नहीं आते। नर्सिंग स्टाफ के भरोसा सभी सरकारी अस्पताल चल रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में मरीज़ों की न तो समय से जांच होती है और न ही दवाएं मिलती हैं।"

जानलेवा हो रहा ब्रेक-बोन फीवर

दावा है कि इसी ब्रेक-बोन फीवर के चलते बनारस की जानी-मानी चिकित्सक डॉ. अंजना गुप्ता का कुछ रोज़ पहले निधन हो गया था। मैदागिन स्थित मेडविन अस्पताल के निदेशक डॉ. मनमोहन श्याम की पत्नी डॉ. अंजना गुप्ता कई दिनों से बुखार से पीड़ित थी। उन्हें गंभीर हालत में बीएचयू में भर्ती कराया गया था। डॉ. मनमोहन श्याम और उनकी पत्नी डॉ अंजना गुप्ता ने कोरोना के संकटकाल में बड़ी संख्या में लोगों को बचाया था। परिजनों के मुताबिक, डॉ. गुप्ता डेंगू की चपेट में थीं। बीमारी लाइलाज हुई तो उनकी जान चली गई। डेंगू की वजह से जौनपुर में नीलकंठ हॉस्पिटल की महिला चिकित्सक डॉ. अलका अग्रवाल (48 साल) की भी जान जा चुकी है। मौत के ये मामले उन चुनिंदा लोगों के हैं जिन्हें समूचा पूर्वांचल जानता है। इसके अलावा जौनपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष कपिल देव मौर्य ने बताया कि यहां डेंगू से पीड़ित 328 मरीज़ों की पहचान हुई है और क़रीब 12 लोगों की जान भी जा चुकी है।

ब्रेक-बोन फीवर के चलते पूर्वांचल के जाने-माने बसपा नेता देवव्रत शर्मा बेहाल हैं। इनकी बहू सोनम राय की लिवर इंफेक्शन से मौत हो चुकी है, जिसके सदमें से वह अभी तक उबर नहीं पाए हैं। बनारस के शिवपुर निवासी देवव्रत शर्मा बनारसियों के पैरों को ख़राब कर रही इस बीमारी से खासे परेशान हैं। सोशल मीडिया पर वह कई दिनों से मोदी-योगी सरकार को घेर रहे हैं। उन्होंने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है, "पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में गजब का बुखार फैला हुआ है। बड़ी तादाद में लोग बीमार हैं। हर घर त्रस्त है, सरकार मस्त है।"

न्यूज़क्लिक से बातचीत में देवव्रत कहते हैं, "कितनी अजीब बात है कि इस गुमनाम-सी बीमारी को सरकारी ही नहीं, प्राइवेट डॉक्टर भी नहीं पकड़ पा रहे हैं। कोई इसे चिकनगुनिया तो कोई टाइफाइड, कोई डेंगू और कोई कोरोना जैसी बीमारी का दूसरा रूप मान रहा है। ब्रेक-बोन फीवर की ज़द में आने वाले मरीज़ों को पैदल चलने-टहलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। बहुत से मरीज़ अब दवा लेने से खौफ खाने लगे हैं।"

बनारस के के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. दिग्विजय सिंह स्वीकार करते हैं कि, "हाल के दिनों में वायरल बुखार और डेंगू के मरीज़ों की तादाद तेज़ी से बढ़ी है। इमरजेंसी से लेकर डेंगू वार्ड तक भर गए हैं। जहां भी जगह मिल रही है, वहां मरीज़ों को भर्ती कर इलाज किया जा रहा है। फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है।"

