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विश्लेषण: पांचवीं अर्थव्यवस्था का सच

बड़ी अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है लोगों की प्रति व्यक्ति आय में सुधार होना और उसमें भी एकसमान सुधार होना।
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कबीर दास जी का एक दोहा है— बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।। यह दोहा हमारी अर्थव्यवस्था पर बहुत सटीक बैठता है। इस दोहे का अर्थ यह है कि कभी भी उस खजूर के पेड़ की तरह न बनें जो भले ही बड़ा हो लेकिन वह राहगीरों को छाया प्रदान नहीं कर सकता और भले ही उस पर फल लग जाएं लेकिन उसे कोई पा नहीं सकता क्योंकि वो बहुत ऊंचा है। इस दोहे के जरिए कबीर दास जी ने यह उपदेश देने की कोशिश की है कि जब आप बड़े आदमी बन जाएं तो दूसरे की मदद करने की कोशिश करिए अन्यथा आपके बड़ा बनने का कोई लाभ नहीं।

अभी हाल ही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को पछाड़कर पांचवा स्थान हासिल किया है। हमारे सत्ताधारी दल के नेता और खासकर प्रधानमंत्री इस पर इतराते नहीं थक रहे। पिछले दिनों अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देते हुए भी उन्होंने इसकी वाहवाही लूटी। हां, इस बार 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का दंभ नहीं भरा। क्योंकि उनके दावों के बावजूद अर्थव्यवस्था अभी भी 3-4 ट्रिलियन डॉलर के आस पास ही घूम रही है। पहले वे दावा करते रहे हैं कि 2023 तक भारतीय अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन तक पहुंच जाएगी।

अभी विश्व में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका की है। उसका आकार करीब 27 ट्रिलियन डॉलर है। दूसरे नंबर पर चीन है जिसकी अर्थव्यवस्था 19.3 ट्रिलियन डॉलर की है। तीसरे और चौथे नंबर पर जापान की अर्थव्यवस्था 4.4 ट्रिलियन डॉलर और जर्मनी की 4.3 ट्रिलियन ड़ॉलर की है। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार क्या है यह बताना जरा मुश्किल है। क्योंकि अभी पीछे बताया जा रहा था कि जो अर्थव्यवस्था 3 ट्रिलियन डॉलर को पार कर गई थी वह कोरोना काल में फिर 3 ट्रिलियन डॉलर के नीचे चली गई। लेकिन दो महीने पहले 12 जून को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक ट्वीट के जरिए जानकारी दी कि 2023 में भारत की जीडीपी 3.75 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई है। ट्वीट में यह भी कहा गया है कि 2014 में भारत की जीडीपी करीब दो ट्रिलियन डॉलर की थी। निर्मला सीतारमण के ऑफिस के इस ट्वीट में लिखा था कि भारत अब ग्लोबल इकोनॉमी में एक ब्राइट स्पॉट के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया। बहरहाल भारत जब पांचवीं अर्थव्यवस्था बना तब यही कहा गया था कि उसने ब्रिटेन की 3200 अरब डॉलर यानी 3.2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को पछाड़कर 3500 अरब डॉलर यानी 3.5 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गया है।

बड़ी अर्थव्यवस्था से ज़्यादा ज़रूरी प्रति व्यक्ति आय बढ़ना

निश्चित रूप से ये हमारे लिए गर्व की बात है। जो व्यस्था एक दशक पहले 11वें नंबर पर थी अब वो पांचवें नंबर पर पहुंच गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह रहे हैं कि हम जल्दी ही विश्व में तीसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। यह भी सच है। इसमें किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए। जिस तरह से हम 11 वें से पांचवें नंबर पर पहुंचे हैं उसी तरह से पांचवें से तीसरे क्या पहले पायदान पर भी पहुंच सकते हैं। आखिर हमारी आबादी दुनिया में सबसे अधिक हो गई है। ऐसे में अर्थव्यवस्था का पहले पायदान पर पहुंचना कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। असली बात ये है कि हमारी अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के साथ हमारे अपने लोगों की आमदनी उसी अनुपात में बढ़ रही है कि नहीं। आखिर जब लोगों की आमदनी बढ़ेगी तभी उनकी खर्च करने की क्षमता बढ़ेगी और तभी उनका जीवन खुशहाल होगा। नहीं तो अर्थव्यवस्था तो बढ़ती जाएगी लेकिन उस अनुपात में लोगों की आमदनी नहीं बढ़ेगी। अभी क्या हो रहा है जिस ब्रिटेन को पछाड़कर हमने पांचवां स्थान हासिल किया है वहां के लोगों के जीवन स्तर और हमारे जीवन स्तर में जमीन आसमान का अंतर है। वहां के लोगों की प्रति व्यक्ति आय हमारे यहां के लोगों से 18 गुना ज्यादा है। तो अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने से कुछ नहीं होता। असली बात है प्रति व्यक्ति आय का बढ़ना।

