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रहने को घर नहीं हिंदोस्तां हमारा!

सपना है, ज़रूरत है, ज़रूरतमंद हैं, योजना है, सरकार है, विज्ञापन है, दलाल हैं, प्रोपर्टी डीलिंग और रियल इस्टेट का पूरा कारोबार है। लेकिन घर नहीं है।
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : DocumentaryMaker

हम जिस देश में रहते हैं जरूरी नहीं है कि वहां हमारा घर भी हो। भारत में ऐसे लाखों लोग हैं जो किराये पर, झोपड़पट्टी में, सड़कों पर, नालों के किनारे, पुल के नीचे, तिरपाल के नीचे और खुले आसमान के नीचे भी रहते हैं। यानी हम ऐसे देश में रहते हैं जिस देश में हमारा घर नहीं है।

हां, घर का सपना अभी भी है। युवा लोग अभी भी लव स्टोरी फिल्म के गीत, "फूलों के शहर में हो घर अपना" वाला सपना देखते हैं। घर की आस में अधेड़ हो चुके गृहस्थ ज्यादा रियलिस्टिक होकर, घर के बारे में नहीं बल्कि 50 या 100 गज के प्लाट के बारे में सोचते हैं। दो दिवाने शहर में आशियाना ढूंढते हुए अपने आस-पास ही देखे जा सकते हैं। जरूरी नहीं है कि ये दो दिवाने कपल ही हों। अच्छी बात ये है कि सपने अभी भी हैं। लेकिन यथार्थ ज्यादा कठोर हो गया है।

ये सपने कभी होम लोन के विज्ञापनों के साथ तो कभी आवास योजना के फार्मों के साथ उलझते हैं। मुक्तिबोध के हवाले से "अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया" वाली मिडिल क्लास 2बीएचके और 3बीएचके के सपने देखती है। वो लोग भी इसी देश के नागरिक हैं जिनके सिर पर न छत है और न ही घर का सपना बचा है। फुटपाथ ही उनका राष्ट्र है। घर बेशक न हो लेकिन राष्ट्र है।

सपना है, ज़रूरत है, ज़रूरतमंद हैं, योजना है, सरकार है, विज्ञापन है, दलाल हैं, प्रोपर्टी डीलिंग और रियल इस्टेट का पूरा कारोबार है। लेकिन घर नहीं है। यूं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र भी हैं और 2019 का चुनाव भी है लेकिन घर नहीं है। घोषणा-पत्र भी है, रैली भी है, भाषण भी है। लेकिन घर नहीं है। घर चुनाव का कोई मुद्दा भी नहीं है।

घोषणा हो चुकी है बल्कि कहना चाहिये कि आकाशवाणी हुई है कि पिछले 4 साल में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 1 करोड़ से ज्यादा घर बनाये गये हैं। प्रधानमंत्री ने खुद भी ट्वीट करके ये जानकारी दी है। जो जानकारी देनी है वो दे दी गई है। बहुत सी नहीं दी गई है। मसलन ये नहीं बताया गया कि कितने घर अधूरे पड़े हैं, कितने सिर्फ़ कागजों में बने हैं, ऐसे घर कितने हैं जो योजना के अंतर्गत स्वीकृत हुए लेकिन किस्त नहीं आई लोगों ने कर्ज लेकर घर बनाये।

जो जानकारी देनी है वो दे दी है बहुत सी जानकारी नहीं दी गई है। मसलन ये नहीं बताया है कि कितने घर तोड़े गये हैं, कितनी झोपड़-पट्टियों पर बुलडोज़र चला है। खुले आसमान के नीचे होने की वजह से शीतलहर और लू की चपेट में आकर कितने लोग मरे हैं।

ह्यूमन राइट ला नेटवर्क की एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले वर्ष 2017 में 53 हजार 700 घर तोड़े गये हैं, यानी 147 घर हर रोज तोड़े गये हैं। आंकड़ा बताता है कि हर घंटे लगभग 30 लोगों को जबरन अपने घर से बेदखल किया गया है। जिसकी वजह से लगभग 2 लाग 60 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। तथाकथित विकास प्रोजक्टों के चलते लगभग 6 लाख लोगों पर बेदखली की तलवार लटक रही है। नेटवर्क ने रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि आने वाले समय में ये आंकड़ा और भी बढेगा।

तो सिर्फ घोषणाएं है, जिन पर कोई सवाल नहीं है। घोषणाएं अपने आप में ब्रह्मवाक्य है जिसकी सत्यता की जांच नहीं है। हां यूं तो आरटीआई भी है, देश में लोकतंत्र भी है लेकिन घर नहीं है। आपके पास घर है या नहीं है, जिनके पास है उनके सुरक्षित है या नहीं है। ये सवाल नहीं है क्योंकि बताया जा रहा है कि वो राष्ट्र सुरक्षित हाथों में है जिसमें आपका घर नहीं है।

लोगों के पास घर नहीं है पर चौकीदार है। चौकीदार सचमुच है कि नहीं है, इस पर कोई सवाल नहीं है। 2019 में चुनाव हो रहे हैं ये बात भी बिल्कुल सही है, लेकिन 2024 में भी होंगे इसकी कोई गारंटी नहीं!

तो जब आप सपनों में डूबकर ये गाना गा रहे हों कि "झिलमिल सितारों का आंगन होगा, रिमझिम बरसता सावन होगा" उस दौरान ये भी सोचें कि ये किस पंचवर्षीय योजना में होगा। क्योंकि पंचवर्षीय योजना की रूपरेखा आनंद बख्शी नहीं लिखते।

मुझे पता है कि आपकी दुविधा बड़ी है। घर के सपने और देशभक्ति में कई बार कशमकश चलती होगी। तो आपके लिये एक मशविरा है, जिससे आपके घर के सपने के साथ देशभक्ति भी बरकरार रहेगी। आपको बस इतना करना है, अगली बार जब भारत माता का जयकारा लगाएं तो ये नारा भी साथ में लगाएं कि रहने को घर नहीं हिंदोस्तां हमारा।

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