कोरोना जैसा खौफ

एक दैनिक अखबार के लिए खासतौर पर शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय अस्पताल की कवरेज करने वाले पत्रकार देव कुमार केसरी कहते हैं, "बनारस में इस बुखार का खौफ कुछ उसी तरह से है जिस तरह की स्थिति कोरोना महामारी के समय थी। पिछले दो महीने से वायरल फीवर लोगों की सेहत पर इस कदर असर डाल रहा है कि करीब-करीब हर घर में एक से दो लोग इसकी चपेट में हैं। किसी को तेज़ बुखार, जोड़ों में दर्द है तो कोई सर्दी, जुखाम और पेट संबंधी बीमारी से ग्रसित है। बीमारी किस कदर बढ़ी है, इसका अंदाजा अस्पतालों में हर दिन बढ़ती जा रही मरीज़ों की तादाद को देख लगाया जा सकता है।"

"सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों के वार्ड, मरीज़ों से खचाखच भरे हुए हैं। पैथालॉजी में भी जांच के लिए लंबी कतारें लग रही हैं। सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक साफतौर पर यह नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर यह कैसी और कौन सी बीमारी है? बहुत से लोग इसे मिस्ट्री फीवर मान रहे हैं। इस बीमारी से बनारस में चौतरफा दहशत है। कुछ लोग इसे चिकनगुनिया की बीमारी बता रहे हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि चिकनगुनिया को जन्म देने वाले एडीज एजेप्टी मच्छरों के लारवा शहर में क्यों नहीं मिल रहे हैं? अगर चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों ने बनारस में डेरा डाल दिया है तो नगर निगम और मलेरिया महकमे के नुमाइंदे पिछले दो महीनों में एडीज एजेप्टी को ख़त्म क्यों नहीं कर पाए?"

बनारस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है और कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यहां ब्रेक-बोन फीवर के मामलों में आई बाढ़ की बड़ी वजह वरुणा और अस्सी नदी में गंदगी उड़ेलने वाले नाले हैं। दोनों नदियां शहर से गुजरती हैं। बनारस शहर की तंग गलियों में तमाम नाले खुले पड़े हैं, जो चिकनगुनिया और डेंगू के मच्छरों के पनपने के लिए माकूल महौल पैदा कर रहे हैं। इस साल बनारस में देर से बारिश हुई है, जिसके कारण देहाती इलाकों के तमाम गड्ढों में बारिश का पानी भर गया है। जल-जमाव की समस्या ने चिकनगुनिया के साथ ही डेंगू, चिकनगुनिया और येलो फीवर के मामलों में बढ़ोतरी की गुंजाइश बढ़ा दी है।

हुकुलगंज इलाके के दंत चिकित्सक डॉ. अविनाश सिंह कहते हैं, "हमारे घर में कोई ऐसा नहीं बचा है जो ब्रेक-बोन फीवर की चपेट में न आया हो। यही स्थिति हर घर की है। एक-एक कर के हर परिवार, हर शख़्स इसकी चपेट में आ रहा है। सरकारी अस्पताल में मुफ्त में इलाज उपलब्ध है जो मेरे घर से महज दो किमी की दूरी पर है, लेकिन मैंने निजी अस्पताल में अपने परिजनों का इलाज करवाना बेहतर समझा। चिकनगुनिया और डेंगू के बढ़ते हुए मामलों की वजह से सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों पर बहुत दबाव है। निजी अस्पतालों में स्थिति गंभीर है, लेकिन सरकारी अस्पतालों से थोड़ी बेहतर है।"

बनारस शहर के व्यापारी नेता बदरुद्दीन अहमद कहते हैं, "ब्रेक-बोन फीवर के चलते बनारस में सभी तरह का व्यवसाय प्रभावित हो रहा है। ऐसे कारोबारियों की संख्या बहुत बड़ी है जिसके परिवार के कई सदस्य एक साथ बीमार पड़े हुए हैं। कोई ऐसा नहीं है जो दुकान चलाए। बनारस की सरकार जिस तरह से इस संकट से निपट रही है, उसे लेकर हर कोई चिंतित नज़र आ रहा है। हेल्थ महकमे के अफसर भले ही यह दावा कर रहे हैं कि सरकारी अस्पताल चिकनगुनिया, डेंगू और मलेरिया से निपटने में पूरी तरह से सक्षम हैं, लेकिन कोरा सच यह है कि ब्रेक-बोन फीवर ने बनारसियों को अपने खौफनाक शिकंजे में ले लिया है। बाहर खुले में सोने वालों में चिकनगुनिया और डेंगू का ख़तरा बहुत ज़्यादा है।"

