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चांदी का वरक़: ऑनलाइन प्रोडक्ट की चमक ने फीका किया पारंपरिक कारोबार

लखनऊ और वाराणसी की जिन तंग गलियों में कभी चांदी का वरक कूटने की ठक-ठक हुआ करती थी, वहां अब ख़ामोशी है। वरक़ कूटने का कारोबार लगभग ख़त्म हो गया है। शुद्ध चांदी के वरक़ को बनाने के लिए लगातार तीन घंटे तक लोहे के हथौड़े से कूटा जाता था। मगर अब न ये काम है और न ही इसे करने वाले कारीगर।
silver sheet

लज़ीज़ पकवान सदा से ज़ायके के साथ सजावट के भी मोहताज रहे हैं। नवाबी दौर से जारी ये सिलसिला जो कभी चांदी के वरक़ तक सीमित था, आज अपने बदले रूप और बाजार के फैलाव की बदौलत गोल्ड और सिल्वर डस्ट का रूप ले चुका है। इन सजावटों से झिलमिलाते पकवान, मिठाईयां, पान की गिलौरी और केक पेस्ट्री के बावजूद इसका पारंपरिक कारीगर गर्त में गिरता गया और अपने हुनर और कारोबार से बेदखल हो गया। 

लखनऊ और वाराणसी की जिन तंग गलियों में कभी चांदी का वरक कूटने की ठक-ठक हुआ करती थी वहां अब ख़ामोशी है। वरक़ कूटने का कारोबार लगभग ख़त्म हो गया है। शुद्ध चांदी के वरक़ को बनाने के लिए लगातार तीन घंटे तक लोहे के हथौड़े से कूटा जाता था। मगर अब न ये काम है और न ही इसे करने वाले कारीगर।

पुराने लखनऊ के चौक इलाके में आज से दो दशक पहले तक हाथ से चांदी का वरक़ बनाने वाले तकरीबन 400 कारीगर थे। उस वक़्त इस गली में वरक़ कूटने के शोर के चलते कोई दूसरी आवाज़ सुन पाना मुश्किल होता था। मगर अब बहुत तलाश के बाद पता चला है कि इसके दो कारीगर इलाके में बचे हैं। बातचीत के दौरान कारीगर जावेद ने बताया कि उनके पास कोई दुकान या मशीने नहीं है। केवल यही दो लोग गली के एक कमरे में वरक़ कूटने का काम कर रहे हैं।

कारीगर जावेद का कहना है कि हाथ से चांदी का वरक़ बनाने का काम अब बिलकुल ख़त्म हो चुका है। ज़्यादातर लोग इस काम को कई बरस पहले ही छोड़ चुके हैं। इनमे कोई किराये का बैटरी रिक्शा चला रहा है, तो किसी ने पेट पालने के लिए दूसरा रोज़गार तलाश लिया है। कोविड महामारी का भी इस काम पर बुरा असर पड़ा और इस वक़्त हालात ये हैं कि इतनी भी आमदनी नहीं हो पा रही है कि घर का खर्चा निकाला जा सके। यहाँ तक कि बिजली का बिल भरना भी इनके लिए मुमकिन नहीं और ऐसे में कितने दिन ये लोग इस हुनर से जुड़े रह सकते हैं इसका भी कोई भरोसा नहीं।

कई बरस पहले भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने दावा किया था कि वरक शाकाहारी नहीं है। इसकी पुष्टि के लिए मेनका गांधी एक लेख के माध्यम से ग्राफिक डिटेल भी देती हैं। लेख के मुताबिक़ भारत में बड़े पैमाने पर मुस्लिम समुदाय इस काम से जुड़ा है। वरक को बनाने के लिए मवेशियों की आंत से बनी शीट में रखकर इसे कूटते हुए फैलाया जाता है। मेनका गांधी का बयान ये जानकारी भी देता है कि वरक इंडस्ट्री बहुत बड़ी है। भारत में पान, च्यवनप्राश, तंबाकू, आयुर्वेदिक दवाओं, मिठाई और मंदिरों में 300 टन से ज़्यादा चांदी के वरक का इस्तेमाल किया जाता है। जर्मनी में फ़ूड प्रोडक्ट में इसका प्रयोग किया जाता है। इसे Food Number E 175 दिया गया है। जापान में ये फ्रूट, सलाद, आइसक्रीम से लेकर चाय, कॉफी, शराब और कॉकटेल तथा मंदिर की सामग्री तक में प्रयोग होता है।