प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत की स्थिति बहुत खराब है। प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह अंगोला जैसे गरीब देशों से भी पिछड़ा हुआ है। अमेरिका, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन की तो बात ही छोड़िए हम दुनिया के 197 देशों में से 142 वें नंबर पर हैं। हमारी प्रति व्यक्ति आय 2601 डॉलर है। सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय 80,035 डॉलर प्रति व्यक्ति है। यानी अमेरिका की प्रति व्यक्ति औसत आय हमारे मुकाबले 31 गुना अधिक है। इसी तरह जर्मनी और कनाडा की प्रति व्यक्ति आय हमारी तुलना में 20 गुना ज्यादा है। जापान और इटली की औसतन प्रति व्यक्ति आय भारत से 14 गुना ज्यादा है। हम हर मामले में आबादी का रोना लगते हैं। कहने लगते हैं कि उन देशों में आबादी कम है इसलिए वहां समृद्धि ज्यादा है और प्रति व्यक्ति आय भी अधिक है।  लेकिन ये हकीकत नहीं है। चीन की आबादी पिछले सालों में हमसे ज्यादा ही रही है। लेकिन वहां के लोगों की औसत आय भी हमसे पांच गुना ज्यादा है। ब्राजील की प्रति व्यक्ति औसत आमदनी भी हमसे चार गुना ज्यादा है। बड़े देशों की तो बात छोड़िये जिन देशों का हम नाम तक नहीं जानते उनकी भी प्रति व्यक्ति आय हमसे ज्यादा है। वनातु और साओ टोम प्रिंसिपे जैसे छोटे देशों की प्रति व्यक्ति आय भी हमसे ज्यादा है। वनातु की प्रति व्यक्ति आय 3128 डॉलर और साओ टोम प्रिंसिपे की 2696 डॉलर है। हमने ऊपर अंगोला का जिक्र किया है। उसकी प्रति व्यक्ति औसत आय 3205 डॉलर है। और तो और आइवरी कोस्ट जैसे देश की आय भी 2646 डॉलर है जो कि हमारे 2601 डॉलर से ज्यादा है।

और यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि प्रति व्यक्ति आय में एक बड़ा विरोधाभास यह भी है कि जिस फार्मूले से प्रति व्यक्ति आय निकाली जाती है यानी देश की कुल अर्जित आय को देश की कुल आबादी से विभाजित कर औसत आय या प्रति व्यक्ति आय निकाली जाती है, उसमें अंबानी की आय भी शामिल है, और अडानी की भी। उसमें एक लाख कमाने वाला भी है और दस हज़ार वाला भी। इसलिए यह मानना कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ने से देश की पूरी आबादी की आय बढ़ रही है या उसका जीवन सुधर रहा है, यह भी एक भ्रम ही है।

बड़ी अर्थव्यवस्था के बावजूद हर क्षेत्र में पिछड़े

इसके अलावा अर्थव्यवस्था के मामले में हम जरूर पांचवें स्थान पर हैं लेकिन बाकी मामलों में हम गरीब देशों की कतार में खड़े हैं। खुशहाली के मामले में हम 142वें स्थान पर हैं। 2023 की वर्ल्ड हैपीनेस रिपोर्ट में फिनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल देश है। इसके बाद आइसलैंड, डेनमार्क, इजराइल और नीदरलैंड हैं। इसके बाद स्वीडन, नार्वे, स्विटजरलैंड, लक्जमबर्ग और न्यूजीलैंड हैं। इस सूची में भारत 125 वें नंबर पर है। इन खुशहाल देशों में दस बड़ी अर्थव्यवस्था वाले कोई भी देश नहीं हैं। तो अर्थव्यवस्था बड़ी होने से खुशहाली नहीं आती खुशहाली आती है प्रति व्यक्ति आय बढ़ने और सरकारों के सुशासन और अपने लोगों को सुविधाएं प्रदान करने से।

खुशहाली इंडेक्स के साथ ही बाकी मामलों में भी भारत की हालत खराब ही है। मानव विकास सूचकांक में यह आम तौर पर 130वें के बाद ही होता है। ग्लोबल जेंडर गैप में 144 देशों की सूची में यह 108 वें नंबर पर है। अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी अक्सर इस बात का श्रेय लेते रहते हैं कि उन्होंने भारत में व्यापार करना सुगम बना दिया है, जिसकी वजह से विदेशी निवेश खूब आ रहा है। लेकिन व्यापार करने में आसानी वाले सूचकांक में भी 190 देशों की सूची में भारत 77 वें स्थान पर है। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में 130 देशों में यह 57वें नंबर पर है। फ्रीडम ऑफ प्रेस में 180 देशों में 161वें नंबर पर और ई सरकार में 192 देशों में से 96वें नंबर पर। यह नंबर थोड़ा आगे पीछे हो सकता है कि क्योंकि इंडेक्स हर साल बदलते रहते हैं। लेकिन कुल मिलाकर भारत की स्थिति हर मामले में दयनीय ही है।