ब्रेक-बोन फीवर के खौफ का असर स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर भी पढ़ने लगा है। सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़ी संख्या में शिक्षक भी इस बीमारी की ज़द में है। इस साल बनारस जिले के 1134 परिषदीय स्कूलों में करीब ढाई लाख बच्चों ने दाखिला लिया है। इनके अलावा 1100 मान्यता प्राप्त स्कूलों में बच्चों की तादाद एक लाख के आसपास है। तमाम स्कूली बच्चे ब्रेक-बोन फीवर की चपेट में हैं, जिसके चलते परिषदीय और निजी स्कूलों में बच्चों की संख्या साठ फीसदी तक घट गई है। बदलते मौसम में खासतौर पर बच्चों को संभलकर रहने की ज़रूरत है, क्योंकि इनका इम्युन सिस्टम कमज़ोर होता है।

अस्पतालों में मरीज़ों की बाढ़

बनारस से प्रकाशित होने वाले अखबार Inext की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बनारस में ब्रेक-बोन फीवर के हज़ारों मरीज़ हैं। जिले के सरकारी अस्पतालों में रोज़ाना दस हज़ार से ज़्यादा मरीज़ इलाज कराने पहुंच रहे हैं। यहां एक महीने में एक लाख लाख से ज़्यादा लोगों में यह समस्या पाई गई है। अगर प्राइवेट हॉस्पिटल के आंकड़ों को शामिल कर लिया जाए तो यह तादाद और भी ज़्यादा हो सकती है। डेंगू की बात करें तो तीन सौ से अधिक और इतने संदिग्ध मामले आ चुके हैं। बुखार के मरीज़ों की तादाद लाखों में है। आरोप है कि इस बीमारी को रोक पाने में हेल्थ महकमा नाकाम साबित हो रहा है। शहर में न तो मच्छर कम हो रहे हैं और न ही बुखार के मरीज़। बीएचयू स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल में पूर्वांचल और बिहार के बुखार से तप रहे मरीज़ों का तांता लगा हुआ है।

हेल्थ महकमे के नोडल ऑफिसर डॉ. एसएस कन्नौजिया के हवाले से Inext  लिखता है, "बुखार के मरीज़ों में कई तरह के लक्षण उजागर हो रहे हैं। ऐसे लोगों तादाद भी बहुत ज़्यादा है जिनके गले में इंफेक्शन है, जिससे छाले पड़ गए हैं। ज़्यादातर मरीज़ों को जोड़ों में दर्द, बुखार के साथ लो-बीपी, लिवर में इंफेक्शन, ब्लैक स्पॉट, बॉडी पर लाल चकत्ते और गैस की समस्या है। तेज़ बुखार के साथ ही मरीज़ों की प्लेटनेट्स गिरती चली जा रहा है। कुछ मरीज़ों के शरीर में सूजन की समस्या है। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और पुरूष सभी इस खौफनाक बीमारी से घिरते जा रहे हैं। डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया की जांच के बाद भी रिपोर्ट निगेटिव ही आ रही है। अभी तक ऐसा कोई बुखार नहीं आया था, जिसमें जोड़ों का दर्द होने के साथ पूरा शरीर ही कमज़ोर पड़ जाए।"

