तिरछी नज़र: भागा भागा भागा राजा…
भरी दोपहर का समय था। तारीख थी 20 जुलाई, 2026। सरकार जी अपने घर 7, लोक कल्याण मार्ग हांफते हांफते पहुँचे। जब सरकार जी सरकार जी बने तो उन्होंने अपने घर के मार्ग का नाम लोक कल्याण मार्ग रख लिया। अब वे लोक कल्याण के मार्ग चलें, न चलें, लोक कल्याण मार्ग पर ही चलते हैं। लोक कल्याण मार्ग से ही जाते हैं और लोक कल्याण मार्ग से ही वापिस आते हैं। सरकार जी का हर रोज लोक कल्याण करते रहने का यह अनोखा तरीका है।
सरकार जी के घर पहुंचते ही उनका प्रिय सेवक एक ट्रे में एक गिलास पानी और एक प्लेट में काजू किशमिश ले कर पहुंचा। एक दूसरा सेवक अपने दोनों हाथों में दो दो, मतलब कुल चार बिल्कुल नई जैकेट ले कर पहुंच गया। उसे पता था कि सरकार जी घर आए हैं तो कपड़े तो बदलेंगे ही। कई बार तो घर के बाहर भी कपड़े बदल लेते हैं। क्या पता अब सरकार जी बदल कर कौन सी जैकेट पहन लें।
जब सरकार जी घर पहुँचे तो थर थर कांप रहे थे। इतनी जोर से कांप रहे थे कि जब उनके हाथ में पानी का गिलास पकड़ाया गया तो आधे से अधिक पानी गिलास से छलक ही गया। अगर सेवक थाम न लेता तो शायद गिलास जमीन पर ही गिर जाता।
सरकार जी अभी अभी सेंट्रल विस्टा के पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर आए थे। शायद पुराने संसद भवन में इमरजेंसी के समय भागने के लिए पिछला दरवाजा नहीं था। यदि रहा भी होगा तो जाम हो ही गया होगा क्योंकि जबसे पुराना वाला संसद भवन बना था किसी ने भी उसका इस्तेमाल ही नहीं किया था। इसीलिए सरकार जी ने नया संसद भवन बनवाया था। वैसे सरकार जी इमरजेंसी शब्द से बहुत घृणा करते हैं पर इमरजेंसी के वक़्त बैक डोर से निकलने में भी माहिर हैं।
सेवकों को लगा, सरकार जी बहुत गुस्से में हैं। पर नहीं, सरकार जी गुस्से में नहीं थे, सरकार जी बहुत डरे हुए थे। बहुत डरे हुए। इतने डरे हुए कि उन्हें, अपने पांच सात लेयर की सुरक्षा वाले घर में पहुंच भी डर से कांप रहे थे। इस डर की वजह से ही वे सेंट्रल विस्टा से भाग कर अपने घर पहुँचे थे। यह पहली बार नहीं था कि सरकार जी डरे थे। वे इसी सेंट्रल विस्टा में एक बार पहले भी डरे थे। डरे थे जब कुछ विपक्षी महिला सांसदों ने संसद में उन्हें उनकी सीट पर घेर लिया था। उन्हें डर था कि ये महिला सांसद उनका मुँह ना नोच लें, उन्हें काट ना खाएं, अपनी हेयर पिनों से उन पर आक्रमण न कर दें। उस दिन भी आदरणीय लोकसभा अध्यक्ष जी ने उन्हें उन महिला सांसदों से बचा कर उनके घर पहुंचा दिया था। उस समय सरकार जी ने चाहा था कि वे कानून बना दें कि कोई भी महिला सांसद बढ़े हुए नाखून नहीं रखेगी, दाँत घिसवा कर ही संसद आएगी और बालों में हेयर पिन का इस्तेमाल नहीं करेगी पर उनकी ही कुछ महिला सांसदों ने इसके लिए मना कर दिया।
किस्सा तो यह भी है कि एक बार, जब वे देश के नहीं, अपने प्रदेश के सरकार जी होते थे तो उनके सरकारी निवास के समीप एक ट्रक का टायर फट गया था। रात का समय था और सरकार जी अपने शयन कक्ष में सो रहे थे। टायर फटा तो सरकार जी को लगा बम फटा है। तो वे भाग कर बाथरूम में छिप गए थे। जब उनके सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें बताया कि सर, वह बम विस्फोट नहीं था, ट्रक का टायर फटा था, तब जा कर सरकार जी अपने बिस्तर पर लौटे और सो पाए।
इस बार डर की वजह थे वे निहत्थे नौजवान, वे कॉकरोच, वे छात्र जो पिछले बीस से अधिक दिनों से जंतर मंतर पर धरना दिये बैठे हुए थे, अनशन पर थे, भूख हड़ताल पर थे और 20 जुलाई के दिन संसद की ओर मार्च कर रहे थे।
सरकार जी को डर यह नहीं था कि ये छात्र, ये बच्चे संसद तक पहुंच कर उन्हें घेर लेंगे। उनके ग्रह मंत्री जी की पुलिस मुस्तैद थी। उन्हें आदेश था कि इन्हें आगे नहीं बढ़ने देना है। बेरीकेड की रोक है, लाठी की मार है, पानी की धार है, और आगे बढ़े तो अश्रु गैस के गोले हैं, पेलट गन के छर्रे हैं। फिर भी नहीं रुके तो रक्षा मंत्री जी की सेना भी तैयार है। डर उन्हें यह था कि इन बच्चों ने, छात्र छात्राओं ने, जनता ने डरना छोड़ दिया है। और तानाशाह को सबसे बड़ा डर यही होता है कि जनता उससे डरना छोड़ दे। जनता अपनी आवाज़ उठाने लगे। जनता अपना हक मांगने लगे। जनता जवाबदेही फिक्स करने लगे।
डर को लेकर दो कहावतें मशहूर हैं। एक है डर के आगे जीत है और दूसरी जो डरा वो मरा। पहली आंदोलनकारियों पर सच बैठी है और दूसरी वाली सरकार जी पर।
(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं)
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