अमीर और अमीर हो रहे, ग़रीब और ग़रीब

इसकी एक बड़ी वजह पूरी दुनिया में हो रहा असमान विकास है। अमीरों की आमदनी ज्यादा तेजी से बढ़ रही जबकि गरीबों की आमदनी कई बार तो और कम हो जा रही। पिछले साल फोर्ब्स ने एक सूची जारी की थी। जिसके अनुसार दुनिया में करीब 2755 अरबपति हैं। उनमें से अधिकांश प्रौद्योगिकी फर्मों के संस्थापक हैं। इनके पैसे शेयरों में लगे हैं इसलिए शेयरों के उतार-चढ़ाव के साथ इनकी संपत्ति भी घटती बढ़ती रहती है। लेकिन अरबपति तो ये रहते ही हैं। सबसे अमीर एलन मस्क हैं जिनकी संपत्ति 15.3 बिलीयन डॉलर है। इसके बाद बर्नार्ड अर्नाल्ट, जेफ बेजोस, बिल गेट्स, वारेन बफेट हैं। सूची के अनुसार छठे और सातवें नंबर पर भारत के गौतम अडानी और मुकेश अंबानी थे। 16 जनवरी 2023 को जारी की गई ऑक्सफैम रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनिया के एक प्रतिशत लोगों ने सभी नए धन का करीब आधा हिस्सा कब्जा कर लिया है। सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों ने 2020 के बाद से बनाई गई 42 ट्रिलियन डॉलर की सभी नई संपत्ति का लगभग दो तिहाई हिस्सा हड़प लिया। यह बाकी 99 प्रतिशत लोगों की तुलना में करीब करीब दोगुना है।

भारत में असमान विकास विकसित और दूसरे समृद्ध देशों की तुलना में कुछ ज्यादा ही है। ऑक्सफैम ने अप्रैल 2023 में “सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट” नाम से एक रिपोर्ट जारी की। जिससे पता चलता है कि भारत में पांच प्रतिशत लोगों के पास देश की 60 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है। जबकि निचली पचास प्रतिशत आबादी के पास केवल तीन प्रतिशत संपत्ति है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2012 और 2021 के बीच भारत में जितनी संपत्ति बनाई गई उसका चालीस प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत अरबपतियों के पास गया। रिपोर्ट के अनुसार 2020 में भारत में कुल 102 अरबपति थे जो 2023 में बढ़कर 166 हो गए। एक तरफ तो अमीरों की संपत्ति बढ़ रही है दूसरी तरफ गरीबों की गरीबी और उनकी संख्या बढ़ रही है। 2018 में भूखे भारतीयों की संख्या 190 मिलीयन थी जो 2022 में बढ़कर 350 मिलीयन हो गई। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट मे कहा है कि 2022 में पांच साल से कम उम्र के जितने बच्चों के मौत हुई उनमें से 65 प्रतिशत मौतें व्यापक भूख के कारण हुईं।

तो आप देख रहे हैं कि एक तरफ अमीर और अमीर हो रहे हैं और दूसरी तरफ गरीब और ज्यादा गरीब। कुछ आंकड़े जरूर ये दावा कर रहे हैं कि भारत में गरीबों की संख्या में कमी आई है जबकि कुछ दूसरे आंकड़े इसके विपरीत हैं। इस बारे में नीति आयोग की एक रिपोर्ट को भी देखना अच्छा रहेगा। करीब दो साल पहले नीति आयोग की एक रिपोर्ट आई थी। जिससे पता चला कि भारत के सबसे गरीब पांच राज्यों में से चार वो हैं जहां डबल इंजन की सरकारें हैं। पहले नंबर पर बिहार ( तब बिहार में भी बीजेपी और जनता दल यू का शासन था ), दूसरे नंबर पर झारखंड, तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और चौथे नंबर पर मध्य प्रदेश है। इसमें भी चौंकाने वाली बात ये थी कि बिहार की 52 प्रतिशत झारखंड की 42 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश की 38 प्रतिशत और मध्य प्रदेश की 37 प्रतिशत आबादी गरीब है। रिपोर्ट के मुताबिक जहां बिहार की आधी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है वहीं मध्य प्रदेश के छह आदिवासी जिलों की आधी से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। केवल इन्ही पांच राज्यों की आबादी में करीब दस करोड़ गरीब लोग रह रहे हैं।  

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आखिर में हम इतना ही कह सकते हैं कि बड़ी अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है लोगों की प्रति व्यक्ति आय में सुधार होना और उसमें भी एकसमान सुधार होना। वरना बड़ी अर्थव्यवस्था का लाभ अडानी-अंबानी समेत देश के गिने-चुने अरबपतियों और धनिक वर्ग को मिलेगा। गरीब को हमेशा खाने के लाले पड़े रहेंगे और घुटना मोड़कर सोना पड़ेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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