इसे मिस्ट्री फीवर न कहें: सीएमओ

बनारस के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संदीप चौधरी मीडिया से कहते हैं, "यह लगभग स्पष्ट है कि बनारस में फैले बुखार का कारण डेंगू, चिकनगुनिया और वायरल बुखार है। यहां स्क्रब टाइफस और लेप्टोस्पायरोसिस के रोगी भी मिले हैं। इसे रहस्यमय बुखार (मिस्ट्री फीवर) नहीं कहा जाना चाहिए। यह महज एक वायरल फीवर है जिसे रोकने के लिए हम सार्थक मुहिम चला रहे हैं। संवेदनशील इलाकों में संचारी व मच्छरजनित रोगों की रोकथाम के लिए हेल्थ महकमे के अलावा नगर निगम, पंचायती राज आदि महकमों के लोग इसके प्रसार को रोकने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इसी प्रयास का नतीजा है कि हमने इस बीमारी पर काफी हद तक काबू पा लिया है।"

सीएमओ डॉ. चौधरी कहते हैं, "डेंगू, ब्रेक-बोन फीवर से पीड़ित रोगियों की निगरानी के लिए कोविड कमांड सेंटर (आईसीसीसी) सक्रिय है। हेल्प लाइन नंबर- 0542-2720005 जारी किया गया है। जिले के आठ ब्लाकों के हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर पर 222 सामुदायिक हेल्थ आफिसर (सीएचओ) तैनात किए गए हैं। बुखार के मरीज़ों की शिनाख्त करने के लिए सर्वे चल रहा है। डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं ताकि मौजूदा स्थिति से ठीक से निपटा जा सके। हम मीडिया के जरिये बनारस के लोगों तक यह बात पहुंचा रहे हैं कि तेज़ बुखार होने पर घबराने की ज़रूरत नहीं है। मियाद पूरी होने के साथ ही वायरल बुखार स्वतः खत्म हो जाता है।"

बनारस के जिला मलेरिया अधिकारी शरतचंद्र पांडेय कहते हैं, "जनपद में अब तक डेंगू के करीब 300 मरीज़ मिल चुके हैं। हर सौ सैंपल में छह लोगों की रिपोर्ट पॉज़िटिव आ रही है। पिछले साल डेंगू के 562 मरीज़ मिले थे, जिसके मुकाबले अबकी इस बीमारी का दायरा कम है। अलबत्ता अबकी चिकनगुनिया के मरीज़ ज़्यादा बढ़े हैं। अब तक 71 मरीज़ों में इस बीमारी की पुष्टि हुई है।"

बीएचूय के मेडिसिन विभाग के प्रो. धीरज किशोर कहते हैं, "पहले डेंगू-चिकनगुनिया के गिने-चुने मरीज़ मिला करते थे, लेकिन इस बार इनकी तादाद कुछ ज़्यादा है। बीमारी से ग्रस्त होने पर मरीज़ को शरीर में दर्द के साथ लाल चकत्ते पड़ना, चक्कर आना, बीपी कम होने जैसी शिकायतें आम है। बुखार उतरने के बाद भी तीन से चार सप्ताह तक जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द हो रहा है। जोड़ों में ज़्यादा दर्द होने पर गर्म पानी से सिकाई करने पर आराम मिल सकता है।"

दूसरी ओर, जिला प्रशासन, नगर निगम और हेल्थ महकमे पर सवाल खड़ा करते हुए विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत राजेंद्र तिवारी कहते हैं, "फॉगिंग हो रही है या नहीं, यह बताने वाला कोई नहीं है। बनारस में पहले 90 वार्ड थे और अब 100 वार्ड हैं। दायरा तो बढ़ता जा रहा है, लेकिन संसाधन सीमित हैं। सिर्फ दो-चार फॉगिंग मशीनों के सहारे करीब 34 लाख की आबादी को इस संकट से उबारने का दावा करना जनता की ज़िंदगी से खिलवाड़ माना जा सकता है। सरकारी अस्पतालों के लैब में भीड़ इतनी ज़्यादा है कि जांच रिपोर्ट लेने के लिए लोगों को कई-कई दिन लग जा रहे हैं। डेंगू और चिकनगुनिया की जांच के लिए शुल्क तय नहीं होने के कारण प्राइवेट लैब फायदा उठा रहे हैं। बेबस मरीज़ और उनके परिजन स्वास्थ्य महकमे की लापरवाही के शिकार हो रहे हैं।"