2016 में छपे मेनका गांधी के इस लेख के बाद इस मामले में सरकार ने दखल दिया। परिणाम स्वरुप हाथ से बनने वाले चांदी के वरक़ पर प्रतिबंध लग गया और फ़ूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड के तहत चांदी के वरक के लिए गाइड लाइन बनाई गई। इस गाइडलाइन के मुताबिक़ चांदी की चादर के हर स्क्वायर मीटर का वजन 2.8 ग्राम और चांदी की शुद्धता 999/1000 होनी चाहिए। ये कारीगर अपनी सफाई देने में पिछड़ गए। इस बीच मिठाई की दुकानों पर लगे साइनबोर्ड वरक की तारीफ में उन्हें 'गंदे मानव हाथों से अछूता' बता रहे थे। नतीजा ये हुआ कि उपभोक्ता मशीन से बने शाकाहारी वरक की मांग करने लगे।

सरकार द्वारा फ़ूड सेफ्टी एंड रेगुलेशन 2011 के अनुसार प्रतिबन्ध तो हटा, लेकिन गरीब कारीगर इन कड़े दिशानिर्देश के साथ काम करने लायक नहीं रहे। इस गाइडलाइन की बदौलत धीरे-धीरे ये कारोबार पूंजीपतियों के हाथों में आ गया। 

यहां पर जयपुर के हीरा व्यापारी सुरेंद्र कर्णवत का ज़िक्र ज़रूरी है। सुरेंद्र कर्णवत ने कई साल की मेहनत के बाद एक वरक़ बनाने के एक ऐसे प्रोजेक्ट का दावा किया जिसमें तक़रीबन 2 लाख लोगों को रोज़गार मिल सके। सुरेंद्र कर्णवत एक ऐसी योजना पर काम कर रहे थे जिस पर उन्होंने 15 साल मेहनत की थी। कर्णवत ने इसके लिए एक चीनी मशीन के प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया था। अपनी दलील में उन्होंने ये भी कहा था कि भारत चांदी के वरक के लिए दुनिया का निर्यात केंद्र बन जाएगा। मगर उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इस समय सुरेंद्र कर्णवत अपने ट्विटर हैंडल पर चौकीदार सुरेंद्र कर्णवत हैं। इस बीच तकरीबन 1.5 लाख वरक निर्माताओं को अपने रोज़गार से हाथ धोना पड़ा।

सोने और चांदी के वरक को बायोलॉजिकली बेजान माना जाता है, जिन्हें आंत सोख नहीं पाती और ये डाइजेशन सिस्टम से निकल जाते हैं। इस समय सोने और चांदी के ये वरक़ ऑनलाइन मुहैया हैं। सोने के वरक़ की कीमत 10,000 रुपये में 25 परत और चांदी के इतने ही वरक़ तकरीबन 500 रुपये में बिकते हैं। इसके साथ ही पकवानों और केक पेस्ट्री को सजाने के लिए गोल्ड और सिल्वर डस्ट भी खूब चलन में है।

इस रुपहली और सुनहरी सजावट का आधुनिक इतिहास बताता है कि साल 1921 में स्विस चॉकलेट बनाने वालों ने तीन कोनों वाली चॉकलेट को लपेटने के लिए एल्यूमीनियम फॉयल का उपयोग शुरू किया। इसका उद्देश्य खाने को देर तक सुरक्षित रखना था। पिछली सदी की शुरुआत में पूरे यूरोप और पश्चिमी दुनिया में एल्युमिनियम फॉयल ने टिन फॉयल की जगह ले ली थी। एल्युमिनियम फॉयल भोजन और दवा की की प्रकाश, ऑक्सीजन, नमी और बैक्टीरिया से सुरक्षा में काम आई। इस तरह पैकिंग में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका के कारण प्रयोग और उत्पादन बढ़ गया। जल्दी ही पेय पदार्थ, मिठाई, निजी देखभाल और सेहत से जुड़े सामान ने इसे और अन्य औद्योगिक उपयोग में शामिल कर दिया।

इस कारोबार पर अब ऑनलाइन मार्केट का वर्चस्व है। इससे सहूलियत से खाने की मेज़ की सजावट हर दिन और भी गुलज़ार होती जा रही है। लागत से लापरवाह उपभोक्ता इस कीमती वरक और डस्ट की भारी कीमत अदा कर रहा है। इसके बावजूद इस पेशे से जुड़े कारीगर बदहाल हैं और किसी न किसी और पेशे के सहारे अपनी ज़िंदगी बसर करने को मजबूर भी। उत्तर प्रदेश के जौनपुर, वाराणसी, लखनऊ, प्रयागराज, मुरादाबाद, संभल और मेरठ शहरों में चांदी के वरक़ के पारंपरिक कारीगर थे। मगर आज ये कारोबार लगभग पूरी तरह से बंद हो चुका है।

(लेखिका लखनऊ स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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