"बुखार, एलर्जी, मल्टी विटामिन के अलावा एंटीबायोटिक दवाओं की डिमांड बढ़ गई है। बनारस में रोज़ाना ढाई से तीन करोड़ से अधिक की दवाएं इन्हीं बीमारियों में खप रहा हैं। बड़ा सवाल यह है कि सरकार ने मच्छरों के प्रजनन को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं? डेंगू सिर्फ बच्चों और बूढ़ों को ही नहीं बल्कि बड़ों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। क्या स्क्रब टाइफस और लेप्टोस्पायरोसिस से भी लोगों की मौत हुई है और इन बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार की ओर से क्या इंतज़ाम किए गए हैं?"

आधे मरीज़ चिकनगुनिया केः प्रो.गोपालनाथ

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वायरल रिसर्च एंड डायगोनेस्टिक लेबोरेटरी में हर रोज़ 125 से 150 के बीच सैंपल जांच के लिए पहुंच रहे हैं, जिनमें आधे में चिकनगुनिया के वायरस पाए जा रहे हैं। कुछ सैंपल डेंगू और कुछ लेप्टोस्पायरोसिस व स्क्रब टाइफस के निकल रहे हैं। माइक्रोलाजी विभाग के अधीन चलने वाली यह लैब यूपी की सबसे बड़ी लेबोरेटरी है। इस तरह की दूसरी लैब सिर्फ लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में है।

बीएचयू के वायरल रिसर्च एंड डायगोनेस्टिक लेबोरेटरी के प्रोफेसर इंचार्ज गोपालनाथ न्यूज़क्लिक से कहते हैं, "बनारस शहर की करीब एक तिहाई आबादी ब्रेक-बोन फीवर (हड्डी तोड़ बुखार) के शिकंजे में है। यहां हर घर में मरीज़ हैं, जिनमें महिलाएं और बच्चे ज़्यादा हैं। चिकनगुनिया और डेंगू का कहर बनारस शहर में ज़्यादा है और गांवों में कम है। बनारस में कुछ साल पहले तक चिकनगुनिया के इक्का-दुक्का मरीज़ निकलते थे, लेकिन अब इस बीमारी की ज़द में आने वाले मरीज़ों की भरमार हो गई है।"

प्रो. गोपालनाथ यह भी कहते हैं, "चिकनगुनिया का चिकन अथवा मुर्गी से कोई ताल्लुक नहीं है। साल 1952 में अफ्रीका में पहली बार इस बीमारी का पता चला था। चिकनगुनिया का मतलब होता है :अकड़े हुए आदमी की बीमारी। एक ख़ास प्रजाति का एडीज एजेप्टी मच्छर चिकनगुनिया फैलाता है। एडीज एजिप्टी में कई बार डेंगू और चिकनगुनिया दोनों के वायरस पाए जाते हैं। अभी तक यह रहस्य उजागर नहीं हो सका है कि एडीज एजिप्टी के काटे किसी व्यक्ति को डेंगू तो किसी दूसरे व्यक्ति को चिकनगुनिया रोग क्यों होता है? ये मच्छर की मर्जी है या व्यक्ति का दुर्भाग्य? एडीज एजिप्टी बहुत खतरनाक मच्छर है जो ज़ीका जैसी खतरनाक बीमारी भी फैलाता है।"

"चिकनगुनिया मादा एडीज मच्छर के शरीर में होता है। ये मच्छर जैसे ही किसी व्यक्ति को काटता है, इसके वायरस तत्काल उसकी बॉडी में घुसकर हमला शुरू कर देते हैं। इस वायरस के लक्षण अमूमन डेंगू जैसे ही होते हैं। खास बात यह है कि इस बीमारी का न कारगर इलाज है, न कोई दवा है, और न ही कोई टीका विकसित किया जा सका है। इसे फीवर को हड्डी तोड़ बुखार के नाम से भी जाना जाता है। जिन लोगों को चिकनगुनिया होता है उनमें से ज़्यादातर तो पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं। कुछ लोगों को ज्वाइंट पेन महीनों या सालों तक रह सकता है। ऐसा लगता है जैसे हड्डी टूट रही हैं। इस बीमारी में मरीज़ को आंख और हृदय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।"

प्रो. गोपालनाथ कहते हैं, "डेंगू और चिकनगुनिया, दोनों बीमारियों के ज़द में लोग तभी आते हैं जब मच्छर काटते हैं। इन बीमारियों को फैलाने वाले मच्छर आमतौर पर दिन में काटते हैं। इसका संक्रमण एक इंसान से दूसरे इंसान में नहीं होता है। चिकनगुनिया वाले मच्छर को बहुत ग़ौर से देखें तो उसके शरीर पर सफ़ेद धारियां होती हैं। चिकनगुनिया होने पर बहुत तेज़ी से बुखार चढ़ता है और कई बार 105 डिग्री फारेनहाइट तक पहुंच जाता है। शरीर के हर जॉइंट में पेन, मसल्स पेन, सिरदर्द, उल्टी, थकान और बॉडी पर लाल रैशेज़ उभर सकते हैं।"

"बोन ब्रोकिंग फीवर को नियंत्रित करने का सीधा सा उपाय यह है कि बुखार को बढ़ने नहीं दिया जाए। सिर्फ बुखार की दवाएं दी जाएं और मरीज़ को पानी में नींबू और नमक का घोल पीने की सलाह दी जाए। दर्द कम होने में ज़्यादा समय लगता है। इस बीमारी में एंटीबायोटिक और दर्द के लिए स्ट्राय़ड नहीं दिया जाना चाहिए। ये दवाएं जानलेवा साबित हो सकती हैं। इस बीमारी से बचाव ही इसका इलाज है। अपने आसपास जलभराव न होने दें। पूरी बांह की शर्ट पहनें। रात में पूरे शरीर को ढंक कर सोएं।"

"कोरोना से नहीं सीखा सबक"

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा है, "बनारस समेत राज्य के कई शहरों में हड्डीतोड़ बुखार के बढ़ते प्रकोप ने यूपी की एक बड़ी आबादी की चिंता बढ़ा दी है। बनारस में हालात बेकाबू हो गए हैं। ब्रेक-बोन फीवर के मामले में बीजेपी सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। बीजेपी सरकार ने कोरोना महामारी के भयावह दौर के नतीजों से आखिर सबक क्यों नहीं सीखा? डेंगू और चिकनगुनिया से मर रहे लोगों का ज़िम्मेदार कौन है?"

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल यूपी में 13 हज़ार से ज़्यादा मरीज़ डेंगू और चिकनगुनिया की चपेट में आए हैं, जिनमें दो दर्जन से ज़्यादा लोगों के मरने की पुष्टि हुई है। इसमें अगर निजी अस्पतालों की संख्या जोड़ दी जाए तो ये आंकड़े और बढ़ जाएंगे। सूबे में मच्छरजनित बीमारियों के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस साल डेंगू से सबसे ज़्यादा 15 लोगों की मौत हरदोई में हुई है। डेंगू और चिकनगुनिया के सर्वाधिक मरीज़ बनारस के अलावा लखनऊ, मुरादाबाद, मेरठ, कानपुर, अमरोहा और नोएडा में मिले हैं। यूपी के स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक ने सभी सरकारी अस्पतालों में बेड की संख्या बढ़ाने और निजी अस्पतालों को डेंगू मरीज़ों के लिए अलग वार्ड बनाने के निर्देश दिए हैं।

(लेखक बनारस स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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